Post – 2016-07-22

इस हवा में सड़न या घुटन ना रहे।
ना रहे एकदम, एकदम ना रहे।

ऐसी दुनिया बनाओ मेरे दोस्तो
हम रहें, ना रहें, पेचो-खम ना रहे।

जब गले से मिलें दिल में घड़कन भी हो
कोई अफसोस कोई जलन ना रहे।

नाबराबर हैं जो वे बराबर चलें
कोई ओछा गिरा एकदम ना रहे ।

सबको इज्जत मिले सबको औसर मिले
जन्म से कोई भारी या कम ना रहे।

हम हंसें तो उषा का परस बास हो
झेंप शामिल न हो आंख नम ना रहे।

हम बढ़े फिर तो आगे ही आगे चले
रुकता डिगता ठिठकता कदम ना रहे।

यह तो खाहिश है भगवान की आज पर
यह सपन कल भी केवल सपन ना रहे।।
21 जुलाई 16

यह दिल जैसा था वैसा अब नहीं है
कहा जिसने भी हो, जुमला सही है

जो देते जान थे, वे दर गुजर हैं
बचों में अब बची चाहत नहीं है।

पढ़ो इन झुर्रियों को, गौर से तुम
शिकन की हर इबारत कुछ नई है

बताओगे समझ में आ गई तो
कि किसने कितनी गहरी चोट दी है।

मरेंगे अब तुम्‍हीं पर नाजनीना
मगर कुछ और कहने को पड़ी है।

जरा बन ठन के आना तुम अदा से
अभी से बढ़ रही क्यों बेकली है।

अरे भगवान इतना मनचला है
कि मैयत से भी करता दिल्लगी है।
२१ जुलाई २०१६

Post – 2016-07-21

यह लाचारी सी लाचारी यह मजबूरी सी मजबूरी।
खपा सकता हूं सर लेकिन इन्‍हें समझा नहीं सकता।

मेरे मित्र ने कल की खीझ उतारते हुए, शास्‍त्री के आते ही चुटकी ली, ‘शास्‍त्री जी आप अपनी ही आग से इतने गरम क्‍यों हो जाते हैं कि भाप की तरह उड़ कर हमारे सामने से गायब हो जाते है।”

शास्‍त्री जी ने उलट कर दे मारा, ”बरसने के लिए श्रीमान।”

मैंने ताली बजाई तो हंसी में तीनों शामिल हो गए। मित्र ने चारा फेंका, ”मुझे आपकी प्रतिभा को देख कर हैरानी होती है कि आप कहां पहुंच गए। अब भी देर नहीं हुई है। हमारे साथ होते तो इस प्रतिभा के बल पर कहां के कहां पहुंच गए होते। जिन्‍दगी क्‍यों खराब करते हैं,, वहां कोई घास नहीं डालने वाला।”

”छोटे मुंह बड़ी बात होगी सर, अाप अपने पर न लें, पर हमें घास खाने की आदत नहीं। हम कबीर साहब की मान कर अपनी रूखी सूखी से ही काम चला लेते हैं और उसी में खुश रहते हैं। हां, सुनने में आता है कि कुछ खास सोच या फेंफड़े का जोर दिखाने वालों को जाने कहां कहां से चारा डाला जा रहा है और नतीजा यह है कि वे चारे के सिवा भी कुछ खाया जाता है, यह तक भूल चुके हैं।”

आज तो कमाल कर दिया शास्‍त्री तुमने, मैंने ‘जी’ के तकल्‍लुफ को हटाते हुए कहा, ‘पर यह बताओ कि इतनी समझ रखते हुए आप इतने छोटे दिल के क्‍यों हो गए है कि हिन्‍दुओं के हित या अहित से आगे कुछ दीखता ही नहीं और इसीलिए दूसरे आपको संकीर्ण राष्‍ट्रवादी ही नहीं मानते, खतरनाक भी मानते हैं। और यह बात भी गलत नहीं है कि अमेरिका ने आप लोगों को ऐसी सूची में डाल रखा है, जिससे दुनिया को खतरा है।”

”डाक्‍साब, दिल पर हाथ रख कर बताइये, क्‍या जितने लोग हमें संकीर्ण मानते हैं उनकी मानवता हिन्‍दू सहित है या हिन्‍दू रहित? यदि हिन्‍दू सहित है तो हिन्‍दुओं पर इस देश में या कहीं अन्‍यत्र कुछ भी बीते, और बीता तो बहुत बुरा है, उस पर किसी ने कोई आह भरी है? आपके साहित्‍यकारों ने उनकी पीड़ा पर कोई कहानी, लेख, गजल, गीत कभी लिखा है भीडिया ने उनकी पीड़ा को उसी तरह विज्ञापित किया है जैसे किसी भी अहिन्‍दू को क्षति पहुंचने की संभावना तक पर करने लगता है? क्‍या यह सच नहीं कि हिन्‍दू को अपराधी सिद्ध करने के लिए आप फरेब तक करते हैं, अकारण उत्‍तेजना तक फैलाते हैं, पर उसके नायकों तक के नाम से आप को नफरत हो जाती है?”

मेरा मित्र अपने को रोक न सका, ”अकारण तो कुछ नहीं होता, बिना आग के धुआं नहीं उठता।”

”आप बदनाम तो मुझे करते हैं, पर रहते उस युग में हैं जब यत्र यत्र धूमो तत्र तत्र वह्नि: का मुहावरा चलता था और लोग प्रचारशक्ति के बल पर धुंध या फ्यूम को धुंआ सिद्ध करने की कला का विकास नहीं कर पाए थे। आज विचार और संचार माध्‍यम जाने किसकी शह पर, उससे अधिक भ्रामक खबरें प्रसारित और प्रदर्शित कर रहे हैं जो सूचना तन्‍त्र के अभाव या अनुपस्थिति के दौर में द्वारा हुआ करता था? इसमें राष्‍ट्रीय सुर्खाब वाले पत्र तक शामिल हो जाते हैं, जब कि दूसरी जघन्‍य घटनाओं का कोने में जिक्र करके भूल जाते हैं या उन्‍हें दबा देते हैं या अपव्‍याख्‍या से नष्‍ट कर देते हैं। कारण तो है, उनके कुछ कहने का भी और छिपाने का भी और तरह तोड़ मरोड़ कर कूड़दान में फेंकने का भी और कारण इतना गूढ़ है कि इसका पूरा पता हमारे खुफिया तन्‍त्र को भी नहीं लग पाता।”

”आप गोल मटोल बातें कर रहे हैं। सचाई तो यह है कि हिन्‍दू संगठनों से जुडे् लाेग ही राजनीतिक लाभ के लिए कहानियां गढ़ते हैं, प्‍लांट करते हैं, हंगामा करते हैं, और देश में अस्थिरता का वातावरण पैदा कर देते हैं और उसका विरोध होता है तो आप कहते हैं राष्‍ट्रविरोधी वातावरण तैयार किया जा रहा है। मैं ऐसे एक क्‍या सौ दृष्‍टान्‍त दे सकता हूं, आप दो दे कर दिखाइये।” अब मेरा मित्र सचमुच तैश में आ गया था। मामला अब हाजिरजवाबी का नहीं रह गया था।

”देखिए सर आग लगाने वाली समस्‍याओं पर लुकाठा ले कर विचार नहीं किया जा सकता। ठंढे दिमाग से सोचना होता है। आवेश में कोई दूसरे की बात सुनने को तैयार नहीं होता इसलिए मैं जो भी कहूंगा उसकी सचाई को पूरा सुनने से पहले ही नकारने पर आपका अधिक जोर होगा, समझने पर कम या बिल्‍कुल नहीं। समाचार तो रोज ही एक से अधिक ऐसे होते हैं, पर मैं अभी आज के ही अखबार की एक रपट को लेता हूं। एक आयोजन चल रहा है दो मुस्लिम नौजवान मोटर सायकिल से आते हैं गोलियां चला कर आयोजन को तितर बितर कर देते हैं, भारत विरोधी और पाकिस्‍तान जिन्‍दाबाद के नारे लगाते हैं पर इसी बीच पकड़ लिए जाते हैं, और आपके अखबार वे जो भी बहाना बनाते हैं उसे कारण मान कर लोगों की नजर में उन्‍हें ऐसे मासूम बना देते हैं जो फेसबुक पर उसके वीडियो से लाइक बटोरना चाहते थे। इसमें सारे माध्‍यम एक सुर में मासूमियत की एक ही तस्‍वीर पेश कर रहे हैंं।”

मित्र से रहा न गया तो बोल पड़ा, ”आप क्‍या समझते हैं ऐसा नहीं हो सकता।”

”मैं इतना समझदार नहीं हूं कि सोच लूं कि जो मेरी समझ में आया उसके अलावा कुछ और नहीं हो सकता । मैं कहता हूं, यदि इतने छोटे प्रलोभन पर युवा एेसा कर सकते हैं तो हंगामा कराने और उनके समर्थन में आनन फानन में हाजिर हो जाने वाले नेताओं के लूट खसोट से जुटाए गए अपार काले धन की महिमा से पूरे देश में, विभिन्‍न संस्‍थाओं में ऐसा हो सकता है या नहीं। यदि ऐसा हो सकता है तो इसे आप राष्‍ट्रव्‍यापी असंतोष, जन विक्षोभ आदि कह कर कैसे प्रचारित कर सकते है। इसका जवाब आपके पास है ?”

मेरे मित्र से कुछ कहते न बने । शास्‍त्री चालू हो गया, ”क्‍या आपको पता नहीं है कि कश्‍मीर का विकास वहां व्‍याप्‍त अशांति और अस्थिरता के कारण दशकों से रुका पड़ा है, इसलिए उसकी सबसे बड़ी समस्‍या नौजवानों की बेकारी है, इस लिए उनको मामूली प्रलोभन से कोई भी गुमराह करके उनसे कुछ भी करा सकता है? पता है केन्‍द्र से उसके नेताओं का दिल खुश रखने के लिए भारी मदद पहले से दी जाती रही है और अशान्ति के कारण वह विकास कार्यों पर लग नहीं सकती थी इसलिए उसे वे शान्ति से अपनी जेब में डाल लेते रहे है? मौसेरे भाइयों का मामला था इसलिए जानते हुए भी केन्‍द्र चुप रहता था और मदद जारी रहती थी।

” क्‍या आप को मालूम नहीं है कि पाकिस्‍तान सहित दूसरे कई देशों से वहां अलगाववाद की खेती करने वालों को खाद पानी के लिए अकूत धन दिया जाता रहा है और उसका खाद वाला पैसा बांट कर वे जब जी में आता था तब अराजकता फैला देते रहे हैं? कि बेकार नौजवानों का घाटी में मनरेगा जैसा लाभ नारों की उूंचाई और आवर्तिता पर काम के दर से मिलता रहा है? पता नहीं है कि इसका उचित समाधान खोजने में नाकाम नेतृत्‍व सेना के माध्‍यम से उसी तरह का चारा फेंक कर भड़के हुए या भड़कने और भड़काने वाले नौजवानों काे फुसलाती रही है इसलिए यह भावनात्‍मक ज्‍वार भाटे का ऐसा खेल बन चुका था जिससे अलगाववाद के फायदे अधिक और लगाव के फायदे कम दिखाई पड़ते थे? क्‍या आपको पता नहीं है कि इस पर पहली बार रोक लगी है और पहली बार सही तरीका अपनाया गया है जिसके सफल होने पर इसके दूरगामी अच्‍छे नतीजे आएंगे? क्‍या आपको पता है…”

मित्र का धीरज खत्‍म हो गया पर उसने इस बार स्‍वर को संयत ही रखा, ”आप छरों से छलनी होती पीठों, अन्‍धी होती आंखो और बीच बीच में होने वाली मौतों को सही तरीका बता रहे है? आप लोगों का सही तरीका यही है?”

शास्‍त्री या तो बीच में टोकने के कारण या इस घटना की उग्रता के कारण, अपनी प्रतिज्ञा भूल कर खुद भी कुछ गरम हो गया, ”आप ने अमे‍रिका का इतिहास पढ़ा है। जानते हैं वहां के महानतम राष्‍ट्रपतियों में एक का नाम अब्राहम लिंकन है और उसने दासों की पीड़ा से कातर हो कर और कोई चारा न रह जाने पर गृहयुद्ध का विकल्‍प चुना था। कहीं से पता लगाइये उसमें कितने लोगों की, गोरों के हाथों ही कितने गोरों की जान गई थी क्‍योंकि हथियार वहां नागरिकों के पास सदा से रहे हैं। उन्‍हें यह करना पड़ा क्‍योंकि न्‍याय और राष्‍ट्रहित के लिए वह जरूरी था। कठोर विकल्‍प मनोरंजन के लिए नहीं चुने जाते, विवश हो कर चुने जाते है और बाद में उसके परिणाम अच्‍छे होते हैं। दक्षिण के जिन राज्‍यों ने एक साथ बागी तेवर अपना लिया था वहां भी आज लिंकन को उसी आदर से याद किया जाता है जैसे वाशिंगटन को। जिन महान विभूतियों का बस्‍ट एक साथ एक शिखर पर अंकित है उनमें त्‍याग, तपस्‍या, समर्पण और राष्‍ट्रनिष्‍ठा का प्रतीक लिंकन भी एक हैं।”

मेरा मित्र अपनी हंसी को रोक नहीं पाया, ”किस जमाने की बात कर रहे हो भाई और फिर यह असंतोष तो पूरे भारत में यत्र तत्र फैल चुका है।”

”फैल चुका है, अर्थात फैलाया गया है, अर्थात आप इसके फैलाने और राष्‍ट्र के लिए समस्‍याएं पैदा करने वालों के साथ हैं, पर एक बात आप स्‍वीकार नहीं करेंगे कि आप , मेरा मतलब है आप नहीं सर, आपको तो मैं अच्‍छी तरह जानता हूें पर, आप जिनसे सहानुभूति रखते हैं और जिन्‍हें समझदार समझते हैं, वे यह नहीं जानते कि टुकड़ों के लोभ में वे राष्‍ट्र के अहित की अमेरिकी योजना को पूरा कर रहे हैं।वे भारत के नागरिक हो कर भी अमेरिका के भाड़े के सैनिक हैं।’

मित्र अपनी हंसी पर काबू नहीं रख सका, हंसी के साथ ताली भी बजाने लगा। हंसी तो उसकी चिडि़यों को उड़ाने वाली होती ही है, ”अमेरिका का।”

”आप तो, क्षमा करें, मुझसे अभद्रता हो गई होती। अभी अभी। आपके ज्ञान पर शंका तो कर ही नहीं सकता, परन्‍तु आपको ध्‍यान नहीं होगा कि भारत ने जितना कठोर और दृढ़ स्‍टैंड अमेरिका के विरुद्ध इन्द्रा जी के समय में लिया था उतना न उससे पहले लिया गया न बाद में। यह बांग्‍लादेश के मुक्ति संग्राम में अमेरिका की धमकी भरी योजना के कारण था। वह अकेली नेता हैं जिसे किसिंजर गाली देता था क्‍योंकि उन पर उसकी कूटनीति का जादू नहीं चल पाया जो चीन तक पर चल गया। और उसी समय भारत के बाल्‍कनाइजेशन अर्थात टुकडे टुकडं करने की किलपैट्रिक योजना का आरंभ हुआ था। आप सभी लोग जो भारत के टुकड़े टुकड़े करने की विविध योजनाओं पर काम कर रहे हैं, चाहे आप माओ आ चेहरा लगा कर आएं या नक्‍सल का नाम लेते हुए, या मार्क्‍स का, अपने को भारतीय कहते हुए या भारत से अलग तार जोड़ते हुए, आपको यह पता है आप किसकी योजना पर काम कर रहे हैं। एक बात ध्‍यान रखें, अमेरिका की सभी योजनाएं दीर्घकालीन होती हैं और उसने रूसी सैनिकों तक का इस्‍तेमान रूस को नष्‍ट करने के लिए पैसे के बल पर और मिथ्‍याप्रचार के बल पर कर लिया था।”

मेरी तो आंख खुल गई । किलपैट्रिक वाली बात तो मुझे भूल ही गई थी, फिर भी मैं यह तो कई बार कई तरह से कह आया था कि भारतीय मुसलमानों के बीच सीधी या अरब देशों में पहुंचे कामगारों को उनके ही तन्‍त्र द्वारा सिखा पढ़ा कर और उनका पैसा भी पंप करते हुए अपनी परोक्ष पैठ बना कर धर्म और जाति की विभाजन रेखा पर इस देश को तोड़ने का काम उसी की योजना का हिस्‍सा है। मैंने शास्‍त्री को यह सुझाया और कहा, ”भई, अगर आपकी समझ इतनी पैनी है तो कम से कम अपने घर परिवार में यह संदेश तो पहुंचाते कि हिन्‍दू और मुसलमान दोनों एक अधिक ताकतवर दुश्‍मन के निशाने पर हैं और इन्‍हें आपस में मिल कर ही इसका सामना करना होगा।” तो शास्‍त्री ने कहा, डाक्‍साब, आप ठीक कह रहे हैं, पर घृणा की जड़ों को इतनी गहराई में पहुंचा दिया गया है कि मैं अपने लोगों से कहूं तो उनमें से कितनों के गले के नीचे यह बात उतरेगी, यह नहीं जानता। यही बात आप मुसलमानों से कह कर देखिए कोई सुनने को तैयार नहीं होगा और तत्‍काल तैयार हो गया तो भी आंख से ओझल होते ही भूल जाएगा। मैं तो समझता हूं यह सीधी सी बात इन सर को भी समझाना आसान नहीं हे।‘’

Post – 2016-07-21

गली में उसके जाे कदम रखा
जबान बन्‍द आंख नम रखा।।
मैंने जब तुमको प्‍यार से देखा
साथ ही साथ इक भरम रखा ।
तुम कई के हो फिर भी मेरे हो
निगाह पैनी दिल नरम रखा।
रखता सब कुछ जगह अगर होती
अपनी चाहत से बहुत कम रखा
फिर भी इस दिल में भीड़ है इतनी
गुल में मिलता है गुलबदन रखा।
उसको भी लाओ उसकी माप तो लूं
उस तरफ को है क्‍यों कफन रखा।
तू है भगवान मौत से भी दराज
मैंने सौ तरह जांच कर रखा ।।
20 जुलाई 16

Post – 2016-07-20

ऐसी हठ जैसी गांठि पानी पड़े सन की

”मैने तुम्‍हारी सुबूही देखी। तुम सुबूही लिखते ही नहीं हो, लगता है आज कल सुबह सुबह चढ़ा भी लेते हो, नहीं तो इस गली में पांव न रखते। यह पुराने पापियों का इलाका है, नौसिखुओं पर रोड़े पत्‍थर पड़ते हैं।मुझे तुमसे बहुत सारे सवाल करने हैं, परन्‍तु सबसे पहले शास्‍त्री जी से। कल इन्‍होंने तुलसी को आसमान पर तो चढ़ा दिया और बोर करके भाग लिए, परन्‍तु मेेरे इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि वह प्रतिक्रियावादी थे।”

शास्‍त्री जी ने मुस्‍कराते हुए कहा, ”दिया तो था, परन्‍तु आपको समझा नहीं पाया। मैंने कहा था, कबीर बाहरी या कहें सामाजिक समस्‍याओं का समाधान करने के लिए भीतर की यात्रा करते है और ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं। तुलसी कहते हैं अन्‍तर्यामी ब्र‍ह्म को जानने और ध्‍यान और साधना में ममय बर्वाद करने की जगह काम करने वाले अवतारी राम को आदर्श मानते हुए अपने काम में जुट जाओ। अन्‍तरजानिहु तें बड़ बाहरजामी हैं राम जे नाम लिए ते’। साधना में जीवन बर्वाद हो जाता है और आदमी और किसी काम का नहीं रहता। वह राम का नाम ले कर अपना काम करने वाला रास्‍ता दिखाते हैं और उसके लिए बहुत ध्‍यान और पूजा की भी जरूरत नहीं, भाव कुभाव अनख आलसहू, नाम जपत मंगल दिसि दसहू। वह एक किसान की मोटी समझ रखते हैं। ”

मित्र ने बिना किसी उत्‍तेजना या व्‍यंग्‍य के कहा, ”मेरे कहने में ही चूक रह गई। जिस अर्थ में मैं तुलसी को प्रतिक्रिया वादी मानता हूं और दूसरे लोग भी मानते हैं वह कबीर से सीधे जुड़ी हुई है। यदि हम किसी यात्रा में आगे बढ़ आए हैं और कोई दूसरा हमें खींच कर पीछे ले जाय तो हम उसे प्रतिक्रियावादी कहेंगे।”

शास्‍त्री जी चुपचाप सुनते रहे।

”कबीर ने अन्‍धविश्‍वास और बाहद्याचार के स्‍थान पर तार्किकता की प्रतिष्‍ठा की। आध्‍यात्मिक तुष्टि के लिए एक ऐसी साधना का समर्थन किया जो सर्वसाध्‍य थी और जिस पर कोई रोकटोक न थी। जीवन को ईमानदारी से जीने को, पूरी लगन से काम करने को ही पूजा का स्‍थानापन्‍न बना दिया। व्‍यवहार में कहा, पहले देखो जो काम कर रहे हो उसका परिणाम क्‍या होगा, फिर उसे करो। वह जप माला छापा तिलक की ही व्‍यर्थता की बात नहीं करते हैं अपितु दाढी बढ़ाय जोगी हो गए बकरा की भी बात करते हैं और प्रकारान्‍तर से दाढ़ी रखने वालों की मूर्खता की भी बात करते हैं। दोनों को भटका हुआ सिद्ध करके एक नए पंथ की आवश्‍यकता पर बल देते हैं तो तर्क, अनुभव और सार्थकता पर आधारित मानवीयता की हिमायत करते हैं। पुस्‍तकीय विधानों की चिन्‍ता नहीं करते और अपने ज्ञान पर भरोसा करने का पाठ सुझाते हैंं। तुलसी इस पूरे क्रम को उलट देते हैं। वह आगे नहीं बढ़ते पीछे लौट जाते हैं। कबीर प्रगतिशील हैं और तुलसी प्रतिक्रि‍यावादी। कबीर के सामने बहुत छोटे।”

अब तो शास्‍त्री जी को कुछ कहना ही था, ”देखिए श्रीमन्, मुझसे तो आप भी बहुत बड़े और अनुभवी हैं, परन्‍तु आप ही नहीं, जिस विचारधारा से आप जुड़े हैं उसके दोषाें से उससे जुड़ा कोई व्‍यक्ति मुक्‍त नहीं हो सकता। आपकी सोच से हमारी सोच अलग रही है। आप मानते हैं एक सही है और दूसरा उससे भिन्‍न है तो दूसरा गलत होगा ही। सही के दो या अनेक रूप हो सकते हैं यह व्‍यवहार में तो आप को दिखाई देता है, पर सिद्धान्‍त में आप लोग भूल जाते हैं। यह एकेश्‍वरवादी सीमा है और इसीलिए मैं डाक्‍साब के उस मत से सहमत हूें कि मार्क्‍सवाद की आत्‍मा सामी है। यही कारण है कि आप पर लीगी जादू आसानी से चल गया। हम बहुदेववादी संस्‍क़ृति के लोग हैं जो संहार नहीं करती, भिन्‍न के लिए जगह दे देती है। इसलिए ही वह उदारता और खुलापन हमारे यहां बचा रहा है जब कि संत हों या सिद्ध या इस्‍लाम या बौद्ध कहीं भी यह बच नहीं पाया। हमारे यहां विष्‍णु से भिन्‍न भूमिका रुद्र की है और किंचित विरोधी भी। ब्रह्मा की अलग है ही। पर हम तीनों की महिमा के कायल है। इसलिए हमारे लिए कबीर साहब भी महान हैं और तुलसी भी। आप तुलसी को छोटा बनाए बिना कबीर को बड़ा बना ही नहीं पाते। एक को जीवन देने के लिए आप लोगों को दूसरे की हत्‍या करनी पड़ती है, एक को आदर देने के लिए दूसरे का अपमान करना जरूरी हो जाता है।

”अब रही आपकी प्रतिक्रियावादिता और प्रगतिशीलता का। आप लोगों ने उस भाषा से ही मुंह फेर लिया जिसमें शब्‍द विवेक पर बहुत ध्‍यान दिया गया है और यह कहा गया है कि कोई भी दो शब्‍द जो एक ही चीज के लिए प्रयोग में आते हैं, उनका अर्थ ठीक एक नहीं हो सकता। वे उसी के किन्‍हीं गुणों से जुड़े हो सकते हैं। इस विवेकहीनता के कारण आप लोग सही सोचना तो दूर सही शब्दों का इस्‍तेमाल तक नहीं कर पाते। आपके पास मूल्‍यांकन की दो श्रेणियां है, एक प्रशंसा की दूसरी भर्त्‍सना की। जिसकी भर्त्‍सना करनी है उसके लिए उस टोकरी में से निकाल कर कोई पत्‍थर फेंक दो मतलब ताे चोट पहुंचाने से ही है न। आप के लिए शब्‍द भी पत्‍थर ही हैं, डाक्‍साब को कहना होता तो पता नहीं इसे किस अन्‍दाज से कहते, पर मैं तो आप से छोटा हूं मैं नहीं कह सकता कि जिस दिमाग से शब्‍द भी पत्‍थर बन कर निकलते हैं, वह सचमुच है क्‍या।

”आपने तुलसी को प्रतिकियावादी ठहरा दिया। समझाते हुए बताया कि कबीर ने समाज को जहां पहुंचाया था वहां से उसे वह पीछे ले गए, अर्थात् पश्‍चगमन किया। पश्‍चगमन में एक निर्णय होता है, किचार होता है और उसके परिणाम के अनुसार ही हम उसका श्रेय या अपयश किसी को दे सकते हें। अभी तीन दिन पहले डाक्‍साब ने मुझे कहा था एक फिल्‍मी इबारत को याद करने को, राह भूले थे कहा से हम और समझाया था कि जब इसका उत्‍तर मिल जाय तो पहले उस बिन्‍दु पर लौटना होगा और सही रास्‍ते का चुनाब करना होगा और यदि रास्‍ता भी न हो तो बनाना पड़ेंगा। सैन्‍य विज्ञान में इसे खतरनाक बिन्‍दु से पीछे लौटना या रिट्रीट कहते हैं। यह एक वैज्ञानिक क्रिया है। परन्‍तु क्‍या तुलसी ने विभिन्‍न सन्‍त मतों में जो लोग प्रवेश कर चुके थे उन्‍हें वहां से वापस लौटने को कहा। नहीं। वे वहीं बने रहे। उन पर उनका अधिकार भी नहीं था। उनकी आवाज भी उनको सुनाई नहीं दी। इसलिए प्रतिगामी शब्‍द भी उनके लिए समीचीन नहीं है। ,,

”परन्‍तु प्रतिक्रियावाद तो होता ही नहीं। क्रिया होती है और प्रतिक्रिया होती है और यह एक भौतिक नियम है जिससे जड़ तत्‍व भी प्रभावित होते है। क्रिया के साथ निर्णय और उत्‍तरदायित्‍व सब कुछ आता है, प्रतिक्रिया तो अवश्‍यंभावी है। इसका वाद कैसे होगा। ताे क्रियावाद भी नहीं होता, प्रतिक्रियावाद भी नहीं होता, यह न तो तुलसी ने किया, न उनसे हुआ।

”तुलसी सेतुबांधते हैं। यह देख कर कि एक संकट आ गया है, उससे निबटने के लिए जो बचा हिन्‍दू समाज है उसको एक मर्यादा में बांधते हैं। वह मर्यादावादी हैं। मर्यादा अच्‍छी और बुरी नहीं होती, एक सीमांकन होता है। डाक्‍साब ने ही लिखा है कि बहुत प्राचीन काल में क्षेत्र विभाजन में यह निर्णय किया गया था कि सभी अपनी सीमा में ही आखेट आदि करेंगे, बाहर नहीं जाएंगे। यदि उनके तीर से मारा शिकार भी दूसरे क्षेत्र में जा गिरा तो उस पर दावा करने के लिए भी उसमें प्रवेश नहीं करेंगे। गए तो उनकी जान पर बन आएगी। इसी के कारण बालि सुग्रीव के कमजोर होते हुए भी उसके क्षेत्र में आ कर उसे हानि पहुंचाने का साहस नहीं कर सकता था। जिस सीमा की रक्षा के लिए लोग उसका उल्‍लंघन करने वालों की जान ले और दे सकते है उसे ही मर्यादा कहते हैं। इसे मेड़ बांधना या सेतु बांधना भी कह सकते हैं। इसलिए मुझे लगता है आप लोग जैसे लोगों की हत्‍या करके युग बदलना चाहते हैं उसी तरह शबदों को काठ पत्‍थर की तरह प्रयोग में लाते हुए केवल विक्षोभ पैदा करना जानते हैं, विचार और जागृति पैदा करना नहीं जानते या जानते हैं तो ऐसा चाहते नहीं। आप लोग आग लगाना जानते है, और जब तक आग नहीं लगती तब तक धुंए और धुंध से भी प्रसन्‍न रह लेते हैं, परन्‍तु समाज को प्रकाश नही दे पाते।

”अब प्रश्‍न उठेगा कि तुलसीदास दूरदर्शी थे या यथास्थित‍ि‍वादी या पुरातनपंथी और उन्‍होंने जिन खतरों को भांपा था वे वास्‍तविक थे या काल्‍पनिक और इनके परिणाम शुभ थे या अशुभ। हम नहीं जानते कि तुलसीदास के मन में क्‍या विचार प्रबल रहा हो सकता है। एक तो यह कि इस तरह तो जितने संत और योगी हैं उनका संप्रदाय बन कर पूरा समाज खंड खंड हो जाएगा, अपने कोटर में बन्‍द भी हो जाएगा। दूसरा संकट कि ये सभी जिस दिशा में बढ़ रहे हैं उसकी अन्तिम परिणति इनका इस्‍लाम में विलीन हो जाना ही हो सकता है जैसा कि योगियों के सामूहिक इस्‍लामीकरण से हुआ था। इस दृष्टि से वह अकेले खड़े हो कर एक महासमर में उतरते हैं और विरोध के ज्‍वार की दिशा को उलट देते हैं। इतना पराक्रम, इनका सा‍हस, इतनी दूरदर्शिता किसी एक मनीषी में हो सकती है, यह सोचते हुए पूरे विश्‍व साहित्‍य पर दृष्टि डालिए, यदि कोई दूसरा कवि मिले तो बताइयेगा। तुलसी की महिमा यह है कि उन्‍होंने कठमुल्‍ले पंडितों के विरोध के बाद भी जो करना था किया, विरोधी विचारधाराओं के प्रहार को झूलते और निष्‍प्रभाव करते हुए ऐसा किया। दूर दर्शिता यह कि आज आप जिस खुलेपन, समावेशिता वगैरह की बात करते हैं वह हिन्‍दू समाज को छोड़ कर न उन मतों में मिलेगा न किसी अन्‍य धर्म में। दलितों को भी विरोध का स्‍वर मुखर करने का अवसर केवल हिन्‍दुत्‍व में है, न इस्‍लाम में, न ईसाइयत में न कहीं अन्‍यत्र। जहां तक छापा और तिलक की बात है, वह सबके साथ जुड़ गया और सबके पास है क्‍योंकि उसके साथ एक सामुदायिक प्रतीकात्‍मकता जुड़ी हुई है। हाल यह कि नानकपंथ जहां पहुंचा वहा अनेक असुविधाओं और भेदभाव के बावजूद सिख पगड़ी और दाढी और केश तक छोड़ने से इन्‍कार करते हैं। तुलसी इस प्रत‍ीकात्‍मकता को उस समय समझते थे और इसे औजार के रूप में प्रयोग करते हैं। वह वेद और पुराण को लंगर के रूप में इस्‍तेमाल करते हैं कि जहाज तूूफान में बह न जाय, पर किसी से पूरी तरह बंध कर नहीं रहते। उनका साहस और निर्भीकता की तो कोई तुलना नहीं। हां, बाद में, बहुत बाद में उर्दू कवियों ने इश्किया दायरा तोड़ते हुए जिस तरह राजनीति के लिए पुराने प्रतीको की आड़ ली, तुलसी उनसे बहुत पहले कलिकाल की आड़ ले कर अपनी बात करते हैं। अब इन पंक्तियों को पढि़ए तो आप को उनकी क्रान्तिकारिता और साहस और राजनीतिक हस्‍तक्षेप की शक्ति सब समझ में आ जाएगी जिसका ढोल बजाया जाता है, नाच नाचा जाता है, तमाशा किया जाता है और अन्‍त में पता चलता है कि उसके पीछे किसका पैसा काम कर रहा था, नाच आदमी रहे थे या पैसा-
गोड़ गंवार नृपाल महि यवन महा महिपाल।
फोड़े सिल लोढ़ा सदन लागे अढुक पहाड़ ।
कायर कूर कुपूत कलि, घर घर सहज डहार ।।
यह साहस किसी अन्‍य कवि में दीखे तो मुझे भी बताइयेगा।

”ऐसा साहस, और ऐसी विनम्रता युक्‍त दृढ़ता – ऐसी हठ जैसी गांठि पानी पड़े सन की।”

शास्‍त्री जी अपने ही कथन के भावावेश में उठ कर खड़े हो गए और चलते,

Post – 2016-07-20

एक नुस्‍खा है घर जलाने का
अच्‍छा मौका है आजमाने का
ितनका ितनका बिखर रहा सा है
हाल ऐसा है आशियाने का ।
जर्रों को आफताब बनना है
कान में उनके यह बताने का
जिन्‍दगी में न कुछ किया न सही
आज है वक्‍त कर दिखाने का ।
नामा भी नाम भी नुमायश भी
और क्‍या चाहिए जमाने का ।
हाथ दो, फिर हुनर सिखाता हूं
राख से घर नया बनाने का।
सूखी बारूद बन रहो साथी
क्रान्ति तो नाम है मिटाने का ।
तुमने भगवान कभी सोचा थां
ऐसा दिन देखने दिखाने का ।।.

Post – 2016-07-19

हम वहां से अजान देते हैं
जहां से लोग जान देते हैं
जानते ही न जान की कीमत
फिर भी देने की ठान लेते है।
थी तो मेरी मगर न मेरी है
”उनकी है जो कि जान लेते हैं।”
गुलामी इतनी पर गरूर में साथ
”आप क्‍यों उनकी मान लेते हैं
”क्‍या मिला आपको कहां से मिला
”यह भी कुछ लोग जान लेते हैं।”
राज भगवान से पूछा तो कहा
‘हम फकत’ लंबी तान लेते है।।’
१९/०७/१६ २३:१७

Post – 2016-07-19

रहिमन फाटे दूध के मथे न माखन होय

शास्‍त्री जी के आने में आज कुछ विलंब हो गया था, फिर भी मेरे मित्र ने चर्चा उन्‍हीं की शुरू कर दी, ”अब तुम समझोगे क्यों मैं इन लोगों पर विश्वास नहीं करता। ये जिसे शैतान समझते हैं उसी जैसा बन कर उसे मिटाना चाहते हैं। इससे शैतानों की संख्या बढ़ती है और इंसानो का जीना मुश्किल होता जाता है।” उसने उन्‍हें दूर से आता हुआ देख लिया था।

”घबराहट में बहुत से उल्‍टे सीधे विचार मन में आते हैं। आदमी जो जो सोचता है वही वही बन नहीं जाता। विषस्य विषमौषधम्, कांटे को कांटा ही निकालता है, या ऐन आई फार ऐन आई, टिट फार टैट, जैसे को तैसा जैसे मुहावरे हमारी चेतना में भरे हुए हैं और स्थिति के अनुरूप समाधान बन कर उपस्थित हो जाते हैं। बेशक ये परिस्थिति को समझने, आैर उसे सुलझाने के अन्य तरीकों पर विचार करने में बाधक भी होते हैं।” मैं अपना वाक्य पूरा करता कि शास्त्री दो चार कदम पहले से ही करबद्ध मुद्रा अपनाते पहुंचे और हमने बातचीत के क्रम में आमने सामने होने के लिए जो दूरी बना ली थी उसी में बैठ गए।

”क्या विचार विमर्श हो रहा था?” शास्‍त्री जी ने हमें बातें करते तो देख ही लिया था।

”हम लोग अाप को कोस रहे थे। मैं बता रहा था शास्त्री जी संस्कृत के विद्वान होने के कारण सूक्तियों के युग में रहते हैं, उस युग से आगे बढ़ने को तैयार ही नहीं होते, जब कि दुनिया सूक्तियों के युग से बहुत आगे चली आई है। हमारी जहन में कई तरह के जीरो आवर्स हैं जिनसे चिपक जाने पर हम इतिहास के किसी मुकाम पर लटके रह जाते हैं। शास्‍त्री जी के पास लटकने के लिए बहुत की खूंटियँा हैं। ”

”सूक्तियाँ तो किसी भी चिन्तक के उत्‍कृष्‍ट विचारों का मणिभाकार रूप हैं। आप ठीक कहते हैं हम संस्कृत के लोग बात बात पर सूक्तियां जड़ देते हैं। हम उस शिक्षा प्रणाली से निकले हैं जिसका अस्तित्‍व लेखन का विकास होने से पहले से है, जिसमें उपयोगी विचारों को पद्यबद्ध करके कंठस्‍थ कर लिया जाता था, शिक्षाप्रद बातों को कहानियों में पिरोकर सुनाया और प्रसारित किया जाता था, जिसमें शिक्षा सार्वभौम थी और शैशव से मां की लोरियों और दादी की कहानियों से आरंभ हो जाती थी, जिसमें साहित्‍यानुराग इतना प्रबल था कि थके लोग भी सोने से पहले कहानियाँ सुनते और सुनाते कहानियों के फेड होेने के साथ सपनों की दुनिया में चले जाते थे। मैं तो बहुत अधिक जानता नहीं पर जितना जानता हूं उसमें सर्वशिक्षा का ऐसा विशद आयोजन दुनिया के किसी अन्‍य देश में नहीं था। बाद में लिखित साहित्‍य आरंभ होने और शिक्षा संस्‍थाओं के खुलने के बाद भी कवियों की रचनाओं का माधुर्य तो काव्‍य रसिकों तक ही सीमित रहता था, परन्‍तु उनके मार्मिक कथनों या सूक्तियों को लोग कंठस्‍थ कर लेते थे और उनका दैनिक व्‍यवहार में उपयोग करते थे। संस्‍कृत का विद्वान साधारण अशिक्षित या नाममात्र को शिक्षित व्‍यक्तियों से बात कर‍ते हुए उनका ही भाव प्रचलित भाषा में बताते हुए अपने कथन की पुष्टि करता था तो इस रास्‍ते वे अशिक्षित समाज में भी मुहावरों, लोकोक्तियों के रूप में फैल जाते थे। मुहावरे और लोकोक्तियां भी तो सूक्तियां ही हैं और ये देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भाषा की दीवारों को पार करते हुए फैले है। वह एक महाशय हैं इमेनो साहब, भाषाविज्ञानी हैं तो उन्‍हें केवल भाषाओं के बीच के ये तार दिखाई दिये और उन्‍होंने इंडिया एेज ए लिग्विस्टिक एरिया की पहचान की और काफी नाम कमाया, पर अगर वह साहित्‍य और संस्‍कृति से भी इतनी ही गहराई से परिचित होते तो कहते इंडिया इस ए कल्‍चरल एरिया, मेंटली इंटीग्रेटेड और फीजिकली वैरिगेटेड और तब कोई मूर्ख यह नहीं कहता कि भारत को तो अंग्रेजों ने एक किया, उससे पहले यहां एकता की अवधारणा थी ही नहीं। यह टुकड़ों में बंंटा था।”

शास्‍त्री जी की इस अन्‍तर्दष्टि पर चकित तो मैं भी था, पर मेरा दोस्‍त तो जैसे ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे। वह चुप हुए तो वह अपने को रोक नहीं पाया, ”शास्‍त्री जी आपने तो कमाल कर दिया। मैं तो आपको संस्‍कृत का आचार्य समझ कर निरा भोंदू समझ बैठा था। आज तो आपने मेरा दिमाग ही घुमा दिया।”

शास्‍त्री जी हाजिरजवाबी में किसी से कम नहीं हैं, ”अभी तो आधा ही घूमा है, पूरा घूम जाय तो कल से अगले पार्क में शाखा में चले आइएगा।”

एक साथ तीनों ने ठहाका लगाया और मेरा दोस्‍त साथ ही तालियां भी बजाने लगा, ”भई मान गया। सूक्तियों को आप ने मणिभाकार कहा तो मैंने सोचा सूक्तियों से भरे आपके दिमाग में पत्‍थर ही पत्थर भरा होगा, लेकिन अब तो लगता है उन्‍हें मोम से चिपका कर रखा गया है।”

”देखिए श्रीमन, सूक्तियों के लिए क्‍या कहा था एक कवि ने, कहा था, ये ज्ञान के शिखर हैं। इनका भारत को शिक्षित करने में बहुत योगदान रहा है। कविता सभी कर लेते हैं, सूक्तियां कुछ ही प्रतिभाशाली कवि गढ़ पाते हैं। इनका आकर्षण भी अपार है। यह जो तुलसीदास काे और इनसे पहले वाल्‍मीकि और व्‍यास को लोग इतना आदर देते हैं वह इसलिए नहीं कि उनमें भक्तिभावना प्रबल हाेती है। महत्‍व इस लिए देते हैं कि इनमें युगों से रक्षित सूक्तियों का भंडार है और केवल रामायण पढ़ कर ही एक अल्‍पशिक्षित व्‍यक्ति भी व्‍यावहारिक मामलों में इतना निपुण हो जाता है और उसके आत्‍मविश्‍वास का स्‍तर इतना ऊपर उठ जाता है कि बड़े बड़े विद्वानों से सिर उठा कर बात करता है। उत्‍तर भारत को शिक्षित करने में तुलसी की जो क्रान्तिकारी भूमिका है, आत्‍मगौरव की रक्षा में उनका जो योगदान है उसके कारण उन्‍हें वह सम्‍मान मिला है जो किसी दूसरे को नहीं मिला।”

”शास्‍त्री जी जैसे उस दिन आपको मस्जिद के नाम पर पार्क की जमीन दबाने की बात याद रही, पर मन्दिर की आड़ में किया गया वही काम भूल गया था, उसी तरह लगता है आप ने तुलसी की प्रतिक्रियावादी भूमिका को कान्तिकारी बता दिया और कबीर को भुला दिया।” मित्र ने चुटकी ली।

”देखिए, कबीर साहब को तुलसी दास के सामने मत खड़ा करें, एक साहब ठहरा दूसरा दास। इसी तरह की भूल लोग सूटेड बूटेड नाना भांति इलीवेटेड बाबा साहेब के सामने आधी धोती के फकीर को खड़ा करके करते हैं। कंह सेवक कंह दास। मैं तो श्रीमान जी आप जैसे ज्ञानी प्रोफेसर के साथ डाक्‍साब को जो जिन्‍दगी भर क्‍लर्की करते रहे और एक बार सोचा कहीं पढ़ाने का काम मिल जाय तो वहां घुसने भी नहीं दिया गया, आपके साथ बैठा देख कर ही घबरा जाता हूं। लेकिन विडंबना देखिए कि डाक्‍टरेट आप ने की और मैं और मुझ जैसे बहुत से लाेग अपनी नादानी में डाक्‍साब डाक्‍साब को ही कहते हैं और आपको श्रीमान कह कर ही सन्‍तोष कर लेना पड़ता है।” मेरे दोस्‍त की ऐसी हालत तो मुझसे फटकार सुनने पर भी न होती रही होगी।

शास्‍त्री जी ने मेरे मित्र का हाथ अपने दोनों हाथों में लिया और कुछ दबे स्‍वर में कहना आरंभ किया, ”देखिए, श्रीमन, हास परिहास की बात अलग है, परन्‍तु मैं कबीर के जीवन और लेखन में एक विसंगति को समझ नहीं पाता या जिस रूप में समझता हूं वह यह है कि कबीर अपनी पीड़ा के गायक है, उनमें वह परदु:ख कातरता नहीं है जो तुलसी में है। कबीर या उनके पिता या दादा जिन भी परिस्थितियों में इस्‍लाम कबूल करने को बाध्‍य हुए वह उनका चुनाव नहीं था फिर भी वह हिन्‍दू नहीं हो सकते थे। उनके संस्‍कार, विचार और आदर्श उपनिषदों से लिए हुए हैं, माध्‍यम कौन से रहे हो सकते हैं, यह हम अधूरे रूप में ही समझ सकते हैं, परन्‍तु जिस मजहब में उन्‍हें डाल दिया गया उसकी रीति नीति को पचा नहीं पाते। उनकी स्थिति ना हिन्‍दू ना मुसलमां की है। वह लोक पीड़ा से कातर नहीं है, उस आध्‍यात्मिक और आत्मिक उच्‍छेदन से विकल हैं। दलितों की वेदना हिन्‍दुओं की अस्‍पृश्यता की निन्‍दा में व्‍यक्‍त होती है, पर उनकी आर्थिक अधोगति या किसी की आर्थिक दुर्दशा की ओर उनका ध्‍यान नहीं जाता क्‍योंकि बुनकर अपने खाने पीने का इन्‍तजाम अपने पेशे से कर लेता है। परन्तु इसके कारण मैं उन्‍हें छोटा नहीं मानता। आध्‍यात्मिक लंगर की तलाश में वह योगसाधना और अात्‍मानन्‍द की ओर ले जाते हैं। उनके व्‍यंग्‍यों में धार है वह आत्‍मविश्‍वास का स्‍तर उठाता है पर ज्ञान का स्‍तर नहीं। ज्ञान उनके यहां अन्‍तर्ज्ञान बन जाता है। तुलसी भीतर से बाहर की ओर की यात्रा करते हैं, वह पूरे भक्ति आन्‍दोलन में अकेले हैं जो भूख और दारिद्र्य की पीड़ा की बात करते है। प्रशासन की उददंडता की आलोचना करते हैं। अकेले निग्रहवादी साधनाओं और भटकाओं को समाज के लिए अनिष्‍टकर बताते हुए सक्रिय और सकर्म जीवन का समर्थन करते हैं। कबीर साहब की स्थिति बाद के अंबेडकर साहब जैसी है। इनको भी आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ा इसलिए सामाजिक-आर्थिक अधोगति की ओर उनका ध्‍यान ही नहीं जाता। केवल अस्‍पृश्‍यता, और उसका उतना ही सतही समाधान, धर्म परिवर्तन। हिन्‍दू इतनी जल्द पूरी तरह बदल नहीं सकते इसलिए वह हिन्‍दू पैदा हुए पर हिन्‍दू मरेंगे नहीं। हो सकता है मेरे समझने में कुछ इकहरापन हो। और हां, मायावती जी के बारे में कभी सुना था, वह आईएएस की तैयारी कर रही थीं जब कांसीराम जी ने उन्‍हें समझाया कि राजनीतिक भविष्‍य के सामने आइएएस कुछ नहीं। अर्थात् दलितों की पीड़ा नहीं, अच्‍छे कैरियर की तलाश उन्‍हें दलित राजनीति में ले आई और उन्‍होंने आइएएस अफसरों से जूती ठीक करा कर अपने उस अहं की पूर्ति भी कर ली और जीते जी पत्‍थर में बदल गईं। दलित पीड़ा की दुहाई दे कर ये हंगामा मचाने वाले नौजवान हैं इनके सामने भी पीड़ा नहीं कैरियर है। अपने लिए अपनों का इस्‍तमाल करके ऊपरी मंजिल तक पहुंचने की व्‍यग्रता। अकेला एक मुझे, रोहित वेमुला, भीतर से बेचैन लगता है, परन्‍तु उसकी वही बिडंबना ना हिंदू ना मुसलमां वाली ही थी, न दलित न सवर्ण फिर भी उपेक्षा की पीड़ा गहरी थी। जो चला गया वह क्‍या बन पाता ये बैठे ठाले लोगों के विनोद के विषय हो सकते हैं। हमारे लिए विचारणीय नहीं।”

शास्‍त्री जी ने मित्र का हाथ छोड़ दिया और उठ कर खड़े हो गए। मेरे लिए श्रोता बने रहने का सुख ही पर्याप्‍त था। मैं भी उठ खड़ा हुआ।

Post – 2016-07-19

सुबूही

सिलसिला कोई नहीं फिर भी गिला है तो सही।
नसीब में जो बदा था वह मिला है तो सही ।

प्‍यार के सौदे में घाटा ही नफा लगता है
पास तू है नहीं पर तेरी जफा है तो सही ।

मैंने जो खत लिखे तुझको वे मेरे पास नहीं
जिस पर आंसू गिरे मेरे वह सफा है तो सही।

ऐ मेरी जां तुझे हर हाल में अपना माना
खुश नहीं मुझसे अगर है तो खफा है तो सही।

मिलना भी ठाना तो रिश्‍ते को तर्क करने को
आह भरने का सबब अबकी दफा है तो सही ।।
0.30 19 जुलाई 2016

Post – 2016-07-18

मैने जो लेख लिखा था और जिसे पोस्‍ट करने चला तो वह किसी कारण गायब हो गया वह कबीर और तुलसी पर पहुंच गया था। मैं नहीं जानता फिर वैसा लिख पाउूंगा या नहीं। कल प्रयत्‍न करूंगा, पर उसकी पीड़ा में मर्सिया के बाद ती,न दोहे भी लिखे जो यदि वह न मिटता तो न लिख पाता। वे निम्‍न प्रकार है:

कबिरा खड़ा बजार में तुलसी घर घर मांहि।
दोनो लिए मशाल हैं फिर भी उल्टी राह।।

किसकी कीजे बन्दना किसके लगिये पांव
दोनों हैं अड़बंग पर कितना सरल सुभाव।।

मैं दोनों को जोड़ता दोनों करें भिड़न्त
दोनों सांचे सूरमा जाने क्या हो अन्तं ।।

अब इस नुकसान के बाद भी चैन से सो पाउूंगा।
शुभ रात्रि गहरी नींद और बीते दिनों के सपने।

Post – 2016-07-18

मर्सिया

मेरा चेहरा ही मुझे दे गया धोखा देखो
फेस बुक पर दिखा अब हो गया वह कया देखों
किस मशक्‍कत से लिखा आज का मजमून मगर,
जहां लिखा था वहां ही न वह मिला देखो।।
आज की शाम इसी मर्सिया की शाम रही।
हमारे काम न आई पर उनके काम रही ।
दर्द है करना दुबारा हमें उरियां देखो
पास होगा कि न होगा यह इम्‍तहां देखो ।।