Post – 2016-10-25

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 18

मित्रों मेरी एक फेसबुक मित्र Farhat Durrani की तीन तलाक पर क्षोभ, अपमान और आक्रोश भरे एक पोस्‍ट से बहुत विचलित हो कर एक टिप्‍पणी 23.10.16 को लिखी थी। वह टिप्‍पणी निम्‍न प्रकार थी:

”मैं इस्‍लामी रवायात पर कुछ कहने से इसलिए बचता हूं कि मैं मुसलमानों के लिए बाहरी आदमी हूूंं। कोई बात उचित हो तो भी बाहरी आदमी के कहने के कारण अनुचित मानी जाएगी। अनधिकार हस्‍तक्षेप मानी जाएगी। परन्‍तु मुझे यह बात खलती है कि मुल्‍लों ने, और वह भी भारतीय मुल्‍लों ने सेकुलरिस्‍टों की सह पर इस्‍लाम को जितना अडियल बना दिया है उसमें विचार जिद के सामने हार जाता है। बन्दिश, वह परदे की हो या तलाक की और छूट वह बहुविवाह की हो या तीन तलाक कहने के अधिकार की, केवल मर्दों तक सीमित रहनेके कारण, क्‍या उसमें औरत की जगह शैटल की नहीं बना दी गई है। यह शब्‍द गुलामों के लिए प्रयोग में आता था, परन्‍तु इसके साथ यह अवधारणा जुड़ी थी कि इनके पास आत्‍मा नहीं होती, इसलिए इन्‍हें जितना भी सताओ इन्‍‍हें दुख नहीं होता। पर हो सकता है मैं हिन्‍दू होने के नाते इसे इस रूप में देख रहा होऊं । फिर भी मुझे डर है कि इसका लाभ भाजपा को मिलेगा। हिन्‍दू जिस मुल्‍लावाद से आजिज हैं, उसी से मुस्लिम महिलाएं। वे बोल नहीं सकती, न यह बता सकती हैं कि उन्‍होंंने किसे वोट दिया पर यह बहुत मुमकिन है कि उनका वोट भाजपा के पक्ष में जाए जिससे उन्‍हें कुछ सुकून मिलने की उम्‍मीद हो सकती है। इसलिए मुल्‍लों काे इस बात का अभियान चलाना चाहिए कि कोई अपनी महिलाओं को वोट देने की छूट न देगा, यदि किसी महिला ने मतदान किया तो उसे तलाक दे दिया जाएगा और सरकार से यह मांग करनी चाहिए कि चूंकि हजरत मुहम्‍मद के समय में महिलाएं वोट नहीं देती थीं इसलिए मुस्लिम महिलाओं को दिया गया मताधिकार गैरइस्‍लामी है और इसे हम अपने परसनल ला में हस्‍तक्षेप मानते हैं।”

इसमें मैं यह जोड़ना भूल गया था कि इस्‍लामिक परसनल ला और हदीस के अनुसार मुसलमानों को भी मताधिकार नहीं दिया जाना चाहिए क्‍योंकि पैगंबर मुहम्‍मद के जमाने में न लोकतंत्र था, न मताधिकार का प्रश्‍न था, और जिसकी लाठी उसकी भैंस का न्‍याय था। इसलिए जिसके हाथ में लाठी हो, अर्थात् सरकार हो उसे भैंस किसकी है, क्‍यों कहां बांध दी गई है, इसकी जवाबदेही नहीं रखी जा सकती। यही नियम उत्‍तरप्रदेशी, बिहारी और बंगाली सेक्‍युलरिज्‍म में चलता रहा है जो, मैं कई बार याद दिला आया हूं कि मुस्लिम लीग अर्थात् मुल्‍लावाद का सीमित प्रयोग है, परन्‍तु समग्र सत्‍ता हाथ में आ जाय तो इसे असीमित बनाया जा सकता है। इसका एक प्रमाण है उत्‍तर प्रदेश के एक सम्‍मान का वितरण! इस‍के विषय में हम कुछ कहना नहीं चाहेंगे, इसके बाद की पोस्‍ट में (जो ऊपर है) सार्वजनिक किया गया । चित्र किसी की वाल से लिया गया है और मुझे इस पर अविश्‍वास करने का कोई कारण नहीं दीखता। समाजवाद के यदुवंशी पुनर्जन्‍म में उत्‍तर प्रदेश में पहली बार अठारह सौ इंसपेक्‍टरों की भरती में मुहफट वर्मा सहयोगी थे इसलिए एक वर्मा को छोड़ कर सभी पदस्‍थ यदुवंशी थे। कम्‍युनिस्‍ट विचारधारा से जुड़े लोग विश्‍वविद्यालयों में जहां निर्णायक स्थिति में थे वहां किसी व्‍यक्ति की नियुक्ति का पहला आधार उसका वामपंथी होना था। कांग्रेस के सबसे अल्‍पभाषी और म़दुभाषी प्रधानमंत्री को जो भाजपा विरोधी गठबंधन की बैसाखी पर एक तकनीकी खामी के बल पर बहुमत सिद्ध कर पाए थे यह कहते सुना था कि जनता ने हमें बहुमत दिया है इसलिए हम जो भी फैसला करें उस पर आप टोकने वाले कौन होते हैं और आप आपु कर आरसी लखि रीझति लखवारि पार्टी तो प्रथम दिवस से ही पुकारती आ रही है कि जनता ने हमें इतने भारी बहुमत से जिताया है इसलिए हमारे सामने संविधान और विधान और परंपरा की मर्यादाएं क्‍या होती हैं।
ये जिस अधिकार का मुक्‍त उपयोग करते च माह आपको अपने काम का हिसाब देंगे और आप की हर सलाह पर ध्‍यान देंगे। मुल्‍लावादी निरंकुशतावाद के समाजवादी, साम्‍यवादी और कांग्रेसी संस्‍करणों के बीच लोकतन्‍त्र का सम्‍मान करने के लिए प्रतिश्रुुत, अपनी सक्रियता से उनको पूरा करने को आतुर, और जनता के प्रति जवाबदेही का निर्वाह करने की एक अभूतपूर्व परंपरा स्‍थापित करने वाले व्‍यक्ति से ये सभी निरंकुशतावादी जवाब तलब करते हैं, मोदी चुप क्‍यों है? मोदी क्‍यों नहीं बाेलता ? मोदी इस पर क्‍या कर रहा है? उसका छप्पन इंच का सीना कहां गया? सभी कार्यों विचारों के लिए मोदी को उत्‍तरदायी बनाने वाले क्‍या इस बात के लिए आतुर नहीं है कि वह तानाशाह बना दिया जाये और उनके ही प्रश्‍नों का जवाब दे तो यह कहने का अवसर निकाल लें कि वह तानाशाह है? अभी अभी एक मित्र ने याद दिलाया कि आपात काल से भी बुरी अवस्‍था में देश जाते जाते रह गया, बचा लिया सीजेआई ने पर यह नहीं देख पाये कि दोनों उस गुत्‍थी काे सुलझाने के लिए तैयार हो गए हैं जिसका एक इतिहास है और जिसकी जटिलता पर लगातार बहस की जाती रही है।

बहकने की आदत देखिए, मैं तो यह कहना चाहता था मोदी को इस देश की रगों का इतना अच्‍छा ज्ञान है कि लोग उसको गालियां देते हैं तो उन गालियों की उल्‍टी चपेट से अपने सारे किए कराए पर पानी फेर देते हैं। लोग किसी न किसी बहाने उसका नुक्‍स निकालने के सामूहिक अभियान में अपनी सक्रियता दिखाने के लिए अपनी खुन्‍दक निकालते हैं और उसके अपने लिए खन्‍दक खुदती चली जाती है और विश्‍वसनीयता कम होती जाती है।

लोग सारे सामाजिक, लोकतांत्रिक सरोकारों को ताक पर रख कर मुसलमानों काे अपना वोट बैंक बनाने के लिए नंगा नाच करने लगते हैं और कुछ कुयोग से और कुछ नासमझी से यह हिसाब तक नहीं लगा पाते कि पन्‍द्रह या बीस प्रतिशत का कितना हिस्‍सा उनके हिस्‍से में आएगा और हिन्‍दुत्‍व के प्रति घृणा पैदा करते हैं, वहां मोदी को इस बात की समझ है कि मुल्‍लावाद से जितना आहत भारतीय समरसता है, जितने पीडित हिन्‍दू हैं उससे कई गुना उत्‍पीडित और अपमानित
मुसलिम महिलाएं हैं जिनमें तलाक की दहशत में रख कर अधिकांश को तो मानापमान के प्रति संवेदनशून्‍य तक बनाया जा चुका है। परन्‍तु शिक्षा ने यह चेतना उनके भीतर भी जगाई है कि उन्‍हें इस जलालत से मुक्‍त किया जाना चाहिए। मुस्लिम बुद्धिजीवी वर्ग को उनके साथ आना चाहिए वह नहीं आ पाता। अपनी औरतों की तरहा वह भी अपने मुल्‍लों मौलवियों से डरा हुआ है। इसलिए खुला विद्रोह भले न हो मुस्लिम महिलाओं का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा केवल भाजपा से यह आशा लगा सकती है कि वह उन्‍हें इस अपमान से मुक्ति दिलाए और बिना किसी को अलग थलग किए, न्‍याय और समानता के आश्‍वासन से ही उनका समर्थन उससे अधिक पाया जा सकता है जितना वोट बैंक बनाने की कसरत में अनर्थ करने को उतारू दल पाने की आशा कर सकते हैं।

देश और समाज को तोड़ने वालों के समक्ष सबको जोड़ने और सम्‍मानित जीवन प्रदान करने की यह राजनीति अपने विरोधियों पर इतनी भारी पड़ रही है कि देश को तोड़ कर सत्‍ता में आने का समना देखने वाले स्‍वत: टूटते और दृष्टि फलक से ओझल होते जा रहे हैं, हमारे वाचाल बुद्धिव्‍यवसायियों की तरह । कितना विचित्र संयोग कि एक दिन पहले मेरे मन में जो खयाल आया वह पहले से ही इस आदमी की योजना में था ।

Post – 2016-10-24

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर -17ग

यह बताओ तुम जो कह रहे थे इन हास्‍यास्‍पद बातों का कुछ आधार तो है, उनके पास वह आधार भी नहीं, यह समझ में नहीं आया। सचाई तो इससे उल्‍टी है, उनके पास तो ग्रीक सम्‍यता और उसकी उपलब्धियां थीं, हमारे पास पुराण और बेद न वैसा सुथरी सोच न वैसा सुलझा विचार । पढ़ा तो होगा।

कल्‍पनाओं का एक भौतिक आधार होता है। वे अतिरंजित होती है, अव्‍यवस्थित होती हैं, पर निराधार तो स्‍वप्‍न के बेतुके टुकड़े भी नहीं होते। आवश्‍यकता उस सचाई तक पहुंचने की होती है।

आकांक्षाएं होती है, यह चाह हो सकती है कि मैं भी पक्षियों की तरह उड़ जाऊं, ऐसे पक्षी की कल्‍पना हो सकती है जो उड़ान भर कर सूर्य के पास पहुंच जाय और उसके पंख जल जायं, उनके आधार पर उड़न तश्‍तरियों की कल्‍पना कर ली जाय, पुष्‍पक विमान की कल्‍पना कर ली जाय तो कहोगे इसका कोई भौतिक आधार तो होगा। तुममें और इन हास्‍यास्‍पद लोगों में कोई अन्‍तर है ? इसको काव्‍य में प्रस्‍तुत किया जाय तो तुम इसके पीछे सचाई तलाशने लगोगे।

नहीं तलाशोगे तो मूर्खों की तरह बात करोगे जैसी वे करते हैं । हमारी इन आकांक्षाओं ने कि हम अमुक जैसे हो जायं तितली जैसे, सुए जैसे, कोयल जैसे, या जैसे फूल लताओं पर, वृक्षों पर लदे रहते हैं वैसे ही फूलों से हम शोभित होते, इन कामनाओं का सभ्‍यता के विकास में और विज्ञान के भी उदय में कम भूमिका नहीं है। इनसे अलंकरण, वस्‍त्र, अलंकरण, संगीत, नृत्‍य का ही विकास नहीं हुआ, हमारी संवेदनाएं समृद्ध हुई हैं। इनके इतिहास में जाने की फुर्सत नहीं। पर सचाई का पता चल सकता है। उस अतिरंजना से भी कि कोई ऐसी ऊंची उड़ान भरने वाला गिद्ध हो सकता है जो सूर्य तक पहुंच सके। इसकी सचाई यह है कि हमारा खगोलीय ज्ञान उस समय तक विकसित न था। हम नहीं जानते थे कि धरती से सूर्य की दूरी कितनी है। कहीं इनसे हमारी उपलब्धि का पता चलता है, कहीं सीमा का, कहीं आकांक्षा का पर इस ललक के साथ इस प्रयत्‍न का भी पता चलता है कि कुछ लोगों ने संभव हैं इसके उपाय तलाशे हो । उड़ कर ऊंचा पहुंचने या ऊंचाई पर किसी चीज को पहुंचा देने की कामना से पतंग का आविष्‍कार हुआ यह तो मानोगे।

मैं यह तो मान लूंगा जब कि तुम मान लोगे कि हवाई जहाज का आविष्‍कार पतंग के आविष्‍कार का परिणाम है।

धी और धीरज में एक संबंध है, जिसमें सोचने विचारने का धैर्य नहीं वह किसी बात को समझ भी नहीं सकता। तुम छलांग क्‍यों लगाते रहते हो। संबंध यह है कि यह प्रयोग यहीं तक पहुंचा। अगला प्रयोग तुम मानना चाहो तो भारत में हुआ लगता है जिसमें विशाल पंखों वाले एक यन्‍त्र की कल्‍पना की गई और पुष्‍पक विमान का अर्थ फूल का विमान न समझ लेना, इसका अर्थ है अत्‍यन्‍त हल्‍का, ऐसा यंत्र जो हवा में उड़ सके । चौथी शताब्‍दी या इससे कुछ पहले यह प्रयोग किया गया कि यदि मजबूत परन्‍तु हल्‍की लकड़ी का ऐसा यंत्र बनाया जाय जिसके बीच में एक पेटी हो और दोनो ओर पंख लगे हो, और उस पेटी में कोई ऐसा द्रव्‍य भरा जाय जिसे गर्म करें तो वह ऊपर की ओर उठे तो वह कुछ दूर तक पक्षी की तरह उड़ ही नहीं सकता अपितु उस पर बैठ कर कुछ दूर की दूरी आप हवा में उड़ते हुए पार कर सकते हैं पुष्‍पक विमान की कल्‍पना उसी का एक विकसित रूप है।

”यार तुम मेरे घर में बैठे हो, तुम्‍हारी इस वाहियात बात से बचने के लिए भाग कर कहीं जा भी नहीं सकता। तुम्‍हारे दिमाग पर इन दिनों सचमुच सब कुछ जहां में हमसे है का भूत सवार हो गया है।

मैं यह नहीं कह रहा कि राइट बंधुओं ने अपना विचार समरांगणसूत्र से लिया था, कहता यह हूं, जो पहले कह आया, कि प्रत्‍येक आविष्‍कार का एक आर्थिक आधार होता है, वह मिल गया और किसी की जरूरत उससे पूरी होती दिखी, उस पर उतना धन और श्रम व्‍यय करने को तैयार हो गया तो वह आविष्‍कार वाणिज्यिक स्‍तर तक पहुंच जाता है, यदि नहीं मिला तो खेल बन कर या अविकसित रूप में रुका रह जाता है जैसा भारतीय प्रयोग के साथ या दुनिया के दूसरे प्रयोगों के साथ हुआ। तुम क्‍या समझते हो, भाप की शक्ति का पता पहले उन लोगों को न था जो आसवन करते थे परन्‍तु तब पूजीवादी आकांक्षाएं नहीं पैदा हुई थीं कि इनका अपेक्षित दिशा में विकास किया जा सकता और फिर इसकी जटिलता को देखते हुए बहुत थोड़े समय में ही इतने सारे पुर्जे, रेल का रास्‍ता, सब संभव हो गया। मैं जिस आविष्‍कार की बात कर रहा हूं और जो खेल बन कर रह गया उसका जो विवरण है वह विश्‍वसनीय लगता है। मैं इसे यथातथ्‍य दे रहा हूं। किसी जानकार से समझ लेना:
लघुदारुमयं महाविहङ्गं दृढसुश्लिष्टतनुं विधाय तस्य
उदरे रसयन्त्रमादधीत ज्वलनाधारमधोऽस्य चातिपूर्णम्॥ ९५
तत्रारूढ: पूरुषस्तस्य पक्षद्वन्द्वोच्चालप्रोज्झितेनानिलेन
सुप्तस्वान्त: पारदस्यास्य शक्त्या चित्रं कुर्वन्नम्बरे याति दूरम्॥ ९६
इत्थमेव सुरमन्दिरतुल्यं सञ्चलत्यलघु दारुविमानम्
आदधीत विधिना चतुरोऽन्तस्तस्य पारदभृतान् दृढकुम्भान्॥ ९७
अय:कपालाहितमन्दवह्निप्रतप्ततत्कुम्भभुवा गुणेन
व्योम्नो झगित्याभरणत्वमेति सन्तप्तगर्जद्ररसरागशक्त्या॥ ९८
हंसना स्‍वास्‍थ्‍य के लिए उपादेय है । रुक रुक कर हंसना फेफड़े की सेहत के लिए लाभकर है, और हंसी को रोक कर सोचने समझने की आदत डालना दिमाग के लिए अच्‍छा है।

Post – 2016-10-24

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर -17ख

”यार तुम तो ऋण को भी धन बना देते हो। कहां से यह उल्‍टी विद्या पाई है ।”

”उल्‍टी को सीधी करने को तुम उल्‍टी विद्या कहते हो । तुम्‍हारी सोच ही ऋणात्‍मक रही है तो इसमें मेरा दोष । तुम कहते हो यह ऋण (-) है मैं कहता हूंं ऋण को काट दो तो धन (+) बन जाएगा। गणित का नियम भी मेरी ही बात करता है ऋण का ऋण धन होता है। लेकिन यह अकेली मेरी सोच नहीं है, यही सोच उस आदमी की भी है जिसे तुम गालियां देते नहीं थकते। तुम्‍हें याद है उसने चुनाव अभियान में ही एक पुरानी बात दुहराई थी । यदि आपकी सोच नकारात्‍मक है तो आप कहेंगे गिलास आधा खाली है, यदि सकारात्‍मक है तो कहेंगे, गिलास आधा भरा हुआ है। यह कोई नया दृष्‍टान्‍त न था, बहुत कुछ हमारे पास पहले से है, सवाल है कि जो कुछ है उसमें से तुम चुनते क्‍या हो, निराशा या आशा। तुम कहते थे आबादी का विस्‍फोट हो रहा है। इसको ले कर कई तरह की सांप्रदायिक राजनीति की जाती थी, उसने उसे उलट दिया, हम सवा सौ करोड़ की ताकत रखते हैं और एक समय में जब दूसरे अनेक देश आबादी में गिरावट के शिकार है, हम दुनिया को कुशल मजदूरों की आपूर्ति कर सकते हैं। यह नहीं कि यह आदमी चाहता है कि हमारी आबादी और उसके साथ हमारी समस्‍यायें बढ़ती जायं। उसकी सोच है कि जिसे हम रोक नहीं पा रहे हैं, जिसके विस्‍तार से घबराहट पैदा हो रही है, पहले उस घबराहट पर काबू पायें फिर दूसरे उपाय करें और यह है निराशावादी सोच को आशावाद में ढालना।”

वह हंसने लगा । ताली बजा कर बोला, ‘बहुत खूब, बहुत खूब ।’

‘तुम दिन भर बहुत खूब कहते रहो तो भी यह समझ न पाओगे कि यह सचमुच बहुुत खूब है। तुम कहते थे विकलांग, यह कहता है दिव्‍यांग। दिव्‍यांग का मतलब जानते हो।”

उसे हंसने का एक नया अवसर मिल गया।

”दिव्‍यांग का मतलब होता है, अपने भौतिक अभाव को पूरा करने की जो आंतरिक सोच और आत्‍मबल पैदा होता है वह सर्वांग सुडौल लोगों में नहीं हो सकता। यह मात्र शब्‍दों का खेल नहीं है, एक मनस्‍वी की गहरी दृष्टि है और यह दृष्टि उसने अपने अभावों से जूझते हुए विकसित की है । तुम जानते हो हमारे अधिकांश सर्जक और कलाकार किन्‍ही न किन्‍ही बाध्‍यताओं, व्‍याधियों और कर्इ बार तो मानसिक रुग्‍णताओं के शिकार रहे हैं। महानतम रचनाकार इन्‍हीं में से निकले हैं। कालिदास, वाल्‍मीकि, व्‍यास, तुलसीदास, सूरदास, घनानंद, निराला, मुक्तिबोध नाम गिनते जाओ देश में भी विदेशों में भी। पर इसकी समझ तुम्‍हें नहीं है, उस आदमी को है जिसकी डिग्रियां तलाशते फिरते हो। मैंने क्‍या कहा था, कहा था यह हमारे देश का सबसे तेजस्‍वी और योग्‍य प्रधानमंत्री है क्‍योंकि इसने अभाव देखें है, कई तरह के अनुभवों से गुजरा है जिससे गुजरने का हमें अवसर मिला है और इसने पिछड़ी जाति का होते हुए जाति की राजनीति किए बिना अगड़ी जातियों के बीच सेवा, कर्तव्‍य निष्‍ठा और दूरदृष्टि से उस चक्रव्‍यूह को भेदते हुए यहां तक का रास्‍ता तय किया है परन्‍तु इतने से ही सन्‍तुष्‍ट नहीं है। अभी तक सभी जोड़ने, बांटने, लड़ाने और धोखाधड़ी की राजनीति की है, यह पहला व्‍यक्ति है जो जोड़ने, मिलाने, और आगे बढ़ने की राज‍नीति करता है। परन्‍तु तुम उसके प्रताप को देख नहीं पाते। आंखें चुराते हो और आलोचना की जगह चुगलियां करते फिरते हो। इसके बारे में भी उसकी दृष्टि बहुत साफ है, ‘जिसे जो काम आता है वह करे ।’ तुम्‍हें यही काम आता है इसलिए तुमको उसकी धनात्‍मक उपलब्ध्यिों को देख तक नहीं पाते। देखा हो तो बताओ ।’

उसका मुंह उतर गया था और मोदी तो सामने थे नहीं, वह मुझसे भी नजरें चुरा रहा था ।

Post – 2016-10-24

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर -17

‘तुमको पता है, मोदी की टीम का वश वश चले तो ये देश को कहां ले जाएंगे। एक ऐसे अतीत की ओर जिसमें पुष्‍पक विमान उड़ते थे, अंग प्रत्‍यारोपण होता था, एक जेनेटिक इंप्‍लांट हाेता था।’

‘इससे तुम्‍हारा मनोरंजन होता है या नहीं, यह तो बताओ।’

‘मनोरंजन तो होता है, यार । हंसते हुए पेट में बल पड़ जाता है।’

‘एक समय था तुम कहते थे, यहां तो कुछ था ही नहीं, सब कुछ बाहर से आया है। यहां तक कि सभ्‍य मनुष्‍य भी, सभ्‍यता भी, भाषा भी। तब तुम्‍हें अपने हाल पर रोना आता था या नहीं, यह भी ताे बताओ।

‘मुझे अपने विद्वानों की बौद्धिक दरिद्रता पर रोना आता था, क्‍योंकि इससे जो पस्‍ती पैदा होती थी उसी का परिणाम थी यह सोच कि हमसे न तो पहले कभी कुछ हुआ है, न आगे कुछ हो सकता है। हमने न पहले कुछ बनाया है न बना सकते हैं। हम मंगाएंगे और गर्व से बताएंगे, यह इंपोर्टेड माल है। ये कहते हैं हमने बनाया था, बना सकते हैं और बना कर दिखा देंगे ।

‘यदि दो तरह के मूर्खों में मुझे चुनाव करना हो तो मैं उन मूर्खों के साथ खड़ा होना पसन्‍द करूंगा जिनकी बेवकूफियां से मनोरंजन भी होता है और आत्‍मविश्‍वास भी बढ़ता है। हमने दुनिया में किसी से पहले यह किया है और कर सकते हैं। तुम दूसरे वाले मूर्खों के साथ खड़े होगे जिनके दिमाग में पश्चिम का मलबा भरा हुआ है ।

‘तुम्हें पता है उनकी बेवकूफी उसी स्‍तर की है जिस स्‍तर की पश्चिम की बेवकूफी है। तुम्‍हें याद है, जेम्‍स मिल का वह वाक्‍य, ‘आल थियरीज फ्राम दि वेस्‍ट।’ दुनिया में जितना भी ज्ञान और कौशल है सब यूरोप से बाहर गया है। इसे तुम मान लेते हो।

‘वे कहते हैं दुनिया का सारा ज्ञान पूर्व से गया हुआ है, यह सुनकर तुम्‍हें घबराहट होती है । तुम पश्चिमी मूर्खो के कहने पर चलते हो, मै अपने मूर्खों पर हंसता भी हूं और खुश भी होता हूं क्‍योंकि जिन्‍हें काम करना है वे उनके नारो से नहीं अर्थव्‍यवस्‍था के दबावों से काम करते हैं, दूसरे सरोकारों से काम करते हैं जिनमें अतीत का दखल नहीं इसलिए इस तरह की डींग से कोई नुकसान नहीं होने वाला।’

लगा वह मेरी बात से सहमत है।

मैंने मजा लेते हुए कहा, ‘और एक बात समझ लो उनकी बेवकूफियों में भी कुछ सचाई है और पश्चिम की इस समझदारी में इससे अधिक बेवकूफियां हैं।’

Post – 2016-10-23

तुम सोचना हम मर के भी जिन्‍दा हैं किस तरह
तुम सोचाना मरते हुए जिन्‍दा हैं किसलिए ।
तुम सोचना मकसद में कामयाब हुए क्‍या
तुम सोचना क्‍या क्‍या दिए औरों से क्‍या लिए ।

तुम सोचना भगवान को क्‍यों मानते हैं हम
जब उसको न जाना न तो देखा ही किसी ने
तुम सोचना भगवान के थे जो भी घरौंदे
विज्ञान ने क्‍यों सारे घरौंदे मिटा दिए ।

तुम सोचना हम सोचने से डरते हैं क्‍यों कर
तुम सोचना हम कह के मुकर जाते हैं क्‍यों कर
तुम सोचना हम अब भी कहीं हैं कि नहीं हैं
तुम सोचना क्‍या जुल्‍म खयालात ने किए।

गर सोच न पाओ तो मेरे पास तो आना
मिल बैठ के सोचेंगे बेडि़यों के शिकंजे
हमने ही गढ़े, हमने ही चमकाये थे लेकिन
उन बेडि़यों को हंसते हुए क्‍यों पहन लिए ।।

Post – 2016-10-23

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 16

मैं गया तो था अपनी डाक लेने । दोस्‍त से मुलाकात तो होनी ही थी। बैठा । चाय भी पीनी ही थी। पर चाय से पहले ही भाई ने बड़े भोलेपन से पूछा, ”तुम्‍हें रात नींद तो आई थी न ?” एक पल रुक कर वह भोलेपन की मुद्रा से बाहर आते हुए मुस्‍कराने लगा।

कोई बात मेरी समझ में कुछ देर से आती है इसलिए चुस्‍की लेते हुए सोच ही रहा था कि उसका इशारा किस बात की ओर हो सकता है कि उसने ऊपर से जड़ा, ”देख कर सदमा तो लगा होगा ।”

बात अब भी मेरी समझ में नहीं आई, ”तुम क्‍या देखने की बात कर रहे हो ?”

”दुख तो तुम्‍हारी दशा सोच कर मुझे भी हुआ था। ओबामा ने एक अलबम जारी किया है उसमें दुनिया के पचास खास लोगों के बीच पहली जगह मनमोहन सिंह की है और मोदी को जगह ही नहीं मिली है।”

मैंने चिन्‍ता की मुद्रा अपना ली, ”यार तुमने तो मेरे किए कराए पर पानी फेर दिया। रोज मैं इतनी मेहनत से फेसबुक पर समझा कर लिखता हूं कि तुम जैसों की अक्‍ल में कुछ सुधार होगा, तुम तो ऐसे चिकने घड़े हो कि कोई असर ही नहीं होता।”

उसने जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं, अपने ही रौ में बोला ”सदमा अधिक गहरा लगता है।”

मैंने भी उसकी बात अनसुनी करते हुए कहा, ”अभी दो दिन पहले ही लिखा था, ‘पढ़ा लिखा मूर्ख अनपढ़ मूर्खों से अधिक बड़ा मूर्ख होता है क्‍योंकि वह अपनी अक्‍ल से काम नहीं लेता, दूसरों की अक्‍ल से काम लेता है जिनके विचारों को वह जानता है, उनके पीछे छिपे इरादों को भले न जानता हो। अनपढ़ आदमी उसका जितना भी दिमाग है, थोड़ा ही सही, उसी से सोचने को बाध्‍य होता है, इसलिए दूसरे मामलों में शिक्षित लोगों से पीछे रह जाने के बावजूद वह उन प्रलोभनों से कम प्रभावित होता है जिसका शिक्षित व्‍यक्ति शिकार हो जाता है, इसलिए वह सही फैसले करता है।’ कुछ सुधार आया तुममें ? फिर वही अमुक ने अमुक का यह मूल्‍यांकन किया है, जब कि वह व्‍यक्ति तुम्‍हारे सामने है! दूसरों के कहे किए पर इतना भरोसा कि तुम स्‍वयं अपनी अक्‍ल से काम लेते हुए उसका मूल्‍यांकन भी नहीं कर सकते ?”

उस पर कोई असर नहीं पड़ा, ”झेंप मिटा रहे हो । उस अलबम से जो सचाई उभरती है, उसे सीधे क्‍यों नहीं देखते । कहां मनमोहन सिंह और कहां मोदी । बेचारे का सूट भी बेकार गया। जाकर मापो छाती भी छब्बीस इंच की हो चुकी होगी, अब पुराना सूट फिट नहीं आएगा।”

यह बताओ, यदि सोनिया गांधी ने कोई अलबम बनाया होता तो क्‍या वह इससे भिन्‍न होता?”

उसने कहा, ”मैं ओबामा की बात कर रहा हूं । ह्वाइट हाउस की। दस नंबर की नही।”

”मैं भी ओबामा की ही बात कर रहा हूं । सोनिया का तो नाम इसलिए ले लिया कि तुम्‍हारी आंख के सामने से पर्दा हट जाएगा। तुम स्‍वयं सोचो, सोनिया इसलिए उन्‍हें पहले नम्‍बर पर रखती क्‍योंकि उन्‍होंने अपमान झेला पर मुंह नहीं खोला। फैसले वह लेती रहीे, हस्‍ताक्षर मनमोहन जी को करने पड़ते थे। शरीफ आदमी जो ठहरे, उनका आदेश फाड़ कर फेंक दिया जाय तो भी मुस्‍करा कर रह जाते थे।
उनका जो हाल सोनिया के सामने था वही हाल अमेरिका के प्रसिडेंट के सामने था। वित्‍त प्रबन्‍धन का उनको इतना अच्‍छा ज्ञान कि विश्‍वबैंक तक को उनकी सेवाओं की जरूरत पड़ी, इसके बाद भी उनके शासन काल में भारत का बजट अमेरिका के संकेत पर बनता था ।”

वह हंसने लगा, ”खिसियानी बिल्‍ली खंभा नोचे।”

मैंने उसका फिकरा सुना ही नहीं, ”तुम्‍हें याद है उनका वह आदेश जिसमें सेना को अपने पेट्रोल का खर्चा 20 प्रतिशत कम करने को कहा गया था। इसका मतलब था अपनी प्रतिरक्षा क्षमता में जो पहले से ही कम है, बीस प्रतिशत की कमी। याद है उन्‍होंने एक बार खाद्य सबसिडी कम करने का आदेश अर्थव्‍यवस्‍था पर बोझ कम करने के लिए दिया था? यह भी अमेरिकी इशारे पर ही था। घरेलू विरोध के चलते दोनों अवसरों पर अपने आदेशों को वापस लेना पड़ा था। इसलिए अमेरिका अपने सामने मुंह न खोलने वाले सरल स्‍वभाव के मनमोहन सिंह को पहले नंबर पर न रख कर मोदी को रखेगा जिसने अमेरिका में पहुंच कर कहा था जब मैं पहले भारत में आतंकवाद की बात करता था तब अमेरिकी कहते थे, कि यह आपके यहां के कानून और व्‍यवस्‍था की विफलता है। जब अपने पर हमला हुआ तो उसको समझ में आया कि आतंकवाद एक समस्‍या है ।”

उसने बीच में कुछ कहना चाहा, मैंने मौका ही न दिया, ”क्‍या उस मोदी को अपने अलबम में स्‍थान देगा जिसने यूएन के मंच से कहा कि अच्‍छा आतंक वाद और बुरा आतंकवाद की बात करते हो, परिभाषित करो कि इनसे तुम्‍हारा क्‍या मतलब है। तुम्‍हें केवल एक ही दृश्‍य याद आता है मोदी का कोट और ओबामा का बार बार गले मिलना पर यह भूल जाता है कि मोदी ने उनके घर मे जा कर कहा, अमेरिका आतंकवाद के प्रति दोहरी नीति अपनाता है, वह इसके बारे में सीरियस नहीं है और अपनी कूटनीतिक दक्षता के बल कर अमेरिका को भी दबाव में ले लिया।”

”क्‍या तुमको याद है, यह तो नई नई बात है यार, मोदी ने रूस के साथ भारत के संबंधों को एक नया तेवर देते हुए कहा, ‘एक पुराना दोस्‍त दो नए दोस्‍तों के बराबर होता है।’ ऐसा उस समय जब अमेरिका विश्‍व की महानतम शक्ति बन चुका हो, कहने का साहस किसी दूसरे का हो सकता है और यह केवल कथन नहीं था, रूस के साथ उसने सबसे बड़ा और सबसे भरोसे का रक्षा सौदा किया और इससे परोक्ष सन्‍देश दिया कि हमें आज भी अमेरिका से अधिक रूस पर भरोसा है। जो नहीं कहा, वह यह कि यदि हम अमेरिकी रक्षा उपकरण खरीदें भी तो जरूरी नहीं वह हमें अद्यतन माडल दे, या यह कि बाद में उसके साज सामान के नाम पर हमें अपने हाथ की कठपुतली न बना ले। इसलिए फ्रांस अमेरिका से अधिक भरोसे का है ।

”मैं लिखता हूं तो तुम्‍हारे ही फायदे के लिए पर मेरी बात समझने की योग्‍यता तुममें नहीं आ पाई है, सोचते हो, तुम्‍हारा मित्र होने के नाते मैं समझदार कैसे हो सकता हूं। अभ्‍यास करने से, धीरे धीरे मेरी बात भी समझ में आएगी, पर मोदी तो सीना तान के और दहाड़ कर ये बातें कह चुका है, वह भी तुम्‍हें सुनाई नहीं दी। उसे भी समझने की योग्‍यता तुम लोगों में नहीं है। यह अकेले मोदी की कूटनीतिक क्षमता है जिसमें उसने आतंकवाद के सवाल पर व्‍यापक, लगभग सार्विक, समर्थन जुटाते हुए अमेरिका को भी घेर कर सही रास्‍ते पर आने को मजबूर किया और यह भी चिन्हित किया कि यदि इसके बाद बहाने बना कर, वह पाकिस्‍तान को सैनिक सहायता देता है तो समस्‍त प्रचार साधनों के बावजूद वह विश्‍व समाज के सामने नंगा हो जाएगा। तुम क्‍या समझते हो, जिस व्‍यक्ति ने अपनी दक्षता से अमेरिका को भी नाक रगड़ने पर मजबूर किया, उसको अलग किया, रूस से अभी चार दिन पहले ही सामरिक समझौता किया, अमेरिका के अलबम में उसे स्‍थान मिलेगा? उसे स्‍थान न मिलना ही इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका को उसने कहां से कहां ला कर खड़ा कर दिया और वह भी केवल कूटनीतिक दक्षता के बल पर।”

उसकी बोलती बन्‍द । बोलने से बचने के लिए कुछ देर तक बिस्किट चबाता रहा और फिर एक लंबी सांस ले कर बोला, ”तुमने तो आज ही किसी की फेसबुक पर जिसमें कहा गया है कि संघ ने स्‍वतन्‍त्रता संग्राम में भाग नहीं लिया, ब्रितानी हुकूमत का साथ्‍ा देता रहा, हामी भरते हुए अपनी ओर से यह भी जड़ा है कि संघ के लोग खादी से और गांधी टोपी से भी परहेज करते थे।”

मैंने अपनी बात को वजनी बनाने के लिए कहा, ” तुम परले सिरे के मूर्ख हो। जुमले उठा कर चल देते हो । किसी बात को पूरी तरह समझते नहीं। मैंने तो आज से पचीस साल पहले तीसरी दुनिया में एक लंबे लेख में बताया था कि यह लीग की नकल पर बना संगठन है और उसी के कदमों पर चलता रहा है। और कुछ दिन पहले यह भी लिखा था कि गांधी के विरुद्ध उन दिनाें संघ में जिस तरह का दुष्‍प्रचार किया जा रहा था उसमें मैं इतना उत्‍तेजित अनुभव करता था कि यदि गोडसे ने गांधी जी की हत्‍या न की होती, उसकी जगह मैं होता और मेरे हाथ में पिस्‍तौल होती तो मैं उन्‍हें गोली मार सकता था। इसलिए यदि दूसरा कोई यह सिद्ध भी कर दे कि गांधी जी की हत्‍या में संघ का हाथ नहीं था तो भी मैं इसे मानने को तैयार नहीं हो सकता। सच तो यह है कि बहुत सारे संघियों में आज भी गांधी के प्रति, अहिंसा के प्रति गहरी घृणा है और इस माहौल में इस व्‍यक्ति ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया है जिसका लक्ष्‍य पुरानी व्‍याधियों से मुक्‍त हो कर पूरे देश को, उसका वश चले तो पास पड़ोस के सभी देशों को साथ ले कर आर्थिक विकास और सामाजिक सौमनस्‍य के उस लक्ष्‍य को प्राप्‍त किया जा सके जिसका इससे पहले किसी भारतीय नेता ने सपना तक नहीं देखा।

”बडे भोले हो यार । इतना सब जानते हुए भी धोखे में आ जाते हो। तुम्‍ही तो कहते हो इतिहास हमें दृष्टि देता है, हम किसी नैदानिक की तरह उसकी जड़ों को देख पाते हैं। और जड़ों में जाने पर जो कुछ दिखाई दे रहा है उसे देखने तक से इन्‍कार करते हो। तुम मुझे जो समझा रहे हो वही अपने उस मित्र को समझा पाओगे जिसकी पोस्‍ट पर तुमने हामी भरी है।”

देखो, मैं तुम्‍हारी और उस मित्र की सदाशयता में विश्‍वास करता हूं, समझ पर नहीं। तुमको तो फिर भी आधी तिहाई बातें समझ में आ जाएंगी। मेरा वह मित्र तो वर्दी पहन कर सोचता है और हुक्‍म देने के अन्‍दाज में फैसले लेता है। और फैसले भी जानते हो कैसे, असरानी वाले अंदाज में, ‘आधे दायें जाओ, आधे बायें और बाकी मेरे पीछे।’ यही हाल है उसका। सोचता है पीछे कुछ रंगरूट तो होंगे ही, मुड़ कर देखने को भी तैयार नहीं होता।”

”जहां तक इतिहास को देखने का सवाल है, पूर्ववृत्‍त को जानने का सवाल है, कुछ लोग इतिहास को वस्‍तु की तरह देखते हैं, वे किसी घटना या क्रिया को लेकर बैठ जाते हैं और अपना मत बदलने को तैयार नहीं होते। मनोविज्ञान में इसे फिक्‍सेशन कहते हैं।

”जो इतिहास को जानते वे जानते हैं कि यह एक प्रक्रिया है । प्रत्‍येक परिघटना को उसके पूरे आसंग में देखते हैं। उस बदलाव को भी देखते हैं जो एक ऐसी संस्‍था के जो अपने को सांस्‍कृतिक कहती थी और राजनीति से परहेज करती थी उसके राजनीति में आने से होता है और फिर राजनीतिक अपरिहार्यताएं जो बदलाव लाती रहती हैं उनके कारण वह रूपान्‍तरित होती हैं। मैं उसके आज को देखता हूं, तुम उसके कल को देखते हो इसलिए आज को उसका फरेब मानते हो जब कि आज की समझ हो तो कल को बीती गुजरी चीज मान सकते हो। मुझे मोदी की योग्‍यता से अधिक उसकी महत्‍वाकांक्षा और उसके अनुरूप साहस पर विश्‍वास है। वह जिस तरह विश्‍व समुदाय को घेर कर अपनी बात मनवाने में सफल हुआ है उसी तरह भारत के मेढ़क तौल वाली राजनीति में सबको जोड़ते हुए एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकता है जिसकी उपेक्षा दुनिया का कोई देश न कर सके और जो अपने दम पर खड़ा रह सके।

Post – 2016-10-22

कोई चुनाव उपलब्‍ध विकल्‍पों के भीतर होता है। मोदी उस समय उतने बड़े नेता नहीं दिखाई देते थे जितना बड़ा अवसर आने पर उन्‍होंने अपने को साबित किया। उन्‍हें उस शून्‍य का लाभ मिला था जिसे भरने के लिए जनमन को उनसे उपयुक्‍त कोई व्‍यक्ति नहीं जंचा। मोदी का सबसे बड़ा अपराध यह है कि उन्‍होंने यह नहींं समझा कि उन्‍हें इतिहास ने चुना है जनता ने नहीं। उनको अपने प्रचार अभियान में इतना पैसा और इतने बहादुरी के शब्‍द खर्च करने की जरूरत न थी। कहते आप यदि मुझे इस कार्यभार के योग्‍य समझें तो मैं इसे स्‍वीकार करने को तैयार हूूूं पर मेरा हाथ मजबूत करने के लिए मुझे पूर्ण बहुमत दें तो भी नतीजा वही होता। प्रचार पर बहुत सारा पैसा खर्च हुआ था यह तो सही है। जल्‍दबाजी में कुछ बातें बढ़ चढ़ कर भी कर दी गई थीं। इससे बचा जा सकता था। पर मेरा दुर्भाग्‍य यह है कि सही समय पर लोग मुझसे सलाह लिए बिना ही जो सही समझते हैं कर गुजरते हैं और अगला दुर्भाग्‍य यह कि सही समय पर मैं स्‍वयं भी उतना सही नहीं सोच पाता जितना बाद में समझ पाता हूं। मोदी को अपने प्रचार के लिए अंबानी और अडानी का आभार नहीं लेना था, वह उस निराशा के दौर में घूरे पर खड़े हो जाते तो वह भी टीले मे बदल जाता और ऊपरी सिरे पर समतल हो कर मंच भी तैयार कर देता। प्रचार का काम तो हमारे अधिक समझदार मित्र विरोध करते हुए कर ही रहे थे । अकेला एक स्‍वर था विरोध का और इसमें जो दुर्गुण बताए जा रहे थे वह जनता की नजर में सद्गुण प्रतीत होते थे। आप चीखते थे यह जल्‍लाद है, जनता के पास अखबार तो है नहीं कि वह अपनी बात आप तक पहुंचा सके। पर वह अपनी पस्‍तहिम्‍मती के दौर में आपस में गुफ्तगू करती थी कि इस समय कोई ऐसा नेता आना चाहिए जो…. आगे का अंश सुनना मुझे इतना बुरा लगता था कि पार्क की उस बैठक की श्रव्‍य सीमा से आगे बढ़ जाता था जिसमें यह चर्चा होती थी पर अनसुने वाक्‍यांश को जानता था। आप कहते यह तानाशाह है, और वे कहते, इसी की तो हमे तलाश थी।
आप आज भी अपनी भाषा में बोल रहे हैं, जनता अपनी भाषा में समझ रही है और समझ का फेर यह कि आप ‘समझ के फेर से भयो है हेरफेर ऐसो कोऊ कहै कछू पै सनत कछु और हैं’ की गुत्‍थी तक को नहीं समझ पाए।

काहे के बुद्धिजीवी हो यार । न अपनी भाषा को समझते हो, न अपने साहित्‍य को, न समाज को, न उसकी भावनाओं को और यह तक नहीं समझ पाते कि अपने इन्‍हीं कारनामों के कारण तुम समाज बहिष्क्रित हो चुके हो। समाज मोदी के साथ है तुम रोटी के साथ हो। रोटी भी ऐसी जो फेंकी हुई हो। मोदी समाज का प्रतिनिधित्‍व करता है तुम उस दल या संगठनों का जिनसे तुम्‍हारी दांत कटी रोटी का संबंध रहा है। केन्‍द्रीय मंच पर उस विशेष क्षण में मोदी का कोई प्रतिद्वन्‍द्वी नहीं था या था तो वह लोकरंजन का काम कर रहा था, जैसे आप।

हमारे बुद्धिजीवियों ने जो अपनी असाधारण समझदारी में किन वि

Post – 2016-10-22

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर -15

मोदी के विषय में सबसे डरावना चित्र गुजरात के दंगों को ले कर खींचा जाता है। अदालत ने बरी भले कर दिया हो, मैं अपनी व्‍याख्‍या में उन्‍हें कुछ सीमा तक निरुपाय भले मानता होऊं, करोड़ों के मन में वह उसकी छाया से मुक्‍त नहीं हो सकते। स्‍वयं वाजपेयी जी ने सुनते हैं उनकी सरकार को गिराकर राष्‍ट्रपति शासन लगाने तक का निर्णय ले लिया था और आडवाणी जी के मनाने पर मान तो गए थे पर मंच से ही राजधर्म निभाने की शिक्षा तो दी ही थी। मोदी ने कुछ झेंपे हुए स्‍वर में कहा था, ‘वही तो निभा रहा हूूं। मंच का वह चित्र मेरी स्‍मृति में अभी तक कौंधता है। इस दृश्‍य और परिदृश्‍य और इसके उपागम की व्‍याख्‍या करें तो जो तथ्‍य निकल कर सामने आते हैं वे निम्‍न प्रकार हैं:

1. साबरमती एक्‍सप्रेस से स्‍वयं सेवकों का जत्‍था मोदी ने भेजा था और उनके असंयत व्‍यवहार के परिणाम स्‍वरूप जो गोधरा कांड हुआ उसकी भयानकता को देखते हुए ग्‍लानि और क्षोभ में आरंभिक दौर में मोदी ने दंगे को नियंत्रित करने में ढील बरती थी। यदि न बरतते तो हम उन्‍हें या तो वली समझ सकते थे, या यंत्र मानव। मैं ऐसे सवालों पर अपने काे उस स्थिति में रख कर देखता हूं और अपने से पूछता हूं तो पाता हूं उस स्थिति में मैं स्‍वयं शिथिल हो सकता था और इसलिए इसे बहुत बड़ा अपराध नहीं मानता, प्रमाद मानता हूं।

2. स्थिति बेकाबू न हो जाय, इसलिए उसे संभालने के लिए उन्‍होंने पुलिस को उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने का आदेश देते हुए और केन्‍द्रीय बल का भी उपयोग करते हुए तीन दिनों में स्थिति पर काबू पा लिया था इसलिए उनका कहना कि ‘वही तो कर रहा हूूं’ सही भी था और पिछले प्रमाद की झेंप भी उनकी हंसी में थी। एक अपराध बोध कह सकते हैं।

3. सही राजनीतिक कदम यह होता कि उन्‍होंने एक ओर इस उपद्रव को सख्‍ती से रोका होता और गोधरा के अपराधियों का पता लगा कर उन्‍हें दंडित किया होता। परन्‍तु यह सही कदम तब होता जब हमारी न्‍याय प्रक्रिया सही होती जिसमें अपराधियों को जल्‍द से जल्‍द सजा मिलती। यह सच है मुकदमों को देखते हुए न्‍यायाधीशों की संख्‍या कम है, परन्‍तु न्‍यायाधीश स्‍वयं भी न्‍याय प्रक्रिया की उस भूल भुलैया के शिकार है जिसका नब्‍बे प्रतिशत बेकार का कर्मकांड है जिसे निकाल कर सरल बनाने का प्रयत्‍न नहीं किया गया और जो मुकदमे तीन दिन और कुछ तो एक सुनवाई में निपटाये जा सकते थे। अमेरिका में इन न्‍याय प्रक्रिया का एक पूरा कार्यक्रम ही आता है । मिनटों में पक्ष विपक्ष को सुन कर वारा न्‍यारा। इमारे यहां इउन्‍हें सालों साल घसीटा जाता है और इसमें अदालत की भी मिली भगत होती है। प्राय: अपराधी गलत बहानों से तारीख पर तारीख और लंबी मियाद की तारीख डलवाते हुए निरपराध को ही दंडित करने मेंं सफल होता है।

सही दंड प्रकिया का सही होना इस बात पर भी निर्भर था कि पुलिस सक्रियता दिखाने के लिए तनिक भी सन्‍देह पर किसी बेगुनाह को न पकड़े और उसे यातना दे कर अपराध कबूल करने को न बाध्‍य करे। उसकी शिथिलता, अकर्मण्‍यता अथवा भ्रष्‍टता के कारण आधे मामलों आरंभ में ही अपराधी को राहत दे दी जाती है और बेगुनाहों काे यातना भोगनी होती है।

पुलिस का सही होना इस बात पर भी निर्भर था कि न्‍याय और व्‍यवस्‍था के सवालों पर निर्वाचित प्रतिनिधि स्‍वयं पुलिस को अपने कर्तव्‍य निर्वाह में न रोकते और उस तरह की घटिया राजनीति न की जाती की जाती जैसी कांग्रेस शासन के दौर में रेलमन्‍त्री के माध्‍यम से की गई।

जहां सब कुछ गलत है वहां केवल एक आदमी का सर्वतोभावेन सही हो पाना संभव नहीं और इसके बाद भी ऐसे अपराधों को भुला कर जो उससे भी भयानक रहे हों और जिनमें राज्‍य की प्रत्‍यक्ष भागीदारी से कोई इन्‍कार नहीं कर सकता, उन कारणों की पड़ताल करने को बाध्‍य करता है जिसमें एक मामला इतना प्रचारित किया जाता है कि उसकी कसक लोगों के दिलों मेंं बहुत गहरे घर कर जाती है और दूसरे को इस तरह दरकिनार कर दिया जाता है मानो यह कभी घटित हुआ ही न हो। हम इस पर कुछ गहराई से विचार करेंगे पर कुछ रुक कर।

3. जिस राजधर्म की याद अटल बिहारी वाजपेयी ने दिलाई थी, हो सकता है मंच से अलग मोदी की आलोचना करते हुए उन्‍होंने इसकी कुछ बाद में चर्चा भी की हो, उसका एक पक्ष तो सर्वविदित है जिसमें प्रजा को राजा अपनी संतान मानता है और उसके साथ समता का व्‍यवहार करने का प्रयत्‍न करता रहा है यद्यपि यह समता का भाव वर्णमर्यादा में ही होता रहा है।

इसका दूसरा पक्ष चाणक्‍य के अर्थशास्‍त्र में मिलेगा जिसमें राजा यह तो प्रयत्‍न कर सकता है कि शत्रु देश में अशान्ति रहे, वहां की प्रजा में असंतोष फैले, पर स्‍वयं अपने ही राज्‍य में कोई अशान्ति फैला कर अपने काे ही निर्बल करे यह मूर्खता पूर्ण है।

4. अब इस कसौटी पर देखें तो क्‍या उस चेतावनी के बाद से मोदी ने कभी अपने राज्‍य में शान्ति व्‍यवस्‍था भंग होने की कोई नौबत आने दी ? उत्‍तर नहीं में देना हाेगा। क्‍या मोदी के कथन, कार्य और व्‍यवहार से यह नहीं लगता कि वह आज तक उसी आदर्श पर कायम हैं? य‍दि हां, तो ऐसे प्रशासक के विरुद्ध भय और असुरक्षा का वातावरण तैयार करने वाले किस धर्म का पालन कर रहे हैं ?

5. परन्‍तु इस राजधर्म का पालन, वह वाजपेयी की सरकार रही हो, या मोदी की सरकार, या भाजपा शासित राज्‍य, केवल वे ही क्‍यों कर पाते हैं। जिस संगठन को सबसे खतरनाक बताया जाता है, फासिज्‍म से ले कर तानाशाही तक के सारे खतरे कल्‍पना से गढ़ कर उस पर लाद दिए जाते हैं, केवल वही क्‍यों राजधर्म का पालन कर पाती है ? इसका कारण कोई बता सकता है ? मुझे ऐसा लगता है कि अपनी इतिहासविमुखता के कारण दूसरे विचारों और संगठनों को राजधर्म शब्‍द तक का पता नहीं या पता होगा तो वे इसका पालन जरूरी नहीं समझते क्‍योंकि इससे हिन्‍दुत्‍व की गन्‍ध आती है।

दो

अब हम उस मनोविज्ञान को समझना चाहेंगे जिसके कारण हाशिमपुरा और सिखों के खुले संहार के अभियान में जिस दल की खुली भागीदारी रही है उसके कारंदाजों को नजर अन्‍दाज करके केवल गुजरात के मामले में ही अजपाजाप क्‍यों इतनी तन्‍मयता से क्‍यों चलाया जाता रहा कि सह अन्‍तश्‍चेतना का अंग बन जाय। इसी का उच्‍च स्‍वर से अखंड मंत्रोच्‍चार अभिव्‍यक्ति के सभी माध्‍यमों से क्‍यों चलता रहा ?

मेरी समझ में इसका एक ही कारण है जिसे मैं पहले बता आया हूं । ये तो उसी के प्रमाण हैं । इसे फिर दुहरा दूं कि स्‍वतंत्रता संग्राम के अाखिरी दौर में कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने मुस्लिम लीग की विचारधारा को आंख मूद कर अपना लिया और धर्म के आधार पर देश के विभाजन का समर्थन ही नहीं किया अपितु इसे गर्व से बताती भी रही, यह मुझे बलराज साहनी के एक संस्‍मरण में पहली बार पढ़ने को मिला था। उसके बाद उसने कहने को इसे अपनी भूल स्‍वीकार किया पर उससे कोई सबक नहीं लिया।

स्‍वतंत्र भारत में वे मुस्लिम लीगी जो पाकिस्‍तान न जा सके रातोरात खादी वस्त्र और गांधी टोपी लगा कर कांग्रेसी हो गए। नेहरू को मुसलमानों के और आज की भाषा में दलितों के वोट बैंक की जरूरत थी और इसी के बल पर वह सत्‍ता में रहे। इसलिए उन्‍होंने इसको और बढ़ावा दिया पर इनके लिए कुछ खास करने की जरूरत नहीं समझी सिवाय हिन्‍दू समाज में बहुविवाह पर रोक और मुस्लिम समाज में इसे जारी करने की छूट देते हुए पहली बार हिन्‍दू कोड बिल पास करने के।

न्‍याय के तकाजे से यदि हिन्‍दू समाज के निजी विधान में सरकार दखल दे सकती थी तो उसी आधार पर मुस्लिम समाज की महिलाओं को भी वह राहत दी जा सकती थी और कानून पास किया जा सकता था। पर यह लीगी मानसिकता वाले कांग्रेसियों को स्‍वीकार न था और नेहरू अपना वोटबैंक छोड़ने को तैयार न थे इसलिए भारत काेे पहली बार हिन्‍दू राज्‍य बनाने का प्रयत्‍न नेहरू ने किया।

इसको खींच तान कर लें तो भी इसका अर्थ हुआ हिन्‍दू समाज न्‍याय और औचित्‍य के आधार पर कोई भी सुधार या बदलाव करने को तैयार रहता है इसलिए उसके रूढि़वादियों ने भी इस पर आपत्ति नहीं की। केवल राष्‍ट्रपति ने इस पर आपत्ति दर्ज की क्‍योंकि देश की जनता को कानून के समक्ष भी हिन्‍दू मुसलिम में बांटना उन्‍हें गलत लगा था और उन्‍होंने दो बार बिल को लौटाया था। इसके विपरीत मुस्लिम समाज अपने आन्‍तरिक अन्‍याय को तर्क और औचित्‍य से परे ही नहीं मानता, केवल पुरुषों को मुसलमान मानता है महिलाओं को अपनी संपत्ति या चैटल और इसे जारी रखने के लिए वह धर्म की दुहाई दे सकता है जब कि धर्म ऐसा नहीं कहता।

केवल तत्‍कालीन परिस्थि‍तियों में चार की हद पार करने की मनाही थी जिस आधार पर सारे मुसलिम शासक कुरान पाक की तौहीन करने वाले सिद्ध होंगे। एक और एकमात्र विवाह की मनाही न की गई थी।

हमारा बौद्धिक वर्ग या इस दृष्टि से किसी भी समाज का बौद्धिक वर्ग अपने समुदाय के कोटर में बंधना नहीं चाहता और इसलिए उसका आकर्षण कांग्रेस और वाम की ओर रहा है । इनकी राजनीति ने एक अच्‍छे से नाम की आड़ में उनकी अात्‍मा में जगह बना लिया। लीगी मानसिकता के कारण बुद्धिजीवियों को हिन्‍दू समाज से विरत किया गया। हिन्‍दू शब्‍द, इसके इतिहास, इसके मूल्‍यों के प्रति विरक्ति पैदा करने के प्रयास होते रहे । इन प्रयत्‍नों केा प्रगतिशीलता का प्रमाण माना जाता रहा। इसे इसकी तार्किक परिणति पर पहुंचाने का काम नूरुलहसन साहब के शिक्षामंत्री बनने के साथ शिक्षा में प्राइमरी स्‍तर से ही इसे घोलने और उच्‍चतम स्‍तर तक इसे कायम रखने का इन्‍तजाम करके किया गया। जेएनयू सहित सभी केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालयों, शोध संस्‍थानों और पुस्‍तकालयों को इस मानसिकता का विस्‍तार करने का यन्‍त्र बनाया गया।

कांग्रेस ने भले वोटबैंक को बदल कर हिन्‍दू वोटबैंक तैयार करने के लिए दंगे कराए हों उनसे व्‍यथित मुसलमान भी हिन्‍दू माने जाने वाले संगठनों को कांग्रेस से अधिक खतरनाक मानते थे। हिन्‍दूविरोध ही लीग का आधार था। इसलिए बुद्धिजीवीवर्ग का ध्‍यान उधर गया भी तो न गए के समान।

सिख उग्रवादियों को उभारने में सीआईए की सक्रियता का दावा किसी ने नहीं किया। जिन देशों में उनको पनाह मिलती रही वे ईसाई संगठनों का पोषण करते हैं। निशाने पर तो कांग्रेस भी थी क्‍योंकि इंन्दिरा जी ने अमेरिका के सामने झुकने से इन्‍कार कर दिया था। पाकिस्‍तान में उनको जो संरक्षण मिल रहा था। उनके पीछे ईसाई और मुस्लिम फिरकों के हाथ का यह प्रमाण है।

उन्‍होंने अकारण, केवल हिन्‍दुओं को जिस तरह उतार कर गोलियों से भूनने का इतिहास रचा वह उन हत्‍याओं से अधिक जघन्‍य था जिनके फोटो खीच कर समाचार माध्‍यमों पर आइ एस की पाशविकता प्रमाणित करने के लिए दियाया जाता रहा है। इन्होंने एक बार संघ की एक शाखा के नौजवानों को गोलियों से भून दिया गया था, दिल्‍ली में कई विवाहमंडपों को खूनी खेल मंडप बना दिया था, उस पर हमारे संगठन चुप रहे, बुद्धिजीवी चुप रहा। कांग्रेस ने अकाली दल को सत्‍ता से हटाने के लिए उन्‍हीं आतंकवादियों का साथ लेना चाहा और उनके छवि निर्माण के प्रयत्‍न किए। क्‍याें ? क्‍योंकि उनके हाथों मरने वाले हिन्‍दू थे । कश्‍मीर से पंडितों के पलायन का और उन्‍हें केन्‍द्रीय संरक्षण देने का सवाल उठाने वाला रैबिड हिन्‍दुत्‍ववादी दिखाई देता है। 1984 के सिख विरोधी दंगों में कांग्रेसियों की म‍ुहिम से, पुलिस के सहयोग से जो हत्‍याये हो रही थी वे मुसलमान नहीं सिख थे। मुस्लिम लीग की मानसिकता जिसे सेक्‍युलरिज्‍म का नाम दे दिया गया और उसे संघ के विरोध में सभी संभव साधनों से विकसित किया गया।

इन्‍द्रा जी की हत्‍या करने वाले एक अपराधी काे घटनास्‍थल पर ही गोली मार दी गई थी, दूसरा गिरफ्तार किया जा चुका था इसलिए सिख नागरिकों का संहार करने का कोई कारण न था। लाल बहादुर शास्‍त्री की मृत्‍यु जिन रहस्‍यमय कारणों से हुई थी वैसे ही रहस्‍यमय कारणों से इन्‍द्रा जी की भी हत्‍या हुई थी। निमित्‍त पकड़ में आ गया, मूख्‍य अपराधी ने अपने को छिपाने के लिए यह दंगा करा दिया हो यह अन्‍देशा लोगों के मन में बना रहा। इसका संकेत लेखी ने अपनी बहस में भी दी थी कि बेअन्‍त और सतवन्‍त ने तो इन्द्रा जी पर सामने से गोलियां बरसाई थीं, एक गोली जो उनके निवास की ओर से आई थी और पीठ में लगी थी वह किसकी थी? वह क्‍या कारण था कि अस्‍पताल में उन अन्तिम घडि़यों में भी उनके अपने स्‍टाफ का कोई व्‍यक्ति पूछ रहा था कि उस तिब्‍बतन बार्डर फोर्स के सिपाही को क्‍या हुआ और जब पता चला कि उसे गोली मार दी गई तो चैन पड़ा। जैसे सिख दंगा उस अपराध से ध्‍यान हटाने के लिए किया गया उसी तरह उस दंगे से ध्‍यान हटाने के लिए गुजरात के दंगे को अतिरंजित और विश्‍व की पहली और सबसे दुर्दान्‍त घटना बताते हुए संघ और भाजपा और खास करके मोदी को लगातार मौत का सौदागर मौत के सौदागरों द्वारा सिद्ध किया जाता रहा यह सेक्‍युलरिज्‍म और ताहू पर कछु और है। य‍दि कोई जानना चाहे कि क्‍वात्रोची का प्रधानमन्‍त्री निवास में आना जाना इन्दिरा जी को पसन्‍द था या नहीं तो इसका जवाब तो मैं भी नहीं दे सकता। जो दे सकते हैं देंगे नहीं ।

Post – 2016-10-21

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर -14

मोदी की सबसे बड़ी शक्ति है, विश्‍वसनीयता । जो लोग कमियां ढूंढ़ते हैं उनको यह मक्‍कारी प्रतीत हो सकती है । ऐसा नहीं है कि यह व्‍यक्ति जो कहता है उसे कर दिखाता है, बल्कि यह कहते समय अपने कहे वाक्‍य की जिम्‍मेदारी समझता है और बाद में उसे पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास करता है । कुछ संयोग भी ऐसा है कि दूसरों के बारे में भी यदि कुछ कह दिया तो घटनाक्रम ऐसा मोड़ लेता है कि अभी तक वह सही होता गया है । उसकी एक मिसाल है वंशवाद का नाश । कांग्रेस के वंशवाद के खुलासे के बाद जो सबसे रोचक विकास हुआ है वह यह कि कल तक नेहरू परिवार अपने को राजवंश समझता था। उसके कुत्‍ते तक भौकते थे तो उससे दर्शन निकाल लिया जाता था।

मोदी के मंच पर आने से ठीक पहले तक हालत यह थी बेटा, बेटी, दामाद, धवते सभी लाइन लगाए तैयार थे कि किसके न रहने या नालायक सिद्ध होने पर कौन मुकुट धारण करेगा। उसके ठीक बाद से नेहरूवंश के किसी सदस्‍य की बात कोई सुनने को तैयार नहीं। थकान, खीझ, गुस्‍सा, बदजबानी जो सभी पस्‍ती के प्रकट लक्षण हैं वह बढ़ती जा रही है। खुराफात के तरीके तक चन्‍द दिनों तक भरोसा दिलाने के बाद बेकार पड़ जा रहे हैं। पहली बार कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने मुंह खाेला और कहा नि राहुल में नेतृत्‍व की क्षमता नहीं है, उन्‍हें जनता सुनती नहीं है, अपितु एक दो ने यह भी कहा कि वंश परंपरा के कारण पार्टी का नुकसान हुआ है।

पहली बार उत्‍तर प्रदेश के यादव परिवार का काला कारोबार इतने बड़े पैमाने पर उजागर हुआ है और जिस बात का सन्‍देह किया जाता था उसके प्रमाण आए हैं । विगत चुनाव में बिहार में भाजपा की सैद्धान्तिक जीत, और नीतीश कुमार की भाजपा के समक्ष सैद्धान्तिक और लालू के सामने चुनावी पराजय के साथ ही लालू वंशवाद अपने आपराधिक रिश्‍तों के साथ उजागर हुआ है। उल्‍टी गिनती शुरू इसी से होती है।पश्चिम वंग में ‘सेक्‍युलर अपराध तन्‍त्र के खुलासे के साथ वहां भाजपा के पक्ष में जनमानस का इतना झुकाव हुआ है जो पहले नहीं सोचा जा सकता था। और इस समस्‍त व्‍यापार में मोदी की न तो कोई सक्रियता है, न हीं कोई परोक्ष हाथ। वह अपना काम करते रहे। वह जैसा भी है, पर इसमें सन्‍देह नहीं कि अपने वादों को पूरा करने की दिशा में जब कि दूसरे दल और संगठन अपनी पूरी ताकत इस में लगाए रहे कि वे अपने काम में सफल न हों ।

उनकी सफलता देश के हित में तो होगी, परन्‍तु उनके अपने हित में न होगी। यह चेतना उन सभी की और उन फुटकर आलोेचकों की भी है जिन्‍हें आज तक मोदी में कोई गुण दिखाई ही न दिया, उनकी बेचैनी को बढ़ाती है। झुंझलाहट बढ़ती जाती है और इतने छोटे मुद्दों काे तूल देकर उनको देश की सबसे दुर्भाग्‍यपूर्ण घटना बनाने का प्रयत्‍न करते हैं जब कि सामान्‍य जनों को यह प्रयास इसलिए मनोरंजक लगता है कि इतने दिन से परिश्रम करने के बाद इतनी छोटी कमी निकाल पाए । तब तो इनके अनुसार भी बाकी सब ठीक ठाक ही है।

एक व्‍यक्तिगत घटना याद आती है । मैंने अपनी पुस्‍तक हड़प्‍पा सभ्‍यता और वैदिक साहित्‍य में अपने मार्क्‍सवादी इतिहासकारों की कमियों का निर्ममता पूर्वक उल्‍लेख किया था। मुझे भी लगता रहा कि इतनी निष्‍ठुरता की जगह कुछ अधिक शालीनता से वही आलोचना की होती तो अधिक अच्‍छा रहता। आर एस शर्मा और रोमिला थापर दोनों की उस समय तक मैं व्‍यक्तिगत रूप में बहुत आदर करता था परन्‍तु विचार के स्‍तर पर कभी किसी का लिहाज नहीं कर पाता। मैंने यह बताते हुए कि इसमें आपकी आलोचना की गई है पुस्‍तक का विमाचन उन्‍हीं से कराने का प्रस्‍ताव रखा था और कहा था, मैंने जिस निर्ममता से आपकी आलोचना की है उसी तरह आप इसकी गलतियों को उजागर करते हुए अपना भाषण दें। कुछ लोगों के बरगलाने पर वह बाद में विमोचन से पीछे हट गए। वह भी जब कार्ड छप गए थे और समय तीन दिन का रह गया था। खैर, उनको पुस्‍तक का पहला खंड ही दे पाया था, दूसरा अभी बाइंडर के यहां से आया नहीं था। बीच में वह खिन्‍न भी रहे । पांच छह महीने बाद उनसे अनुमति लेकर मैं पुस्‍तक का दूसरा खंड उनके पूर्वांचल अपार्टमेंट्स के फ्लैट पर देने गया और पहले खंड पर उनकी राय जाननी चाही तो उन्‍होंने कहा, ”हां, और सब तो ठीक है लेकिन भई, आजकल स्‍थान नामों का उच्‍चारण वहां के लोग जैसा बोलते हैं वही लिखने का चलन है। नाम है मोहें जोदड़ो और तुमने लिखा है माेहनजाेदड़ो । मैंने मुस्‍कराते हुए कहा अगले संस्‍करण में सुधार कर दूंगा ओर मन ही मन सोचा यदि पूरी पुस्‍तक में यही सबसे बड़ी और एकमात्र गलती दिखाई दी तो पुस्‍तक शर्मा जी को भी निर्दोष लगती है।

छोटी चूकों को तूल देने वाले नहीं जानते कि इसका सन्‍देश उनके इरादे से ठीक उल्‍टा जा रहा है।

पढ़ा लिखा मूर्ख अनपढ़ मूर्खों से अधिक बड़ा मूर्ख होता है क्‍योंकि वह अपनी अक्‍ल से काम नहीं लेता, दूसरों की अक्‍ल से काम लेता है जिनके विचारों को वह जानता है, उनके पीछे छिपे इरादों को भले न जानता हो। अनपढ़ आदमी उसका जितना भी दिमाग है, थोड़ा ही सही, उसी से सोचने को बाध्‍य होता है, इसलिए दूसरे मामलों में शिक्षित लोगों से भी पीछे रह जाने के बावजूद वह उन प्रलोभनों से कम प्रभावित होता है जिसका शिक्षित व्‍यक्ति शिकार हो जाता है। कारण यह नहीं कि उसका नैतिक स्‍तर ऊंचा होता है अपितु यह कि वे प्रलोभन उस तक पहुंच नहीं पाते । उसके नाम पर भेजे जाते है तो भी बीच के चालाक लोग, जो पढ़े लिखे भी होते हैं, उसे कई तरीकों से झपट लेते थे इसलिए उन कम अधपढ़ और अनपढ़ लोगों तक य‍दि कुछ पहुंचता था तो वह कई गुना बड़ी लायबिलिटी, दुर्वह बोझ बन जाता था जिसमें आत्‍मग्‍लानि और आत्‍महत्‍या आत्‍मसम्‍मान बचाने का सबसे आसान तरीका लगता था।

मैं जिस क्षेत्र की बात कर रहा हूं वह मेरा नहीं है। उसमें प्रवेश नहीं करना चाहिए। परन्‍तुु इसका संबंध जिन्‍दगी से है इसलिए जिसने अर्थशास्‍त्र और बित्‍त प्रधन्‍धन जैसे भारी भरकम शब्‍दों को नहीं सुना है उसे भी इस पर सोचना और अपनी राय बनानी पड़ती है जो कामचलाऊ कही जा सकती है। मैं कामचलाऊ बुद्धि के बल पर सारा लेखन करता आया हूं नहीं कोई इतने विषयों पर किसानों जैसे आत्‍मविश्‍वास से बात कैसे कर सकता है।

मेरे एक मित्र ने पीडि़त स्‍वर में लिखा इतने हजार या लाख करोड़ का कर्ज माफ कर दिया गया। दूसरे ने कहा कि यह तो हमारे राष्‍ट्रीय बजट से या हो सकता है सकल उत्‍पाद कहा हो, पढ़ते ही भूल जाता हूं, ऐसी तो याददाश्‍त पाई है, अधिक है। इसे एक ने रघुराम राजन की दृढ़ता और अर्थव्‍यवस्‍था को सुधारने के संकल्‍प से जोड़ दिया। ये सभी लोग मुझ जैस ढाई अक्षर के ही विद्वान थे और बीच में नई सरकार ने जाने कितने का नया कर्ज जारी भी कर दिया। एक बै‍ंक के पुराने तजुर्बेकार ने अपना निजी उद्योग खड़ा करने के लिए दिए गए इन कर्जों पर टिप्‍पणी की कि यह अपनी वाह वाह क्‍यों करते हैं। ऐसे ऋण पहले भी दिए जाते रहे हैं और इससे कर्जमाफी की नौबतें ही आई हैंं।

सोचिए समस्‍या कितनी गंभीर है। अर्थशास्‍त्र का वह स्‍तर जिस पर रघुराजन जैसे
अमेरिकी अनिवासी भारतीय की उदार सेवा है, मोदी जैसे चाय वाले के अर्थशास्‍त्र का दखल है जो गिनती तो जानता है, पहाड़ा जानता होगा यह उसको रियायत देते हुए सोचा जा सकता है, परन्‍तु वह अलजब्रा और ट्रिगनामेट्री तो कतई न जानता होगा। टक्‍कर एक अनाड़ी और सनाड़ी जिसे नशाड़ी या ज्ञानांध भी कह सकते हैं, के बीच है।

क्‍या आपने नोट किया क‍ि आज कल सारे समाचार दूसरे अपराधों से भरे रहते हैं, आत्‍महत्‍या तक के मामले प्रेमी के दगा, कैरियर में बाधा, प्रेमिका के छल और धन दौलत के दूसरे फसादों से जुड़े पढ़ने को मिलते हैं, किसानों की आत्‍महत्‍या के नहीं मिलते हैं।

क्‍या आपको पता है, सच तो यह है कि मुझे भी पता नहीं है, मैं भी आपके ज्ञान भरोसे बैठा हूं कि क्‍या यह समाचार माध्‍यमों की फितरत है और वे आत्‍महत्‍या की खबरों को दबा कर मोदी के इस दावे को सच कर रहे हैं कि अच्‍छे दिन आ गए, और संतुलन बनाए रखने के लिए पहले पन्‍ने से ले कर खेल के पन्‍ने तक उन्‍हें गाली दे रहे हैं, या सचमुच ऐसा हुआ है।

यदि ऐसा हुआ है तो क्‍या इसमें उन कर्जमाफियों की भूभिका नहीं है। राजन की दलील थी, देखिए मैं मुुफ्त का वकील हूं और जो सूचना मुझ अपने मुअक्किल से नहीं मिली है उसकी भी अपनी तरह से व्‍याख्‍या करके उसे बचाने का प्रयत्‍न करूंगा, इसलिए आप बताएं कि कर्ज वसूली करके बैंकों को जिलाने और अर्थव्‍यवस्‍था को आगे बढ़ाने का फैसला अधिक व्‍यावहारिक था या यह कि जिनसे कर्ज की वसूली की जा रही है उन बेचारों तक उसका एक अंश पहुंचा। बाकी बीच के लोग खा गए जिसमें बैंक के कर्मचारी, उनके जमानतदार आदि सम्मिलित थे और उस बेचारे ने समझा मुफत का माल है ले लो जो भी मिला उसकाे मुफ्त का माल समझ कर खा पी गया और अब देनदारी के समय उसको उसको उस पूरी रकम काे व्‍याज सहित भरना था जिसका आधा या तिहाई तो दूसरे खा गए। यह कर्ज तो महाजन के कर्ज से भी भारी पड़ा। कर्ज लेते समय वह तरंग मेंं था कि मैंने अफसरों और दलालों को पटा कर बाजी मार ली। देते समय उसे अपने ही परिवार और परिजनों के सामने अपमानित होना पड़ रहा था जिनसे उसने तड़ी बघारी थी। आत्‍महत्‍या के असंख्‍य समाचारों में इस बात पर कभी ध्‍यान नहीं दिया गया कि परिवार का प्रधान या वह व्‍यक्ति आत्‍महत्‍या करता है, जिसके नाम से कर्ज लिया गया था, उसके परिवार के दूसरे सदस्‍य नहीं। अर्थात् निर्धनता जैसी भी रही हो, ऐसी न थी कि जीवनयापन संभव न हो। उन्‍हीं परिस्थितियों में दूसरे जीवित रहे, वह भी रह सकता था।

मोदी काे जमीनी सचाई का पता है। उसने देखा, यह आर्थिक अभाव या दुरवस्‍था की मृत्‍यु नहीं है, आत्‍मग्‍लानि और अपनी मूर्खता से मोहभंग की देन है। पूरा पैसा तो उसने लिया ही नहीं। उस तक पहुंचा ही नहीं।

क्‍या करें । उसने सोचा इनको बचाएं। इनका कसूर नहीं है। कसूरवारों को हम पकड़ नहीं सकते, न उनसे वसूली की जा सकती है।

कर्जमाफी पहले भी की जाती रही होगी, पर वह इसलिए कि वोट लेना था। रिश्‍वत खाने वाले रिश्‍वत देने के तरीके ईजाद कर लेते हैं।

मोदी की पकड़ जनता की नब्‍ज तक है। उसने पहले यह सुनिश्चित किया कि जो धन जिसके नाम से है उस तक पहुंचे और इसके लिए लोगों के एक पैसा न रहते हुए भी अपना खाता खोलने के लिए दो लाख की बीमा राशि का आश्‍वासन दे कर इतने अधिक लोगों के खोते खुलवाए जो विश्‍व में एक कीर्तिमान है। परन्‍तु यह कीर्तिमान बनाने के लिए नहीं था, बिचौलियों के चंगुल से भुक्‍तभोगियों को बचाने का अपूर्व विजन था जो दुनिया के किसी अर्थशास्‍त्री या तन्‍त्र ने न देखा होगा। (यह मैं अपनी ओर से गढ़ कर कह रहा हूं, आप प्रमाण दे कर इसे गलत साबित करेंगे तो आपकी बात मान लूंगा। )

और दूसरा काम यह कि कर्ज उन्‍हें दो जो अपने पांवों पर खड़ा होना चाहते हैं। जो कोई रोजगार खड़ा करना चाहते हैं। एक अपना कारोबार करेगा तो सहायता के लिए एक दो को और आगे बढ़ेगा तो बहुतों को काम पर लगाएगा। बेरोजगारी तो इसी तरह कम होगी। उसकी योग्‍यता आदि के आधार पर उसका चयन किया जाएगा।

कहें पहले के कर्ज समाज को सरकार का परावलंबी बनाने के लिए थे, कर्ज लेने वाले को फांस कर आत्‍महत्‍या के कगार पर पहुंचा देते थे जिसे झेल न पाने के कारण उनमें से बहुतेरे आत्‍महत्‍या कर लेते थे। मोदी ने पहले यह व्‍यवस्‍था की जिसका प्राप्‍य है उस तक पहुंचे । यह विश्‍व का अपूर्व प्रयोग है। आप इस मोदी को नहीं समझ पाते क्‍योंकि अाप उससे ही नफरत नहीं करते अपने आप से, अपने समाज से, इसके भविष्‍य से नफरत करते हैं। नफरत करने वालों की प्राणशक्ति नफरत पर ही जाया हो जाती है। वे अधिक समय तक टिके नहीं रह सकते।

मुझे लगता है, और तब तक लगता रहेगा जब तक आप अपने विवेचन से गलत नहीं सिद्ध कर देंगे कि मोदी का अर्थशास्‍त्र बोध राजन के अथशास्‍त्र ज्ञान से बहुत आगे है।

Post – 2016-10-20

भारतीय राजनीति में मोदी फैक्‍टर – 13
(सांप्रदायिकता : एक प्रवेशिका की शवपरीक्षा

यदि मेरे एक विद्वान मित्र ने इस पुस्‍तक की महिमा ऐसे शब्‍दों में न गाई होती मानो यह विपिन चन्‍द्रा की सर्वोत्‍तम पुस्‍तक हो, सांप्रदायिकता को समझने के लिए गीता जैसी महत्‍वपूर्ण है तो मैं जिस दिशा में सोच रहा था, उससे विचलित हो कर इस प्रश्‍न को न ले बैठता जो मोदी फैक्‍टर से यदि कोई संबंध रखता भी है तो हाशिए की लिखावट जैसा। सांप्रदायिकता की मीमांसा मैं बाद में करने वाला था और करूंगा भी। परन्‍तु यह व्‍यवधान भी इस अवसर पर जरूरी था।

मेरी कुछ बहुत निर्णायक टिप्‍पणियां हैं जिनमें से किसी का प्रतिवाद किसी विद्वान ने नहीं किया। उनमें से एक है भारतीय राजनीति में सेक्‍युलरिज्‍म मुस्लिम लीग की मान्‍यताओं और पूर्वाग्रहों से परिचालित रहा है और कम्‍युनिज्‍म, सेक्‍युलरिज्‍म आदि स्‍वतंत्र भारत में उसी के मुखौटे हैं। मैंने बड़े सहज भाव से इस सवाल को खेल के नियमों के तहत निर्वैर भाव से उठाया था कि मैं मोदी के पक्ष में अकेला खड़ा होता हूं और आप लोगों पर प्रहार करता हूं और बुद्धिजीवियों की पूरी अक्षौहिणी को मेरे प्रहारों पर अपना बचाव और उलट कर मुझ पर प्रहार करें। यह एक ऐसा खेल हो जिसमें जो उचित हो उसे दोनों मानते चले और जीत उस निष्‍कर्ष के रूप में आए जिस पर हम सभी पहुंचे परन्‍तु मेरी समझ में नहीं आता कि कोई अपना बचाव तक नहीं कर पा रहा है फिर भी छी: थू: के स्‍तर को जारी रखा जा रहा है। यह बौद्धिक स्‍तर तो न हुआ। मैं उत्‍तर के अभाव को मौन सहमति मानता हूं । और प्रतिवाद के रूप में छी: थू: को वह बौद्धिक गिरावट जिसमें विचार का स्‍थान घृणा प्रचार ने ले लिया है। इस घृणा प्रचार के कारण सोचने का स्‍तर भी गिर गया है और सोच-विचार का दायरा भी सिकुड़ गया है।

इस कारण ही मैं यह भी मानता हूं कि जिनको पिछले पचास सालों के समाजशास्‍त्र की विविध शाखाओं में प्रकांड विद्वान कह कर प्रचारित और स्‍थापित किया जाता रहा है वे प्रकांड तो नहीं पर प्रचंड विद्वान अवश्‍य हैं और उन सबके भीतर, दिमाग के उस कोने में जहां से अन्‍तर्दृष्टि पैदा होती है हिन्‍दुत्‍व के प्रति विरक्ति भरी हुई है इसलिए वे अपने विषय की चुनौतियों तक का सामना नहीं कर सकते । यदि न ऐसा होता तो अनुवाद के पेशे से जुड़ और समस्‍त सुविधाओं से वंचित व्‍यक्ति को आर्यद्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता और हड़प्‍पा सभ्‍यता और वैदिक साहित्‍य न लिखना पडता, उसे अधिक सलीके से, और पहले, उन्‍होंने लिखा होता। पर बौद्धिक स्‍तर यह कि उसे समझने और मानने से बचने के लिए दो दशक तक बहाने तलाशते रहे और मानने को विवश होने में तीस साल लगा दिये ।

उक्‍त कारण से ही मैं यह मानता था कि सांप्रदायिकता की समस्‍या को भारतीय सेक्‍युलर घराने का कोई व्‍यक्ति समझ ही नहीं, सकता, वह इसके नाम पर भी सांप्रदायिकता का ही विस्‍तार करेगा। अत: इसे देखने और अपने विचारों से दूसरों काे अवगत कराने के लिए सोचा यदि यह पुस्‍तक सांप्रदायिकता को समझने की गीता न भी हुई तो सेक्‍युलरिज्‍म में अन्‍तर्निहित सांप्रदायिकता के कारोबार को मापने का फीता तो बन ही सकती है।

कम्युनलिस्म : ए प्राइमर का प्रकाशन वर्ष 2013 में हुआ था। इसका मूल्‍य 85 रखा गया था। पुस्‍तक 121 पन्‍नों की है जिसे देखते हुए मूल्‍य नेशनल बुक ट्रस्ट के मानकों से उचित ही कहा जाएगा। इस पुस्‍तक के प्रथम संस्‍करण की प्रतियां आज भी उपलब्‍ध हैं, यह ट्रस्‍ट के वेव साइट से पता चलता है। इसका हिन्‍दी संस्‍करण ‘सांप्रदायिकता : एक प्रवेशिका’ अब उपलब्‍ध नहीं है। इसका प्रकाशन विपिन चन्‍द्रा के अध्‍यक्ष रहते 2011 में हुआ था और मूल्‍य अपेक्षा से बहुत कम मात्र 45 रु रखा गया था। मूल्‍य में यह अन्‍तर समझ में तभी आ सकता है जब हम यह जानें कि इसे प्रचार के लिए लिखवाया गया था। अंग्रेजी में अनुवाद स्‍वयं डा चन्‍द्रा ने ही किया होगा और अपनी साख बचाने के लिए उसमें कुछ छोड़ा और जोड़ा भी गया होगा, क्‍योंकि हिन्‍दी की पुस्तिका केवल 85 पन्‍नों की थी जो अंग्रेजी में 121 पन्‍ने हो गई ।

विनय पूर्वक ही सही, परन्‍तु यदि किसी अक्षम व्‍यक्ति को किसी पद पर रखा जाता है तो उसका उपयोग किया जा सकता है और यह उपयोग तो उनकी सोच के अनुरूप भी था। डा. साहब की स्‍मृति अब तक कमजोर हो चुकी थी, दृष्टि का लेखन में बाधक तो नहीं होती, वह काम डिक्‍टेट करके कराया जा सकता है, परन्‍तु पदीय कार्यनिर्वाह में बाधक थी और फिर नियम को ताक पर रख कर उन्‍हें तीन कार्यकालों तक रखा गया था इसलिए वह अपने नियोक्‍ता के हवाले होने को बाध्‍य थे।
हिन्‍दी और उर्दू में प्रकाशित होने के बाद इसका अनुवाद अंग्रेजी में किया गया। डा. साहब की गति अंग्रेजी में थी, हिन्‍दी में नहीं । परन्‍तु जहां जरूरत प्रचार की हो वहां हिंदी उर्दू अधिक जरूरी हो जाते हैं । हिन्‍दी में इसकाेे ‘लोक विज्ञान’ रखा गया था आप चाहें तो प्रचार विज्ञान पढ़ सकते हैं। पहली बात तो यह कि किसी भी प्रकार का राजनीतिक प्रचार या इसका आभास देने वाली पुस्‍तक का प्रकाशन, या जिससे किसी तरह का धार्मिक पक्ष प्रकट होता हो उसका प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्‍ट की नीति के विरुद्ध है । मैंंने उपनिषदों की कहानियां और पंचतन्‍त्र की कहानियां की तर्ज पर पुराणों की कहानियां लिखने का प्रस्‍ताव रखा था उस समय इसका पता चला था। अत: यह निर्विवाद है कि पुस्‍तक अपने अधिकार का दुरुपयोग करते हुए डा. चन्‍द्रा ने किसी दबाव में अपनी ही संस्‍था की नीति के विरुद्ध किया था जो अनैतिक माना जाएगा।

यह निरा प्रचार साहित्‍य था और भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता से आतंकित हो कर कांग्रेस के दबाव में लिखवाया गया था इसे निम्‍न अंश से ही समझा जा सकता है:
‘यह (सांप्रदायिकता) अब स्थानीय और क्षेत्रीय तथ्य नहीं रहा है. राष्ट्रीय सच बन गया है, जो बीजेपी की चुनावी सफलता और पिछले कुछ सालों में आरएसएस के दूसरे मुख्य संगठनों की बढ़ती ताकत से स्पष्ट है. बीजेपी और उसकी जन्मदात्री संस्था आरएसएस अपने कैडर्स की नियुक्ति बहुत ही सख्त और स्पष्ट सांप्रदायिक विचारधारा के आधार पर करती हैं.’

पुस्‍तक वास्‍तविकता से अनभिज्ञता के होते हुए या बिना प्राथमिक तैयारी के लिखी गई थी इसका प्रमाण इसी उद्धरण का अंतिम अंश है । मैं इसमें प्रयुक्‍त कैडर्स का अर्थ मैं नहीं समझ पाया। यदि शाखा से जुड़े या शाखा में जाने वालों को कैडर्स में गिना जाय तो उनको किसी सख्‍त और स्‍पष्‍ट सांप्रदायिक विचारधारा के आधार पर चुना नहीं जाता अपितु उनको खेल और स्‍वास्‍थ्‍य के प्रलोभन में फुसला कर शाखा से जोड़ा जाता है और इनकी ही बढ़ती संख्‍या के आधार पर संघ यह घोषित करता रहा है कि अब हमारी सदस्‍य संख्‍या इतनी हो गई।

भाजपा ने अपना अलग सदस्‍यता अभियान चलाया था और उसका मजाक यह कि बहुत सारे लोगों को बिना उनकी जानकारी के सदस्‍य मान लिया गया था और जब स्‍पष्‍टीकरण मांगा गया तो उत्‍तर मिला कि हम इनके पास पहुंच कर बात करने वाले थे । इसलिए कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के कैडर्स का जो ज्ञान था उसे डा. चन्‍द्रा ने संघ पर लाद दिया।

आगे की जानकारी यह कि ‘‘बीजेपी और उनके साथी संगठन वीएचपी और बजरंग दल, सभी पर आरएसएस का बहुत ही चौकस नियंत्रण है, जो राम जन्मभूमि मुद्दे और उसके धार्मिक अपील से काफी संख्या में हिंदुओं के जेहन में जगह बनाने में सफल रहे और उन्हें सांप्रदायिकता पर लाकर कमजोर कर दिया.’’

नियंत्रण का हाल यह है कि मोदी की सफलता से हाशिये से बाहर खिसकते जानेे के कारण, ये दल ऐसी अनाप शनाप बातें करते हैं कि उनके किए पर पानी फिर जाय। वे राम मन्दिर के बल पर सांसे ले सकते हैं, मोदी का कहना है देवालय से अधिक जरूरी शौचालय है। देवता से अधिक जरूरी सफाई और पवित्रता है – तन की, मन की और परिवेश की । अत: डा. चन्‍द्रा का यह कथन भी कोरी लफ्फाजी है जिसे घबराई हुई कांग्रेस और उसके प्रसादग्राही ही कोई भाव दे सकते हैं।

अगला अंश इस प्रकार है, ‘धर्मनिरपेक्षता की दिशा में बीजेपी के सुधार की बात करना निरर्थक है, क्योंकि बीजेपी के शुरुआती अवतार जनसंघ के संदर्भ में 1977-78 में कइयों ने इसकी कोशिश की थी. या बीजेपी के एनडीए के कई सहयोगी भी मानते थे कि वे ऐसा कर सकते थे, या आरएसएस से अपना अल्पसंख्यक विरोधी नजरिया छोड़ने के लिए, या यह सुझाव देने के लिए कि बिना सांप्रदायिकता के बीजेपी बनी रहेगी. पर ऐसा नहीं हुआ. बिना सांप्रदायिकता के बीजेपी ‘पूरी तौर पर सही’ नहीं रहेगी. यह राजनीतिक धरातल पर जीरो हो जाएगी, और बेजीपी नेता इससे वाकिफ हैं.’

परिणामों ने, मोदी के सबका साथ सबका विकास नारे ने और इस दिशा में किए गए सतत प्रयत्‍नों ने तो इसकी व्‍यर्थता सिद्ध कर ही दी, चुनाव के परिणामों ने राजनीतिक धरातल पर जीरो होने की जगह, जिस कांग्रेसी सरकार को प्रसन्‍न रखने के लिए डा. चन्‍द्रा इतने घटिया स्‍तर की बयानबाजी कर रहे थे उसे ही जीरो पर पहुंचा दिया। उसे प्रमुख प्रतिपक्ष बनने तक केे लिए अपेक्षित मत नहीं मिले।

मैं अपने पाठकों को अधिक थकाना नहीं चाहता परन्‍तु यह पुस्तिका प्रचार पुस्तिका के रूप में लिखवाई गई थी और ऐसी वाहियात पुस्‍तक की प्रशंसा मेरे ऐसे मित्र करें जिनकी समझ पर मुझे कुछ भरोसा रहा है तो नासमझी उस स्‍तर पर पहुंच चुकी लगती है जिसमें लोग पत्‍थर मारने के लिए आंख मूंद कर पत्‍थर उठा रहे हैं और यह भी नहीं देखते कि वह कहां सं उठाया गया है।

मैं इस पुस्‍तक की बिक्री पर रोक लगाने को ही उचित नहीं मानता, अपितु इसके अंग्रेजी अनुवाद के अब भी एनबीटी के वेबसाइट पर सुलभ लिखा देख कर आश्‍चर्य भी प्रकट करता हूं। पदीय दायित्‍य व्‍यक्ति के साथ समाप्‍त नहीं होता। मैं वर्तमान अध्‍यक्ष से इस बात की उम्‍मीद करता हूं कि राष्‍ट्रीय पुस्‍तक न्‍यास से इस पुस्‍तक के प्रकाशन के अपराध के लिए वह अपनी संस्‍था के अध्‍यक्ष के नाते क्षमायाचना भी करें ।