Post – 2016-06-03

आसीत् पुरा विदिशा नाम नगरी, अधुनाsपि अस्ति

मैं कल बहाव में आ गया था, इसलिए अपनी बात साफ साफ नहीं रख सकता था। बात कठोर थी इसलिए जल्दबाजी में कही भी नहीं जा सकती थी। मैं कहना यह चाहता था कि हमारे शिक्षाशास्त्री शिक्षा के बारे मे उससे भी कम जानते हैं जितना एक जंगली आदमी या जंगली पशु।

‘’कमाल की व्याख्या है तुम्हारी। जानवर और जंगली आदमी शिक्षित होता है, शिक्षित नहीं, सुशिक्षित होता है और सुशिक्षित व्यक्ति जंगली लोगों और जानवरों से भी कुशिक्षित होता है। मैंने तुम्हारी बात को समझने में कोई भूल तो नहीं की?”

‘’अदालत की समझ में कुछ आ जाय यही एक मुश्किल काम है। आ गया यह एक आश्‍चर्य है। अदालत अपने हाथ में तराजू रखती है और आंखों पर पट्टी बांध लेती है और नजर सीधे एकसौअस्सी अंश के कोण पर रखती हैजाे कोण होता ही नही। इसलिए उसे यह तक नहीं दिखाई देता कि उसकी ठीक नाक के नीचे पेशकार किसे क्या इशारा कर रहा है और उसका बेलिफ उसी के हुक्मं की तामील के लिए उसके हुक्म को अमल में लाने के लिए किस फोर्स के सक्रिय होने की प्रतीक्षा में हैं।‘’

’’तुम किस फोर्स की बात कर रहे हो?”

‘’इसे भौतिकी में मोटिव फोर्स, अर्थात् चालक बल कहा जाता है पर न्यायालयों में दस्तूरी कहा जाता है। दस्तूरी का मतलब तो आपको पता होगा ही।‘’

अदालत सर्वज्ञ होती है फिर भी कुछ चीजों का पता उसे भी नहीं होता इसलिए वह दूसरों से पूछती रहती है। इस बार मुझसे पूछना पड़ा तो मुझे बताना ही था, ‘’दस्तूर का मतलब रीति है, पर यह आपकी समझ में नहीं आयेगा, इसलिए अंग्रेजी में इसे कनवेन्शन कहते हैं, यह बताने से काम चल जाएगा। इसकी ताकत क्‍या है यह ‘रघुुकुल रीति सदा चलि आई प्राण जायं पर बचन न जाई से ही पता चला जाएगा। कुछ देशों में संविधान नहीं है, वहां कनवेंशन ही संविधान का स्थान ले लेता है, जैसे इंगलैंड में जिससे अदालत ने झुलसती गर्मी में भी अपना चोंगा और विग और वकीलों ने अपना काला कोट और टाई उत्‍तराधिकार में पाया है।

”इसलिए आप संविधान की दुहाई देते हैं और आपकी न्याय प्रणाली कनवेंशन अर्थात् रीति से चलती है। यदि अदालत की अनुमति हो तो इसका एक उदाहरण पेश करना चाहूंगा।‘’

अदालत इस डर से कि कहीं उसे पक्षपाती न मान लिया जाय, ऐसी अनुमति दे देती है और इसके चलते मुझे इन्दिरा जी के मेहरौली के प्लााट के रजिस्ट्रेशन का किस्सा याद आगया। उन्‍हें इस सिलसिले में सब-रजिस्ट्रार के सामने पेश होना था। वह आईं, सब कुछ तैयार था, दस्तखत किया और चलने लगीं तो सब-रजिस्ट्रार को सुनाते हुए अपने कारिंदों से बोलीं, इनका जो कुछ बनता हो वह दे दीजिएगा।

उन्हें शक था कि इस धौंस में कि यह प्रधानमंत्री का मामला है कोई कुछ मांग कैसे सकता है, इन्दिरा जी कह रही थीं, मुझे अपने पद का लाभ देने की जरूरत नहीं, जो रीति है उसका पालन होना चाहिए। ये वे दुर्लभ गुण है जिनके लिए मैं इन्दिरा जी को असाधारण मानता हूं जब कि कोई दूसरा इसे भ्रष्टाचार का समर्थन और इस मामले में निश्चिन्त होने का आशय भी तलाश सकता है।

’अदालत के हाथ किन किन रस्सियों से बंधे हैं इसका तो हमें पता नहीं। यह तक पता नहीं कि हम एक बन्‍दी बनाई जा चुकी न्‍याय व्‍यवस्‍था से न्‍याय चाहते हैं जो सहूलियत देख कर कभी संविधान की ओर देखती है, जो स्वतंत्र होने के बाद बना, इसलिए पहले के विधानों से आगे जाता है, कभी दंडसंहिता की ओर देखती है जो अंग्रेजों के समय में बना इसलिए उस समय के राजहितकारी और जनविरोधी विधानों के साथ और कहें तो स्वतंत्र भारत में उपनिवेशवादी अवशेषों के साथ होती है और फिर जब नागर विधानों के मामले आते हैं तो संपत्ति से जुड़े नियम संपत्ति हड़पने वालों की रक्षा के लिए बनाए गए मिलते हैं क्योंकि उपनिवेशवादी सत्ता स्वयं इसी कोटि में आती थी और जब पारिवारिक और सामाजिक व्ययवहार का मामला आता है तो यह पर्सनल लाज की हथकड़ी बेड़ी पहन लेता है, क्योंकि धार्मिक समुदायों को भारतीय समाज बनाने का प्रयत्न तक नहीं हुआ इसलिए हिंदू कोड बिल के माध्यम से एक ऐसे देश को जिसे हमने अपने संविधान से सेक्युंलर और समावेशी बनाने का संकल्प लिया था, उसे हिन्दू राष्ट्र बना दिया गया। परन्तु सबसे अधिक बकवास हैं प्रक्रियागत संहिताएं जिन्हें नियम और न्याय से उूपर माना जाता है और जो ही न्या्य में विलंब और अन्याय के संरक्षण में सहायक होती हैं। जब तक ये हैं तब तक अदालत कर्मंकांड की दासी है और न्यांयप्रणाली ऐसा हवन कुंड जिसमें उत्पीडि़तों की हवि दी जाती है ।‘’

मैंने इस ओर गौर ही नहीं किया था कि अदालत के चेहरे पर रक्त का दबाव मेरे बयान के साथ बढ़ता चला गया था और वह अब इतना लाल हो गया था कि लगता था रक्त की केशिकाएं फट जायेंगी और चेहरा अपने आवेश के कारण ही लहूलुहान हो जाएगा। चुप लगाया तो चेहरा तो नहीं फटा पर अदालत फट पड़ी, ‘’तुम्हें पता है तुमने अदालत का कितना बहुमूल्यक समय बर्वाद किया है? तुमको अपने सबूत और गवाह इस बात को साबित करने के लिए रखने थे कि शिक्षित लोग जानवरों और जंगली लोगों से भी कुशिक्षित है और तुमने शिक्षा प्रणाली के बाद न्‍याय प्रणाली पर भी हमला कर दिया।”

‘’यूं तो अदालत को अपराध का सहभागी कभी बनाया नहीं गया क्यों कि लोग इसके नतीजे क्यां होंगे यह जानते थे, परन्तु आपने पहले पुरानी आदत बदलते हुए देखने और सुनने की जरूरत समझी है इसलिए इस बर्वादी में आपको भी सहभागी बताउूं तो संभव है इसे आप मान लें। आपको जो तथ्य मालूम थे, हर आदमी को मालूम हैं तो आप तो दूसरों से अधिक जानकार हैं ही, उन्हें आपको मान लेना चाहिए था और दस्तू र की व्‍याख्या करने के लिए मुझे उकसाना नहीं चाहिए था।‘’

’’फिर भी इसका कोई तुक ताल तो होना चाहिए?”

“है मान्यवर, मैं यह कहना चाहता हूं कि हमारी शिक्षाप्रणाली ही घटिया नहीं है, न्यप्रणाली भी जीवों जन्तु ओं और अनपढ़ गंवारों और जंगली लोगों के अपने प्रबन्धन से अधिक पिछडी हुई है।”

Post – 2016-06-01

आयेंगे जल्द ही यह कह कर घर से निकले थे
वो मेरा घर है मगर देखिए तो घर भी नहीं।
यही जन्नत है जमीं पर उतर कर फैली है
बात जिस शहर में कहते थे वह शहर भी नहीं।
कहीं भी जाओ, कहीं भी, यह घर तुम्हारा है
बात यह किसने, कब कही थी, या कही ही नहीं।
यह अपना देश है अपने ही घर में रहता हूं
सही तो है ही मगर देखिए सही भी नहीं।

(मैं तो आज की पोस्ट लिख रहा था। आधा कर चुका था और तभी शीर्षक की याद आई। शीर्षक एक अर्धाली ‘सही तो है ही मगर देखिए सही भी नहीं’ सूझा और पता नहीं किस रहस्यमय तर्क से अनुपम खेर और कल तक मेरे सबसे प्रिय और मेरी कलासाधना के दो आदर्शों (तसलीमा नसरीन और नसीरुद्दीन शाह) में से एक नसीरुद्दीन शाह की बहस याद आ गई और आगे का लिखना छूट गया। जो उस दबाव में लिखा गया वह उूपर है। शायद यह मेरी रचनाप्रक्रिया के किसी पक्ष को उजागर करे। अब अपने को नियन्त्रित कर चुका हूं इसलिए आगे का लेखन उस पंक्ति के सिरे पर /// का चिन्ह लगाने के बाद करूंगा। पर क्‍या यह संभव हो पाएगा।)

‘शिक्षा में गिरावट की तुम्हारी शिकायत सही है। यह भी सही है कि जब दक्षिणपन्थी खतरे का कोई अन्देशा नहीं था तब दक्षिणपन्थी उभार से बचाने का हौवा खड़ा करके हमने सचमुच इसे इतना ताकतवर बना दिया कि यह सत्ता पर हावी हो गया और हमें कगार पर कोने तलाशने पड़ रहे हैं। तुम्हारी यह शिकायत भी सही है कि शिक्षा के महत्व को समझा ही नहीं गया। गैस पाइप की तुम्हारी उपमा तो बहुत वेधक है और उतनी ही खतरनाक भी। फिर भी मैं मानता हूं कि शिक्षा प्रणाली के महत्व को नहीं समझा गया और इसे हमने अपने स्वार्थ से राजनीति का ओवरडोज पिलाया जिसका उदाहरण दुनिया में अन्यत्र कहीं न मिलेगा। लेकिन आज शिक्षा में सुधार के नाम पर जो कुछ किया जा रहा है उसे क्या ठीक समझते हो? मैं राजस्थान और गुजरात की पाठ्यपुस्तकों में किए जाने वाले बदलाव की बात कर रहा हूं। मैं पुराण और मिथक को इतिहास बनाने के प्रयत्न की बात कर रहा हूं। मैं कहानियों की काल्पनिकता को इतिहास का सच मानने और इसके बहाने प्राचीन भारत में आधुनिक वैज्ञा‍निक उपलब्धियों के दावों की बात कर रहा हूं। मैं इतिहासकारों को इतिहास से बाहर फेंकने और निकरधारियों को निकर की महिमा से इतिहासकार बनाए जाने की बात कर रहा हूं। तुम इसे उचित मानते हो?’’

’’मैंने आपको अपने पैरोकार से लेकर जज तक का काम सौंपा है, ऐसा किया भी अपने मुअक्किल के हित को ध्यान में रख कर ही है कि इस बहाने उसकी भी तो कोई सुनेगा। अभी तक तो कोई सुनने को राजी ही न था। आपकी आशंका में दम है, लेकिन यदि मैं कहूं कि इसके लिए भी वही लोग जिम्मेदार है जिनके पक्ष में आप खड़े रहे हैं तो सुन कर आपको झटका लगेगा।”

”झटका लगेगा ही। तुम क्या समझते हो यह सब हमसे पूछ कर किया जा रहा है?’’

”आप से पूछ कर नहीं, घबराहट में किया जा रहा है। आप जानते हैं शिक्षा में इतनी शरारतें हमारे सुशिक्षित विद्वान करते रहे हैं जिसे कमीनापन कहा जाय तो गलत न होगा। शब्द कठोर है, पर आरोप सही है। जान बूझ कर उकसाने, अपमानित करने के प्रयत्न इस अपेक्षा में किए जाते रहे कि इससे भड़क कर हम जो कुछ करेंगे उसको तमाशा बना कर हमारा उपहास किया जायेगा और इसका मजा लेने की आदत ने एक ऐसी बौखलाहट पैदा की जिसमें इतिहास और पुराण का, सत्य और मनगढंत का फर्क ही मिट गया। आप मखौल को विज्ञान बनाने पर तुले रहे और उन्होंने माखौल का सामान अपनी ओर से पैदा करना शुरू कर दिया, कि हंसना ही चाहते हो तो जम कर हंसो, इसके बीच बहानों का आविष्कार न करना पड़े। हैरानी की बात है कि इस प्रवृत्ति को बदलने का नैतिक साहस तक आप खो चुके हैं क्योंकि आपका इतिहास दर्शन यही करता था, और अब आप जिनका मजाक उड़ाते थे उन्हीं की नकल खुद करने लगे हैं।/// त्रिपुरा के पाठ्यक्रम को अदालत के सामने पेश करता हूं। अपने बहुमूल्य समय में से कुछ समय इसे दान करते हुए ही सही, इसे पढ़ें। आज मैं अपनी ओर से स्थगगन का अनुरोध करता हूं।

Post – 2016-05-31

स्थगन

‘’अगला सवाल यह कि हमारे बीच जो बात हुई उसे क्या तुम फेसबुक पर भी लिखते हो।‘’

बात सच थी, और सच के सिवा कुछ न थी, इसलिए हामी भरनी पड़ी।

’तुम्हारी अक्ल पर कभी भरोसा नहीं था, पर तुम इतने नादान हो यह नहीं समझता था। जानते हो फेसबुक के एक अनुभवी ने कहा कि यह उन जगहों में से एक है, जहां पागल पहुंचते हैं। यदि फेसबुक पर लोगों के जुमले पढ़ो, उनकी हरकतें देखो तो पता चलेगा कि यह एक अनुभववृद्ध व्यक्ति का सुचिन्तित विचार था। मैं तो तुम्हें जानता हूं, तुम्हारा गवाह भी हूं और वकील भी, इसलिए जरूरत पड़े तो कसम खाकर तसदीक कर सकता हूं कि यह आदमी नादान जितना भी हो, पागल नहीं हो सकता, लेकिन जो लोग तुम्हें नहीं जानते हैं, वे तुम्हें पागल ही समझ रहे होंगे !”

‘’जो लोग बिना जाने ही समझ लेते हैं, उन्हें समझने से रोका नहीं जा सकता । समझने की बीमारी है उन्हें। जानते हैं, तमिल में एक कहावत है, ‘कड़ा कण् पोट्टदेन्राल, कन्रै कंबत्तिल कट्टेन्राप्पोल्’ अर्थात किसी ने कहा सांड़ ने बछड़ा दिया है तो अगला बोला, बछड़े को खम्भे से बांध दो।’ आप जिन समझदारों की बात कर रहे हैं उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं। बस हिन्दी में इनके लिए जो शब्द चलता है उसका आपको, ध्यान नहीं रहा।‘’

‘’क्या कहते हैं हिन्दी में उन्हें ?’’

’’लाल बुझक्कड़। आपने उनके मुंह से ही उनकी कीर्ति सुनी होगी, ‘बूझैं लालबुझक्क्ड़ दूसरा न कोई’ । खैर मुझे लालबुझक्कड़ों से भी कोई परेशानी नहीं। जो वे हैं वह बने रहने की उन्हें पूरी छूट होनी चाहिए। उनसे मैं बिना बहस के ही हार जाता हूं। पहले ये ढूंढ़े मिलते थे, अब वह जगह ढूंढ़नी पड़ती है जहां ये न हों। फेसबुक पर मिलेंगे ही। वास्तविक जिन्दगी में एक बार उनका परिचय मिल जाने के बाद आप रास्ता बदल लेते हैं, फेसबुक पर आप उनका रास्त ही रोक देते है।‘’

’’रास्ता रोकने से उनका विचार और प्रचार तो नहीं रुक जाता। तुम उनका रास्ता रोकते हो तो तुम्हारा उन तक पहुंचने का रास्ता रुकता है। तुमने सच कहा कि तुम उनसे हार मान लेते हो क्योंकि यदि तुम सार्वजनिक बयानबाजी करो तो वे तुम तक पहुंच सकते हैं, केवल तुम उन तक नहीं पहुंच सकते। वे जान सकते हैं कि तुम क्या सोचते या कहते हो, तुम न उनके बारे में कुछ कहोगे, न यह जान पाओगे कि सारी दुनिया से तुम्हारे बारे में वे क्या कहते फिरते हैं, इसलिए रास्ता उनका ब्लाक नहीं हुआ, दिमाग तुम्हांरा ब्लाक हुआ।‘’

मैंने तो कभी उसे इतना समझदार माना ही नहीं था, मानता यह आया था कि इसने अपना दिमाग कार्ड लेते समय पार्टी के फ्रीज बैंक में जमा करा दिया और जहां पहले दिमाग होता था वहा एक ट्रांसमीटर फिट है, उसकी इस मीमांसा से हैरान रह गया। मैं उससे उसके बारे में अपनी बनी हुई धारणा और उसे कई बार उससे भी जाहिर करने के अपराध के लिए क्षमायाचना करने ही वाला था कि ठीक उसी समय सिंहासन बत्तीसी की याद आ गई। अब मुझे पक्का विश्वास हो गया कि मेरी मान्यता शत प्रतिशत सही है। इस समय मेरा दोस्त नहीं बोल रहा है, उसकी कुर्सी बोल रही थी। अगर कुर्सी खींच लूं तो फिर उजड्ड चरवाहे जैसी हालत हो जाएगी।

मुझे उलझन में पड़ा देख कर उसने पूछा, ‘’किस सोच में पड़ गए?’’

मेरे मुंह से निकला, ‘’मुझे एक पद का अर्थ नहीं मालूम था, आज समझ में आ गया।‘’

उसने कुर्सी की इज्जत बचाने के लिए आती हुई हंसी को रोकते हुए पूछा, ‘’कौन सा पद? क्या अर्थ समझ में आया?’’

‘’कुर्सी की इज्जत’ पद का। पहले समझता था कुर्सी काठ की होती है। इसे कहीं से काटा, छांटा, तोड़ा जा सकता है। ऐसी चीज जो सरे बाजार बिकती हो उसकी इज्जत आदमी से अधिक कैसे हो सकती है। ठीक अभी समझ में आया कि कुर्सी पर बैठने के बाद आदमी कुर्सी में बदल जाता है। कुर्सी सोचती है, आदमी बोलता है और उसको अकाट्य मान लिया जाता है। आप गौर करें कि मैं चौरासी वर्ष देख चुका हूं, एक माह बाद पचासी पूरे हो जाएंगे, फिर भी इस पद का अर्थ नहीं समझ पाया था, आज समझ में आया कि आदमी काठ की कुर्सी से कितना छोटा होता है और उसका मान सम्मांन उसकी योग्यता में नहीं कुर्सी में होता है, तो इसे पूरे जीवन की उपलब्धि तो मानना ही था।‘’

उसकी, अर्थात् माननीय अदालत की समझ में ही नहीं आ रहा था कि मैंने उसका अपमान किया है या सम्मान और वह गंभीर चिन्ता में निमग्न होती दिखाई दी। मेरी अपनी समझ में भी नहीं आ रहा था कि उसने जो बड़े तर्कपूर्ण ढंग से मुझे ब्ला‍क हेडेड कहा था, मैंने उसका बदला लिया है या वस्तुसत्य को पेश किया है। दोनों ही अनिश्चय में थे इसलिए एक लंबे सन्‍नाटे से उूब कर मैंने ही पुरानी कड़ी से कड़ी भिड़ाने की कोशिश की ‘’यदि अगले के पास विचार होगा तो वह प्रचार करेगा। मैं तो उन लोगों की बात कर रहा था जिनके पास न तो तर्क होते हैं न विचार, परन्तु विश्वास इतना प्रबल होता है कि वे पूरे देश में आग लगा दें और समझाते रहे कि उन्होंने देशहित में ऐसा किया है, तो लोग समझ न पाये कि यह देशभक्‍त है या देशद्रोही। विचार का सामना किया जा सकता है, विश्वास का सामना तो कर्तार भी नहीं कर सकते जिन्होंंने ऐसों को बनाया और उस नक्शे को छापना भूल गए जिसमे मर्यादाएं, सीमाएं और संस्कार भरे होते हैं।”

” जो भरा होता है उसके लिए हमारे संविधान में न दंड है न पुरस्कार। उसके लिए जिन्हें दोष दिया जाता है वे केवल पात्र होते हैं, आधान, कुंभवत, कुंडवत, द्रोणवत, कमण्डलवत । दोष या श्रेय का पात्र वह हो ही नहीं सकता। उत्‍तरदायित्‍व उसमें जो भरा गया है उसे भरने वाले का होता है। वह अमृत भी हो सकता है, विष भी। विस्फोटक भी हो सकता है और शामक भी। इस भरने वाले का नाम अदालत को पता है?’’

“अदालत को सभी बातों का पता होता है, इसलिए अदालत को कभी ऐसे गड़बड़ सवाल का सामना करना ही नहीं पड़ा था। सच तो यह है कि अदालतें लोगों से सवाल करती है, लोग अदालतों से सवाल नहीं करते। फिर भी अदालत ने धैर्य का परिचय दिया, पूछा, ‘’क्या कहते हैं इसे।‘’

मैंने सविनय निवेदन किया, ‘’कुर्सी मान सके तो इसे शिक्षा प्रणाली कहते हैं।‘’

अदालत कोई टिप्पणी करे, इससे पहले ही मैं अपनी बात पूरी करने लग गया, ‘’शिक्षा प्रणाली को सोचना है कि उसे क्या भरना था क्या भरा है। अभी कल ही खबर आ रही थी कि किसी प्रतिष्ठित माने जाने वाले अस्पपताल में आक्सीजन की जगह नाइट्रोजन की नली लगा दी गई और यह दुबारा की गई और इसमें दो बच्चों की जान चली गई। यह शिक्षाप्रणाली को बताना होगा कि वह कौन सी नली लगा रही थी कि ज्ञान का स्तर घटता गया है और विस्फोट का स्तर बढ़ता गया है और सारे डिग्रीधारी नौजवान विस्फोटक गैस के इतने आदी हो गए हैं कि उसे अधिकाधिक मात्रा में पाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं ।‘’

अदालत की भूमिका में उतरे मेरे मित्र ने कहा, ‘‘मामला कल तक के लिए स्थगित।‘’

Post – 2016-05-29

बात बेबात (Preface of part II)

‘इतिहास का वर्तमान’ के प्रथम खंड केा अन्तिम रूप देते हुए प्रकाशक ने पूछा था, इसकी विधा क्या लिखी जाय? जवाब देना मेरे लिए भी कठिन था, क्योंकि लिखते समय मैं इस विषय में सचेत नहीं था कि मैं जिस मंच से अपनी बात रखने जा रहा हूँ वह इसके शिल्प को इस सीमा तक प्रभावित करेगा कि इसकी विधा तय करना कठिन हो जायगा।

जिन दिनों मेरे मन में इस शैली में लिखने का खयाल आया, उन दिनों मैं ऋग्वेद की परंपरा पर काम कर रहा था। परन्तु सामयिक लेखन, चर्चाओं, संवादों को पढ़ते सुनते ऐसा लगा कि हमारी सोच का इस सीमा तक राजनीतीकरण हो चुका है कि सोच ही गायब हो गई है। लेखक, विचारक, कलाकार जिस राजनीति से जुड़ाव रखता है उसे सही ठहराना उसकी विवशता है। इसके दबाव में वह उपलब्ध आँकड़ों में से सुविधाजनक का उपयोग और असुविधाजनक की उपेक्षा करता है। अपने संचित ज्ञान में से. उपयोल्‍य तथ्यों को कल्पना से नया आकार देते हुए वह प्रहार के लिए नए अर्ध सत्य भी गढ़ लेता है। इस तरह अर्ध सत्यों के इतने शिविर तैयार हो जाते हैं कि सत्य ही गायब हो जाता है। इसका सबसे बुरा असर हमारी बौद्धिकता पर पड़ा है। आज उच्चतम शिक्षा प्राप्त, प्रखर प्रतिभा के विद्वान भी भीतर से खोखले प्रतीत होते हैं। हमारी बौद्धिक परनिर्भरता औपनिवेशिक दौर की तुलना में बहुत अधिक बढ़ी है। उस समय तक पाश्चात्य विद्वानों का प्रतिवाद करने वाले बहुत सारे विद्वान हमारे पास थेा आज ऐसे लोगों का निपट अभाव है। अभाव ही नहीं इन्हें निपट निरादर से देखने को सीढि़यं चढ़ने की शर्त बना दिया गया है। कोई भी क्षेत्र हो, प्रमाण पुरुष के रूप में हमें औपनिवेशिक दौर के ही चिन्तक और आन्दोलनकारी याद आते हैं।

स्वाधीन होने के साथ उनके समकक्ष होने की ललक बढ़ी जो कल तक हमारे देश पर शासन करते थे। इससे पूरब को पश्चिम बनाने की ललक पैदा हुई जिसने स्वाभिमान और देशाभिमान दोनों को सोख लिया, लगभग शून्यं कर दिया। पुराने शासकों के जूते में पांव रखने की महत्‍वाकांक्षा पैदा हुई। पश्चिम बनने की ललक में हम पश्चिम तो बन ही नहीं सकते थे, पूरब भी नहीं रह सके। पश्चिम ने पूर्व का जो भी तत्व अपने लिए उपयोगी पाया उसे अपना बना लिया और इस तरह पचा लिया मानो यह उसकी निजी चीज हो। सभी सभ्यताएं यही करती हैं, केवल गुलाम नकल करता है। हमने पश्चिम की नकल की, उससे सीखा नहीं। सीखते तो उसका जो भी उपयोगी और ग्राह्य था उसे लेकर अपने अनुसार ढाल सकते थे, अधिक समृद्ध हो सकते थे और अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनी जमीन पर खड़े हो सकते थे।

प्रतिभाओं की कमी कभी किसी देश में नहीं होती। भौतिक और शैक्षिक पर्यावरण कई बार ऐसा बन जाता है कि चुनौतियाँ घट जाती हैं और श्रम और अध्यवसाय ही नहीं महत्वाकांक्षा तक में कमी आ जाती है। इस बोध ने ही मुझे उस बहुत जरूरी काम को छोड़ कर अनधिकृत क्षेत्र में हस्तक्षेप करने को बाध्य किया। इस लेखन का प्रयोजन मेरे लिए लगभग वही था जो पंडित विष्णुशर्मा के सामने पंचतन्त्र लिखते समय था। परन्तु विस्मित करते वाला तथ्य यह है कि इसका बोध स्वयं मुझे अभी-अभी हुआ !

इस विषय में सचेत हुए बिना भी कि मैं नए युग का एक ऐसा लेखा लिख रहा हूँ जो पंचतन्त्र की परंपरा का विस्तार है और इसकी शैली पर भी उसकी छाप है, मैं आत्ममुग्ध भाव से लिखता रहा और मेरे मित्रों में से बहुत से इसे मुग्ध भाव से मुकर्रर इर्शाद कहते रहे जो हिन्दी संस्क़ृ ति का हिस्सा नहीं है इसलिए मुझे इससे घबराहट भी होती रही। पर लिखने के बाद आत्ममुग्ध तो मैं स्वयं भी अनुभव करता था, इसलिए कारण समझना चाहा तो इसकी शक्ति इस बात में निहित लगी कि इसमें यथाशक्ति दोनों पक्षों के अपने तर्क, प्रमाण और दृष्टान्त असरदार ढंग से रखते हुए एक गहन विमर्श का प्रयत्‍न किया गया है और तभी पंचतन्त्र की बहसें याद आईं।

उस लेखक की पहुँच उस सुगठित और निखोट योजना तक तो हो ही नहीं सकती थी जिसे पता ही नहीं था कि वह क्या लिख रहा है और जो कुछ लिखा जा रहा है वह किस विधा में लिखा जा रहा है। यदि इसको किसी विधा की संज्ञा देने की आवश्यकता हो ही तो इसे ‘बतकही’ या कहानी के तर्ज पर ‘कहा-सुनी’ विधा कहा जा सकता है। अभी तक ऐसी कोई विधा नहीं थी, क्योंकि बातचीत की जाती है, लिखी नहीं जाती! परन्तु अब अन्तर्जालीय संचार में चैट या बतरस एक रोचक विधा के रूप में उभरी है जो लेखन के माध्यम से ही संभव है।

परंतु, दुबारा सोचन पर लगा, यह विधा तो बहुत प्राचीन है। ऋग्वेद में कुछ प्रसंगों में संवाद शैली या वाकोवाक्य का ही प्रयोग नहीं हुआ है अपितु मानवीय प्रश्नों पर अमानवीय या अतिमानवीय प्राणियों और सत्ताओं के बीच संवाद मिलते हैं। जन्तुककथाएं इसी का विस्तार हैं।

जिन्हें इस बात से घबराहट होती है कि इसे भी वैदिक उपलब्धि सिद्ध कर दिया गया, उनको अनाड़ी मसखरा कहना भी उन्हें गिनती में लेना है।

यदि मैं पहले से इसके प्रति सचेत होता तो वैदिक संवाद या जन्तुकथाओं के शिल्प के निर्वाह की चिन्ता में वह छूट नहीं ले पाता जो ले सका हूँ। इसके कारण इसका शिल्प, अपनी परंपरा के भीतर ही, जो इसे समझने की योग्यता रखते हैं उन्हें, संभव है एक नया प्रयोग लगे।

मैंनें चर्चाओं को शीर्षक तो दिए हैं, परन्तु उनमें उन विषयों का सम्यक निर्वाह नहीं हुआ है। बात चीत करते हुए आप किसी विषय से बँध् कर नहीं रह पाते। बात आरंभ जहाँ से भी हुई हो बीच में कोई सन्दर्भ, दृष्टान्त, प्रसंग आते ही विषय बदल जाता है और आप भूल जाते हैं, बात कहाँ से आरंभ हुई थी। याद भी आई तो आप कई बार स्वयं पूछते हैं, ‘हाँ तो मैं क्या कह रहा था?’ गरज कि सुनने वाले को आप क्या कह रहे हैं इसका हिसाब भी रखना चाहिए! परन्तु सबसे मार्मिक प्रसंग तो उन विचलनों में ही आते हैं, तभी तो अपना दबाव डाल कर वे धारा को ही बदल देते हैं ।

1970 के बाद से मेरा समस्त लेखन, चाहे वह किसी विधा में हो, औपनिवेशिक मानसिकता और पुरातनपंथी आसक्तियों से मुक्ति का एकल अभियान रहा है, और इसे ही मेरे समग्र लेखन का केन्द्रीय विषय भी माना जा सकता है। निर्दिष्ट विषय, विचलन और भटकाव सभी में यदि गहन रूप में विद्यमान है तो यह चिन्ता।

मैंने यह लेखन इस उद्देश्य से आरंभ किया था कि गाली-गलौज, आरोप और धिक्कार की घटिया प्रतिक्रियाओं से मुक्ति का मार्ग तार्किक विश्लेषण और संवाद से ही निकल सकता है और इससे हमारी सोच भी बदल सकती है और वह घेरेबन्दी भी टूट सकती है जिसमें लोगों के पास अपने घेरे के तर्क, विचार और सत्य ही बच रहे हैं और इसका प्रभाव हमारे लेखन और चिन्तन की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है। आशा थी कि जिन लोगों को मेरे विचारों से असहमति होगी वे खुल कर, उतनी ही निर्ममता से मेरी आलोचना करते हुए मेरी कमियों को उजागर करेंगे और अपना पक्ष दृढ़ता से रखेंगे। ऐसा हुआ नहीं! प्रशस्तियाँ तो ऐसी मिलीं कि जी अघा जाये, परन्तु तीखी, तार्किक, प्रामाणिक आलोचना, कमियों को उजागर करने वाली कोई टिप्पणी नहीं!

यह किसी ऐसे लेखक के लिए सुखद स्थिति नहीं है जो जानता है कि उसने जो कुछ लिखा है उसमें बहुत सी कमियाँ हैं और कुछ और हो सकती हैं जिनको वह जानता ही नहीं। आशा है मेरी इस आकांक्षा की पूर्ति मेरे आलोचक करेंगे क्योंकि सम्मान जितना मिल चुका है वह मेरी हैसियत के किसी व्यक्ति के लिए जरूरत से अधिक है। जिसकी अपेक्षा है वह है विचार प्रक्रिया का द्वन्द्वात्मक विकास ! वही हमारी सबकी साझी उपलब्धि हो सकती है।
भगवान सिंह
बी-1701गार्डेनिया स्क्वायर
क्रासिंग रिपब्लिक, गाजियाबाद 226016
28 मई 2016

Post – 2016-05-28

कविता ही सही

शाम है
मद्धिम उजाला
हवाएं ठहरी हुई हैं!
चकित हूं क्यों
दिशाएं डगमग!
कहां जाउंू
किधर जाउूं ?
या यहीं दुबका रहूं
घड़ियां बिताते!
इसी संशय में मिटा सा घिसटता हूं
भविष्यत की ओर
मारे गेड़ुरी अपनी सुरक्षा में!
28.5.2016

Post – 2016-05-28

मैं हंसना चाहता था इस पोस्‍ट को पढ़ कर और फिर आगे बढ़ जाना चाहता था। इतना वाहियात खींचतान। फिर जी भर कर हंसने के लिए जी में आया एक बार पूरा पढ़ा जाय। पढ़ने के बाद चकित हूं। मैं जान कर भी विश्‍वास नहीं कर पा रहा हूं कि हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों ने विभिन्‍न क्षेत्रों में कितनी प्रगति की थी। मेरा ऐसा ही मोहभंग ललित मिश्र द्वारा सुलभ कराए गए डा नेने के जो भौतिकी के प्रोफेसर रहे हैं, महर्षि भारद्वाज के अंशुबोधिनीशास्‍त्र के एक बचे हुए अध्‍याय को पढ़ कर हुआ था। जो टुकड़ों में यहां वहां से सुलभ हो जा रहा है उससे सोच का रूप बदल जाता है। उपहास आश्‍चर्य में बदल जाता है। नालंदा आदि के उन विशाल पुस्‍तकालयों में हमारे प्राचीन ज्ञान का कितना विशाल भंडार नष्‍ट हो गया यह सोच कर क्‍लेश होता है। इस तरह के विवरणों को परखने और जानने की जरूरत है। हम अपने विज्ञान का विकास उस स्‍तर का न कर सके जो आधुनिक युग में पूंजीवादी समर्थन के कारण संभव हुआ है और इसलिए वह विचित्र चमत्‍कार बन कर रह जाता रहा है। यह खोज जारी रहे परन्‍तु हमारे आगे के अनुसंधान और ज्ञान की दिशा आज के पश्चिमी खोजों और विकासों के माध्‍यम से ही होना चाहिए और उसमें प्रमाद न पैदा हाेना चाहिए। इस निवेदन के साथ मैं आज इस पोस्‍ट को शेयर करना चाहता हूं और इसके लेखक को धन्‍यवाद देना चाहता हूं साथ ही शेफाली टोपीवाला को भी जिन्‍होंने इसे शेयर किया था। देखें नीचे का शेयर किया हुआ लेख । मेरी ज्ञानसीमा में यह प्रामाणिक लगता है।

Post – 2016-05-27

मैं जिसे सच माानता हूं तू उसे सच मान

“हां, पहले यह बताओ, तुम इतने विश्वास से, इतने पढ़े-लिखे, अनुभवी और वरिष्ठ विद्वानों को चुटकी बजा कर उड़ाते रहते हो, क्या, तुम सचमुच मानते हो कि तुम उनसे बड़े ज्ञानी हो, या लोगों को झांसा देने के लिए अपने आत्मविश्वास का स्तर इतना उूंचा कर लेते हो कि मेरी बोलती तक अक्सर बन्दं हो जाती है?”

“बयान देना है, अदालत के सामने तो सच तो बोलना ही होगा। सच यह है कि मैं जो लिखता हूं उसे भी नहीं जानता, जिन विषयों पर लिखता हूं उन्हें भी नहीं जानता। सिर्फ यह जानता हूं कि जो लोग मुझसे अधिक जानकार है वे किसी कारण से अपने उतने ज्ञान का भी इस्तेमाल, सही मौकों पर नहीं करते, जितना मेरे पास है। वे ऐसा क्यों करते हैं मैं ठीक नहीं जानता, पर कल्पना करता हूं कि कि स्वार्थ और प्रलोभन दिमाग की धुलाई कर देते हैं। इस बोध से मेरा मनोबल बढ़ जाता है और मैं उन सबको रौंदने वाले आत्मविश्वास से अपनी बात कहने लगता हूं और यह देख कर आत्मविश्वास और अधिक बढ़ जाता है कि उनसे मेरे किसी तर्क का खंडन नहीं हो पा रहा है।”

“प्रबल आत्मविश्वास, तुम्हीं ने कहीं कहा है कि मूर्खो और पागलों में पाया जाता है। तुम्हें इन दोनों श्रेणियों में से किसमे रखा जाय, या कहूं अगर किसी जेल में दो वार्ड हैं, एक मूर्खों के लिए दूसरा पागलों के लिए, तुम इन दोनों में से किसमें रहना पसन्द करोगे?”

“दोनों में, क्योंकि मैं एक साथ दोनों हूं। मूर्ख इसलिए कि मैंने एक ऐसे गधे को जज बना दिया जो न्याय प्रणाली का सम्मान नहीं करता और बयान दर्ज करने के चरण पर ही सजा की धमकी देकर बयान अपने अनुकूल‍ दिलवाना चाहता है और इसकी पूरी जिम्मेदारी मेरे उूपर ही आती है। पागल इसलिए कि दार्शनिकों को तुम जैसे गधे पागल ही मानते हैं क्योंकि समझदारी के उनके कोरे कागजों में शर्त यह होती है ‘मैं जिसे सच मानता हूं तू उसे सच मान। फायदे फिर देख उसके और मूछें तान।‘”

तुम जानते हो तुम अदालत की अवमानना कर रहे हो और तुम्हें दंडित किया जा सकता है?”

“जानता हूं। जज तुम्हें मैंने नियुक्त किया है और जब तक तुम मुझे दंडित करने का इरादा बनाओगे, तुम्हारी बर्खास्तंगी का कागज़ तुम्हारे हाथ होगा।”

वह हंसने लगा, “दो वार्डों में एक साथ रहोगे कैस?”

“वार्डों की दीवारें तोड़ कर और जब वार्डों की दीवारें टूट गई तो जेल की दीवारों का भी नंबर आ जाएगा।”

“इस बार वह हंसा नहीं, मुझे शक की नजर से देखने लगा कि कहीं आज कल जो जेलब्रेक और जेलरो और संतरियों को बन्धक बनाने की घटनाएं घटने लगी हैं उसके पीछे मेरा दिमाग तो नहीं, पर इस विषय में उसने आगे कुछ पूछा नहीं। उसके दिल पर क्या गुजरी यह बता भी नहीं सकता।

“एक दूसरा सवाल ! मार्क्सवाद के बारे में तुम्हारा अध्ययन कितना है?”

“अगर उसकी कोई क्लाास लगती हो तो उसके हाजिरी रजिस्टर में मेरा नाम तक न मिलेगा। गरज की जानकारी के नाम पर अध्ययन के नाम पर शून्य ।”

” भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में कैसी विभूतियां पैदा हुई हैं, उनका ज्ञान, त्याग, और अध्ययन क्या था, कितनी कुर्बानियां दीं उन्होंने, उनके विषय में कुछ जानते हो?”
“कभी जरूरत नहीं समझी। ”

“और सबको खारिज कर देते हो?”

” करना पड़ता है ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि प्रयोगविज्ञान में किसी प्रयोग के परिणाम निर्णायक होते हैं न कि यह कि उसे कितने महान वैज्ञानिकों ने मिल कर बनाया था, उनकी अपनी शिक्षा के लिए कुर्बानियां क्या थीं, यदि वे वैज्ञानिक न बनना चाहते तो उनके सामने क्या रास्ते खुले थे? कसौटी है – उनके ज्ञान और विज्ञान और प्रौद्योगिकी का परिणाम क्या रहा और यदि वह अनुकूल न रहा हो उन्होंने भूल सुधार की या जगह बदल कर उसी पर अमल करते चले गए। केवल यह ज्ञान वांछित ज्ञान है और तुम जिसे गिना रहे थे वह आलंकारिक है जो हैसियत दिखाने, झूमने और नाचने के काम आता है।”

वह तमतमाया तो पर मैंने कह रखा था यदि उसने अदालत की अवहेलना का मुकदमा बनाने का इरादा भी किया तो ओहदा हाथ से चला जायगा इसलिए कुछ नरम पड़ गया।”

Post – 2016-05-26

उनकी बारूद है उनके ही कारखाने की
तोप चलती है मगर बेअसर है क्‍या क‍‍हिए।

“तीन दिन गायब कहां रहे।”

“तुमने प्रतिवादी को ही अपना वकील भी बना दिया और जज भी बना दिया तो इस नई भूमिका की तैयारी तो करनी ही थी। बीच में एक दिन सिक लीव पर भी चला गया। बुढ़ापे का एक मात्र विशेषाधिकार। जब परिजनों का ध्यान खींचना हो तो बीमार पड़ जाओ। अचूक अस्त्र है।”

“ऐसे में खबर कर दिया होता, मैं भी पहुंच गया होता। पड़ोसियों का जुटना शुरू हो जाय तो कद्र आसमान को छूने लगती है।*

“नामुराद तुम यही चाहोगे, क्योंकि तुम्हें पता है, मैं फैसला देने से पहले तुमसे कुछ सवाल भी करूंगा और वे सवाल तुम्हारे गले की फांस सिद्ध हो सकते हैं।”

मैंने उलट कर उस पर ही रख दी, “तुमने इतनी देर कर दी। मैं तो इतने कठोर शब्दों में तुम्हें कुरेदता ही इसलिए रहा हूं कि तुम सवाल करना और जवाब देना सीखो। गालियां देना और तोहमतें लगाना तो गली-मुहल्लेे की औरतें भी तुम लोगों से अधिक अच्छी तरह जानती हैं। उनके तीर बेकार नहीं जाते, तुम्हांरे तोपखाने का भी किसी पर असर ही नहीं होता। तुम्हारी खलिश जरूर मिट जाती है। यह एक लत है, कान खुलनाने या नाखून कुतरने की तरह जो तुम्हारी बेचैनी को तो प्रकट करती है पर तुम्हारी आदत के लिए समर्थन नहीं जुटा पाती। इसके बेअसर होने से जो पहले तुम्हा्रे कीर्तन में समानधर्मा होने की लाचारी में तुम्हारी सुनते भी थे और ‘हां भाई हां’ करते रहते थे, उनकी संख्या तक घटती जा रही है, कभी इस पर ध्यान दिया है? न दिया हो तो आगे से देना। ”

Post – 2016-05-23

चुनौती जीतने की नहीं हारने की है

‘अब तो तुमसे बात करते हुए भी झुंझलाहट होती है।’

मुझे हंसी आ गई, ‘क्यों क्या हो गया?‘

’मैं जानता हूं तुम गलत हो, यानी तुम जिस बात की वकालत कर रहे हो वह गलत है, फिर भी जब भी मैं इसे तुम्हें समझाना चाहता हूं तुम मुझे ही गलत सिद्ध करना चाहते हो। मेरी दशा उस वकील जैसी है जो सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा है। जानता है कि तुम अन्याय के साथ हो फिर भी बातों को घुमा फिरा कर अपराधी को ही नहीं बचा ले जाते, स्वयं मुझे, अन्यायी सिद्ध कर देते हो। कई बार तो मेरा ही विश्वास डगमगा जाता है और डर लगता है कहीं जीवन भर की तपस्या़ व्यर्थ न चली जाय। मैं भी न मान बैठूं कि तुम जो कहते हो वह सही है । जिन्द गी के इस पड़ाव पर मैं तो कंगाल हो जाउूंगा। कोई फायदा है इस बहस में उतरने का। यूं ही समय बर्वाद करना हुआ ।‘

मैं गंभीर हो गया। यह अकेले उसकी समस्या नहीं थी। एक पूरी पीढ़ी की समस्या थी जो पवित्र मन से अपने ही इतिहास को नकारती, अपनी संस्कृति को बुद्धिबल से तहस नहस कराती , अपनी संकीर्णताओं से बाहर जाने का भरम पालती, इस सूझ और साहस पर गर्व करती और अनजाने ही अपने आप से घृणा करती विकसित हुई और अपने संकरेपन से बाहर आकर खुलेपन के भ्रम में एक अधिक संकरी सोच में फंस गई। मैं स्वयं भी तो इनसे अलग न था और मेरे सबसे आत्मीय मित्र तो उन्हीं के बीच हैं। यह एक तरह से मेरी अपनी पारिवारिक समस्या भी थी। समझ में नहीं आ रहा था बात कहां से आरंभ करूं और किस तरह रखूं। अचानक एक मद्धिम सी किरण दीखी। उसने अनुताप में अभी जो कुछ कहा था, क्यों न उसकी एक एक कड़ी को अलग करके उसकी मींसांसा की जाय।

मैंने कहा, ‘जहां सामना करना चाहिए वहां तुम भागने का रास्ता तलाश रहे हो. पलायनवाद की नई परिभाषा गढ़ ली होगी जिसमे वह परित्राणवाद बन गया होगा.‘

वह चुप रहा।

’तुमने मान लिया कि मैं अन्यायियों की तरफदारी करता हूं। मानने और उसके अनुसार कुछ कर बैठने को मनमानी करना कहते हैं। अच्छा हो, उन तथ्यों की एक तालिका बना लो, या जो याद आएं उन्हें गिनाओ जो अन्यायपरक हैं और हम दोनों उसका समाधान तलाशें। मानना विवेकहीनता का सूचक है, लोग भूत प्रेत से ले कर ईश्वर तक को मानते हैं और बड़ी दृढ़ता से मानते हैं, अपनी ओर से कुछ प्रमाण भी पेश करते हैं जो मानने जैसे ही होते हैं और जांच के बाद छंट जाते हैं। मानने से अच्छा है जानना और उसके कारण और परिणाम के साथ उसे समझना।

अब उसके मुंह से दबा सा अधूरा वाक्य निकला, ‘वह सब तो ठीक है पर…’

’तुम कहते हो तुम मुझे समझाना चाहते हो कि मैं अन्याय के साथ हूं। मैं तुमसे समझना चाहता हूं कि मैं ठीक हूं या गलत। यदि तुम ऐसा करो तो मेरा तुम से बड़ा हितैषी कौन हो सकता है? पर समझाने के लिए तर्क और प्रमाण की जरूरत होती है, गुणदोष पर विचार की जरूरत होती है, वह तुम नहीं करते। इसे तुम भूल गए हो। तुम्हारी जन्मकुंडली में ही नहीं था अधिक सोच विचार । तुम दो काम करते हो, पहला दुश्मन को बर्वाद करने का और दूसरा बर्वादी के बाद यह सिद्ध करने का कि जिसे बर्वाद किया वह सचमुच दुश्मन था, जब की जिसे बर्वाद किया वह तुम्हारा अपना देश था. तुमने उसकी सम्पदा को नष्ट किया – उसकी बसे, ट्रामें, ट्रेनें, दूकानें और उसमें भरे माल असबाब को नष्‍ट किया जो तुम्हारे ही उपयोग में आने वाला था। पुरानी संस्कृति जो संजो कर रखती थी उसकी जगह तुमने नई संस्कृति दी, जो सिखाती है कि जो अपना ही बनाया हुआ है, अपने ही काम आ रहा है या आने वाला है, उसे सत्ता पाने के लिए बर्वाद कर दो। तुम्‍हें सत्‍ता से प्रेम है, देश से नहीं।

तुम कहते हो मैं अपनी चालाकी से तुम्हें भटका कर अपनी गलत बात को सही साबित कर लेता हूँ, इसलिए मैं अपना पक्षकार तुम्हें बनाता हूँ। तुम्ही मेरे गवाह हो, तुम्ही मेरे वकील हो और तुम्ही इसके मुंसिफ भी हो। न्यायाधीश कहने पर तुमको अच्छा न लगेगा। अब तुम बताओ यह सच है या नहीं। यदि सच है तो यह उचित था या नहीं। यदि यह उचित नहीं था तो तुम देशभक्त थे या देशद्रोही ? यदि यह देशद्रोह न था तो मुझे सजा दो और यदि था तो यह तय करो की तुम्हें देशद्रोही बनाने में किसकी भूमिका थी। मैं जीतना नहीं हारना चाहता हूँ। तुमसे सीखना चाहता हूँ। अपने को बदलना चाहता हूँ। उसमें तुम्हारी मदद चाहता हूँ और यदि चूक मुझसे न हुई तुम्हें अपने ही फैसले से लगे तुमसे गलती हुई तो तुम्हें सही रास्‍ते पर लाना चाहता हूँ जिससे हम सभी सही रास्ते के हमराही बन सकें। मंजूर है तुम्हें ?

Post – 2016-05-22

‘छत्री नवैं न मूसर धनुही।

आज वह बदले की पूरी तैयारी के साथ आया था. चेहरे पर चमक थी और चमड़ी में वह कसाव भी जो इरादे की दृढ़ता के समय प्रकट होता है, ‘’आज तो मैं तुम्हें बख्शने वाला नहीं।‘’
‘’वह तो मैं कल से ही सोच रहा था, जब तुमने इसकी धमकी दी थी। अपने नाम के साथ सिंह मैं लगाता हूँ क्षात्रधर्म का पालन तुम करते हो। जो कह दिया उससे पीछे हटने का सवाल ही नहीं।‘’
’’कम्युनिस्ट जो ठहरा।‘’
’’ ‘छत्री नवैं न मूसर धनुही।‘ भारत में क्षात्र धर्म का निर्वाह केवल कम्युनिस्ट करते हैं। सोच विचार से काम ही नहीं लेते। वर्णव्यवस्था का एक खम्भा आज के दिन कम्युनिस्टों के कंधे पर टिका हुआ है और दूसरा बसपा के कन्धों पर . उसने इतनी प्रतिमाएं सरकारी खजाने से बनवाईं कि उनके लिए न मंदिर बन सकता है, न पुजारी रखे जा सकते हैं। अगर मुझसे पूछो तो क्षत्रियों और ब्राह्मणो को एक लाइन में खड़ा करके गोली मार देनी चाहिए कि वे अपने वर्णधर्म का निर्वाह नहीं कर पाते। इसका निर्वाह उनको करना पड़ रहा है जो हिन्दुत्व और मनुवाद की गालियों को अपनी राजनीति का खाद-पानी समझते हैं, यह समझने की कोशिश तक नहीं करते कि इन शब्दों के मानी क्या हैं। विडंबना के कितने रूप होते हैं।‘’
वह नरम पड़ गया, ‘’हम दिमाग से काम नहीं लेते यह तुमने कैसे कह दिया? बात को घुमाने के लिए कि मैं अपना आरोप भूल जाउूं जिससे तुम्हें बाहर निकलने का रास्ता मिल जाय । पहले मेरे सवाल का जवाब दो, तुम जोकर हो या थिंकर। गंभीर बातों को भी तुम मजाक में इधर उधर कर देते हो या नहीं?‘’
‘’मजाक करना दूसरों की तरह मुझे भी अच्छा तो लगता ही है, परन्तु तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा सकता! उसकी जरुरत नहीं पड़ती ! तुम लोग अपने को मजाक बनाते फिरते हो। इतने सारे समझदार लोग जो लेखकों पत्रकारों को धमकाते रहते हों कि इस तरह लिखो नहीं तो मैं तुमको प्रतिक्रियावादी वगैरह ठहरा कर तुम्हारा कैरियर खत्म कर दूंगा, अपनी डगर पर चलने तक का शउूर नहीं रखते यह कहूं तो कहोगे मजाक बना रहा हूं, पर असलियत क्या यही नहीं है?”
‘’तुम्हारा मतलब शायद यह है कि हमारे आन्दोलन के इतने रूप हो गए। जहां दिमाग होगा, वहां विचारों का मतभेद भी होगा। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि हम चलना नहीं जानते, बल्कि यह सिद्ध होता है कि हम नई राहें बना सकते हैं।‘’
’’मेरा मतलब यह तो नहीं था, पर अगर तुम अपने बिखरने को राहें बनाने की योग्यता मानते हो तो मेरा आशीर्वाद है तुम सभी अपनी अपनी राहें बनाओ। इससे पार्टी के चंगुल से बाहर निकलने का मौका तो मिलेगा।**
“फिर राह चलने का शउूर नहीं है कह कर तुम क्या कह रहे थे।?
” मैं यह कह रहा था कि पिछले तीन दशक से तुम्हारा काम रह गया है भाजपा का विरोध। भाजपा अपना काम कर रही है, उसके पास अच्छा बुरा कोई कार्यक्रम है, तुम उसको अपना काम करने से रोक रहे हो। उसका अपना रास्ता है ! वह अपने रस्ते पर चल रही है ! तुम्हारा रास्ता तुम्हें भूल गया है। उस पर चल नहीं पाए। अब उसके रास्ते पर तुम उसका पीछा कर रहे हो और वह आगे बढ़ती जा रही है। तुम दूसरे दलों के साथ मिल कर लिहो लिहो कर रहे हो और वह तुम्हारी ओर नजर फेरे बिना, तुम्हारी आपत्तियों का जबाब तक दिए बिना अपनी राह पर बढ़ी जा रही है। तुम यह भी नहीं देख पाते कि इससे किसको फायदा हो रहा है। एक बार ठान लिया कि भाजपा को हटाना है तो नतीजे की परवाह किए बिना लगातार हटाते जा रहे हो और अपनी ही चाल से पीछे हटते जा रहे हो क्यों कि तुम्हारे पास अपना कार्यक्रम ही नहीं है । प्रतिक्रियावाद का भजन करते रहते हो और यह तक पता नहीं कि क्रिया वह कर रही है प्रतिक्रिया तुम कर रहे हो, वह प्रगतिशील है और तुम प्रतिक्रियावादी। उसका रोल पाजिटिव है तुम्हारा निगेटिव। वह आगे तुम पीछे। वह भविष्य में तुम इतिहास में। लेकिन अपने इरादे नहीं बदल सकते। सच्चा सूरमा सिर कटाने को बहादुरी समझता है पर पैंतरा बदलने को तैयार नहीं होता। समायोजन क्षमता के अभाव में तुम्हारा अस्तित्व खतरे में है और देखो कि सारे बुद्धिजीवी तुम्हारे साथ हैं लेकिन शौर्य के कारण सबकी मति मारी गई है। उनमें से एक भी यह सोचने या मानने को तैयार नहीं कि हमारी जो गति बन रही है उसके लिए हम जिम्मे दार हैं। बुद्धिजीवियों को भी तुम लोगों ने सूरमा बना कर रख दिया जो तलवार पकडने के लिए बेचैन हैं जब कि कलम संभाले संभल नहीं रही। लिखते हैं और आपस में बांट कर पढ़ते हैं और एक दूसरे की बाहम्बाह में भूल जाते हैं कि समाज से उनकी टोली कितनी अलग जा बसी है और अभी तक अपाठ्य थी अब अस्पृश्य भी बनती जा रही है।
‘’अस्पृश्य वह तुम्हारे लिए होगी। इसके बिना तुम्हारा काम नहीं चलता ।‘’
‘’मैं अस्पृश्यता का निवारण करने वालों में हूं, अस्पृश्य बनाने वालों में नहीं। भाजपा को मिटाने की बदहवासी में तुम आततायियों, उपद्रवियों, देशद्रोहियो, आतंकवादियों, हुड़दंगियों सब को गले लगाते रहे, उनके बचाव के लिए परिभाषाएं तलाशते रहे और यह सिद्ध करते रहे कि जो वे अपने काम से दिखाई दे रहे हैं वह वे हमारी परिभाषा से दिखाई नहीं दे रहे, इसलिए आप लोग जो हम देख रहे हैं उसे देखें, जो स्वयं देख रहे हैं उसे न देखें। ये सभी अपने अपने ढंग से भाजपा के संकट से देश को मुक्त कराना चाहते हैं इसलिए ये ही सच्चेे देश भक्त है, ये ही हमारी राजनीति का भविष्य है।‘’
‘’तुम्हें याद है जेएनयू कांड के बाद जब राहुल सहित तुम्हारे सभी टोलियों के नेता और विचारक और प्रचारक हुड़दंगियों के साथ दिखाई दिए और उनमें भी तुम्हारे महासचिव अपनी आत्मविश्वास भरी मुस्कराहट के साथ वहां उपस्थित हुए थे तो उस पर टिप्परणी करते हुए मैंने क्या कहा था?’’
अब इतनी पुरानी बात उसे क्या याद रहती। मैंने 18 फरवरी की पोस्ट की कुछ पंक्तियां उसके सामने कर दीं: ’करात और येचुरी दोनों जेएनयू की ही उपज हैं। देश को नेतृत्व देने के लिए ज्योति दा के नाम पर सभी दल एकमत थे, इन्होंने ही उसमें बाधा डाली थी। इनके नेतृत्व में ही सीपीएम हाशिए पर आना शुरू हुई और आज इतनी बेजान हो चुकी है कि अपनी भ्रष्टता के कीर्तिमान स्थापित करने वाली कांग्रेस के साथ गठजोड़ की स्थिति में आ गई है और येचुरी ने जो अभी बयानबाजी की उसको ध्यान में रखकर ही कह रहा था ‘चेतना ही न रही चढ़ि चित्त सो चाहत मूढ़ चिताहू चढ़्यो रे।‘ पार्टी की अंत्येष्टि का काम जेएनयू का उत्पाद ही करेगा।‘
वह कुछ परेशान तो बंगाल के नतीजों से था, यह पढ़ने के साथ कुछ और परेशान हो गया, पर तुरत संभल गया, ‘’जरा अपनी जबान तो दिखाना।‘’
’’क्यों क्या हो गया।‘’
’’देखूं वह कहीं पर काली तो नहीं है। तुम जो कहते हो वह सच साबित हो जाता है।‘’
’’जो कहता हूं वह जबान काली होने के कारण सच नहीं होता, इतिहास की गति को समझने के कारण होता है। ठीक उस मौके पर जब चुनाव कुछ ही महीने बाद था तुम्हारे नेता उनका समर्थन कर रहे थे जो उचक्कों की तरह व्यवहार कर रहे थे, देश द्रोही नारे लगा रहे थे या ऐसे नारे लगाने वालों के साथ थे इसलिए उनके सह अपराधी थे। तुम्हारे नेता दुनिया को मीडिया तक सिमटा मान कर सोच रहे थे मीडिया हमारे साथ है, मीडिया जो बताती है सब सुनते हैं, जो दिखाती है सब देखते हैं इसलिए हम जो कहेंगे उसे सभी सच मान लेंगे। उनका सोचना सही था। लोगों ने मान लिया कि आप लोग उनके साथ हैं और बंगाल में इसका जो संदेश गया उसने आप को रसातल में पहुंचा दिया जो कमी थी वह कांग्रेस के साथ ने पूरी कर दी जो भी उन लोगों के साथ थी ! देश को भाजपा मान कर उसे तोड़ने के सपने बो रहे थे।‘’
’’यही होता तो केरल में जीत न होती।‘’
’’दो बुरों में चुनाव करना था, किसी तीसरे विकल्प की संभावना होती तो वहां भी वही होता जो बंगाल में हुआ।‘’