Post – 2016-04-25

जिधर देखते हैं उधर तू ही तू है

‘क्या तुम अनुप्रास प्रेम के कारण कमीनेपन को कमाल की ऊंचाइयों तक पहुंचाने की बात कर रहे थे या इसमें कोई सोच और सूझ भी थी.’

‘यदि इसका भाष्य करना पड़े तो मैं समझूंगा मैं एक ऐसे समाज से रू-ब-रू हूँ जो अपनी चेतना और संवेदना खो चुका है और पैना लगाने पर ही चेतता है और जल्दी जल्दी आगे बढ़ता है और फिर थथमथा जाता है जैसे पैने की आदत पड़ गई हो.’

उसके चहरे की भंगिमा से लगा उसकी समझ में बात नहीं आयी.

मैंने पूछ, ‘पैना का मतलब जानते हो?’

बोला, ‘जानता हूँ, जानूंगा क्यों नहीं : नुकीला, तेज़, धारदार.’

मैंने कहा, ‘ ये तो विशेषण हुए. मैं संज्ञा की बात कर रहा था. अंग्रेजी में जिसे गोड कहते हैं वह । इसके कई रूप होते हैं. जिसको स्त्रीलिंग में पशुसाधनी (सटाकी) कह सकते हो और पुल्लिंग में अंकुश, प्रतोद, अष्ट्रा आदि. हाथी, घोड़े, और बैल के लिए उसके नाम और बनावट और उपादान में अंतर होता है।

ये सारे उपकरण, घोड़े के लिए कशा भी वैदिक काल से चले आ रहे हैं। पशु सम्पदा के मामले में भी बहुत समृद्ध था वैदिक समाज. यह गाय चराने वाला जत्था नहीं था। भेड़, बकरी,, गाय-बैल, ऊंट, गधा, घोडा, भैंस और हाथी तक पालने और उपयोग में लाने वाले समाज को कमीनों ने अपने को अधिक सभ्य सिद्ध करने के लिए असभ्य , बर्बर और दरिन्दा सिद्ध करने की ठान ली थी और इसी इतिहास से तुम्हारी अतीत और वर्तमान की समझ पैदा हुई थी इसलिए इसमें अनुप्रास दिखाई दिया, यथार्थ नहीं, जिसके उदाहरण जिधर भी निगाह डालो मिल जाते हैं। अपने इस झूठ को वे तब भी दुाहराते रहे जब मैंने जीवन के एक एक पक्ष को लेकर यह प्रमाणित कर दिया वैदिक समाज अपने समय की अन्य सभी सभ्यताओं से अधिक विकसित और प्रबुद्ध था और इसमें, वर्गभेद, वर्णभेद, पितृ प्रधानता आ चुकी थी. पर सत्ता के साधनों और संस्थाओं पर अखण्ड अधिकार के बल पर उजागर हो चुके सच को दबाने और झूठ को इतिहास का सत्य बनाने पर लगातार जुटे रहे और आज भी किसी न किसी बहाने इसे दुबारा चर्चा में लाने की कोशिश करते हैं। तुमने भी सुना होगा वैदिक समाज की तुलना आइएस करने वाले को । अपने इसी कमाल के बल पर वह आज भी तुम्हारे सिर चढ़़ कर बोलने लगता है। ऐसे लोगों के लिए राही मासूम रज़ा के आधा गांव की भाषा में जो सही शब्द बनाता है उसके उच्चारण के साथ मेरी ज़बान ऐंठ जायेगी. इसलिए घुमा कर कहना पड़ा, कमीनेपन को कमाल की ऊंचाइयों तक पहुंचाने का सच.’

‘कमाल की आत्मविचलन है यार, बात वर्तमाम की हो रही थी और तुम पांच हज़ार साल गहरा गोता लगाकर उसे समझने और उसकी आड़ में अपने को सही साबित करने की कोशिश में जुट गए।‘

’मैंने इतिहास को ध्यान में रख कर नहीं कहा था यह वाक्य । इतिहास की ओर तो तुम्हारी नासमझी के कारण जाना पड़ा और उस इतिहास से वह पैने वाली बात तो धरी ही रह गई। ऋग्वेद में पैने को अष्ट्रा् कहा गया है। यह बांस या लकड़ी का चिकना सा डंडा होता है जो बैलगाड़ी हांकने वाले के हाथ में होता है और बैल जब सुस्त् पड़ जाते हैं या आगे बढ़ने से कतराने लगते हैं तब इसका इस्तेमाल उसे करना पड़ता है, पर यह न बताउूंगा कि कहां, नहीं तो बुरा मान जाओगे। उसी प्रसंग में यह याद आ गया कि कितने हजार साल से यह काम में आ रहा है और फिर क्षोभ में उस सन्दर्भ में जारी रखी जाने वाली कमीनगी का कमाल भी याद आ गया।

‘कल जब बात कर रहा था तो जल संकट के सन्दर्भ में याद आया दस पन्द्रह साल पुरानी नदियों को जोड़ने की वह योजना, जिसकी व्यावहारिकता पर वाजपेयी सरकार ने काम करना आरंभ किया था और उनको इसके आरंभ का श्रेय मिलता इसलिए उसके बाद इस पर काम ही बन्द कर दिया गया और वह धन जो देश के विकास पर लगना था विदेश भेजा जाने लगा।

‘बाजपेयी ने सड़क मार्ग से पूरे देश को जोड़ने और यातायात की सुविधा बढ़ाने की योजना पर तेजी से काम करना आरंभ किया था और इसके सपने में वह इतने गदगद हो गए थे कि कार्यकाल पूरा करने से पहले ही चुनाव करा बैठे और एक तकनीकी तिकड़म के चलते परदे के पीछे चले गए। उसके बाद उस योजना को रोक दिया गया। हजारों करोड़ का धन जो उस पर खर्च हो चुका था वह बेकार कर दिया गया क्योंकि उसका श्रेय भाजपा सरकार को मिलता।

‘आज भी आए दिन यही किया जा रहा है कि हमने नहीं किया और तुम्हें कुछ करने न देंगे और खुलेआम विघटनकारी तत्वों को शक्ति और साधन देकर खुराफात के लिए उकसाया जा रहा है। जाटों को उकसा कर जो उपद्रव कराया गया था उसे किसने इसे भड़काया था यह तो संचार माध्यमों को भी पता चल गया था परन्तु उसके पीछे कांग्रेस का हाथ था इसलिए उसकी एक बार चर्चा हो कर उससे सभी चैनेलों ने आख फेर ली थी। इसकी तुलना किसी छोटी से छोटी घटना से करो जिसकी आड़ में मोदी को घेरा जा सकता हो तो उसे कितने विस्तार से, कितने दिनों तक, कितने बहानों से,चर्चा के केन्द्रा में रखा जाता है, यह उदाहरण दे कर समझाने की चीज नहीं है। यह किसी एक कार्य या घटना से जुड़ी पीड़ा नहीं थी। यह एक राष्ट्रीरय व्यातधि का रूप ले चुका है। जिधर निगाह डालो नमूने मिल जाते हैं।‘

‘मेरी एक बात मानोगे। मान लो। तुम अपनी बेल्ट लाइन बता दो, कल मैं तुम्हाारे लिए एक निकर बनवा कर लाता हूं, अरे, अब तो निकर से काम चलेगा नहीं, दुनिया के सामने नंगे हो गए तो फुल पैंट की सूझी, चलो वही सही। यह मेरी तरफ से भेट रही परसों से तुम जो कमी रह गई है वह भी पूरी कर दो। शाखा में जाना शुरू कर दो।

‘सभी जानते हैं तुम्हा।रे पास हराम का बहुत सारा पैसा है जिसे तुम कहीं भी बहा सकते हो। लेकिन लोगों को तुम्‍हारी सिलाई पैंटों और फुलपैंटों की जरूरत नहीं पड़ रही है। तुम्‍हारी देशद्रोही गतिविधियों और देशद्रोहियों को शहीद बनाने की तुम्हा री कोशिशों से बिदक कर लाखों लोग तुमसे किनारा कसते जा रहे हैं और शाखा तक न भी पहुंचे पर उनकी सोच तक पहुंचने लगे हैं वर्ना संघ को अपने स्वयंसेवकों की संख्या में तेजी से हो रही बृद्धि डंके की बात चोट पर न बतानी पड़‍ती और तुम्हें चोर की मां की तरह छिप कर रोना न पड़ता।
अब तो अपने उजड़े घर में रोने वाला भी तू है और उनके भरे मजमे के बीच ढोल बजाने वाला भी तू है। सभी को साथ बुला रहे हो मिल कर रोने के लिए कि शायद उस स्‍यापे पर ही जनता पिघल जाय। यह क्‍या अकेले उनके करने के वश का काम था। अपना काम छोड़ कर उनका ही काम तुम अरसे से करते आ रहे हो। तुम्‍हारा काम तो तमाम होना ही था।

Post – 2016-04-23

अंतहीन दुख

‘देखो, कल मैं तुम्हारी स्थिति देख कर चुप कर गया था, पर यह समझ लो कि रचनाकार के पास कोई ऐसा अधिकार नहीं होता जिससे दूसरों को वंचित रखा गया हो। हां, उसके पास एक चीज दूसरों से अधिक होती है। यह है कर्तव्य की चेतना, उत्तरदायित्व का बोझ! इसके निर्वाह की क्षमता से ही यह सिद्ध होता है कि उसकी हैसियत क्या है। इसे उलट कर भी कह सकते हैं, ज्यों-ज्यों सर्जक की हैसियत उूंची होती जाती है उसका दायित्व-बोध बढ़ता जाता है और इसके चलते वह स्वयं अपने अधिकारों का भी अधिक संयम से प्रयोग करता है मानो उसके पास अधिकार हों ही नहीं, कर्तव्‍य ही कर्तव्‍य हो। यही उसे सत्ता के लिए संघर्ष करने या सत्ता से जुड़ने वालों की, अपने ‘अधिकारों’ के विस्तार की विक्षिप्तता में अपने दायित्व को भूल चुके लोगों की तुलना में अधिक बड़ा बनाता है और इसी के कारण वह राजनीति से आगे मशाल लेकर चलने वाला पथप्रदर्शक होता है न कि उसके पीछे चलने वाली भिखारियों की टोली में से एक जो राजनीतिक पक्षधरता और राजनीति की गलाजत के चलते सांस्कृतिक अनाथों की स्थिति में पहुंच गया हे और इसके लिए जिम्मेजदार तुम हो। तुम्हें बताउूं कि अधिकारों की मांग भी भिखारियों का कशकोल लेकर चलने जैसा ही है, अन्यथा अधिकार मांगे नहीं जाते, न पिनक में जो सूझ गया उसे पाने के लिए हड़बोंग करने से पाए जाते हैं। उनकी रक्षा की जाती है और इसके लिए उन अवरोधों की सही पहचान जरूरी होती है और इसकी स्पष्ट मांग की जाती है और ऐसा संभव न होने पर ही इसे पाने के तरीकों की खोज करनी होती है।

‘तुम्हें तो वह नजारा याद भी न होगा, शायद देखा भी न हो, जब लोगों की नींद गली या सड़क से आने वाली ‘दे अल्ला के नाम तुझको मौला रक्खे’ की करुण ध्वननि से टूटती थी। संभव है तुमने देखा भी न हो, क्योंकि नेहरू ने देश का सिर उूंचा करने और दरिद्रता दूर करने के लिए भीख मांगने और देने काे अपराध बना दिया था और उसके बाद वह सांस्कृंतिक विरासत ही खत्म हो गई। मैंने उससे प्रभावकारी संगीत देखा ही नहीं जिसमें यह पता होता था कि यह खासी कमाई कर लेता है, इसके बाद भी लोगों का दिल पसीज जाता था, और वे उस कलात्मक आर्तध्वनि पर निछावर हो कर पैसा धेला उधर फेंक ही देते थे। यदि याद हो तो याद होगा कि यह एक युगलबन्दी हुआ करती थी। पता नहीं इसे युगलबन्दीे कहा जा सकता है या नहीं। वे दो का दल बना कर चलते। एक ठेलानुमा चौकी पर अपंग बन कर बैठा हुआ और आर्त स्वर में कहता, ‘दे अल्ला के नाम’ और दूसरा उसको ठेलता हुआ, लगभग थका हुआ, एक एक कदम अब-गिरा-कि-तब की अदायगी से बढ़ाता हुआ, थके ही नहीं मरे सुर में टेक लगाता हुआ, ‘तुझको मौला रक्खे। पर आवाज इतनी साफ कि बहरे को भी सुनाई दे जाय। ‘ लोग जानते हुए कि यह नाटक है, उसे देखने से बचने के लिए कुछ दे बैठते थे। मैंने इससे प्रभावशाली स्ट्रीट ड्रामा आज तक नहीं देखा, और नुक्कड़ नाटकों के अभिनेता उनके पांवों की धूल बराबर भी नहीं लगे।

‘मैं तुम्हारा ध्यान दो चीजों की ओर दिलाना चाहूँगा। मध्यकाल ने सामान्य जनों को अपनी लूट खसोट से यतीमों की जमात में तो बदल दिया परन्तु उसने यतीमी को उस कलात्मक उूंचाई पर भी पहुंचा दिया जिसमें लोगों का दिन कलादर्शन से आरंभ होता था और आंसू पोंछते समाप्त होता था। आज इस मुहावरे को कुछ बदल दिया गया है, दे अल्ला के नाम को बदल कर दे कल्‍ला के नाम कर दिया गया है और तुझको मौला रखे की जगह तुझको माल्या रखे, पर माल्या‍ को उसके प्रतीक में ग्रहण करो, पुरुष रूप् में नहीं। उस तरह जैसे एक जमाने में टाटा बिड़ला का अर्थ पूंजीवाद हुआ करता था जो आज अडानी और अंबानी हो गया है, मैं इसमें घालमेल तन्‍त्र को स्‍थान देते हुए माल्या को केन्द्रं में रखना चाहता हूं।‘

अब तक वह बिना किसी प्रतिवाद के सुनता रहा और सहसा प्रश्न कर बैठा, ‘कल रात नींद अच्छी तरह आई थी।’

इतने सारगर्भित भाषण के बाद उसके इस प्रश्न ने नीचे की जमीन ही खिसका दी।

इस उद्रेक बिन्दु पर जिसमें मैं स्वयं भी तर-ब-तर था इस प्रश्न की तुक न थी! मैंने हैरानी से देखा तो बोला, ‘कल जहां खत्म किया था आज वहीं से शुरू हो गए। रात में सपने भी इसी के देखते रहे होगे। कोई दूसरा विषय नहीं सूझता तुमको।‘

‘ऐसे हवालों से तुमको घबराहट होती है यह जानता तो था, पर सोचा ही नहीं। कल भी तुम रो पड़े थे, यह भूल गया था मुझे। पर मैं मजा लेने के लिए बात नहीं करता, बदमजगी पैदा न हो इसका ध्यान अवश्य रखता हूं। कल तुम्हें आंसू किस बात पर आ गए थे, बताओगे?‘

‘जब तुमने किसानों के महत्व की बात की तो मुझे सहसा आत्महत्या करने वाले किसानों की याद हो आई। फिर आज के सूखे की ओर ध्यान गया । फिर अपनी प्यास बुझाने के लिए बूंद बूंद पानी के लिए तरसते लोगों की कतार याद आई और अपने को उनकी स्थिति में रखने की कोशिश की तो लगा आंखों के आगे अंधेरा छा गया है। कुछ समय लगा यह समझने में कि आंखे डबडबा आई हैं इसलिए ऐसा लग रहा है फिर आंखें पोंछने लगा।‘

विचार भी भौतिक यथार्थ को बदल सकते हैं, अन्यथा उसके इस कथन के साथ मुझे गले में कुछ अटकता सा न लगता और फिर हृदय में वह हूक न अनुभव होती कि सांस लेना भारी पड़ जाता। इसके बाद न उसका साहस मुझे देखने का हो रहा था न मेरा उसे जैसे किसी न किसी रूप में हम भी इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं। मौसम वसन्त का है, वृक्ष किशलयों से लदे चमक रहे थे पर उधर दृष्टि गई तो उन पर एक काली पर्त सी जमी दिखाई दी। आंखें शून्‍य में जा टिकी थीं। स्थिति असह्य हो गई तो मैंने कहा, ‘चलो एक चक्कर लगा लें।‘

वह बिना बोले ही उठ खड़ा हुआ। अपने सामान्य व्यवहार के विपरीत हम साथ चलते हुए भी चुपचाप चलते रहे और लौट कर बैठे तो भी कुछ समय तक अबोला रहा। फिर एक कराह की तरह मेरे मुंह से निकला, ‘हमने कमीनेपन को कमाल की उूंचाई पर पहुंचा दिया है।‘
उसे खटका तो, पर न आगे उसने कोई सवाल किया न मेरा कुछ कहने को जी हुआ।

Post – 2016-04-22

लेखक भी आदमी होता है

‘जानते हो आज मैंने एक बहुत बड़ी खोज की। लेखक भी आदमी होता है।‘ मैंने उसे छेड़ने के लिए कहा।

आश्चर्य का अभिनय करते हुए उसने कहा, ‘इतनी ऐतिहासिक खोज तुमने कैसे कर डाली यार। मैं तो सोचता था इतनी उूंची खोज करने में तुम्हारी पूरी जिन्दगी लग जाएगी और तुम्हारे विरुद में तुम्हारे समाधि लेख पर यह पंक्ति लिखी होगी और उसके उूपर मोटे अक्षरो में लिखा होगा लाइफ एचीवमेंट ऑफ भगवान सिंह ! नथिंग मोर, नथिंग लेस। यार अंग्रेजी में एपिटाफ का रोब कुछ अधिक पड़ता है। मैं ध्यान रखूंगा लिखवाना तो मुझे ही पड़ेगा।’‘

वह हंसा तो उसके अट्टहास में, लाज बचाने के लिए, मैं भी शामिल हो गया!

हंसी थमी तो वह बोला, ‘मैं तो जमाने से कहता आ रहा हूं कि तुम कोई बात सलीके से रख ही नहीं सकते! यदि मुझे कहना होता तो कहता, ‘लेखक दूसरे आदमियों से कुछ अधिक आदमी होता है और आदमीयत की यह अधिकता ही उसके भीतर दबाव डालती है तो उसकी अभिव्यक्ति कला का रूप ले लेती है और वह कलाकार बन जाता है।‘

बात यह भी पते की थी, दाद देने की लाचारी थी, बोला ‘साल में एक बार तुम भी इतनी पते की बात कह जाते हो कि मैं चकित रह जाता हूं कि पत्थर में यह फूल कैसे खिल उठा! खैर उससे अगली खोज यह कि छोटा लेखक अपने को समाज से बड़ा समझता है और बड़ा लेखक अपने को समाज से छोटा समझता है।‘

‘’यह उतनी मूर्खतापूर्ण् बात तो न हुई फिर भी इसका रहस्य क्या है?’

’गलती हमारे पुरखों की है। उन्हों ने कहा तो कुछ सोच कर ही होगा, क्योंकि कवि का उनका अर्थ था तत्वदर्शी, लेकिन अपने जीवन की पहली तुकबन्दी करते ही, यदि संस्कृत का ज्ञान न हुआ तो भी, पहला आभास जो किसी तुक्कड़ को होता है वह यह कि तुक का बैठ जाना कविता है और तुक बैठाने वाला कवि और फिर तो उसके कानों में ‘कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू’ का संगीत गूंजने लगता है।

‘तुम्हें एक मजेदार आपबीती सुनाउूं।‘

वह उत्सुकता में मेरी ओर मुड़ गया।

’मैं दूसरी कक्षा में पहुँचा तो या उससे पहले ही एक तुकबन्दीु कर बैठा। अब तो इतना ही याद है कि दूसरी कक्षा में मुझे दो साल लगाने पड़े थे और उसका कुछ संबंध इस तुकबंदी से है। इसकी पहली पंक्ति रामनेति नामक एक प्रतिभाशाली छात्र की थी। वह उस समय मिडल स्‍कल की सातवीं कक्षा का छात्र था। बड़े भाई साहब ने उसकी तारीफ यह बताते हुए की कि इसकी तारीफ उसके हेडमास्टर रामसुरंजन सिंह ने स्वयं की थी। पंक्ति थी ‘अर्जुन के हाथ में था धनुष बाण किसी दिन’ आगे की पंक्तियां क्या थीं यह याद नहीं। अपनी तुकबन्दी में आगे की पंक्तियां मैने चुुपके से जोड़ीं,
‘मारा था भीष्म बीर काे दस बाण किसी दिन।
अर्जुन का प्यारा लड़का अभिमन्यु किसी दिन।
रण में मरा था बालक वह बीर किसी दिन।

और जब मैंने इसे झिझकते हुए लोगों को सुनाया तो बात फैल गई और मैं चुपके चुपके इस बात का कायल हो गया कि परमात्मा ने मुझे कवि बनाया है। यह विश्वास पक्का तब हुआ जब उसी साल स्कूल जाते समय रास्ते में पड़ने वाले एक बरसाती नाले में मैं फिसल कर गिर गया और सराबोर हो कर वापस लौट आया, पर किसी से यह कहने का साहस नहीं कि मेरे साथ क्या दुर्घटना घटी है। विमाता से सहानुभूति की आशा न थी, और बाबा से कहने का साहस इसलिए नहीं कि उस दिन बहन के यहॉं बहुरावत भेजने के लिए मिठाइयां बन रही थीं जिसके लिए दो हलवाई नियुक्त थे। संकोच यह कि कहीं बाबा यह न समझ लें कि मैं मिठाई के लोभ में अपने को जान बूझ कर भिगो कर लौट आया हूँ। बात आत्मसम्मांन की थी इसलिए दासे पर एक कोने में चुपचाप बैठा प्रतीक्षा करता रहा कि कपड़ा सूख जाय और बरसाती हवा का कमाल कि मै बीमार पड़ा तो महीनों के लिए। यदि यह मियादी बुखार था तो कई मियादी बुखारों के बराबर, पर दवा के नाम पर तुलसी का काढ़ा, नीम की ढेंपी का काढ़ा। वैद्यनाथ की जूड़ी ताप शीशियां। विस्तर से उठ नहीं पाता था। बुखार उतरा तब तक शरीर अस्थिशेष रह गया था, पेट बाहर को फूल आया था, बाल झड़ गए थे और रात में आंखों से कुछ दीखता नहीं था।‘

’यह पवांरा ले कर क्यों बैठ गए तुम?’

‘यह बताने के लिए कि जब सभी लोग इस बात से निराश हो चुके थे कि मैं बचूंगा भी या नहीं, मैं बिस्तहर पर लेटा सोचता, ‘मैं मर नहीं सकता। यदि मारना ही होता तो परमात्मां ने मुझे कवि न बनाया होता।‘

‘वह तो ठीक है, पर इसकी यहां क्योंं जरूरत पड़ गई?’

‘यह बताने के लिए कि जब कोई साहित्यकार, पत्रकार, चित्रकार, यह याद दिलाता है कि वह दूसरे लोगों से उूपर है, उसकी जान अधिक कीमती है, दूसरे सभी यातना भोगते रहे, उसके सुख सुविधा का ध्यान रखा जाना चाहिए, तो मुझे लगता है बौद्धिक के रूप में वह बालिश रह गया है। उसकी मानवीय संवेदना समाप्‍त हो गई है। वह केवल अपने बारे में सोचता है, समाज के बारे में नहीं। ऐसे रचनाकार अपनों के अपने हैं, किसी और के अपने नहीं। वे यह तक नहीं जानते कि कविता के बिना भी समाज जीवित रह सकता है पर अनाज के बिना नहीं और उनकी महिमा उस अगण्य के से आती है जो खुद तो धूप और शीत की मार खाता है और दुनिया को रोटी खिलाता है।‘ मुझे अपनी रौ में यह ध्यान ही न रहा कि वह अपनी आंखें पोंछ रहा है।

Post – 2016-04-22

खाद की खेती करने वाले

तुम्हें सारे ठीकरे कम्युनिस्टों के सिर ही फोड़ने होते हैं।’

‘तुम अपने सिर की हिफाजत के लिए ठीकरे फोड़ने का नाम ले रहे हो, मेरा वश चले तो पत्थर फोड़ू और वो भी इतने बड़े जो मुझसे उठ न पाएंगे। कम्बख्‍तों ने देश और समाज का सत्यानाश करके रख दिया। कम्यु़निस्ट कहने से कोई कम्युनिस्ट हो जाता है। दुनिया में कहीं कम्युानिज्म स्थापित नहीं हुआ और यह जानते हुए जो ढकोसलेबाज अपने को कम्युनिसट कहते हैं वे गेरुआ पहन कर अपने को योगी, साधु, साध्वी , सन्यासी, संत कहने वाले कुकर्मियों से किस माने में अच्छे हैं? न रामनामी पहनने से कोई रामभक्त हो जाता है न मार्क्सनामी ओढ़ने से मार्क्सवादी। नाम नहीं, आचरण और गुण ही यह सिद्ध करते हैं कि कोई क्या‍ है। तुम्हे कितने प्रमाण चाहिए यह स्वीकार करने के लिए कि भारत में कम्युनिस्ट का मतलब मुस्लिम लीग की आत्मा, मानवतावादी मुखौटा और असंभव को संभव मानने और उस पर अपार राष्ट्रीय संसाधनों को बर्वाद करने वाला देशद्रोह होता है?‘

उसने जोरदार ठहाका लगाया, ‘फिर से कहना! फिर से कहना तो! अरे भई, इतने लंबे साथ के बाद भी मैं तो यह समझ ही नहीं पाया था कि तुम इतने प्रबल मूर्ख हो। अपने को मार्क्सवादी कहते हो, अब समझ में आया, दावे में कुछ नहीं रखा है। मार्क्सवाद एक दर्शन है, उसमें नादानों को घुसने की इजाजत नहीं है। नादानों का स्वाागत उनके यहां होता है जो सांस्कृ्तिक राष्ट्रवाद के जनक हैं और जो अबोध वय में ही बच्चों को झूठे बहानों से अपनी वाहिनी में भर्ती करके उनके दिमाग की धुलाई करने लगते हैं और सांस्कृतिक विस्फोटको में बदल देते हैं।‘

‘दुख होता है, यह सोच कर कि तुम जिन शब्दोंं का इस्तेमाल करते हो, उनको ईंट पत्थर मान कर किसी न किसी पर फेंकने का काम ही लेते हो। उनकी बनावट और आशय समझने की चिन्ता नहीं करते। तुमने ठीक कहा कि संघ में अबोध अवस्था में ही बच्चों को भरती करने की सूझ किसी तत्वदर्शी के मन में पैदा हुई थी। परन्तु वह उन्हें आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित करना चाहता था जैसे आज कल सामाजिक अभद्रता के शिकार लड़कों और विशेषत- लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया जाने लगा है। वह उनमें सहभागिता और आत्मविश्वास पैदा करना चाहता था। जिनको तुमने स्वयं अबोध कहा, जिनके मस्तिष्क में कुछ है ही नहीं, उनकी धुलाई की जरूरत क्यों पड़ेगी? ब्रेनवाशिंग की जरूरत वहां पड़ती है जहां किसी विचार या उसके किसी इतर आकर्षक पक्ष से आकर्षित हो कर सुपठित लोग किसी संस्था में जाते हैं, उन्हें नया धर्म, विचारधारा, विश्वासधारा और यहां तक कि विनाशधारा कहो तो मुझे आपत्ति न होगी, क्योंंकि, अन्ततोगत्वा वे होती विनाशधाराएं ही हैं, जो सांस्कृरतिक आत्महत्या के लिए प्रोत्साहित और विवश करती हैं। दिमागी धुलाई की इनकी शर्तों पर ध्याेन दो:
1. पहले से जो जानते थे उसे मिटा दो;
2. जो तुम्हारे विश्वासबन्धु नहीं हैं उनको मिटा दो;
3. जो ज्ञान तुम्हारे विचारस्रोत से अनमेल हो उसे मिटा हो।
4. जिस ज्ञान से हमारी सिखाई बातों के निष्प्रभाव होने का खतरा हो उन्हें पढ़ो ही नहीं और इतना गर्हित बना दो कि उनकी ओर मुड़ने से लोग कतरायें।

और जो मॉग नहीं की जाती है, न बताई जाती है, वह यह कि:
5. नादानो, जब इतनी चीजों को मिटा ही चुके हो तो तुम्हें जीने का क्या अधिकार है, अपनी हस्ती को भी मिटा दो तब तुम्हें मर्तबा मिलेगा। और जानते हो, जादू इस तरह काम करता है कि लोग मर्तबा पाने के लिए अपनी हस्ती तक को मिटाने को तैयार हो जाते हैं पर यह नहीं जानते कि वह मर्तबा है क्या जो उस दुर्लभ अवसर को हमसे छीन लेता है जो किसी रहस्यजमय संयोग से हमें जीने, आनन्द लेने, और यदि समाज में कुछ बुराइयॉ हैं तो उन्हें मिटाने या कम करने का अवसर देती है।

‘जानते हो अपने जीवन को नकारने, अपने को अपमानित करने, अपने से घृणा करने पर गर्व करने की प्रवृत्ति का जातीय नाम क्या है ?’

उसे तो इसकी उम्मीद ही न थी। मेरा प्रतिवाद करने के लिए जिस तैयारी के साथ आया था उसके असले बेकार जा रहे थे। बेचारगी में बोला, ‘तुम्हीं बताओ।‘

‘सामी मत। और जैसा कि मैंने कहा था, सामी मतों का मूल भी, धर्मान्तरित करने वाले तन्त्र का जन्मस्थान भी, भारत ही है। कोसंबी ने ठीक ही कहा था कि बौद्ध धर्म धर्मान्तारण कराने वाला पहला धर्म था, पर यह नहीं समझाया था कि बौद्धमत ने सबसे पहले धर्म के उस वैज्ञानिक अर्थ को संकुचित करते हुए अपने को सही सिद्ध करने या मान्य बनाने के लिए प्रयोग किया और सत्य की दुहाई देने वाले इस मत का आरंभ ही धूर्तता से हुआ। तुम जानते हो न कि बौद्ध मत में भी बुद्ध की उत्पत्ति से पहले का इतिहास उनके पूर्वजन्मों तक सीमित है, शेष इतिहास लुप्त‍ है। दूसरे विचार और विश्वास उस सीमा तक ही इतिहास में जगह पाते हैं जिनसे बौद्धमत की श्रेष्ठता प्रमाणित हो। बौद्धमत और उसका अनुकरण करने वाले सामी मतों में अन्तर केवल यह है कि बौद्धमत में विचार के लिए जगह है, सामी मतों में इसके लिए जगह नहीं है। वे सभी अन्तिम सत्य पर पहुँचे हुए विश्वास है जिनमें तर्क, विमर्श या आत्मनिरीक्षण से परहेज किया जाता है। भारतीय कम्युनिज्म एक मजहब है, उसमें ये सभी लक्षण पाए जाते हैं। मार्क्सवाद एक दर्शन है, दर्शन होने के कारण ही उसमें भी विचार के लिए स्थान है, जब कि कम्युनिज्म सबसे नया सामी मत है और उसका अन्य सामी मतों से जो भी विरोध हो उसके सबसे बड़े शत्रु गैरसामी मत ही हैं और इसी तर्क से भारतीय कम्‍युनिज्म एक मजहब है समीक्षा से परे है। इसके सपनों से आकर्षित हो कर लोग इसके पास आते हैं और एक बार फंस जाने के बाद न उनके अपने सपने रह जाते है न ही अपने मंसूबे। सभी बलिपशु की तरह काम करते हैं और बलिपशु बनने के गौरव पर मंत्रमुग्ध रहते हैं।‘

वह कुछ नर्वस हो रहा था। नर्वसनेस की उस अवस्थ में पहुंचा लग रहा था जहां बेहोश होने की नौबत आ जाती है। मैंने उसकी सहायता के लिए उससे शिकायत की, ‘हम तो लेखकीय आचार संहिता पर बात करना चाहते थे। तुमने अंधी गली में उतार दिया। आज का दिन तो व्‍यर्थ गया ही।‘

व्यर्थ कुछ नहीं जाता मेरे दोस्त। सड़ी चीजें भी खाद बन कर फूलों के रूप में खिलती है। सड़े विचार भी अपनी सड़ांध से बचने के लिए नई चिन्ताधाराओं और विचारधाराओं को जन्मे देते है।जैसे तुम्हारी सड़ी गली मान्‍यताओं की खाद से कम्‍युृनिज्‍म ने जन्‍म लिया।‘

‘और उसने तुम्‍हें आदमी से खाद में बदल दिया।”’

Post – 2016-04-20

रचनाकार का मोर्चा

‘कलबुर्गी के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है? क्या तुम उन्हें शहीद नहीं मानते। कल तुम जिस तरह बात कर रहे थे उससे लगा तुम उनके बारे में उूंचा खयाल नहीं रखते, या कहें, तुम्हारी राय उनके बारे में अच्छी नहीं है।‘

‘तुम्हारे बारे में राय खराब है तो इसका मतलब यह तो नहीं हो जाता कि तुम जिस किसी का नाम लो उसके बारे में मेरी राय खराब हो जाएगी। कलबुर्गी लेखक कैसे थे यह मैं नहीं जानता। मुझे कन्नड नाममात्र को आती है जिससे मैं अखबार की खबर का एक पैरा भी पूरे एक दिन में समझ पाता हूं, आधा अंदाज से और आधा कुछ जाने हुए शब्दों के सहारे, इसलिए मूल में उनका वह उपन्या‍स पढ़ नहीं सका जिस पर उन्हें पुरस्कृ्त किया गया था और इस हंगामे में यह तक पता नहीं कर सका कि उसका हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है या नहीं।

‘मैं केवल यह कह रहा था कि मृत व्यक्तियों के प्रति सम्मान की हमारी एक लंबी परंपरा है। सामने से गुजरते हुए मुर्दे की जात-धरम पूछे बिना लोग उसे नमस्कार करते रहे हैं। मृत व्यंक्ति के साथ कल्पना से या अपनी जरूरत से कोई कहानी गढ़ कर उसे बड़ा, छोटा या अपने लिए उपयोगी नहीं बनाया जाना चाहिए। वह अपना बचाव नहीं कर सकता, इसलिए उस पर ऐसा अभियोग नहीं लगाया जाना चाहिए जिसका पक्का आधार न हो। ये निष्ठुरता के विविध रूप हैं, परन्तु हाल के दिनों में यही किया जाने लगा है, या कहें, एक खास सोच के लोगों द्वारा, जिनके अध्ययन, ज्ञान और लेखन को देखते हुए उन्हें मूर्ख भी नहीं कहा जा सकता, कुछ पहले से यही किया जाता रहा है, क्योंकि यह चर्चा में आने का छोटा रास्ता रहा है। हाल के दिनों में किसी प्रयोजन से जुड़े व्यक्तियों की लाश को मानवीय बम बनाने के लगातार प्रयत्न हो रहे हैं। मेरी आपत्ति मात्र इससे थी और आज भी है। और तुमसे तो खास तौर से कि मेरे संपर्क में आने के बाद भी तुम दादुर संस्कति से बाहर निकल ही नहीं पाते।

वह मुस्‍कराकर रह गया। कुछ बोला नहीं।

‘कलबुर्गी लेखक किस स्तर के थे, यह निर्णय करना मेरे लिए असंभव है, परन्तु जब तुम तर्कवादी विशेषण लगा कर उनका नाम लेते हो तो उनका अपमान तुम करते हो। तर्कवादी का अर्थ होता है कुतर्कवादी, क्योंकि तर्क सत् तक पहुँचने का माध्यम है, साध्य नहीं, अत: तत्वदर्शी, सत्यान्वेषी, मीमांसक जैसा कोई विशेषण भी उनके कद को छोटा ही करता, पर विशेषण उसका ही विलोम करने की छूट नहीं देता। लेखन और कथन लेखक और वक्ता की सही औकात को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है। जहां विशेष्य (उपमेय) उपस्थित हो या जहां उसकी कृति उपलब्ध हो, विशेषण का प्रयोग उसका और पाठकों का अपमान है। इसका यह मतलब नहीं कि लेखन में तार्किकता का अभाव होना एक गुण है।

‘कलबुर्गी के बारे में जो कुछ मुझे पता है वह स्वत: नितान्त सज्जन और अपने विचारों पर दृढ़ रहने वाले व्यक्ति थे, कुछ कुछ गैलीलियो से प्रेरित जिसने कोपरनिकस की इस मान्य ता को सही ठहराते हुए इतालवी में किताब लिखी कि धरती ब्रह्मांड का केन्द्र नहीं है और यह सूर्य की परिक्रमा करती है, परन्तु जब इस पर अरस्तूवादियों ने आपत्ति की (कुछ लोग मानते हैं कि आपत्ति प्रोटैस्टेंटो ने की थी) और इस पर प्रतिबन्ध लगाने की बात की, तो वह स्वयं पोप को समझाने वेटिकन में पहुँच गए और जब पोप ने उनसे आगे ऐसी बात न करने का आदेश दिया तो जान बचाने के लिए वह इस पर राजी हो गए। फिर उसी पोप ने सलाह दी कि वह एक ऐसी पुस्तक लिखें जिसमें अरस्तूवादियों से कोपरनिकस का तुलनात्मक अध्ययन हो परन्तु सही अरस्तूवादियों को ठहराया जाय। गैलीलियो ने प्राणरक्षा के लिए यह आदेश मंजूर कर लिया। यह पुस्तक इतनी कलात्मक तन्‍मयता से लिखी कि पोप की इन्विजिशन कमेटी ने भी इसे पास कर दिया, पर जब पता चला कि इससे तो कोपरनिकस के विचारों का प्रचार हो रहा है तो फिर वेटिकन में हंगामा मच गया। उनसे कोपरनिकस की भर्त्सना करने को कहा गया तो जान बचाने के लिए इसके लिए भी तैयार हो गए। जान तो बची और सजा भी कम कर दी गई। उन्हें उनके घर में ही आजीवन कैद का दंड दिया गया। उस बन्दी अवस्था में उन्होंने एक दूसरी किताब लिखी और इसे चुपके से हालैंड के एक प्रकाशक के पास भेजने की जुगत निकाल ही ली और इसके प्रकाशन ने भौतिकी के विषय में यूरोपीय वैज्ञानिकों की सोच ही बदल दी और उनके दबाव में वेटिकन भी आ गया। परन्तु यह सब हो सका क्योंकि कोपरनिकस के कैथोलिको से अच्छे संबंध थे। गैलीलियों के तो मित्र ही पोप बन गए थे। परन्तु गोर्डिनो ब्रूनो जो एक दार्शनिक था, अनीश्वरवादी था, कोपरनिकस के उसी सिद्धान्त के बखान के लिए र्इसा से भी अधिक यातना से गुजरा। सन् 1600 में उसे सलीब से बांध कर जिन्दा जला दिया गया जब कि उन्हीं विचारों का प्रतिपादन करने वाली कोपरनिकस की पुस्तक उससे सोलह साल बाद प्रतिबन्धित हुई क्योंकि जैसा कह आए हैं, कोपरनिकस के संबंध भी चर्च से अच्छे थे और इस सोच से अलग वह पक्के कैथोलिक थे।

‘जो मामूली जानकारी मुझे सुलभ साधनों से मिली है उसके अनुसार कलबुर्गी ने वीरशैव मत के संस्थापक, बासव, उनकी पत्नी और बहन के बारे में कुछ अशोभन तथ्यों को उजागर किया था । उनके ये विचार मार्ग में प्रकाशित हुए थे जिनमें बासवेश्वर की दूसरी पत्नीं नीलंबिके के लिखे वचनों की छानबीन के आधार पर उन्होंने दावा किया था कि अपने पति से उनका शारीरिक संबन्ध न था। इसके बाद में उन्हों ने एक दूसरे लेख में वीरशैव संप्रदाय के एक दूसरे कवि चन्निबासव के विषय में लिखा कि बासव की बहन नागमल्लिके का विवाह एक मोची से हुआ था जिससे वह पैदा हुए थेा। इससे लिंगायत संप्रदाय के लोग आहत हुए थे और लिंगायत मन्दिर के प्रधान ने उनको 1989 में बुला कर आपत्तिजनक अंशों को निकाल देने को कहा तो उन लेखों को उन्होंने अपनी पुस्तक से निकाल दिया था।

‘इन्हें निकालने के बाद उन्होंने किसी अवसर पर कहा था कि उन्होंने अपनी जान और परिवार की रक्षा की चिंता से कातर हो कर ऐसा किया था ‘पर ऐसा करके मैंने बौद्धिक आत्महत्या कर ली थी।‘

‘1914 में बंगलूर में एक संगोष्ठीं में अन्धविश्वास निवारण बिल के औचित्य पर बोलते हुए उन्होंने यू आर अनन्तमूर्ति की 1996 में प्रकाशित पुस्तक नग्न-पूजन क्यों गलत है इसके लिए उनके द्वारा अपने बचपन के अनुभव का हवाला दिया था जिसमें उन्होंने एक प्रतिमा पर यह जांचने के लिए पेशाब कर दिया था कि देखें देवता इस पर नाराज होते हैं या नहीं और इसके बाद, कहते हैं, दक्षिणपन्थी संगठनों के लोगों ने दोनों लेखको को धमकाया था। संभवत: यही वह पृष्ठभूमि थी जिससे आतंकित अनुभव करते हुए यू आर अनन्तमूर्ति ने अपना वह बयान दिया था कि यदि मोदी के हाथ में सत्ता आई तो वह इस देश में नहीं रहेंगे। इससे पहले भी कलबुर्गी को जान की धमकी मिली थी और उन्होंने राज्य से सुरक्षा की मांग की थी और उन्हें कुछ देर से ही सही, विशेष संरक्षण दिया गया था, जिसके झमेले के कारण उन्होने अगस्त 2015 में सुरक्षा हटा लेने का अनुरोध किया था और सुरक्षा हटा ली गई थी।

उनकी हत्या एक कृतघ्नतापूर्ण, कायरतापूर्ण और अक्षम्य घटना थी, परन्तु अपराधियों को नैतिकता की कसौटी पर तोलने का कोई अर्थ नहीं, क्योंकि यह उनके परिचित कोश और मूल्य प्रणाली में आता ही नहीं।

एक दृढ़निश्चयी व्‍यक्ति के रूप में कलबुर्गी के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है ,परन्‍तु उनके लिए नहीं जो उन्‍हें मानवबम बनाने केलिए इन तथ्‍यों को छिपा कर आगजनी करते हैं। वह अपनी समझ से एक सामाजिक विकृति से लड़ रहे थे पर अपने औजारों से नहीं लड़ रहे थे। अपने मोर्चे से हट कर दूसरों के मोर्चे पर खड़े थे जहां पवित्रता के लिए जगह नहीं होती और इसलिए उनको शूर मान सकता हूँ योद्धा नहीं। शूर ही मानव बम बन कर अपने को और अपने जैसे ही अनगिनत लोगों को मिटाते हैं, परन्तु उपद्रव या क्षणिक सफलता से आगे नहीं बढ़ पाते।

मुझे पक्का पता नहीं, पर लगता है कलबुर्गी कम्युनिस्टों के संपर्क में आ गए थे जिनके लिए पुराने लक्ष्य की प्राप्ति अब सपना रह गई है इसलिए किसी तरह की उत्तेजना पैदा करना, अशान्ति पैदा करना ही उनके लिए क्रान्ति का पर्याय बन गया है। गैलीलियो जानता था कि एक ध्येय को प्राप्त करने के लिए क्या तरीके अपनाए जा सकते है़। कलबुर्गी को पता रहा होगा, पर कम्युनिस्टों के संपर्क में आने के बाद यथार्थ हवा और हवा जमीन हो जाती है। बेचारे को दूसरों के भड़कावे में आने का कुफल भोगना पड़ा।‘

’क्या यह अच्छा न होगा कि हम इस पर कल बात करें।‘

मैं तुरत राजी हो गया क्याेंकि आगे क्या कहना है यह सूझ मुझे भी नहीं रहा था।

Post – 2016-04-19

कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है (2)

‘तुमने तो मेरे मुंह की बात छीन ली यार। हम तो तुम्हें निरा गावदी समझते थे। हैरानी तो इस बात पर है कि इन्हीं विकृतियों के कारण, इसी पाखंड के कारण तो हम हिन्दु त्ववादियों का विरोध करते हैं, तो तुम्हेंं बुरा लगता है। तुम्हारे दिमाग को सही होने में इतना समय लगा। चलो, देर से ही सही, सही मुकाम पर तो आए। ये लोग तो इतने अहमक हैं कि सही राह दिखाने के अपराध में ही बेचारे तर्कवादीकलबुर्गी को जान से जाना पड़ा।‘

‘तुम पढ़े लिखे गधे हो, और यह तक नहीं जानते कि तुम किसकी गुलामी कर रहे हो। तुम्हेंं धन, मान, यश किसी भी चारे से फंसा कर, तुम्हा रा इस्तेेमाल किया जा सकता है और किया जाता रहा है और तुम्हारी समझ का यह हाल कि तुम इस जाल को देख भी नहीं पाते, अपनी नासमझी पर शर्मिन्दा होने की जगह उल्टें गर्व करते हुए इसका दिखावा भी करते।

तुमने बात शुरू की सच और गलत से, मैंने गलत के पीछे काम करने वाली सीमाओं के उदाहरण दिए तो हिन्दुत्व पर आ गए और इसी में कलबुर्गी को घुसेड़ कर ईर घाट से वीर घाट की ओर रवाना हो गए और आरोप लगाते हो कि विषयान्त‍र मेरे कारण होता है।

देखो जब किसी समस्या पर विचार हो रहा हो तो संवेदनशील उदाहरणों को बीच में नहीं लाना चाहिए इससे उसका तार्किक पक्ष कमजोर पड़ जाता है और भावुकता हावी हो जाती है और उसमें सहमति-असहमति के पूर्वनिर्मित खेम पूरी धमक से बीच में आ जाते है जिसमें तर्क काम करना बन्द कर देता है। दूसरे को गलत होने का प्रमाण दे कर भी तुम गलत नहीं सिद्ध कर सकते इसलिए एक दूसरे का सर फोड़ कर लहू लुहान भले हो जाओ, किसी का कोई लाभ नहीं होता। यदि किसी व्य वह यह क्ति की हत्या का प्रश्न हो और तुम उसकी मूर्खता या भूल को बताने चलो तो सबसे पहले जो बात सुनने वाले को खटकती है वह यह कि तुम भी उसकी हत्या करने वालों या कराने वालों में शामिल हो, या कम से कम उन्हें बेकसूर मानते हो। बहुत कठिन हो जाता है आपकी जिद से आपको विचलित कर पाना, आप समझने के लिए बात नहीं कर रहे होते हैं, अपनी बात मनवाने के लिए दबाव डाल रहे होते हैं और वह दबाव यदि अनैतिक हो तो भी उसे अनैतिक तक मानने को तैयार नहीं होते। कलबुर्गी के मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए ही मैंने कहा था कि इस पर हम बाद में बात करेंगे। इससे पहले इससे जुड़े दुसरे पहलुओं की पड़ताल करेंगे। और यदि समझ सको तो हम लगातार यही करते भी रहे हैं। फिर भी, यदि तुमने उसको भी घसीट ही लिया तो उस पर ही सही।

‘यदि मैं कहूँ कलबुर्गी की हत्या के प्रश्न को देश, काल, सन्दर्भ और औचित्य से काट कर पेश करने वाले हंगामा करने वाले धूर्त लोग हैं और धूर्तता को कला की कसौटी समझते हैं, तो इसे मानोगे ?’

’तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया?’

’मैं जानता था, तुम ऐसा ही कोई उत्तर दोगे? यह बताओ तुमने कभी शतरंज का खेल देखा है?’

’शतरंज मेरा प्रिय खेल है, यह तुम जानते हो।‘

’जानता हूँ और तुमसे यह भी छिपा नहीं है कि मैं इस खेल से घबराता हूँ, क्योंकि इसमें सभी गोटें अपनी अपनी चाल चलती हैं, एक पर दूसरे का नियम लागू नहीं होता। जाहिर है खेल नहीं जानता परन्तु यह जानता हूं कि यदि कोई अगले खिलाड़ी की आंख में धूल झोंक कर उसकी गोट इधर उधर सरका दे तो नतीजा क्या होगा। जिसको ऐसी घटिया तरकीब अपनानी पड़ी वह लगभग हारा हुआ था। अपने को बचा नहीं सकता था। पर अब पर जीत उसी की होगी। अर्थात् यहां का वहां कर देना और इसके बाद जो मर रहा था उसे बचाना और जो बचा हुआ था उसे मारने जैसा हुआ। व्यक्ति को वहां रख दो, क्योंकि होते तो वे विभिन्न हैसियतों वाले इन्सानों के ही प्रतीक, तो बचने वाले को मारना, मरने वाले को बचाना हुआ। अपराध के सिरे से अपराधी को बचाना और एक निर्दोष व्यक्ति को अपराधी करार देना हुआ। शतरंज के खिलाड़ी हो तो इतनी बात तो मानोगे ही।’

वह उलझन में पड़ गया। असहमत होना संभव न था इसलिए अनमने स्वर में बोला, ‘चलो मान लिया।‘

‘जो बात व्य़क्ति के साथ हुई वही किसी दल, संस्था , देश, समाज या सभ्यता के साथ भी हो सकती है। यानी, इनके बीच एक के कारनामे संचार माध्यमों और विचार माध्यमों को धूल झोंकने के काम पर नियुक्त करके बड़े पैमाने पर भी हो सकते हैं। स्था‍न की हेर फेर जैसे ही परिणाम कालगत हेरफेर से भी हो सकते हैं।‘

वह एक क्षण को ठिठका, फिर कुछ और आजिज आए स्वर में कहा, ‘हो सकता है यार, तुम्हारा सिद्धान्त निरूपण सिर माथे, इसके आगे भी तो बढ़ो।‘

बताओ ‘कलबुर्गी की हत्या कहॉं हुई थी, वहां का शासन किसके हाथ में था? वहां की कानून व्यवस्था के लिए कौन उत्तरदायी था? ‘

‘तुम जानते हो।‘

’जानता हूं, पर तुम इसे छिपाते हो इसलिए तुमसे कबूल करवाना चाहता था।‘

वह झुंझलाया तो, पर चुप रहा।

मैंने कहा, ‘चलो, इसका उत्तर देने में तुम्हें असुविधा हो रही है। इसे छोड़ देते है। पर यह बताओ जिस प्रशासन में दाभोलकर और पनसारे मारे गए थे वह किसका था? उस समय वहां की कानून व्यवस्था के लिए कौन जिम्मेरदार था?’

अभी कुछ और सवाल हैं। आज कल पुरस्कारों की भीड़ लगी हुई है। इस हद तक कि पुरस्कृत होना गले में तौक लटकाने के समान हो गया है। पुरस्कार तो चार पांच मुझे भी मिले पर मेरे परिचय में कहीं उसे स्थान नहीं मिलेगा। फिर भी क्या रचना को जिन भी कारणों और बाध्यताओं के तहत पुरस्कृ त किया जाता है, उनमें यह व्यक्त या निहित रूप में प्रतिश्रुत होता है कि हम इस नायाब लेखक के किसी भी लेख या विचार की जिम्मेदारी लेते हैं और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी मेरी है। मैं नहीं जानता नोबेल समिति ऐसा करती है या नहीं, कोई और ऐसा करता है या नहीं, और लेखक पर आगे जो भी बीते उसके लिए कार्रवाई करने का दायित्व उस पर आता है या नहीं, तुम अधिक जानते हो। इतना तो बता ही सकते हो।‘

वह चुप रहा।

‘लगता है तुम भी सहमत हो कि कानून और व्यवस्था पुरस्कार देने वाली संस्थाओं के अधिकार में नहीं है और हो भी तो लेखक के सभी विचारों और कारनामों की जिम्मेदारी पुरस्‍कार देने वाले नहीं लेते। यदि तुम इससे सहमत नहीं हो तो साफ बता देना।

अब उसके लिए बैठना भी मुहाल हो गया। उसने घोषणा कर दी, ‘मैं जा रहा हूँ।‘ वह उठ रहा था कि मैने उसका हाथ पकड़ कर बैठा लिया, ‘देखो, उधर, उस बेंच पर बैठे कुछ लोग हमारी ओर ही देख रहे थे। उनको हमारे शब्द सुनाई पड़े हों या नहीं, चेहरे की रंगत हो सकता है दिखाई पड़ रही हो। तुम उठ कर जाओगे तो वे सोचेंगे, ‘हार कर जा रहा है।‘ मैं तुम्हारी इज्जत बचाने के लिए कुछ देर बैठे रहने की और अपनी मुख मुद्रा सही करने की सलाह देता हूँ।‘

वह बैठ गया।

मैंने कहा, ‘सब कुछ स्वाभाविक लगे इसलिए इस बीच हम कुछ सोचते विचारते भी रहें तो अच्छा रहेगा।’

वह बैठ तो शान्ति से गया, पर मेरे प्रश्ने की अनसुनी कर दी।

’अब हम यदि एक निरपेक्ष और नि:संग चिन्तक की तरह उपलब्ध सूचनाओं और आंकड़ों का विश्ले षण करते हुए किसी नतीजे पर पहुंचना चाहें तो, इसके निम्न फलागम निकलते हैं:
1. कांग्रेस शासन में बुद्धिजीवियों का संकट बढ़ जाता है और इसके लिए आपात काल का होना या न होना भी माने नहीं रखता।
2. बुद्धिजीवी उस शासन में इतना डरा रहता है कि वह मारा जाता है तब भी कानून व्यवस्था को उत्तरदायी कहने का साहस नहीं जुटा पाता है।
3. चालाक बुद्धिजीवी सत्ता के भय, प्रलोभन या या सुविधाओं की तलाश में उसे आश्रयदाता मान लेते हैं और अपना स्वत्व और स्वााभिमान बेच कर अवसर का उपयोग और अहंकार का प्रदर्शन करते हैं।
4. तुम जिनको कलाकार, साहित्ययकार, विचारक मान कर उनकी संख्या गिनने लगते हो, वे जरखरीदों की जमात का हिस्सा बन चुके होते हैं। अपने गोत को बढ़ते देख गर्व भी अनुभव करते हैं, परन्तु उनके बारे में पता लगा कर बताओ कि क्या उनमें कोई ऐसा भी है जो सीधी या उल्टीे नाक पकड़ने की कवायद करते हुए कांग्रेस का टुकड़खोर नहीं बन गया था। कुछ तो होंगे ही, मैं केवल उनका नाम जानना चाहता हूँ।

वह भड़क उठा। तुम मुझे टुकड़खोर कह रहे हो ? मैं मैं’ वह आवेश में इतना असंतुलित हो गया कि मैं-मैं में-में के रूप में सुनाई देने लगा और वाक्य पूरा ही न हो पाया।

मैंने उसकी मदद करनी चाही, ‘मुहावरे कुछ खुरदरे होते हैं, और सच कहो तो खुरदरी जिन्दगी जीने वालों के द्वारा ही बनाए जाते हैं। इनका बुरा मत मानो, पर इस प्रश्नो का उत्तर अवश्य तलाश करो कि जिन्होंने भूत-प्रेत-पिशाच- निशाचर को रोग निवारण का उचित तरीका माना वे हिन्दू समाज से ले कर दूसरे सभी समाजों में रहे हैं या नहीं और एक समय सभ्यता की परिभाषा ही यह रही है या नहीं कि उसमें अन्धविश्वास और वशीकरण के कितने चोर दरवाजे बनाए गए हैं? आज भी वह बहुत अधिक बदली नहीं है, अभी मदर टेरेसा को संत घोषित किए जाने के लिए यह पता लगाया जा रहा था कि उन्होंने कितने चमत्कार किए हैं, किए भी हैं या नहीं।‘

परेशानी उसके माथे से पसीना बन कर चू रही थी। बोलने के लिए सही इबारत नहीं मिल रही थी। मैंने इस बेचैनी का उपयोग करते हुए कहा, ‘यह भी पता लगाना कि क्यों मोदी के शासन के साथ इस तरह की घटनाएं बन्दं हो गई हैं या कम हो गई हैं और बोलने का पहला अवसर पाते ही उस जमाने की सारी गन्दगी जिन्होंने सहेज कर रखी थीं वे उसके सिर डालने की कोशिश क्‍यों कर रहे है जिसने उन्हें प्रलोभन और भय से मुक्ते करके स्वतंत्र हो कर अपने विचार प्रकट करने का अवसर दिया। क्या ऐसे बुद्धिजीवियों का बुद्धि से कोई संबंध रह गया है। कलबुर्गी की पड़ताल हम कल करेंगे।

Post – 2016-04-18

कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है

‘तुम दिन में कितनी बार सच बोलते हो और कब, कोई हिसाब रखते हो?’

‘याद नहीं आज से कितने साल पहले कोई झूठ मेरे मुंह से निकला हो।, निकला तो होगा, मनुष्य जो ठहरा परन्तु झूठ बोलने का तो सवाल ही नहीं उठता।’

‘जानते हो ऐसों को क्या कहते है? पैथोलोजिकल लायर, झूठ बोलने का मनोरोगी, हैबिचुअल लायर, आदतन झूठ बोलने वाला। वह सच बोलता नहीं और यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि वह कभी झूठ बोलता है। जिसके बारे में जो आया बक जाते हो सोचते भी नहीं कि इससे तुम्हारे बारे में लोग क्या राय बनाएंगे। बोलते समय सोच कर बोला करो, झूठ का प्रतिशत कम होने लगेगा।‘

’यही तो वह बारीक फर्क है हमारे तुम्‍हारे, कहो, सच और झूठ में। सच सहज मुह से निकल जाता है, जो देखा और समझा है उसके अनुपात को घटाए-बढ़ाए बिना, सन्दर्भ में हेर-फेर किए बिना कह देना होता है। इसके लिए साहस की जरूरत होती है, कई बार अपने आप से, अपने हितों से टकराना होता है।, बहुतों से संबंध बिगड़ जाते हैं, नौबत जान बचाने और जान से जाने के दो विकल्पोंप में से एक की रह जाती है। पहले को चुनने के साथ तुम मर जाते हो, दूसरे के बाद तुम मार दिए जाते हो। परन्तु झूठ को सच बनाने के लिए सोचना होता है, कहानियॉं गढ़नी होती हैं, और इसके बाद भी चालाक से चालाक झूठा और उसका वकील अपराधियों की तरह कुछ कडि़यां ऐसी छोड़ जाता है कि उसका झूठ पकड़ में आ जाता है।’

और जानते हो, झूठ की एक और पहचान है। उसके पास तर्क नहीं होता, कहानियां होती है और दूसरों पर आरोपित करके उस प्रहार से बने सुरंग के माध्‍यम से अन्‍य देशों और समाजों में पहुुंच जाना भी। इसलिए उन्हें अपने दावे अधिक जोरदार ढंग से करने होते हैं, और वह जोर ही उसके झूठ होने का प्रमाण बन जाता है, जैसे यदि कोई कहे, ‘हां हां मैं अपने बाप का ही बेटा हूँ’ तो आप मान लेते हैं कि कहीं कुछ गड़बड़ है और इसे यह व्यक्ति भी जानता है और उसे छिपाने की कोशिश कर रहा है। इसीलिए कीर्तन-भजन, पाठ और पूजा करने कराने वालों के विषय में मेरी मोटी राय है कि इनमें सच्ची भक्ति और निष्ठा का अभाव होता है और ये प्रदर्शनीय धर्मश्रद्धा की आड़ में जघन्य से जघन्य अपराध कर सकते हैं या इनका यह दिखावा जघन्य अपराधों की मनोग्लाोनि से मुक्ति का उपाय होता है जिसे क्षतिपूर्ति कहा जाता है। परन्तु एक विचित्र बात यह कि ये धर्मभीरु और मन के ‘सरल’ होते हैं, धर्म और निष्ठा को केवल वहीं भूल जाते है और यह भी मनोरुग्णता की अभिव्यक्ति के रूप में जिसके प्रति वे सावधान तक नहीं होतें, जहाँ लाभ और लोभ सभी मूल्यों और आदर्शों पर हावी हो जाते हैं और उनके इस प्रकोप को समझने में स्वयं उनसे भी भूल होती है।

‘ क्षतिपूर्ति के तरीके, दान दक्षिणा और धर्म-कार्य के तमाशे इसी से पैदा होते हैं जिसमें चरितनायक अपने चरित्र को ढकने के प्रयत्न में अपने ही मनोजगत का आवरण बन जाता है। तुम जानते हो ठगों का इतिहास। एक ओर वे विष्‍णु के उन्‍हीं पर्यायों – दामोदर, नारायण और वासुदेव – के संकेतों से उस व्यतक्ति की हत्या कर देते थे जिसके विषय में उन्हें यह अनुमान होता था कि उसके पास कुछ धन है और दूसरी ओर शक्ति के इतने नैष्ठिक उपासक होते थे कि अपने को सच्चा उपासक सिद्ध करने के लिए वे अपना सिर भी चढ़ा सकते थे। मेरे परिचितो-मित्रों में बहुत से पूजा-पाठ करने वाले, उसका नगर ढिढोरा पीटने वाले, व्रत रखने वाले, पांचो नमाज पढ़ने वाले सभी हैं और मैं यह सोच कर कि उनका दिल न दुखे उनकी आलोचना नहीं करता, परन्तु उनकी धर्मनिष्ठा और सत्यानिष्ठा पर विश्वास भी नहीं करता।

मेरा ध्यान उनके कथन पर नहीं, उनके कथन और कृत्य की संगति पर होता है। उसका अभाव देख कर उनको सहन करना होता है परन्तु बहुत से ऐसे काम है जिनकी प्रकृति धर्मवाह्य होती है और उनमें ऐसे लोगों के सहयोग की जरूरत होती है। हम किसी ऐसे दुश्मन से लड़ रहे होते हैं जिनमें वह हम सबको धर्म, लिंग, जाति निरपेक्ष रूप में दोहन कर रहा होता है और उस स्थिति में ये सभी हमारे अपने हो जाते हैं। अन्या्य के विरोध में इनका अपना हो जाना कोई छोटी उपलब्धि तो नहीं।‘
(कल पूरा करेंगे इस लेख को)।

Post – 2016-04-17

17 अप्रैल
मौन भी गूॅजता है
तुम जब आवेश में होते हो तो तुमको छेड़ना सींग ताने सांड के सामने खड़ा होने जैसा खतरनाक लगता है। बहस का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। हर बार तुम अपने को ही सही साबित करते हो, और फिर भी कहते हो जीतने की फिक्र में हम रहते हैं।

‘यह तो तुम्हा्रा दुर्भाग्य है कि तुमने पक्ष ही ऐसा चुना है जिसके पास औचित्य नहीं है, तर्क नहीं है, अपने पांवों पर खड़ा हो पाने की शक्ति नहीं है और परनिन्दा् पर जिन्दा रहतेे हो। पैशुनी वृत्ति है, तुम्हारी। तुम्हा्रा सबसे प्रिय कोश लेक्सिको फासिस्टकस है उसी में से भारी भारी विशेषण निकालते हौ और उन्हें दूसरों पर फेंकना चाहते हो लेकिन भारीपन के कारण वे उछल कर तुम्हारे उूपर ही आ गिरते है। मैं तुम्हें बचाना तो चाहता हूँ, यह भी चाहता हूँ कि तुम जीत जाओ पर जीत थाली में परोसी तो जाती नहीं। तुमतो हारने की पूरी तैयारी के साथ दहाड़ते हुए मैदान में उतरते हो। अभी मैं लहक के अंक देख रहा था, बड़ी सार्थक और आज के समय में जरूरी पत्रिका है। लिखने वाले जैसा सोचते हैं वैसे ही लेख भी मिलेंगे, परन्तु इसकी विशेषता है भावोछ्वास की जगह तार्किक बहस की दिशा में बढ़ा जाय जिससे लिखने और पढ़ने वाले दोनों की समझ सुधरे। परन्तु उसमें भी लेखक बहुत डरे हुए लग रहे हैं। सभी सभी से या लगभग सभी से और सबसे अधिक भाजपा के आज के शासन से। एक कहानीकार ने अपने लेख का शीर्षक ही रखा है ‘हम सब लेखक डरे हुए है’।
‘ऐसी इबारतें पढ़ने पर लोगों को हंसी आती है।’

‘क्यों, इसमें हंसने की क्या बात।’

‘एक हो तो समझाउूुं। कहते हैं उूंट की शक्ल ही ऐसी बेडौल है कि वह जिस भी करवट बैठे, हंसी को दबाना पड़ता है। पहली हंसी इस बात पर आएगी कि लेखकों में इतना सामरस्य आ गया है कि उनमें से कोई सभी के मन की बात जान चुका है और सभी की ओर से बयान दे सकता है और यह उम्मीद कर सकता है कि लोग इसे सच मान लेंगे। यह अपने को असाधारण प्रतिभाशाली और लोगों को मूढ़ समाझे बिना संभव ही नहीं है।

‘संपादक से मैंने पूछा कि भई ऐसे लेखों पर अपनी प्रतिक्रिया में जो लोग हंसते हैं उसे क्यों नहीं छापते तो कहा उसके ग्राफिक्स तैयार होने को दे दिए है, अगले अंकों में वह भी छपने लगेगा।’

वह विनोद में शामिल होते हुए बोला, ‘तुम जैसों की बीच सड़क ताजपोशी की जानी चाहिए। इसके अलावा कोई इलाज नहीं।’

मैं हत्प्रभ नहीं हुआ, बोला, ‘मैं जानता था डरा हुआ आदमी दुबक कर, सांस रोक कर, छिप कर बैठता नहीं है वह डर कर लोगों को पीटने लगता है और, जानते हो, लोगों को तुम्हारे इस शक्तिशाली डर के चरित्र का पता चल जाता है इसलिए वे तुम लोगों पर भी हंसते हैं और डर की तुम्हारी परिभाषा पर भी, और इस बात पर भी कि जिसके आने से पहले से ही तुम इतना डरे हुए थे कि दुनिया को बता रहे थे ‘कयामत को रोको, बढ़ी आ रही है’ पर रोक नहीं पाए, क्योंकि वह तुम्हारी मिली भगत से फैले भ्रष्टाचार के खुलासे से पैदा वैकुअम को भरने के लिए चली आ रही थी, कयामत बन कर नहीं सलामत बन कर, इसका दावा करते हुए।

‘लोग उस समय तुम्हारी बातों में नहीं आए पर तुम्हारे बोलने से पूरी तरह बेअसर भी नहीं रहे, झिझक तो गए ही थे। फिर धीरे धीरे भूल गए थे उस हाहाकार को जो तुमने तब मचाया था। अब जब तुम डरने की बात करते हो तो वे तुम्हारे डर की असलियत का इतिहास समझ कर भी हंसते हैं। और अगर तुमने अपने अपने राम पढ़ा है तो उसमें राम को सत्ता से वंचित करने के खेल में जिन लोगों ने जी जान लड़ा दिया था वे डर जाते हैं कि सत्ता में आने के बाद वह उनसे बदला लेंगे। वह बदले का इरादा तक नहीं रखते, उनके हितों का ध्यान रखते हैं, पर उन पर यह प्रकट भी कर देते हैं कि वह जानते हैंकि उन्हों ने उनके साथ क्या किया था और आज भी क्या सोच और कर रहे हो। उनके शत्रु इस बोध से ही उससे अधिक त्रस्ते और अपमानित अनुभव करते हैं जितना वास्तव में उत्पी्डित और अपमानित किए जाने पर अनुभव करते। यह उपन्यास लिखते समय मेरे मन में कहीं नही था कि ऐसा कोई शासक भारतीय राजनीति में आएगा जो इसी नीति का अनुसरण करेगा।

‘जिन लोगों ने उस उपन्यास को पढ़ रखा है उन्हें लगता है डरे हो भी सकते हैं, परन्तु सहानुभूति डरने वाले के प्रति पैदा नहीं होती क्योंकि डराने वाला ही क्षमादान देता दिखाई देता है, इसलिए वे ऐसी कातरता से अविचलित हो कर ऐसों के प्रति ऐसे स्नेनह संबंध जोड़ते हुए हँसते हैं जिसके लिए दहेज की जरूरत पड़ती है।’

ऐसे प्रहार पर तिलमिलाने का उसका हक बनता था। उसकी मुखमुद्रा देख कर ही मैं बचाव की मुद्रा में आ गया, ‘देखो, हमारा अपने उूपर ही जब वश नहीं चलता तो लोक के विषय में तो कहा ही जाता है कि वह निरंकुश होता है। मेरी सहानुभूति तुम्हारे साथ है और विवशता अपने साथ। यह बताओ, यदि सच्चे मन से मैं तुम्हारी कोई मदद करना चाहूं और कुछ सलाह दूं तो उस पर ध्यान दोगे?‘

वह कुछ बोला नहीं, उलझन में मेरी ओर देखने लगा।

मैंने कहा, ‘मैंने तुम्हारी जन्मकुंडली और कर्मफल तालिका कई बार तुम्हें अपनी नियति से अवगत कराने के लिए बनाई भी है, तुम्हें दिखाई भी है। कमजोर दिमाग के हो इसलिए भूल गए होगे। अब तुम्हें याद दिलाउूं कि तुम क्रान्ति और रिवोल्यू‍शन का अन्तर तक नहीं जानते । परिणति में दोनों एक हैं पर अवधारणा अलग है। क्रान्ति का अर्थ है एक सीमा रेखा को पार करके दूसरे क्षेत्र में चले जाना, रिवोल्‍यूशन में चक्कर खाने और उलट देने का आशय जुड़ा है। तुम उलटफेर को आगे बढ़ने, एक सीमा रेखा को पार करके दूसरी में प्रवेश करने और आगे बढ़ने का क्रम उसके चरम तक जारी रखने से अधिक जरूरी समझते हो। तुम पहले की चीजों और उपलब्धियों को बचाने की चिन्ता करते हुए अपने को समृद्ध नहीं करते, नया संसार बसाएंग, नया इंसान बनाएंगे के आवेश में अपनी परंपरालब्ध पूँजी को उसकी विकृतियों के साथ उसी तरह स्वांहा कर डालते हो जिस तरह ईसाइयत के सत्ताधारियों ने अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए किया था।

‘मेरी पहली सलाह यह है कि तुम अपनी भाषा को समझो, उसमें बोलना सीखो, उसके माध्यम से अपने समाज की मानसिक बनावट को समझो और फिर अपने समाज के साथ संपर्क साधो। यह उस यथार्थवाद की पहली कड़ी है जिसको समझे बिना ही लोगा यथार्थवाद पर पुस्तकें लिख डालते हैं और वे पुस्तकें किसी के काम नहीं आतीं, सिर्फ उनकी महिमा बढ़ाने के काम आती है कि उनके नाम यह भी एक पुस्तक है।

‘दूसरी सलाह है तुम सोचने की आदत डालो, और सोचने के लिए जरूरी है कि अधिकारी विद्वानों या बहुसंख्य जनों के विचारों से अप्रभावित रह कर वस्तुस्थिति पर विचार करो। पूरा हिन्दू समाज मानता है कि गंगाजल अमृतोपम है, इससे प्रभावित हो कर उस गंगाजल को पीने से बचों जो गन्दा जल हो चुका है । अपने विचार बन्धुओं और विश्वास बन्धुओं के दबाव में मत आओ। ऐसा करते ही तुम अकिंचन हो जाते हो, जिसके पास दिल, दिमाग, विचार और राेटी कपड़़ा कुछ नहीं है।

मेरी तीसरी सलाह दूसरी से जुड़ी हुई है। यह मत सोचो कि बहुत सारे लोग एक साथ मिल कर एक तरह के विचारों का समर्थन करें तो इसका मतलब यह है कि वे सोचते भी हैं। सोचना-समझना एक निजी काम है, मैंने यह कई बार दुहराया है, पर तुम्हारे सारे काम यूनियन बना कर होते है और उसके नियमों केा मान लेने के बाद उनसे असहमति तक गद्दारी समझी जाती है जब कि उनका सही पर्याय अंग्रेजी के फूल्स पैराडाइज मुहावरे में ही मिला सकता है।

‘ मैं कहता हूँ तुम एक नए मार्क्सकवाद की जरूरत को समझो। उस कविता को तो हजारों, लाखों, करोड़ों बार दुहराया गया होगा हम उसे फिर दुहरा देते हैं और वह भी अपनी याददाश्त के बल पर नहीं, लहक अंक 26-27 संयुक्तांक मे शैलेन्द्र चौहान के एक लेख के अन्त में उद्ध़ृत पा कर। कविता निम्न प्रकार उद्ध़ृत है जो ठीक ही होगा:
जब नाजी कम्युनिस्टों के लिए आए
मैं खामोश रहा।
क्योंकि मैं कम्यु‍निस्ट नही था
जब उन्होंने सोशल डेमोक्रैट्स को जेल में बन्द किया
मै खामोश रहा
क्योंकि मैं सोशल डेमोक्रैट नही था
जब वो यूनियन के मजदूरों के पीछे आए मै बिल्कुल नहीं बोला
क्योंकि मैं मजदूर यूनियन का सदस्य नहीं था
जब वो यहूदियों के लिए आए मैं खामोश रहा
क्योोकि मैं यहूदी नहीं था
लेकिन जब वो मेरे पीछे आए तब बोलने के लिए कोई बचा नहीं था
क्यों कि मैं अकेला था।

इसका पाठ बहुत सरल है। इसका एक भारतीय पाठ बनता है, कहीं का पत्थर कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा। और तुम्हारा वैचारिक आधार भानुमती का पिटारा और तुम्हारे हमखयाल भानुमती के कुनबे में ही आते हैं जिनका यथार्थ से कोई मेल नहीं बैठता।

” जैसे बच्चों को कुछ राइम रटा दिए जाते हैं और लोग लंबी प्रतीक्षा करते हैं कि उनके बाल बच्चे होंगे तो उन्हें भी वे वे ही लोरियां सुनाएंगे और रटाएंगे और इसके आधार पर यह सिद्ध करेंगे कि मेरा लाड़ला कितना होनहार है। वैसा ही कुछ तुम करते आए हो। पहले लाेगों को बाध्‍य करो कि वे सोचे समझे बिना जिसे तुम नाजी कहो उसे नाजी मान लें और फिर घबराहट में अपने अंत से बचने के लिए जिस को तुम नाजी कह चुके उस पर टूट पडें। पर बार बार इस राग को सुन कर उनके मन में तुमसे उूब पैदा होती है।

‘भारतीय सन्द र्भ में इसकी एक पैरोडी भी बनती है। सुनने का साहस है?’

उसके चेहरे से लग रहा था कि वह मेरी बातों से उूब रहा है परन्तु जब चुनौती पेश आ गई तो पीछे कैसे हटता, गो बोला हंसते हुए ही, ‘सुनाओ। उसे भी सुन लेंगे।‘

तुमने जब देश के विभाजन का समर्थन किया हम चुप रहे, समझ न सके कि यह हुआ कैसे है
तुमने जब गोलियों से दुनिया को बदलने के उत्साेह में
हमारी बोली तक हम से छीन ली
हम चुप रहे
क्योंकि हमे गोली की मार और बोली के असर का अन्दाज न था,
जब तुमने मजदूरों के हित में मिलों और कारखानों को बन्द करा दिया
हम चुप थे
जानते नहीं थे पसीने और पेशाब की गन्ध का अन्तर
बहा दोनो रहे थे पसीना हम और …
तुमने यूनियनबाजी में कारोबार को चौपट किया
अर्थतन्त्र को पंगु बनाया
शिक्षा को नष्ट किया
विचारकों को संघबद्ध करके राजनीतिज्ञों का अखाडि़या पहलवान बना दिया
हम चुप थे
इस आशा में कि कोई तो लिखेगा हमारा हाल
अब जब तुम अपने दशकों पुराने नारे को दुहराते हुए संकटमोचन बनने का नाटक करते हो,
हम चुप है
क्योंकि तुम्हा री सलाह मान कर बोलना तक भूल चुके हैं।

Post – 2016-04-16

हम न अपने हुए न अपनों के

‘अम्बेडकर दिवस पर कार्यक्रम तो अनेक हुए लेकिन सबसे मजेदार था जेएनयू की छात्राओं का मनुस्म़ृति के पन्ने जलाना। मुझे तो बहुत मजा आया, तुम्हें कैसा लगा?

‘तुम बता सकते कि कितने ग्राम या कितने मिलीलिटर मजा आया तो मैं उसको दूना या तीनगुना करके अपने मजे का हिसाब दे पाता। तुम तो सारे काम लगभग करते करते रह जाने वाले अन्दाज में करते हो।’

‘हैरान हूँ तुम्हें भी मजा आया इसमें। तुम तो कई बार मनुस्मृति की तारीफ कर चुके हो और जिसने भी तुम्हें पढ़ा या सुना होगा तुम्हें मनुवादी मानता होगा। तुम अपने मजे की बात झेंप मिटाने के लिए तो नहीं कर रहे हो?’

‘देखो, तुम मोदी को गाली देने के आदी हो इसलिए यह नहीं देख पाए कि अच्छे दिन आने के उनके वादे कितनी तेजी से पूरे हो रहे है। महिला सशक्तीेकरण, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अब नारा ही नहीं रह गया है। दो साल के भीतर देखो तो महिलाऍं वह काम करने लगी हैं जिसे इससे पहले कभी किया नहीं। भूमाता का ब्रिगेड बना कर शनि के मन्दिर में स्त्रियों के लिए वर्जित क्षेत्र में प्रवेश का अधिकार हो, या शबरी माला मन्दिर में प्रवेश हो या सेना में प्रवेश हो या मनुस्मृति दहन हो, ये सारे आयोजन महिलाओं द्वारा पहली बार हो रहे हैं। इससे मुझे तो मजा आना ही था और कई गुना आना था, तुम जानते हो मैं किसका वकील हूँ। लेकिन मजा थोडा किरकिरा हो गया।’

उसके चेहरे पर थोड़ी देर पहले झुंझलाहट आ गई थी। मजा किरकिरा होने की बात सुनते ही चमक आ गई। अभी वह कुछ बोलने की तैयारी कर ही रहा था कि मैं उससे पूछ बैठा, ‘लेकिन तुम बताओ, तुम कब से मोदी के भक्त बन गए और मोदी की योजनाओं की सफलता से तुम्हें कैसे मजा आने लग गया?’

कुछ देर के लिए वह कामा में चला गया। कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या कहे। दो चार डुबकियों के बाद बाहर निकला तो आवाज में आत्माविश्वास लौट आया था, ‘तुमको यह पता नहीं कि यह सब मोदी के विरोध में किया जा रहा था, भाजपा की मनुवादी मानसिकता के विरोध में।‘

‘यदि इसकी योजना तुम लोगों ने बनाई हो तो मैं तुम्हारी बात मान लेता हूँ। मैं तो, तुम जानते हो, आधी बातें जानकारी के आधार पर कहता हूँ आधा अनुमान के आधार पर, लेकिन कभी जानबूझ कर हेराफेरी नहीं नहीं, पहली बार यदि कुछ घटित हो तो औचित्य यह कहता है कि इस बात पर ध्यान दो कि वह कौन सी नई बात हुई है जिससे पहली बार कोई घटना या क्रिया सामने आई है तो मुझे अकेला यही कारण दिखाई दिया। सत्ता का परिवर्तन। फिर यह दिखाई दिया कि पहले आठ मार्च को जेएनयू के विद्यार्थी परिषद के पुराने छात्र नेताओं ने मनुस्मृति के पन्नों की फोटो कापी जलाई और अगले दिन इस समय के विद्यार्थी परिषद के छात्रनेताओं ने यही किया जिसके लिए उनसे जवाब भी तलब किया गया, और इन दोनों में तुम्हारे लोग साथ नहीं थे, तो मैंने सोचा ये छात्राऍं विद्यार्थी परिषद से जुड़ी हों या नहीं, परन्तु मोदी के आह्वान से ही प्रेरित रही होंगी। इसे नकारने के लिए तो पक्का सबूत चाहिए। यदि तुम्हें इस बात की पक्की जानकारी हो कि यह सब तुमने कराया था तो मैं तुम्हें प्रमाण मान कर इसे मोदी को हटाने की मुहिम का हिस्सा मानने को भी तैयार हूँ। सत्य की खोज करने वाले को प्रमाण के विरुद्ध जाने का साहस हो ही नहीं सकता। लेकिन मेरी नजर में भी कुछ तो कमी रह ही गई थी। न तो एबीवीपी के बन्दों में इतनी अक्‍ल कि कौन सी चीज कैसे जलाई जाती है, न तुम्हारी ब्रिगेड की महिलाओं में जो आन्दोलन तो कर रही होंगी मोदी को हटाने की और उसका नतीजा होगा पुजारिनों की संख्या में बढ़त और उस मानसिकता के विस्तार में मदद जिसको तुम मिटाने पर आमादा हो।

‘और जहॉं तक महिलाओं द्वारा मनुस्म़ृति को जलाने की बात है, यह तो उस पुरानी मान्यता की पुष्टि करने जैसा हुआ जिसमें लोग यह विश्वा‍स करते थे कि महिलाओं में अक्ल कुछ कम होती है। और उस कहावत को जानते हो, जो महिलाओं के बारे में चीन में प्रचलित थी। वे मानते थे कि महिलाओं में आत्मा ही नहीं होती। तो महिलाओं को किसी काम पर लगाओ तो सबसे पहले खुद तैयारी कर लो कि उन्हें किस मोर्चे पर किस तैयारी के साथ लगाना ठीक रहेगा, लेकिन इसके लिए पहले खुद अपना दिमाग सही रखना होगा जो है ही नहीं।

‘तुम लोग सोचने समझने की क्षमता खो चुके हो, जुआड़ियों की तरह बाजी जीतने के लिए तरकीबें सोचते हो, जुए की लत से होने वाले समय, धन के अपव्यय और नैतिक गिरावट पर सोचने की जरूरत ही नहीं समझते, इसलिए तुम तथ्यों को आधा छिपाते और आधा दिखाते हो, उनमें घाल मेल करते हो। जुआडियों का ध्यान जिस ओर नहीं जाता उस ओर दूसरों का ध्यान गए बिना रह नहीं पाता इसलिए तुम्हारे और जनसाधारण के आकलन में इतना अंतर होता है कि जनवाणी तुम्हें मृत्युघोष बन कर सुनाई देती है।

मैं अपने रौ में होता हूँ तो भूल जाता हूँ कि अगले पर क्या बीत रही है। उसने बोलने के लिए बीच में कई बार मुंह खोला पर मुझे रुकता न पा कर चुप लगा गया था, अब चुप हुआ तो उसने कहा, ‘अब तुम्हारे स्टीम का दबाव कम हो गया हो तो मैं कुछ सीधे सवाल करूँ?’

बोलते बोलते मेरा गला सूख चला था। मैंने इशारे से ही कहा कि वह अपने सवाल करे।

उसका पहला प्रश्न धमकी का था, ‘महिलाओं के बारे में जो टिप्पणी तुमने की है उस पर महिला आयोग तुम्हे अपनी अदालत में तलब कर सकता है?’

मैंने जवाब देना उचिन न समझा, इशारे से कहा, और कुछ?

‘तुम को हमारे तरीके में कौन सी कमी दिखाई दी ?’

मैंने वही तरीका अपनाया, ‘और कुछ?’

’तुम नारों के पीछे मत जाओ, क्या तुम नहीं मानते कि मनुस्मृतति में शूद्रों के लिए तो आपत्तिजनक और घृणित बातें कही ही गई हैं, स्त्रियों के विषय में भी बहुत सी बातें आपत्तिजनक है और इसलिए छात्राओं का मनुस्मृति को जलाना सर्वथा उचित था? फिर तुम स्वयं उनके इस कृत्य का, चाहे जिनके भी समझाने पर मान बैठे कि जो उन्‍होंने किया उसे गलत ठहराना मनुवाद का प्रमाण नहीं है।‘

अब मुझे बोलने में कोई असुविधा नहीं थी, इसलिए जब इस बार कहा, ‘और कुछ ?’ तो वह जिसका आत्मविश्वास प्रत्येक प्रश्न के साथ रिक्टर पैमाने पर उछलता जा रहा था, यह देख कर कि उसके प्रहार का मुझ पर कोई असर हुआ ही नहीं, एक दम नीचे आ गया। उसने हारे हुए से स्वर में कहा, ‘और कुछ नहीं।‘

मैंने कहा, ‘देखो, पहले तो मुझे यह स्वी्कार करना चाहिए कि मैं आवेश में आ गया था, नहीं तो, इतनी लंबी तकरीर न झाड़ देता। यदि एक-एक बात पूरी करने के बाद तुम्हारी प्रतिक्रिया जानने के लिए रुकता तो तुम कायदे के सवाल भी कर सकते थे, और मैं उनका सटीक उत्‍तर भी दे सकता था। तुमने जो सवाल किए वे जान बचाने के लिए किए, जिनसे मुझे कोई लाभ न हुआ और यदि तुम, मैं जो जवाब दूँ उससे कुछ न सीखना चाहो तो, तुम्हें भी कोई लाभ न होगा। सच तो यह है कि तुमको मैं समझाने का लाख प्रयत्न करूं तो भी तुम समझ न पाओगे, क्योंकि तुम समझना नहीं, बाजी जीतना चाहते हो। ऐसे लोग सही का मतलब जीत और गलत का मतलब हार मान लेते हैं जब कि अक्सर यह होता है कि जो सही होता है वह अपने सही होने के आत्मविश्वास के कारण अपने को सही साबित करने के तिकड़म का इस्‍तेमाल नहीं करता और गलत लोगों के द्वारा गलत सिद्ध कर दिया जाता है।

‘तुमने मुझे महिला आयोग के बुलावे की धमकी देते हुए उस आयोग के समक्ष अपने को अपराधी सिद्ध कर दिया क्योंकि तुमने यह मान लिया कि मैंने जो कहा है, जिन हवालों और संदर्भों में कहा है उनको समझने की योग्यता तक उनमें न होगी, इसलिए वे अपनी समझ का अवमूल्यन करने के दुस्साहस के लिए तुम्हें बुला तो सकती हैं, पर बुलाऍंगी नहीं, उन्हें अधिक जरूरी काम होंगे।

‘तुम अंबेडकर का नाम लेते हो, और उन्हीं को दुहराते हो। जानते हो इतिहास को दुहराने के बारे में मार्क्स ने त्रासदी और भड़ैती का प्रयोग किया था History repeats itself, first as tragedy, second as farce.। तुम इतिहास को बदलने की कोशिश में लगातार अतीत की भड़ैती कर रहे हो। पर उसे भी सलीके से नहीं कर पाते।

‘’तुम्हें पता है बाबा साहब अंबेडकर ने जब 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति को
जलाने को एक प्रतीकात्मक प्रतिरोध बनाया था तो उन्‍होंने एक उस ग्रंथ की महिमा की रक्षा और व्यर्थता को प्रतीक बद्ध करते हुए एक यज्ञ वेदी बनवाई थी। एक यज्ञकुंड बनवाया था। उसमें चंदन की लकडियों को इंधन के रूप में चयनित किया था, सामने गांधी की छवि रखी थी और गांधीवाद के सामाजिक सरोकार और व्यवहार को चुनौती देते हुए अपना प्रतीकात्मीक प्रतिरोध दर्ज कराया था।

‘जब आज तुम मनुस्मृति को जलाते हो तो किसे जलाते हो? वह तो 1927 में ही जल गई थी और अदालत ने उस मीठे पानी के सरोवर पर सबका अधिकार बहाल कर दिया था जिससे अछूतों को वंचित कर दिया गया था। प्रश्न प्रतीकात्मकता का है तो क्या तुम बता सकते हो कि तुम मनुस्मृति को जलाते हो या उसकी राख को जो जल नहीं सकती। बाबा साहब ने उसे जलाया हो या नहीं, भारतीय संविधान के बाद तो वह राख हो ही गई। आज तुम राख को जलाने की मूर्खता से अपनी साख को राख करना चाहते हो या इस भ्रम में जीवित रहना चाहते हो कि जो हमारे कोप और हमारी कारसाजी का शिकार हो गया वह जान से गया।‘

‘एक और, और आखिरी बात। तुम इतने बदहवास हो कि मनुवादी और मनुस्मृतिवादी का अन्तर तक नहीं जानते। मनुवादी का अर्थ है मानवतावादी, जिस अर्थ में तुम इसका प्रयोग करते हो वह है मनुस्मृतिवादी अर्थात् मानव समाज के संचालन के किसी काल में गिनाए गए नियमों और व्यवस्थाओं का बन्धन जिसके कुछ विधान मानवतावादी नहीं भी हो सकते हैं।

एक और बात पर ध्यान दो। मनुवाद अर्थात् उस समाज का इतिहास आज से नौ हजार साल पीछे जाता है जिसने खेती आरंभ की। खेती के आरंभ का श्रेय हमारी पौराणिक प्रतीकात्मकता में मनु को दिया गया है। वह प्रतीक कथा किसी अन्य स्रोत से उपलब्ध सामग्री से अधिक विश्वसनीय है। मनु हमारे प्रतीकबद्ध इतिहास में कृषि और उसके साथ उत्पन्न रक्षा आदि की व्य्वस्थाओं के भी प्रतीक हैं इसलिए पहले विधान निर्माता। इसके विस्तार में जाने का कोई लाभ नहीं।

‘और यह बता दू कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का जितना ध्यान मनु को था उतना ध्यान आज का समाज दे तो अखबारों में ग्राहक संख्या बढ़ाने के लिए सनसनी पैदा करने वाली खबरों को जितनी प्रधानता दी जाती है वे कम हो जाऍंगी जिनसे जरूरी खबरें दब जाती हैं और हमारा सत्यबोध उससे प्रभावित होता है। सम्य जगत के जिस भी समाज से तुलना करो, एत्रुस्कन समाज के नंगधडंगपन को छोड़ कर, नारी को भारत में जितनी सुरक्षा और उन सीमाओं में जितनी छूट मिली रही है वह दुनिया के किसी देश में नहीं। और तुम तो यार अपने को मार्क्सवादी कहते हो, जानते हो मार्क्स ने सामाजिक प्रगति का मानदंड किसे बनाया है: Social progress can be measured by the social position of the female sex. और जानते हो, दूसरी सभ्य ताओं के लोग भारत में स्त्री की स्थिति को देख कर चकित रह जाते रहे हैं। पत्नी जीवित है तो उसके बिना कोई आयोजन अधूरा है, वह आधा अंग है, अर्धांगिनी है और छोड़ो तुम जब अपने दिमाग से काम लेने लगना और तक कोई समस्या खड़ी हो तो मुझे याद करना।

तुम जब दो हजार साल पहले के भारतीय विधान और आज के नियम विधान को
एक तराजू पर रख कर फैलसा दोगे तो मैं तुमसे बहस नहीं करूँगा, तुम जहॉं पड़ जाओगे पड़े रहने दूँगा। पर जब सोचने समझने को कुछ न बचेगा तो रोने कलपने के अलावा क्या बचेगा, तुम्हारे हिस्से़ का रोना भी मुझे ही रोना होगा। तुम को तो अपनी अधोगति का बोध तक न होगा।

Post – 2016-04-15

बूमरैंग

‘तुम्हारी बातें कुछ देर से समझ में आती हैं, तुमने ठीक कहा कि कई बार शब्दों का अर्थ उल्टा भी होता है, या उल्टाे ही होता है। जैसे तुम्हारे मामले में मार्क्सवादी का अर्थ संघ का चमचा भी होता है।‘

’जब एक शब्दा को समझने में तुम्हें इतना समय लगा तो मेरे सरोकार को समझने के लिए तो युगों की जरूरत पड़ेगी। मैंने कहा था कि एक सच्चे लेखक का काम है सताए हुए, दबाए जा रहे लोगों के पक्ष में खड़ा होना और इसलिए मैं उनका पक्ष लेने या उनका प्रवक्ता बनने को नैतिक रूप में बाध्य थ जिनपर बु‍द्धिजीवियों की अक्षौहिणी लगातार प्रहार कर रही थी और वे बेचारे ठीक से कराह तक नहीं पाते थे क्‍योंकि उस कराह को सुनने वाला कोई था ही नही। वह तुम्‍हारे हंगामे में दब जाती थी। सताए हुए का साथ देना एक लेखकीय दायित्व है और एक मार्क्सवादी दायित्व भी। दुर्भाग्य से इस इतने बड़े देश में अपने को कम्युनिस्ट कहने वाले हजारों होंगे पर मार्क्सवादी मैं अकेला बचा रह गया हूँ और वह भी तुम्हारे मिटाने की लाख कोशिशों के बाद भी। तुम जानते हो तुम्हारी समस्याा क्या है?‘

’अच्छी तरह जानता हूँ। मेरी सबसे बड़ी समस्या तुम और तुम जैसे लोग हैं जो कहने को हमारे साथ हैं और रहने को हमारे दुश्मनों के साथ, इन्हें हमारे यहॉं ब्लैकशीप या भेड़ की शक्ल् में उन्हीं के झुंड में छिपा हुआ भेडि़या कहा जाता है और उनसे मुक्ति पाना हमारी सबसे बड़ी और सनातन समस्या रही है।‘

‘मैंने कभी नहीं कहा कि मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्‍हारे झुंड में तो एक मेरा दब घुट जाता है। तुम लोग मार्क्सवादी उद्धरणों की जुगाली करने वाले और इस जुगाली के क्रम में ढेर सारा झाग गिराने वाले अवसरवादी ऐयाश हो और लंबे अरसे से एक ही जगह ठहरे हुए लोगों की जमात हो जिनकी न आपस में पटती है न दुनिया जहान से पटती है, और जो मार्क्‍सवादी विश्लेषण की युक्ति और शक्ति दोनों से रीते हैं। तुम मुझे तक नहीं समझ सकते जिससे तुम इतने डरे हुए हो कि मुझसे ही छुट्टी पाना चाहते हो। फिर भी तुम्हारी समस्या यदि यही है तो उससे तो चुटकी बजाते छुटकारा पाया जा सकता है। तुम मुझ पर उसी हथियार से चोट करो जिससे मैंह तुम्हा्रे उूपर प्रहार करते हुए तुम्हें भेड़ों की खाल ओढ़े भेडि़यों का झुंड साबित कर देता है।‘

’इसका मतलब है हम तुम जैसों को भी भाव दें और तुम उसे चरित्र प्रमाणपत्र की तरह दूसरों को दिखाते फिरो।‘

’तुम जिस आदमी को सबसे बड़ी समस्याा मानते हो उसी को भाव नहीं देना चाहते। विचित्र है। मुहावरे में सुना था कबूतर बिल्ली से डर कर ऑंख मूँद लेता है कि वह उसे देखेगा नहीं तो वह गायब हो जाएगा। शुतुरमुर्ग के बारे में भी कहावत इससे मिलती जुलती है। तुम जिससे इतना डरे हुए है उसे देखने और जांचने तक का साहस नहीं जुटा पाते। ऐसे लोगों को मार्क्रवादी परिभाषाकोश में क्या कहते हैं, कभी पता किया है? देखो, मैं तुम्हारी आलोचना इसलिए करता हूँ कि तुम मार्क्वाद के शत्रु हो। तुम अपनी काबिलियत पर इतना भरोसा करते हो कि अपने को समझा लेते हो कि तुम अपने बुद्धिबल से सचाई को इस तरह परिभाषित करोगे जिससे जो नहीं है वह उपस्थित हो जाएगा और जो है वह हवा हो जाएगा। आपसी सहमति और सहानुभूति इतनी जबरदस्त कि एक बेवकूफी करे तो उसे ही समझदारी का नमूना मान कर सभी उसी के साथ हो लेते है और मान लेते हैं कि पूरी दुनिया इसका कायल हो गई। तुम्हारे हलके से बाहर दूसरों को तुम्हारी उन्हीं बातों पर लोगों को इतनी हँसी आती है कि उनका पीआरपीएम बढ़ जाता है।‘

’यह पीआरपीएम क्यान बला है भाई।‘
’पल्स‍ रेट पर मिनट।‘
उसे ठहाका लगाना ही था।

’सुनो, यदि मार्क्मवादी हो तो सचाई को देखने, समझने में ईमानदारी से काम लो। तम्‍हारे बुद्धि बल के चलते तुम्‍हारी साख घट गई है। तुम्‍हारी सबसे बड़ी समस्‍या अपनी विश्‍वसनीयता अतर्जित करने की है। तुुम्‍हारी गिरावट के साथ बुद्धिकौशल पर तुम्‍हारा आत्‍मविश्‍वास इस तरह बढ़ता गया है कि आत्महत्या को हत्या सिद्ध कर देते हो। आत्महत्या को इतना जरूरी काम मान लेते हो कि घूम घूम लोगों को समझाना शुरू कर देते हो कि हर घर में आत्महत्या करने वाला पैदा होगा। देश को तोड़ने की बात करने वालों की जमात को क्रान्तिकारी बना देते हो, भगत सिह का सम्मान करने का अनोखा उदाहरण पेश करते हुए उन्हें इन सिरफिरों का नायक बना देते हो। इस खयाली बहक को तुम मार्क्सवाद कहते हो, मैं मार्क्सवाद को इस एड से बचाना चाहता हूँ जो अब तुम्हें मेरिका से भी मिलने लगी है, और जिसने तुम्हारी प्रतिरोध क्षमता को नष्ट कर दिया है और तुम बिना किसी के मारे मरते जा रहे हो।यद्यपि मैं मानता हूँ यह देश के हित में है। मैं बार बार तुम्हें सचेत तो कर सकता हूँ परन्तु न तो तुम्हारे साथ हो सकता हूँ न तुम तब तक हमारे साथ आ सकते हो जब तब तुम्हारी इम्यून प्रणाली दुरुस्त नहीं हो जाती। मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, पर सहचर नहीं।‘

‘तुम किसके हितैषी हो और अगर तुम्हारे इरादे सफल हुए तो इसका क्याकुप रिणाम होगा यह तुम्हारे बताए बिना भी सब पर प्रकट होता जा रहा है। इसलिए अब आर-पार की लड़ाई लड़नी होगी। या तो हमारा देश रहेगा या तुम्हारा हिन्दुत्व का एजेंडा।‘

’तुम्हेंम पता है हिन्दुुत्व के दो ऐजेंडे हैं, एक पर तुमने काम किया है और उससे भारी अनर्थ हुआ है, दूसरे पर वे जिन्हेंं तुम अपना दुश्मन समझते हो। तुम्हारे पास अक्ल मंदों की भारी जमात है, पर बेवकूफी के सबसे अधिक काम तुमने ही किए है, उनके पास सिरफिरों की वैसी ही जमात है, लेकिन उनसे देश बहुत कम अहित हुआ है। तुम हिन्दुओं के सरोकारों की उपेक्षा करते हो, हिन्दुत्व को जा जा कहते हुए उभारते हो, वे उन उपेक्षाओं की याद दिला कर तुम्हारी असलियत उजागर करते हैं और हिन्दू आ आ कहे बिना भी जिसे तुमने भगाया था उसे अपना बनाते जाते हैं। तुम निगेटिव सजेशन से उसी मुद्दे को केन्द्रीय बनाते हो, वे आटो सजेशन से उसको केन्द्र में रखते हैं। तुम सांप्रदायिकता की जमीन तैयार करते हो वे उसमें फसल उगाने को तैयार रहत हैं । बहुत हाल में उन्होंने सोचा और अपने को बदला कि इसकी जरूरत ही नहीं है और अपना दायरा बढ़ा कर सबका साथ और सबका विकास की बात करने लगे।‘

’परले सिरे के उूत हो तुम तो, यह भी समझ में नहीं आता कि इसके पीछे क्या है? उनके छिपे इरादे क्याा है?‘

’उनके इरादे भांपने से पहले यह तो बताते कि तुम्हारे इरादे क्या है। यह तो देखते कि उन्हों ने अपने को नयी परिस्थितियों के अनुसार समायोजित किया है या करने का विश्वास पैदा किया है और इस तरह वे अपनी पहली जकड़बन्दी से आगे बढ़े हैं और तुम अपने को जिन्दा रखने की जीतोड़ कोशिश में उनके पीछे लगे हो जिनका नाम और कारनामा दोनों उस अवस्थाऔ से बहुत गर्हित हैं जब तुम उनका जी जान से विरोध करते थे। अपना आकलन करो कि तुम आगे बढ़े हो या पीछे लौटे हो। आज की तारीख में प्रगतिशील भूमिका किसकी है, उनकी या तुम्हारी। कौन अधिक कारगर हथियार से लड़ रहा है। तुम जिन पर आरोप लगाते थे कि ववे लट्ठ चलाते हैं वे संचार की ताकत को समझ कर उसका भरपूर उपयोग कर रहे हैं और तुम बन्दू क से बूमेरैंग पर पहुँच गए हो जो निशाने पर लगे या न लगे उलट कर चलाने वाले को चोट अवश्‍य दे जाता है। कम से कम मुहावरे में। 15/4/2016