Post – 2017-05-09

देववाणी (अठ्ठाइस)
नाद ही शब्द, नादभेद ही अर्थभेद

हम जिसे देववाणी की विशेषता मानते हैं वह, हमारी अपनी समझ से, सभी आदिम बोलियों की विशेषता थी, इसलिए इसे विशेषता कहना भी केवल विकसित और मानक भाषाओँ के सन्दर्भ में ही सार्थकता रखता है। आज आदिम अवस्थाओं में जीने वाले समाज भी हमारी समझ के कारण आदिम हैं, अन्यथा अपने आदिम जीवन के लिए कुख्यात आस्ट्रेलियाई आदिवासियों तक के जीवन पर दूसरी संस्कृतियों का प्रभाव लक्ष्य किया गया है।

हम भाषा के सन्दर्भ में जिस प्राचीन चरण की बात कर रहे हैं उसमें ध्वनि परिवर्तन से अर्थभेद किया जाता था, दुनिया की कुछ भाषाएँ आगे भी उसी जुगत का प्रयोग करती रहीं. उदाहरण के लिए अरबी और इससे प्रभावित भाषाओँ में स्वरभेद से ही अर्थभेद – किताब-क़ुतुब-कातिब – किया जाता है. अंग्रेजी में सिंग-सैग-संग-सांग के पीछे भी यही तर्क बचा हुआ है। वैदिक में यह संस्कृत की अपेक्षा अधिक क्रियाशील था। उदाहरण के लिए भोज. में हिंदी सब के लिए आज भी कुछ लोग ‘सभ’ का प्रयोग करते हैं। हिंदी के प्रभाव से ‘सब’ का प्रयोग भी चलता है और हिं. ‘सभी’ के लिए अनपढ़ भी ‘सब ही’ (एमे सब ही केs हिस्सा चाही = इसमें सभी को हिस्सा चाहिए) का प्रयोग करते पाए जा सकते हैं. परन्तु सामान्य प्रयोग (एहमे सभकेs हिस्सा चाही) ही है। देववाणी का सभ हिन्दी में सब हुआ और वह कौरवी प्रभाव में सर्व हुआ, न कि सब, सर्व का अपभ्रंश है, और सभी सब के साथ निश्चयात्मक, हि, प्रत्यय जुड़ने का परिणाम है। अब क्रम सभ > सभा > सभी का बना जो वैदिक में सभेय और संस्कृत में सभ्य उसी तर्क से बना जिससे इह यह, और इहां, इहवां, यहां, बना फिर ‘सभ्य’ का अर्थविस्तार होने के बाद वैदिक में भी सभासह बना और सं. में सभासद ।

हम आपका ध्यान दो बातों की और दिलाना चाहते हैं. पहला यह कि संस्कृत वैयाकरणों के नियमों का एक नई दृष्टि से अध्ययन जरूरी है। जिसे वे ऐतिहासिक बदलाव मानते हैं वह आंचलिक बदलाव है। उनके अनुसन्धान अमूल्य हैं, पर तभी जब हम समझें कि बोली बानी के भेद के कारण एक ही शब्द को कई भाषाई समुदायों के सम्पर्क में आने के बाद उनके विविध रूप हो जाते थे। हमारे वैयाकरणों ने इन्हे ऐतिहासिक संदर्भ में देखा। आंचलिक विविधताओं की ओर भी उनका ध्यान गया, अन्यथा पाणिनि यह न लिखते कि गान्धारों में ‘शव’ का अर्थ गमन होता है। परन्तु इस सर्वेक्षण में चूक यह थी कि वह यह न देख सके कि मरने के लिए लोक में गुजरने का प्रयोग गांधार तक सीमित नहीं है।

Post – 2017-05-08

#देववाणी (सत्ताइस)
शब्द निर्माण प्रक्रिया

‘यदि तुमने किसी सारंगी वादक को तारों पर आघात के सूक्ष्म अन्तर से अलग अलग ध्वनियां निकालते देखा हो तो भाषा के विकास के उस चरण को भी समझ सकते हो जिसमें बोलना तक एक आह्लादकारी अनुभव से गुजरना था। नये प्रयोग अर्थ सेचार के साथ सर्जना के आनन्द की अनुभूति भी कराते थे। शब्द फूल जैसे हल्के, नैसर्गिक प्रतीत होते थे और उनका अर्थ गंध की तरह स्वतः बिना परिभाषित किए श्रोता तक पहुंच जाता था। बोलियों में, सभी बोलियों में, ये तत्व आज तक नष्ट नहीं हुए हैं। कृत्रिम भाषाएं तो कागजी फूल है। उनमें भाषा का अपना आनन्द नई व्यंजनाएं गढ़ते हुए ही प्राप्त होता है। पर यह अपनी कारीगरी पर मुग्धता होती है, जिसका संचार उतना सहज नहीं होता।

देववाणी का यह गुण वैदिक में कुछ कुछ बचा रह गया था, इसलिए हमने ऋग्वेद से जिन शब्दों को अपने तकनीकी भंडार में शामिल किया, वे हिन्दी में उसी तरह घुल गए जैसे नमक पानी में घुल जाता है। निविदा, संविदा, सदन, सदस्य, संसद, समिति आदि ऐसे ही शब्द हैं। पर ऋग्वेद तक देववाणी अपना सौष्ठव काफी दूर तक खो चुकी थी। तकनीकी जरूरतों और सूक्ष्मतर संकल्पनाओं की मांग नैसर्गिक तरीकों से पूरी नहीं हो पाती।

जहां से हम प्रकृति में हस्तक्षेप करते हैं, वहीं से उस सूनृता वाक् में भी हस्तक्षेप करते हैं जिससे हमने भाषा का विकास किया था। औजारो और युक्तियों का जोड़तोड़ करते हुए नए आविष्कार करने वाले भाषा में भी जोड़तोड़ करते हुए अपनी अपेक्षाएं पूरी करने को बाध्य थे।

यहीं से वह इंजीनियरी आरंभ होती है जिसमें भाषा की निर्माण प्रक्रिया भी बदलती है और इसे समझने की युक्तियां भी बदलती हैं। बदलती भी इस हद तक हैं कि हम पिछले चरण की विकास प्रक्रिया तक के प्रति अनभिज्ञ होते चले जाते हैं। यही संस्कृतीकरण की प्रक्रिया है। यहां कौरवी की एक कारक भूमिका भी है। यही कारण है कि जब तक कोई भाषा हमारे सुख दुख, राग विराग के प्रकृत स्तर पर बनी रहती है उसका काम देववाणी की युक्तियों से चल जाता है, परन्तु जब वह विचार और दर्शन की ओर अग्रसर होती है तो उसे संस्कृत से सहायता लेनी होती है, वह संस्कृतमय होती चली जाती है।

ऋग्वेदिक समाज तकनीकी दृष्टि से बहुत आगे बढ़ा हुआ था, इसलिए कई विफल प्रयोग नयी चीजे बनाने वालों ने भी किए ही होंगे, वैसे ही कुछ अटपटे भोंड़े प्रयोग शब्द गढ़ने में भी किए गए, जैसे सास्युक्थ्यः (सः+ असि+उक्थ्यः) एतायामोप (आ+इत+ अयाम+उप) इहेहमातरा (इह इह च सर्वत्र माता), अक्रविहस्त (निष्पाप) , अदब्धव्रतप्रमतिः (जिसे जो ठान लिया उससे कोई डिगा न सके ), आदि ।

इन विरल अपवादों को छोड़ दें जिनकी संख्या अधिक नहीं है तो दूसरे रूप अपेक्षाकृत अधिक सटीक और कम अटपटे हैं जैसे अकृत्तरुक (लकदक), अकामकर्शण (अनाकर्षक), हृदयाविध (मर्मभेदी), अतिविद्ध (ऐसा मनका जिसका छेद अधिक चैड़ा हो गया हो), आदि।

परन्तु वैदिक शब्द निर्माण प्रक्रिया बोलियों की अपनी निर्माण प्रक्रिया के निकट पड़ती है जिसमे निर्माण जैसा कुछ लगता ही नहीं, सारंगी के तार का स्पर्श और धर्ष का दबाव और स्पंदन बदल जाता है. केतु, प्रतीत, प्रतीक, अंक, अच्छा, अजस्र, अंकी, अंकुश, अंग, अजस्र,, तन्द्रा, अति, अद्भुत, अद्य, अनवद्य, अध्यक्ष, अधिवक्ता, उपवक्ता, दूत, सम्राट, अधिराट। हिन्दी में ये शब्द भी घुलमिल गए।

यह स्मरण दिलादें कि वैदिक में इनमें से अधिकांश शब्दों का अर्थ वही नहीं है जिससे हम परिचित हैं। यह गढ़े हुए शबदों की अपनी सीमा है जिसे हम बता आए हैं। यहां हम इस प्रश्न को इसलिए उठा रहे हैं कि जिने सुन्दर, सरल और मार्मिक शब्द वैदिक समाज गढ़ सका वैसे नए और सर्वजनग्राह्य शब्द हमारे शब्दनिर्माता क्यों न गढ़ सके? अंग्रेजी में जो तकनीकी शब्द समस्या पैदा नहीं करते वे हिन्दी में समस्या क्यों पैदा करने लगते हैं? इसका उत्तर यह है कि जब तकनीकी विकास में प्रयत्नशील समाज अपने नये अविष्कारो और तकनीकी आवश्यताओं के अनुसार शब्द गढ़ता है तो उसमें वस्तु बोध और शब्दबोध में वह दूरी नहीं होती जितनी दूरी बिना कुछ किए, उधार की तकनीक लेकर, उसका भी सही उपयोग न कर पाने वाले समाजों की भाषा में पाई जाती है । समस्या श्रमिकों, उत्पादकों, विविध उद्यमों में जुड़े लोगों के शब्दों को अपनाने की जगह, शब्द से शब्द गढ़ने की समस्या के कारण पैदा होती है। इसे मैं प्रायः भैंस से दूध दुहने की जगह भैंस दुहने की समस्या मानता हूं।

पर रोना वही की भूमिका में ही समय निकल गया। बात तो देववाणी के शब्द निर्माण पर करनी थी जो हो सकता है कल आरम्भ हो जाए।

आज इतना ही कि भाषा की इंजीनियरी श्रम से परहेज़ करने वाले पंडितों द्वारा गढ़ी गई है इसलिए उसमे आडंबर है, वह स्वाभाविकता नहीं जो वैदिक जार्गन में मिलती है ।

संस्कृत का सहारा लेने वाली बौलियाँ भी संस्कृत की तरह अपना अलग संसार रचने लगती है, अपनी जड़ों तक को भूलने लगती है और जब जड़ें ही कमजोर हो जायं तो भाषा की प्राणवगा चुकने लगती है और समाज के सामान्य संचार की भाषा नहीं रह जाती और काल कवलित हो जाती है।

इसलिए चिरायु होने के लिए अपनी जड़ों की ओर लौटना, उस रस का जिसे पत्तियां ग्रहण करके वृक्ष का पोषाहार बनाती हैं जड़ों तक वापस जाना और जड़ों से खाद पानी ग्रहण करना दोनों साथ साथ चलता रहे तो भाषा स्वाभाविक भी बनी रहेगी, अमूर्तन की अपेक्षाओं को भी पूरा कर सकेगी।

हम इस झमेले से निकल कर उस चरण पर लौटें जिसकी तलाश दुनिया की सभी बोलियों में की जा सकती है। मूलोच्छिन्न भाषाओं में यह अपेक्षकृत कम मिलेगा, मूल से जुड़ी भाषाओं में किंचित अधिक। परन्तु आज तो यह संभव नहीं।

Post – 2017-05-07

देववाणी (छब्बीस)
बोलियां, लोक भाषा और मानक भाषा

भाषा, समाजशिक्षा, सामाजिक सर्जनात्मकता और राष्ट्रीय उत्थान की समस्यायें परस्पर जुड़ी हुई हैं, और इस दृष्टि से किसी देश की शिक्षा नीति और सरकारी कामकाज की भाषा विषयक निर्णय बहुत महत्व रखते हैं। हम इस विषय पर पहले से लिखते आए हैं। परन्तु हमारा क्षेत्र विचार या मानसिक बदलाव तक सीमित है न कि इसके आन्दोलन से जुड़ा। आन्दोलन में शक्तिशाली यदि गलत या अन्यायी हो तो भी उसकी जीत होती है और अंग्रेजी की वरीयता के पीछे जितना व्यापक और बहुआयामी समर्थन है उसका सामना करने वाला आन्दोलन नहीं खड़ा किया जा सकता। विचार में सत्य और न्याय का पक्ष अपने दायरे का विस्तार करता है और स्वतः अपने औचित्य के बल पर इतनी प्रबल शक्ति बन जाता है कि वह अपने विरोधियों को निस्तेज करके व्यर्थ कर दे। कुछ यूं कि हउनके सारे हथियार और औजार व्यर्थ हो जायं।

मुझे इस पोस्ट के माध्यम से कुछ भ्रान्तियों का निराकरण करना, या उनके विषय में अपना मन्तव्य प्रकट करना जरूरी लगा।

पहली बात हम बोलियों का प्रयोग उन उपबोलियों के क्षत्र क्षेत्र के रूप में कर रहे हैं जिन्हें हम अपनी मां और अपने परिवेश से सीखते हैं और बोलते हैं, परन्तु जिनमें इतने अन्तर होते हैं कि या तो इनका कोई मानक रूप तैयार किया जाय तो अपने पूरे प्रसार क्षेत्र में एकरूपता बनाए रख सकती हैं, और उस दशा में आरंभिक शिक्षा का भी माध्यम बन सकती हैं, अ्न्यथा अपनी महत्वाकांक्षाओं को त्याग कर अपने स्थानीय चरित्र को बचाए रख सकती हैं।

ध्यान में रखना होगा कि पूरे बोली क्षेत्र में व्यवहार के लिए जिस मानक भाषा का निर्धारण किया जाएगा वह अल्पायु ही होगी। उपबोलियां उस मानक रूप में नीचे अपनी गति से चलती रहेगी। परिवर्तनों से गुजरने के बाद भी ये चिरायु हैं। इनका भी अन्त हो सकता है यदि पूरे समाज के शिक्षा, संस्कृति और आर्थिक स्तर में समरूपता पैदा हो सके और शैक्ष भाषा निजी व्यवहार में आ कर उस ग्राम्य पद्धति को ही बदल दे जिसमें अनपढ़ ओर अपने ही भौगोलिक परिवेश में सिमट कर रहने वालों की संख्या इतनी कम हो जाय कि उनकी भाषा, भाषाई परिवेश का निर्धारण न करे।

दूसरी बात यह कि मानक भाषाएं तभी तक जीवन्त बनी रह सकती हैं जब तक वे लोक भाषा को अपना आदर्श मानें। यहां लोक भाषा से मेरा तात्पर्य उस मानक भाषा के लोक व्यवहार वाले रूप से है, न कि क्षेत्रीय बोलियों से। कहें, यह मानक भाषा का वह रूप है जिसे आप हाट बाजार में बोलते हैं और जिसे बोलते समय इस विषय में अतिरिक्त रूप में सावधान हुए बिना आप की वाक्य रचना में सरल वाक्यों की संख्या बढ़ जाती है, ऐसे शब्द प्रयोग में नहीं आते जिनको समझने में अशिक्षित को भी कोई कठिनाई हो।

ऋग्वेद में मरुतों के वाहन चित्रमृग (चीतल ) के लिए पृषती प्रयोग में आया है, बोलियां भी चितकबरी हैं, रंगबिरंगी हैं। बहुत ग्रहणशील फिर भी सब कुछ अपनी प्रकृति में ढाल कर अपनाती हैं। कौरवी ने देववाणी को भी अपने रंग में ढाल लिया था। आज संस्कृत किसी क्षेत्र के काम काज की भाषा नहीं है, सामान्य बोलचाल की भी नहीं, परन्तु कौरवी उससे पहले भी थी आज भी है और आगे भी रहेगी। यह सौभाग्य किसी मानक भाषा को प्राप्त नहीं हुआ, यह हम पहले कह आए हैं, परन्तु इसका कारण यह था कि ये मानक भाषाएं कृत्रिम भाषाएं बनती हुई, अपने ही वायवीय जगत में विचरण करती हुई लोकभाषा से अपना नाता तोड़ बैठीं।

हिन्दी ने भी यह किया। सरकारी भाषा बनने की अपेक्षा पूरी करने के लिए। और सरकारी भाषा का हाल यह कि इसका मूल पाठ अंग्रेजी में तैयार किया जाता है, फिर उसे हिन्दी में अनूदित किया जाता है और वह हिन्दी जार्गन बोझिल होती है। विन्यास अंग्रेजी से प्रभावित होता है। हिन्दी जार्गन को समझने के लिए यह याद करना होता है कि यह किस अंग्रेजी शब्द का अनुवाद है। अर्थात् सरकारी हिन्दी जानने की एक अघोषित शर्त यह है कि आपको अंग्रेजी शब्दों का अर्थ पता होना चाहिए। ऐसी स्थिति में हिन्दी जानने वाले के सामने भी यदि कोई सरकारी ज्ञापन या पत्र हो और उसके साथ अंगेजी पाठ भी सुलभ हो तो वह अंग्रेजी पाठ पढ़ेगा, न कि हिन्दी पाठ।

मैं एक दुखद सचाई की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं। वह यह कि सरकारी हिन्दी सरकारी अंग्रेजी से अधिक दुर्बोध भाषा है और इसलिए इसके नाम पर आप हिन्दी दिवस मना सकते हैं, हिन्दी पखवाड़ा मना सकते हैं, विश्व हिन्दी सम्मेलन कर सकते हैं, परन्तु इसे कामकाज की भाषा नहीं बना सकते, क्योंकि यह कर्मकांड की भाषा बन चुकी है। इसे कर्मकांड की भाषा से बदल कर व्यवहार की भाषा बनाना हिन्दी बचाओ, हिन्दी चलाओ, आन्दोलन से अधिक जरूरी है।

संसार भावुकता से नहीं व्यवहार से चलता है, जिसमें भावुकता का भी अर्थशास्त्र होता है। अपनी भाषा की महिमा का राग अलाप कर हिन्दी का विरोध करने वाले बंगालियों और तमिलों ने भाषावार राज्य बनने और राजभाषाओं के स्वीकार के बाद भी अपने अपने राज्य में अपनी भाषा को अमल में लाने में सबसे अधिक समय लिया था।

संस्कृत का नाम आते ही भावुक हो जाने वाले ब्राह्मणों में उच्च पदों पर बैठे ब्राह्मण अंग्रेजी के सबसे बड़े समर्थक हैं। जातिवाद और वर्णवाद को पानी पी पी कर गाली देने वाले दलित और पिछड़े जातिवाद और वर्णवाद के सबसे बड़े समर्थक हैं। वर्णवाद के समाजशास्त्र से अधिक प्रबल है वर्णवाद का अर्थशास्त्र।

इसलिए हम जब किसी समस्या पर विचार करते हैं तो हमारे सामने यह बहुत साफ होना चाहिए कि हम उस समस्या का समाधान चाहते हैं, या उसे इसलिए बनाए रखना चाहते हैं कि हम उसको लंबे समय तक उछालते हुए उसका राजनीतिक लाभ उठा सकें और उस चिन्ता से अपने को कातर दिखा कर अपना रुतबा बढ़ा सकें।

यदि समस्या का समाधान चाहते हैं तो समस्या की प्रकृति को समझना होगा। समझने के लिए भावुकता से दूरी बनाते हुए विवके का सहारा लेना होगा। अपने विवके से काम ले रहे हों तो यह समझ जरूरी है कि उस वस्तु व्यापार को प्रभावित करने वाले घटक क्या हैं? उनके जिस संबंध से वह समस्या पैदा हुई है उनमें कुछ बदलाव लाया जा सकता है या नहीं? यदि हमने यह समझ लिया कि उन संबंधों में बदलाव लाया जा सकता है तो आधी समस्या हल हो गई। आधी समस्या का हल इस समझ पर निर्भर करेगा कि उन संबंधों को बदला कैसे जाए। हो सकता है यह कठिन काम हो, परन्तु जब तक हम पहली को नहीं समझते, तब तक सबसे कठिन समस्या समझने की ही है ।

हम पहले जार्गन बहुल या विशिष्ट क्षेत्र की भाषा जिसे हम तकनीकी शब्दावली से भरी भाषा कहते हैं उसे समझ लें। जार्गन शास्त्रीय होता है। सबसे कम भरोसे का होता है और लोक शास्त्र का विपक्ष है। जार्गनबोझिल भाषा उसकी भाषा नहीं हो सकती, फिर भी विवशताओं के कारण बहुत सारे जार्गन उसकी भाषा में जगह बना लेते हैं। जार्गन से जार्गन की कोई यात्रा नहीं है, वह भाषा के प्रवाह के बीच एक प्रतीक के रूप् में उपस्थित होता है जो न रहे तो उसी बात को समझाने के लिए हमें एक व्याख्यापरक टिप्पणी देने की आवश्यकता होगी और इस क्रम में भाषा इतनी पृथुल और इसके कारण ही उससे भी अधिक दुर्बोध हो जाएगी जितनी तकनीकी शब्दों या जार्गन के प्रयोग से दीखती है। अतः यह समझना जरूरी है कि जार्गन भाषा को या कथन को सरल बनाने का उपाय है, न कि उसे कठिन बनाने का।

दूसरा यह कि जार्गन बदले जा सकते हैं, उनका सांकेतिक अर्थ उनके द्वारा या किसी अन्य शब्द या संख्या के द्वारा उसी सटीकता से व्यक्त किया जा सकता है। परिचित श ब्दों को जार्गन के रूप् में प्रयोग किया जा सकता है। चाणक्य ने जिन शब्दों को जार्गन बना कर प्रयोग किया उनका अर्थ नए सिरं से समझना होता है। वेद से लिए गए शब्द संविदा, निविदा, संसद, परिषद उसी अर्थ में प्रयोग में नहीं आते थे जिस अर्थ में हमने उनको ग्रहण किया।

जार्गन विषेशज्ञों के उपयोग में आते हैं और हमारे बुनकर, चर्मकार, मछियारे, नौचालक, सभी जार्गन का प्रयोग करते है और उस क्षेत्र की जानकारी के लिए उनके जार्गन और उन्हीं क्षेत्रों के पाश्चात्य जार्गन को समझना और उनके बीच चुनाव करना जरूरी है।

जार्गन का एक परिवेश और इतिहास होता है जिसे वे प्रतीकब़द्ध करते हैं। यदि वह आपका सिरजा हुआ नहीं है, उसे आपने उधार लिया है तो शराफत का तकाजा है कि उसे अपना बनाने की जगह उस शब्द को अपनी भाषा का अंग बना लें। आपकी भाषा सरल न भी हो तो कम दुरूह रह जाएगी।

भाषा में बेईमानी नहीं चलती। शुद्धतावाद नहीं चलता। सबका स्थान प्रयोग, प्रयोज्य और प्रयोजनीयता ले लेती है। जिन अर्थों में जो शब्द लोकभाषा का अंग बन चुके थे उनको नकारते हुए अपनी ही लोकभाषा को नकारते हुए लोकविमुख भाषा दूसरी किसी भाषा की अनुचरी हो सकती है, स्वतन्त्र भाषा नहीं हो सकती।

वह अपने को रेाक न पाया। ‘यार, मैं तुम्हें सुनता हूं तो लगता है तुम जानी समझी बातों को भी दुर्बोध बना देते हो।’

मेरे पास उससे सहमत होने के अतिरिक्त कोई चारा न था, ‘तुम ठीक कहते हो। सच को जानने के लिए उसकी पृष्ठभूमि को जानना जरूरी होता है। उसके अभाव में सच दुर्बोध हो जाता है। यही है भाषा और जार्गन की भेदरेखा।

Post – 2017-05-06

देववाणी (पचीस)
भाषाविज्ञान की कब्र

– तुम्हें एक भेद की बात बताउॅ, भाषा की सबसे अधकचरी जानकारी वैयाकरण की होती है। वह उसे सूखे काठ के रूप में, एक बढ़ई की नजर सेख् देखता है न कि एक जीवन्त वृक्ष की तरह, जैसे एक बागबान देखता है। इस मामले में उसका मुकाबला कोशकार ही कर सकता है जो भी उसी का छोटा भाई होता है। और यदि किसी भाषा का भाग्य उनको सौंप दिया जाय तो, या तो वह भाषा मर जाएगी, नही तो वह समाज जिसने उसे अपना लिया है। सरकारी हिन्दी के साथ यही दुर्भाग्य घटित हुआ।

– मैं जानता था तुम यही करोगे। तुम्हें बेतुकी बातें करने की बीमारी है। बात शब्दों की करनी थी और मुड़ गए वैयाकरणों की ओर। जानते हो, तुम जिन वैयाकरणों को कोसते नहीं थकते, वे न होते तो संस्कृत का पता तक न चलता।

– मैं कोस नहीं रहा हूं अपनी हैरानी जता रहा हूं कि इतनी मोटी बात भी तुमलोग नहीं जानते जब कि करने के नाम पर जिंदगी भर हिंदी पढाने का ही काम किया है ।

यह मेरी अपनी बात नहीं है, इसे तो पतंजलि और भर्तृहरि कह गये हैं।
तुमको पतंजलि की बात तो बताई भी थी कि भाषा का निर्माण वे करते हैं जिनको अपने अनुभवों, परिस्थितियों, उत्पादों, क्रियाओं, आदि को दूसरों तक पहुँचाना होता है। वे उनका नामकरण करने के लिये वैयाकरण के पास नहीं दौड़ते अपनी भाषा चेतना से नये शब्द गढ़ लेते हैं।*

‘यह बात तो तुमने पहले कभी नहीं कही.’

‘ठीक इन्हीं शब्दों में नहीं कही. पतंजलि ने एक उदाहरण देकर संक्षेप में यही बात कही थी, परन्तु भर्तृहरि ने तो साफ कहा था की भाषा को लोक गढ़ता है, उसके नियम कायदे सब वही बनाता है. तुम कहोगे की जब भाषा लोक गढ़ता है तो वैयाकरण क्या करता है?

‘ वैयाकरण एक ही जैसी बोली की भिन्नताओं से पैदा समस्या का समाधान करने के लिए किसी एक उपबोली को सबके लिए बोधगम्य बनाने के लिए उसका मानकीकरण कर देता है। उन स्वतंत्रताओं को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए दरजी या बढ़ई की तरह काट छाँट और जोड़ तोड़ करता है जिनसे भाषा की प्राणवत्ता बनी रहती है । कहो, उसकी प्राणवत्ता और लोच को भी कम कर देता है. वैयाकरण बनने के बाद आदमी न देश दुनिया को समझ पाता है,न कोई दूसरा उसे समझ पाता है और वह खुद उस भाषा की हथकड़ियों बेड़ियों को तो अच्छी तरह समझता है, पर अफ़सोस कि भाषा को नहीं समझता है।

मैं कोस नहीं रहा हूं अपनी हैरानी जता रहा हूं । सोचो क्या बोलने वाला व्याकरण के नियम तलाशते हुए अपने प्रयोग करता है। उस प्राथमिक चरण पर जब ध्वनि ही (१) उस स्रोत की संज्ञा थी जिसकी किसी क्रिया से या जिसके साथ हुई छेड़छाड़ से वह ध्वनि पैदा हुई, उदाहरण के लिए सर – जल, (२) वह ध्वनि ही उस क्रिया का बोधक थी, जिससे यह पैदा हुई, उदाहरण के लिए प्रवाह या गति, सरन, सरकना (३) वह ध्वनि ही उस ध्वनि की लय की,उस विशेषता का द्योतक थी जिससे यह पैदा हो रही थी, उदाहरण के लिए सर सर, (४) वह ध्वनि ही उस गुण को प्रकट कर सकती थी जो उस वस्तु में है उदाहरण के लिए, सरस, (५) वह ध्वनि ही उस वस्तु के भंडार को अभिहित कर सकती थी, उदाहरण के लिए, सर = सरवर > सरोवर, सरि, (६) वह ध्वनि ही उस क्रिया वाली वस्तुओं के लिए प्रयोग में आ सकती थी, उदाहरण के लिए, सर=बाण, (7) कभी कदा उसके आदि अक्षर को उपसर्ग के रूप में काम में लाया जा सकता था, उदाहरण के लिए ‘स’ ! यहां याद दिलादें कि यह प्रस्ताव हम एक वैदिक प्रयोग के आधार पर कर रहे हैं जिसमे ससर्परी प्रयोग आया है, और इसका सघ (सह) के आद्यक्षर के उपसर्ग बनने से नहीं।

हम इसे और विस्तार देने से बचते हुए यह कह सकते हैं कि जैसा कि हम बट बीज और शुक्राणु और अंडाणु के उदाहरणों से पहले कह आये है आद्य रूपों में अव्यक्त रूप में परवर्ती विकास निहित होता है इसलिए अनुनादी शब्दों में ही, संज्ञा. क्रिया, विशेषण, क्रियाविशेषण, उपसर्ग और अन्तःसर्ग या निपात और प्रत्यय बनने की ही क्षमता नहीं थी, बहुत कुछ और को नामित करने की क्षमता भी थी।

पाश्चात्य भाषाविज्ञानी असाधारण श्रम और संकल्प के बाद भी अनुनादी शब्दों में से केवल कुछ को पहचान पाए और उनका ज्ञान नाद और उससे जुडी संज्ञा से आगे बढ़ ही न पाया। अपने उत्साह में वे अनुसन्धान कर रहे थे या भाषाविज्ञान की कब्र खोद रहे थे?

मकबरा बुलन्द है पर उसमें दबी लाश पर फूल चढ़ाए जा सकते हैं, हासिल कुछ न होगा। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान विज्ञान है ही नहीं, इसकी घोषणा भी उनके ही एक मेधावी को करनी थी!uŷ

Post – 2017-05-05

देववाणी (चैबीस)
अर्थविस्तार और आत्मविस्तार

‘अब ‘शेष कल’ वाली बात पर तो आओ।’

‘जिधर भटक गए उसकी गलियों से तो जान पहचान हो जाये। जिस तार को छेड़ दिया है उसके स्पंदन का तो अनुभव हो जाए ।’

उसके चेहरे से लगा, वह इस उत्तर से प्रसन्न नहीं है। शायद उसे डर था कि अब उसी बात को लेकर मैं उसके बेहोश होने तक अपना राग अलापता रहूंगा। मै उलझन में पड़ गया, फिर सोचा संक्षेप में कुछ तो बताना ही होगा। कहा, देखो ‘मैं कुछ उदाहरणों से यह बताना चाहता था की किसी बोली के प्रभाव से कुछ भाषाओँ में, जिनमें अन्य कोई समानता नहीं पाई जाती मूर्धन्य अनुनासिक ण के प्रति इतनी आसक्ति पैदा हुई कि वे न का ण के रूप में उच्चारण करने लगे। तमिल में तो ण के साथ साथ न के दो उच्चारभेद हैं। एक को हम अन्द = वह, इन्द= यह मेँ पाते हैं तो दूसरे को एन्रु = कब? किस दिन ? किस समय? मेँ । इसके बाद भी इसमें मन, मानव, मनन, आदि के आशयों में न को ण में बदलने की झक देखी जा सकती है:
माणम = महिमा उत्कृष्टता,
माणवकन् = विद्यार्थी
माणवन् = मानव
माणाक्कन् = विद्वान
माण = महत्व, सम्मान

देववाणी जिसे णकार का पता ही न था कौरवी क्षेत्र में पहुँच कर मनिआर (भोज. मनिहार) को मणिकार और मनका को मणि कहना पसंद करने लगी.
और एक बात की और भी ध्यान दिलाना चाहता था। लम्बाई नापने के लिए हाथ, ऊंचाई नापने के लिए अपने शरीर के जोड़ों और फिर अपनी काया और उससे ऊपर के अनुसार और दूरी नापने के लिए पांवों का सहारा लेता था। अतः अंगुल, वितस्त= बालिश्त , हस्त, भोग या भुज क्रम में माप होती थी, जिसमे हस्त को मान भी कहते थे. हस्त को तुम अंग्रेजी हैंड में और मान को मैनि- में देख सकते हो. ध्यान रहे मैन – मनु या मनुष्य से और मैनीपुलेशन हाथ के पर्याय मान से सम्बंधित है।

धरती की माप का संकेत विष्णु के तीन पग जमीन मांगने से समझा जा सकता है. और गहराईं मापने का सांकेतिक हवाला ऋग्वेद के दशवें मंडल के इकहत्तरवें सूक्त में मिलेगा जिसमे आदध्नास, उपकक्षास प्रयोग आए हैं और तुम आवक्ष, आशीर्ष और पुरुष प्रमाण या दोनों हाथ ऊपर उठाने के बाद की गहराई जिसके लिए पोरसा का प्रयोग होता है को इस क्रम में रख सकते हो। इससे अधिक गहरा हुआ तो अथाह!

एक बार कोई तार टूट जाय तो उसकी श्रृंखला बिखर जाती है. आपको यह याद दिलाना भी भूल गया की सचाई का अणु भी झूठ के पहाड़ की व्यर्थता प्रमाणित कर देता है. अंग्रेजी का मैन और दूसरी भाषाओँ में इसके सहोदर यह सच्चाई बयान करने के लिए काफी थे की होमो क्षेत्र का सम्पर्क मनु के देश से जुड़ा था या मनु की संतानें होमो प्रदेश में अपनी भाषा और संस्कृति के साथ पहुंची थीं. यहां मेरे उन पुराने लेखों को याद रखें की मनु युग या मानव युग देव युग के बहुत बाद में आता है. देव युग के पालतू पशुओं में मुख्य बकरी और गधा (अश्व) थे और मनु युग गोरू पालन के साथ आरम्भ होता है.

एक बात और याद दिलाने की थी कि मांड़, मड़िया संस्कृत में इसलिए न मिलेगा क्योंकि मड का कौरवी प्रभाव में मृदा हो गया। परन्तु बोलियों में यह चलता रहा। कौरवी प्रभाव संस्कृत पर पड़ा और अपने क्षेत्र में तो था ही। इससे बाहर यह लगभग निष्प्रभाव रहा। इसी तथ्य ने भाषाविज्ञानियों को सचमुच उलझन में डाल दिया था जिसका जिक्र हम पीछे कर आए हैं। अतः यह सोचना उचित नहीं कि हिन्दी का मिट्टी या भोज माटी, मटिया- मिट्टी का छोटा बर्तन, मेटा, मिट्टी का बर्तन, मृदा से व्युत्पन्न हैं। परन्तु मधुतता, मधु,ए मृदु आदि का सीधा संबंध मृदा और मृदु से है तथा मद, मत्त, मदन, का मत से। यह मुझे अभी ठीक लग रहा है परन्तु हो सकता है विचार क्रम में कोई दूसरा सूत्र सामने आए और इसमें सुधार करना पड़े। इसलि, मैं चाहता हूं आप इसे ध्यान से पढ़ें और प्रमसध्स न मानकर विचार प्रक्रिया मानें और खटकने वाली बातों से समय समय पर अवगत भी कराएं।

परन्तु आज तो तुम्हारे हस्तक्षेप के कारण जो कहना चाहता था कह ही न पाया।

Post – 2017-05-04

देववाणी (तेईस)
आधी जानकारी का आढ़ती

‘एक बात कहूं तो बुरा तो न मानोगे? उसने शायद पिछली खीझ मिटाने की भूमिका बनाते हुए सवाल किया।
‘तुदेम इस डर से कि कोई बुरा मान जाएगा, किसी बात को कहने में घबराहट अनुभव करोगे, यह पता लगने पर भी बुरा नहीं मानूगा, क्योंकि मैं जानता हूं इसके लिए अपनी समझ पर विश्वास और नैतिक दायित्व की जरूरत होती है। वह तुमलोगों के पास होता नहीं क्योंकि यह उस दाल या संगठन का नीतिगत फैसला हुआ करता है.

वह हत्प्रभ नहीं हुआ, ‘मैं यह कह रहा था कि तुम भरोसे के आदमी नहीं हो। अपने लिखित वादे भी पूरा नहीं कर पाते।’
मैं सचमुच चौंक उठा।

‘तीस अप्रैल की पोस्ट के अन्त में तुमने लिखा था ‘शेष कल।’ मैं प्रतीक्षा कर रहा था कि वह छूटा हुआ हिस्सा क्या है, पर वह कल तो आज तक हुई नहीं।

मुझे दिमाग पर जोर देना पड़ा। याद नहीं आ रहा था, पर इतना पता तो था ही कि कई विषयों को पूरा नहीं नहीं कर पाता इससे पहले ही चर्चा किसी दूसरे विषय की ओर मुड़ जाती है। यहां तक कि जिस बात को कहने की भूमिका बनाता हूं उसके तर्कों का दबाव ही दिशा बदल देता है। मैंने हाथ खड़े कर दिए, ‘यार अब तो हाल यह है कि कई बार अपना नाम तक भूल जाता हूं। याद नहीं आ रहा उस पोस्ट में लिखा क्या था.’

उसमें तुम मणि शब्द की हड्डी पहसली अलग करते चांद पर कदम रख चुके थे। मैंने सोचा इससे आगे सूरज की ओर तो बढ़ नहीं सकते, बढ़े तो भस्म हो जाओग, इसलिए चर्चा पूरी मान ली थी। फिर ‘शेष कल’ पढ़ कर उत्सुक था कि अधूरी जानकारियों का यह आढ़ती देखें कल कौन सी गठरियां खोलता है और इतजार में पांच दिन बूढ़ा हो गया।

अजीब बात है । भूलता हूँ तो कुछ भी यद् नहीं आता और फिर याद आता है तो पूरा दृश्य उपस्थित हो जाता है, ‘अब याद आया। लेकिन तुमने यह कैसे सोच लिया कि चांद के बाद सूरज का नम्बर नहीं आ सकता। देखो चांद और सूरज में आज जितना फर्क दिखाई देता है उतना पहले नहीं था। वे दूर तो थे पर उतने दूर और पराये भी नहीं। इनसे हमारी रिश्तेदारियां थीं। इसी से तुम हमारी पुरानी हैसियत नाप सकते हो. सूरज तो चाँद से भी अधिक पास था. सुना है वह बच्चों के खेल में गाया जाने वाला गीत – चान मोर मामा सुरुज मोर पित्ती. ज्योतिर्विज्ञान में जैन चिन्तकों का काम कम नहीं है लेकिन वे मानते थे कि चांद सूरज से भी बहुत दूर है, क्योंकि उसकी गर्मी पता ही नहीं चलती जब कि निकट होने के कारण सूर्य अपने ताप से झुलसा देता है।’

उसे हैरानी हुई।

‘और जहां तक शब्दों का प्रश्न है, दोनो हमारे लिए चमकदार हैं, इसलिए चान या चन्नन को सूर्य बनते देर न लगेगी। चन्द्रमा में मे जो चन है वही अंग्रेजी में सन है और तमिल चेन्नै का मतलब जानते हो?’

नहीं जानता था। मैं सचमुच अधूरी जानकारियों का आढ़ती हूँ, अब मुझे भी लग रहा था.

‘चेन का अर्थ कभी सूर्य था, अब भूल गया लगता है। चेन्नम के अनेक आशयों में एक है सूर्यवंश। चेन्नै मद्रास का पुराना नाम था जिसका उद्धार करनेवाली जया ने अपने समाचार चैनल का नाम सन टीवी रखा था। यद्यपि चेन्नै के नामकरण के विषय में कुछ अन्य किंबदन्तियां भी प्रचलित हैं। चान, सन, और सनि (शनि) में चन को स्पष्ट देखा जा सकता है। तुम कहोगे शनि नहीं, सनीचर, शनिश्चर, शनैः चरति इति शनैश्चरः । मैं चुप लगा जाऊँगा, अपनी अधूरी जानकारी के कारण.

‘तब एक बात की ओर तो मेरा ध्यान गया ही नहीं था, इसलिए तार्किक संगति के आधार पर यह मानते हुए भी कि चन्द्रमा के मध्य पद द्र का प्रयोग भी किसी समुदाय में चन्द्रमा के लिए प्रयोग होता रहा होगा, मुझे ऐसा कोई शब्द ध्यान में नहीं आ रहा था जिसका प्रकाश, ज्ञान या किसी ग्रह नक्षत्र से संबंन्ध हो।

मुझे कौरवी प्रभाव में बने द्र के उस प्रभाव से मुक्त रूप पर विचार करना चाहिए था। वह था तर पर उस समय तरणि, तारा, और मुहावरे का आंख का तारा याद ही न आया । अब साथ ही यह भी देखो कि आंख की पुतली के लिए एक भाषाभाषी समुदाय पुतली का, दूसरा कनि / कनी या कनीनिका का और तीसरा तार / तारा का प्रयोग करता था। कन को ही चवर्गीय समाज चन कहता था जो चान, बना।

आज की स्थिति में हम तय नहीं कर सकते कि (१) चन/ चान , (२) तर/तार (३) मन और (४) मस किन बोलियों में प्रचलित रहे होंगे, पर यह कह सकते हैं कि तर का प्रयोग करने वाला अल्पप्राण और अघोषप्रेमी प्रेमी रहा होगा। इस प्रसंग में आज तमिल का स्मरण हो आता है। पर तमिल का अपना शब्द कन था या तर यह तय करने चलें तो समस्या पैदा हो जाएगी। कन तमिल में आंख के लिए प्रयुक्त मिलता है, जिसमें अनुनासिक मूर्धन्य है, तर के विषय में कोशकार संस्कृत का आभार मानते हैं।

खैर हम कह सकते हैं कि यह समुदाय घोषप्रेमी समुदाय के संपर्क में तर को दर भी पुकारने लगा होगा या यह तर बोलता रहा होगा । घोषप्रेमी उसे दर सुनता और बोलता रहा होगा और कौरवी ने इसका कबाड़ा करके द्र/ दृ आदि में बदला जिससे एक ओर तो हमारी दृग, दृष्टि. दृश्य, दृष्ट, दृष्टान्त और वैदिक दृशीक, द्राक्षीत का संबन्ध है, दूसरी ओर दर्प और दर्पण का दृ से जो शब्द भंडार तैयार हुआ है उसे दुहराने का औचित्य नहीं। इसके विपरीत तर ने तृषा, तृप्त, तृप्ति, तरु, तरणी ही नही तर्पण, तारतम्य और तरीका आदि शब्दों का आविर्भाव किया।

तर, तर तर चूना, किसी पत्ती पर पड़ी बून्द के ढरकने की ध्वनि को, या जैसा पसीने की बून्द के खिन रुक कर एक झटके में नीचे जाने के क्रम में ध्यान से सुने स्वन पर ध्यान दें तो पता चलेगा यह अनुनादी शब्द है. यही हाल चन/ चम का है. मन मत और मस का है. सभी जल की ध्वनियाँ हैं. यदि अभी तक चंचल, हलचल; तरपत / तड़फड़ाने का अर्थ समझ न पाए हो तो याद करो पानी के अभाव में विकलता को।
भाषाविज्ञानियों की चिंता थी भाषा का इतना जटिल ढांचा अनुनादी स्रोत से कैसे पैदा हो सकता है. हम ऊपर के किसी अनुनाद को लेकर उत्पन्न विपुल शब्दभंडार पर ध्यान दें जिसमे क्रिया मूल या धातुएं हैं, संज्ञाएँ हैं, विशेषण हैं, भाववाचक और गुणवाचक शब्द है, और उपसर्ग और प्रत्ययों का आदि रूप हैा
परन्तु मैं उस दिन जो बात कहना चाहता था वह इससे अलग थी।

Post – 2017-05-03

देववाणी (बाईस)
सान्ध्यराग

उसे नींद आई थी या नहीं, नही जानता । उठा आंख मलते ही थी, वह भी चाय के लिए आवाज लगाने पर, हाथ मुंह धोकर चाय के लिए बैठा तो प्याला उठाने के साथ बोला, ‘हां अब बताओ!’

मैं हंसने लगा।

‘हंसने से काम नहीं चलेगा। बगलें मत झांको। जवाब तो देना ही पड़ेगा।‘

‘मैं जब कहता हूं पश्चिम का प्रखर से प्रखर बुद्धिजीवी भाषा की उत्पत्ति को नहीं समझ सकता तो न तो मेरे मन में उनकी बौद्धिक क्षमता को लेकर कोई सन्देह है, न ही उनके अध्यवसाय को लेकर। इन सभी मामलों में वे हमारे लिए अनुकरणीय हैं। उनकी अनुसंधान पद्धति हमसे अधिक विकसित है, जिस सीमा तक हम उसका निर्वाह करते हैं, परीणाम अच्छे ही आते हैं। हम उनका निर्वाह नहीं कर पाते पर उन्हें बचपन से ही, कहो छोटी कक्षाओं से ही इसकी आदत डाल कर इसे उनके सामान्य आचरण का अंग बना दिया जाता है। हम अनेक दृष्टियों से पश्चिम से पीछे हैं और कुछ माने में अपने गौरवशाली दिनों में भी उनसे आगे नहीं रहे। साधनों और सुविधाओं की तो कोई तुलना संभव ही नहीं।

इसके बाद भी जब मैं मानविकी के क्षेत्र में उनकी कुछ अशक्यताओं की बात करता हूं तो इसलिए कि जिन प्रतिज्ञाओं का पालन वे प्रकृत विज्ञान के क्षेत्र में करते हैं उनका निर्वाह वे मानविकी में नहीं करते। ऐसा नहीं कर पाते क्योंकि यहां विजय का संकल्प (the will to conquer), प्रभुत्व का आवेग (the urge to dominate) इतना प्रबल रहा है कि विवेक इन आवेगों का गुलाम बन जाता रहा है। वैज्ञानिकता से प्रेम की कसमें खाने के बाद भी वे कुछ मामलों में इतने जाहिल सिद्ध होते हैं कि उनकी सर्वोत्तम मेधाएं भी परिवेशीय दबाव में इस तरह झुक, मुड़ और बदल जाती हैं कि जब तक यह समझ न लो कि अमुक कारणों से ये ऐसी गलतियां कर सकते हैं और ऐसे स्थलों को पहचानते न चलो तब तक उस विडंबना को समझ ही नहीं सकते जिसके शिकार अन्यथा बहुत सचेत और तत्वदर्शी विद्वान भी हो जाते रहे हैं।

मैं स्वयं इसे समझाने चलूँ तो तुम्हारी खोपड़ी में यह बात घुसेगी ही नहीं, इसलिए अपने प्रिय भाषाविज्ञानी सस्यूर की कुछ निष्पत्तियों की ओर तुम्हारा ध्यान दिलाना चाहूंगा। मैं ज्योतिषी नहीं हूँ परन्तु इस बात का पूर्वानुमान मुझे भी था कि तुम किस तरह के सवाल मुझसे करोगे, इसलिए जब तुम सो रहे थे मैं अपने नोट तलाश रहा था, जिसे जो मान बैठा उसे बहुत कुछ हासिल होगा, परन्तु यह आत्मविश्वास नहीं कि मैंने अपनी जानकारी का सही उपयोग करते हुए सत्य को समझने का प्रयास किया है और हमने अपनी समझ पर विश्वास करनेवालों को गुमराह नहीं किया है। पहले इन वाक्यों को हृदयंगम करो और आराम से चाय पिओ फिर बात करेंगे:
१. The sense of a term depends on presence or absence of a neighbouring term.
२. The system leads to the term and the term to the value.
३. system of words as opposed to the word in isolation.
४. what are our ideas, apart from our language ? They probably do not exist.
५. … there is nothing at all distinct in thought before the linguistic sign.
६. Idea of different tenses, which seems quite natural to us, is quite alien to certain languages। As in the Semitic system (Hebrew) there is no distinction, as between present, future and past; that is to say these ideas of tense are not predetermined, but exist only as value..
७. So the whole language system can be envisaged as sound differences combined with differences between ideas.
८. There are no positive ideas given, and there are no determinate acoustic signs that are independent of ideas.
९. In the end, the principle it comes down to is the fundamental principle of the arbitrariness of the sign.

इसका लाभ मुझे तो मिला पर वह मेरे नोट में इस तरह उलझ गया कि उसकी चाय ठंढी हो गई और इतना नुकसान सहने के बाद एक लाभ उसे भी हुआ, उसने सवाल किया, ‘इसमें गलत क्या है?’

मैंने कहा, ग़लत यह है की इसके कारण तुम्हारी चाय ठंढी हो गई। मैं जानता था चाय तो ठंढी होगी ही, इसलिए केतली में गर्म पानी बचा रखा था। अब तुम चाय पियो और मेरी बात ध्यान से सुनो! मैंने नई चाय बनाई और पेश करने के बाद जब वह चाय पीने चला तो कहा, अब बोलूंगा मैं, और तुम मेरी बात पूरी होने तक चुपचाप सुनोगे।

जवाब में उसने चाय की चुस्की ली और मेरी ओर कुछ इस अंदाज से देखा जैसे कह रहा हो। ‘मंजूर !’

मैंने कहा इन वाक्यों का एक एक कथन इतना सही है की मैं इनमें से किसी का विरोध नहीं कर सकता, पर कमी यह है की विचारक ने अपनी ही प्रतिज्ञाओं का निर्वाह नही किया है। यदि श्रव्य संकेत के बिना विचार संभव ही नहीं है और विचार रहित श्रुत संकेतों का कोई अर्थ ही नहीं तो श्रुत संकेतों का एक निरर्थक पर्यावरण होना चाहिए जिसमें कुछ ऐसे लक्षण होने चाहिए जिनके कारण किसी श्रुत इकाई को किसी विचार का वाहक माना जा सके। इसमें एक सीमा तक मनमानापन भी है की किसी अर्थ में एक ध्वनि के रूढ़ हो जाने के बाद यह प्रयत्न रहे की वही ध्वनि किसी दूसरे के लिए प्रयोग में न आये, परन्तु इसमें अनुनाद की जो स्पष्ट भूमिका थी उसे आंकने में उनसे चूक हुई क्योंकि:
१- पाश्चात्य भाषाएं अपनी जड़ों से दूर होती गई हैं इस लिए वे अनुनादी शब्दों की भूमिका का महत्त्व न समझ सके न समझ सकते थे क्योंकि वे वे यूरोपीय भाषाओँ को सबसे उन्नत भी सिद्ध करना चाहते थे और सबसे पुरानी भी।
२. सास्युर को यह पता था की रोमांस बोलियों की पड़ताल से पुरानी धारणा बदली की मानक भाषाओँ से बोलियां पैदा हुई हैं और एक उल्टा सत्य सामने आया की मानक भाषाएं किसी एक बोली के अभ्युदय के फलस्वरूप अस्तित्व में आई है। फिर उन्हें पूर्ववर्ती चरणों के लिए अपेक्षाकृत अल्पविकसित बोलियों की बात करनी चाहिए थी। हम इसके लिए उन्हें दोष नहीं दे सकते क्योंकि वह इस झमेले में पड़े ही नहीं, प्रामाणिक आंकड़ों के आधार पर ही अपने विचार रखते रहे।
३. परन्तु हम उनको इस बात के लिए दोषी तो मान ही सकते हैं जिसके लिए नहाने के पानी के साथ बच्चे को भी फेंक देने का मुहावरा बना है।
मुझे और कुछ नहीं कहना है। अब तुम कुछ कहना चाहो तो सुनने को तैयार हूँ।

उसने कहा, ‘यार मुझसे तेरी ऐसी क्या दुश्मनी है। कभी तो मुझे भी यह भरम पालने का मौका दे दिया कर की मैं भी कुछ जनता हूँ।’

Post – 2017-05-03

देववाणी (इक्कीस)

तुम्हारे आरम्भ में ही तुम्हारा अंत है

‘तुम किस बुरे अनुभव की बात कर रहे थे? अधिक तो नहीं पर कुछ भाषाविज्ञान मैं भी जानता हूं। उन्होंने कई पहलुओं से इसे जांचा और पाया कि भाषा के इतने जटिल ढ़ाचे का विकास अनुनादी शब्दों से नहीं हो सकता और उसी आजमाए और छोड़े हुए रास्ते को अपना कर, तुम विषय से अनजान अपने भोलेभाले पाठकों को भ्रमित करते हो, और तेवर ऐसा अपनाते हो कि जैसे भाषाविज्ञान में क्रान्ति कर रहे हो।’ मेरा मित्र मिल जाय और कोड़ों की बरसात न शुरू हो जाय यह संभव ही नहीं है।

मै मुस्कराता रहा और सिर्फ इतने से ही वह नर्वस होने लगा। इसका मजा लेते हुए मैंने कहा, ‘बैठो। अपना सारा ज्ञान उलाटने के बाद खाली हो चुके होगे, लो पानी पी लो। कुछ तो भीतर रहे।

उसने पानी का गिलास तो बिना कुछ कहे ले लिया, एक दो घूंट पीकर गिलास एक किनारे रख भी दिया, पर देखता उसी तेवर से रहा जिसमे अब चुनौती के साथ उलझन भी मिल गई थी।

‘‘देखो, जो अन्तिम ज्ञान तक पहुंच चुके हैं वे कुछ नया समझना तो दूर सुनने को भी तैयार नहीं होते, इसलिए मैं तुमसे यह उम्मीद नहीं कर सकता था कि तुम यह मोटी सचाई तक समझ पाओगे कि जटिल तन्त्रों का विकास जिन सूक्ष्म आद्य रूपों से होता है उनमें उस जटिलता की समग्र संभावनाएं निहित होती हैं। जैसे बट बीज में बटवृक्ष, शुक्राणु और सूक्ष्मांड में मनुष्य के सभी गुणसूत्र।

रही बात उस अनुभव की बात तजिसका हवाला दे कर मैं आगे बढ़ गया। उसका एक इतिहास है जो ग्रीक सभ्यता तक जाता है। वहां अफलातून यानी प्लेटो ने भाषा पर विचार करते हुए खासी मशक्कत करने के बाद भी खासी नासमझी की बातें की थीं। वह केवल संज्ञाओं को ही पूरी भाषा मान कर उसे समझने का प्रयत्न कर रहे थे और जिस तर्क सरणी से बढ़ रहे थे वह उस मशक्कत के अनुरूप ही मूर्खतापूर्ण थी और इसके बाद भी उसमें कुछ तत्व की बातें थीं जिन्होंने अस्तित्ववादी दर्शन में प्रेरक का काम किया। जैसे यह किसी वस्तु को हम अपनी जरूरत के अनुसार देखते और जानते हैं, पर यह उसका अपना स्व नहीं होता। वह अपने आप में हमारी जरूरत से भिन्न कुछ होता है। पर्यायों की समस्या, बहुअर्थी शब्दों की समस्या, इसमें नैसर्गिकता और मानवीय हस्तक्षेप आदि सवालों से भी टकराये थे और इस उहापोह में संज्ञाओं की रचना या उत्पत्ति को समझने का प्रयत्न किया था. जैंसे एक फिरकी (शटल) लकड़ी की होती है पर लकड़ी फिरकी बनने के लिए नहीं होती, न फिरकी होती है, इस सिलसिले को तुम पीछे और खींच सकते हो। अब फिरकी के लिए शब्द पर विचार करते हुए वह कहते हैं, फिरकी जुलाहे की जरूरत है कि वह धागों के बीच से गुजर सके पर जुलाहा फिरकी नहीं बना सकता। इसके लिए उसे बढ़ई के पास जाना होगा और अपनी जरूरत बतानी होगी जिसकों ध्यान में रख कर वह फिरकी बनाएगा। नई चीज़ के लिए नए शब्द की जरूरत जिसे होती है वह शब्दकार के पास जाता है कि मुझे इसके लिए नाम चाहिए और वह उसे उसकी संज्ञा देता है।’ मैंने अपना माथा पीट लिया।

‘इसमें गलत या मूर्खतापूर्ण क्या है? हमारे यहां भी लोग बच्चे का नाम रखने के लिए पंडित के पास जाते रहे हैं और वह नामकरण करता रहा है।’

‘मैंने कहा न जब जनमकुंडली वाली समझ से भाषा की उत्पत्ति तलाशने चलोगे जिसमें ध्वनियों का भंडार तुम्हारे पास है, सिर्फ चुनाव करना है कि इस नई चीज को कौन सा नया नाम दूं जो दूसरे लोगों या चीजों को दिए गए नामों से अलग हो तो इस तरह की यांन्त्रिकता रहेगी।

अंतर इतना ही है कि हमारे यहां जैसा कि पतंजलि ने कहा था कि लोग नाम रखवाने के लिए वैयाकरण के पास नहीं जाते, वे अपनी जरूरत के अनुसार स्वयं नाम गढ़ लेते हैं, पर यान्त्रिकता हमारे यहां भी थी। वह ज्ञान व्यवस्था ही ऐसी थी कि उसमें भाषा की उत्पत्ति को ही नहीं इसके चरित्र को भी समझने में कठिनाइयां थीं। इसी से घबराकर फ्रांस में जब भाषा विषयक अनुसंधान की संस्था बनी तो उसमें यह चेतावनी थी कि इसमें भाषा की उत्पत्ति पर बात न की जाएगी।

‘इसका मुझे पता नहीं था, ‘ उसने सहज भाव से स्वीकार किया।

‘ मेरा भी ज्ञान, तुम्ही बताते हो कि बहुत अच्छा नहीं है और सिर्फ इस मामले में तुम्हारी जानकरी ठीक है। खैर इसका हवाला मैक्समुलर ने दिया था और इसका अनुमोदन करते हुए दिया था फिर भी वह शब्दों के इतिहास की बात करते हैं, व्युत्पत्ति की बात करते हैं।’’

वह मुस्कराने लगा, जबान से कुछ न कहा।

‘भाषा की उत्पत्ति की समस्या भाषावैज्ञानिकों में से कुछ की इस चिन्ता से आरंभ हुई कि आज की दुनिया में यदि सभी देश और समाज एक ही भाषा में बात करें तो सबका ज्ञान सबके द्वारा साझा किया जा सकता है। विगड़ते हुए हालात में भाषाई अहंकार को त्याग कर सभी राष्ट्र किसी एक भाषा में बात करें तो राष्ट्रों के बीच तनाव कम किया जा सकता है। इसी आशा और विश्वास से नई भाषा गढ़ने के क्रम में उन्होंने भाषा की उत्पत्ति के सवाल पर फिर विचार करना आरंभ किया और कई तरह के सुझावों के बीच एक ऐसी भाषा तैयार की जिसे मैं दुनिया की सबसे सरल और सुन्दर भाषा मानने को तैयार हूं। यह थी एस्पेरान्तो जिसं संयुक्त राष्ट्रसंघ की भी मान्यता प्राप्त है।

‘परन्तु बहुत सुथरी और निखोट कृत्रिम रचना नैसर्गिक विकास का स्थान नहीं ले सकती, न ही उन रहस्यमय पक्षों को आत्मसात् कर सकती है जो उसमें है। एस्पेरान्तो नहीं चल पाई। राष्ट्रसंघ के प्रोत्साहन और आधुनिक विश्व की जरूरत के बाद भी। यह एक खतरनाक प्रस्ताव था, इसे भी नहीं समझा गया। नैसर्गिक विविधताओं को नष्ट करते हुए कुछ को सर्वोत्तम मान कर शेष को मिटाने या उनके मिटने की परिस्थितियां तैयार कर देना एक खतरनाक विकल्प है । सबसे रोचक बात यह कि नई भाषा गढ़नेवालों ने यह समझने का पूरा प्रयास किया कि भाषा की उत्पत्ति कैसे हुई और उसी का सहारा लेकर अपनी नई विश्वभाषा गढ़ना चाहते थे। इसे लेकर हास्यास्पद अटकलबाजियां करते रहे परन्तु समझ न सके। जो नई भाषा गढ़ी वह भी यूरोपीय भाषाओँ का वैसा ही पचमेल था जैसा PIE के रूट्स की उद्भावना करते हुए किया जाता रहा है और जिसकी आलोचना स्वयं ऐसे भाषाविज्ञानी भी करते रहे थे। यूरोप का आदमी कितना भी प्रखर हो वह भाषा की उत्पत्ति को नहीं समझ सकता।’

अब उसके ठठा कर हंसने की बारी थी, हंसी थमी तो बोला, ‘मैं पहले से जानता था तुम आओगे इसी ब्रह्मसूत्र पर।’

‘मैं यही कह रहा था कि तुम पहले से सब कुछ जानते हो इसलिए न कुछ धैर्य से सुन सकते हो न अपने माने हुए से अनमेल पड़ने वाले किसी सत्य को समझ सकते हो। यहां तक कि तुम सही सवाल तक नहीं कर सकते नहीं तो अपना फैसला सुनाने से पहले पूछा होता कि मई ऐसा कह किस आधार पर रहे हो ?

उसका उत्साह ठंडा पड़ गया, सम्भलने में कुछ समय लगा, फिर बोला, ‘चलो, तब नहीं तो अब सही। अब तो बताओ कि यह राय तुमने बनाई किस आधार पर है?’

‘थक गए होंगे। आराम करो। शाम को बात करेंगे।’

Post – 2017-05-02

देववाणी (20)
जननी भाषा और आद्य रूप

भाषा की उत्पत्ति कैसे हुई इस सवाल से पाश्चात्य भाषाविज्ञानी बचते भी रहे है, टकराते भी रहे हैं और मुंह की खाते भी रहे हैं और इन अनुभवों के कारण इससे उलझने से कतराते भी रहे हैं। आप भाषा की बात करें और शब्दविचार न करें यह संभव नहीं। शब्दविचार करें और व्युत्पत्ति का सवाल न खड़ा हो यह संभव नहीं। व्युत्पत्ति के साथ ही भाषा की उत्पत्ति का प्रश्न अनिवार्य हो जाता है। परन्तु इसका उनका अनुभव बहुत बुरा रहा है।

सच कहें तो उत्पत्ति का सवाल जिस रूप में विकासवाद के मान्य होने के बाद सामने आया वह पहले संभव ही नहीं था। सच कहें तो ईश्वर के हत्यारों में सबसे पहला नाम डार्विन का ही आता है। उससे पहले ईश्वर था, उसकी बनाई हुई सृष्टि थी, उसकी एक व्यापक योजना थी, उसके बनाए पशु, पक्षी, मनुष्य सभी थे और उसके भीतर ही वे अपनी करामात कर सकते थे पर उससे बाहर नहीं जा सकते थे।

इसलिए ग्रीस हो या प्राचीन भारत या दुनिया का कोई दूसरा देश, उत्पत्ति की बात सोच ही नहीं सकता था। यही कारण है कि हमारे भाषाचिन्तक जिन्होंने भाषाचिन्तन को आश्चर्यजनक उूंचाईयों पर पहुंचाया वे भी अपनी ओर से कुछ जोड़ने बदलने की बात को तो नकार ही नहीं सकते थे, परन्तु उत्पत्ति की बात उनकी कल्पना में भी नहीं आ सकती थी। आज हम जिन बातों पर हंसते हैं कि इतने बुद्धिमान लोगों ने इतनी मूर्खतापूर्ण बात कैसे सोच और मान ली, जैसे सृष्टि के पहले से ही भाषा ही नहीं वेदों तक का अस्तित्व, वे हों किसी देश के, डार्विन से पहली अपने पुराणगाथा के अनुसार उन्हीं बातों का उतना ही या उससे भी हास्यस्पद समाधान दे सकते थे पर इस सोच और विश्वास पर हंस नहीं सकते थे।

वह सीधा सादा आदमी, जो किसी मानी में असाधारण न था, जो देखा उसे कहने के साहस के कारण दुनिया का सबसे बड़ा मजाक करते हुए बन्दर को आदमी बना कर पेश कर दिया और पेश भी इस मासूमियत से किया कि सबने इसे सच भी मान लिया. जादू ओह जो सर चढ़कर बोलेा मुहावरा तो पहले से था, पर जादू ने सर चढ़कर बोलना डार्विन के इशारे पर शुरू किया.

गोरा होते हुए गोरेपन से ऊपर उठकर, ईसाई होते हुए भी ईसाई विश्वासों से ऊपर उठकर अपने रंग पर गरूर करने के कारण काले रंग को भी गाली बना देने वाले समाज को थप्पड़ लगाते हुए बानरों की सन्तान बना दिया। मुहावरा उल्लू बनाने का है, बन्दर बनाने का होना चाहिए। यह ऐसा मजाक था जिसने हमें उन चीजों पर हंसना सिखाया जिनके सामने हम लाचार हो कर हाथ जोड़े खड़े हो जाते थे, या सिर रगड़ने लगते थे। मनुष्य की साधारणता के बीच से उसकी महिमा की यह तलाश ही आधुनिकता है। आधुनिकता के जनक, विज्ञान युग के जनक, मेरी समझ से गैलीलियो या कोपर्निकस नहीं, डार्विन हैं।

अतः हमें इस बात का खेद नहीं है कि हमारे महान भाषाचिन्तक भाषा की उत्पत्ति की समस्या से उलझे बिना व्युत्पत्ति की तलाश में जुटे और इसके लिए धातुओं की कल्पना की और अपना काम इस मनोयोग से किया कि यह आधुनिक भाषाविज्ञानियों को भी अपने जादू में बांध कर भटकाने में समर्थ रहे।

पश्चिमी जगत अपने को वैज्ञानिक सोच का बताता है और सूचना, ज्ञान और प्रचार के सभी माध्यमों का अकूत विस्तार करने के बल पर जिसे जो भी सिद्ध करना चाहता है करने में सफल हो जाता है क्या वह अपनी सोच में वैज्ञानिक है?

यदि हाँ, तो वह जननी भाषा या आद्य भाषाओँ को प्रौढ़ या अपनी पूर्णता पर पहुंची भाषाओँ के बहुनिष्ठ घटकों को जोड़ते या कुछ समायोजन करते हुए आदिम अवस्थाओं की बात कैसे कर सकता है? क्या बहुत सारे प्रौढ़ मनुष्यों के सभी लक्षणों के बहुनिष्ठ तत्वों को मिलाकर (भ्रूण की बात तो छोड़ दें, क्योंकि भाषा की उस अवस्था का ज्ञान हमें भी नहीं है) नवजात शिशु की काया, ज्ञान, व्यवहार आदि को समझ सकते हैं. क्या यह मोटी समझ उन ग्रंथो और नियमों और पुनर निर्मित मूलों (रूट्स), पल्ल्वदण्डों (स्टेम्स) और विवेचनों में दिखाई देती है? डार्विन के बाद भी पाणिनि की नकल करने वाले क्या वैज्ञानिक युग के प्रतिनिधि है? और उन्हें जगद्गुरु मानने वाले ?

Post – 2017-05-01

देववाणी (उन्नीस)

मै आज की चर्चा किसी दूसरे कोण से आरम्भ करना चाहता था. एक व्यवधान के कारण, जिसमे यह आभास हुआ कि मेरे पाठकों के मन में भाषा के प्रति एक सचेतता पैदा हुई है. यह सुखद था. पर इसका एक डरावना पक्ष यह था कि उनमें ऐसे शब्दों को लेकर अपनी व्याख्या अपनी ज्ञान सीमा में देने की लालसा भी पैदा हुई है जिसके उलटे परिणाम हो सकते हैं. इसलिए विषय को यहीं से आरम्भ करते है.
मनुष्य ने जितनी भी संस्थाएं बनाई हैं, भाषा सबसे पुरानी है. वह दूसरी संस्थाएं, इनमें भाषा के बाद समाज का स्थान भी आता है, भाषा के अभाव में निर्मित नहीं हो सकती थी. इस विषय में विवाद हो सकता है कि भाषा अधिक पुरानी है या समाज. इस तर्क से कि भाषा एक सामाजिक संस्था है समाज को भाषा से भी पुरानी माना जा सकता है. हम यह निवेदन करना चाहते हैं कि सामाजिकता यूथबद्धता से आगे की संस्था है और भाषा सम्पन्नता ने ही मूल्यों का सृजन करके यूथ या झुण्ड को समाज में बदला. जो भी हो दोनों का चोली-दामन का साथ है और दोनों के गठन, विस्थापन, बिखराव और समायोजन का दूसरे पर असर पड़ता है और यदि हम धैर्य से काम लें तो समाज के इतिहास का बहुत कुछ भाषा के विवेचन से समझा जा सकता है.
स्तालिन काल में एक पुस्तिका पढ़ने को मिली थी – स्तालिन ऑन लैंग्वेज. राज्याध्यक्ष अवसर के अनुरूप अधिकारी व्यक्तियों द्वारा लिखित भाषण देते हैं इसलिए इसे सोवियत भाषावैज्ञानिकों का भाषा विषयक मत मान कर पढ़ा जाना चाहिए.

उसमे जिस बात को रेखांकित किया गया था वह यह कि भाषा का सम्बन्ध न आधार से है न अधिरचना से. यह दोनों को संभालती, एक के बदलने के बाद स्वयं बदलती नहीं और बदलाव को सँभाल भी लेती है. ठीक यही बात समाज के विषय में कही जा सकती है. अर्थ व्यवस्था में बदलाव के साथ समाज व्यवस्था नहीं बदलती न उससे अप्रभावित रहती है. समाज व्यवस्था इसलिए नहीं बदलती क्योंकि समाज मात्र अर्थ आधारित नहीं है-
भाषा हो या समाज दोनों की संरचना बहुत जटिल है और इनकी एक दूजे पर निर्भरता इतनी गहन है कि भाषा को नष्ट करके समाज को नष्ट किया जा सकता है और समाज को नष्ट करने के बाद तो भाषा बच ही नहीं सकती.
इसलिए भाषा हो या समाज आपको हर तरह की छूट देते या दे सकते हैं, भाषा के व्यवहार में या सामाजिक आचार में हमे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारा हस्तक्षेप कैसा हो, कहाँ हो और किस रूप में हो.

जिनको इस जिम्मेदारी का ध्यान नहीं है वे राष्ट्रगान गाते हुए राष्ट्र को हानि पहुंचा सकते हैं और अंतर्राष्ट्रीय गाते हुए भी अपने पावों के नीचे की जमीन पर भी अपना अधिकार खो सकते है. वे खो सकते है भाषा को भी और समाज को भी. समाज में समस्याएं है, भाषा में समस्याएं हैं. हस्तक्षेप जरूरी है. इसके बिना तो हम जीवंत मुर्दों में बदल जाएंगे.
परन्तु बदलाव के लिए उस चीज़ कि समझ जरुरी है जिसे आप बदलना चाहते हैं, इसके लिए जरूरी तैयारी में लम्बा समय लगता है. क्या यह तैयारी की गई. इन सवालों पर अपनी मूर्खताओं पर क्या कभी सोचने का समय निकला? मैं इनका उत्तर न दूँगा, न यह पूछूंगा कि क्या क्रांतिकारी मनसूबे पालने वाले आज भी आत्मनिरीक्षण करते है. जो वन्देमातरम कहना होगा को राष्ट्रगान बनाना चाहते हैं क्या उनमे से किसी ने अपनी भाषा और समाज का गहन अध्ययन किया. जिस राष्ट्र या विचारधारा के प्रति इतनी भक्ति है कि वह घर से चौराहे तक फ़ैल जाती है उसके लिए इतना भी त्याग न करने वाले कि वे समाज और संस्कृति का, उसकी भाषाओँ का गहन अध्ययन करें वे वाममुखी हों या दक्षिणमुखी क्या वे इसका जवाब देंगे कि यह जरुरी काम किये बिना वे स्वेच्छा से उनके गुलाम क्यों बनते जा रहे हैं जो आपका जरूरी काम आपको अपना मनोवैज्ञानिक गुलाम बना कर रखने के लिए कर रहे हैं?

भाषा में गहन अध्ययन और और जो कुछ प्राचीन मुनियों पंडितों ने कहा है उस पर विश्वास करके चलना जरूरी है। जहां वे नियम चुक जाते हैं वहां से आगे की बात भी उन्हीं के बताए नियमों, सिद्धान्तों के अनुसार की जाती है और उसके लिए और लंबी तैयारी की जरूरत होती है। उसके बाद भी मन में आशंका बनी रहती है कि कहीं ऐसा न झूट गया हो जिससे निष्कर्ष पूरी तरह बदल जाये। उदाहरण के लिए मैंने सस, स्रंस से भोजपु. संस् को व्युतपन्न माना जो कि गलत लगता है. सस जिससे शश और फिर शशि का सम्बन्ध है.
सस आगे बढ़ने तेजी से बढ़ने के लिए तेज धारा की सरसराहट से उपजी ध्वनि है, स्रंस का स्रोत वही है पर अंतःसर्ग के कारण अर्थ बदल जाता है और यह खिसकने छूटने के आशय में प्रयोग में आता है – गांडीवं स्रंसते हस्तात्, इसलिए भोजपुरी का संस उस संस से जो शंस बना पर संस्कृत में प्र लगने के बाद ही मिलता है, निकला है यह मानना ठीक होगा।