Post – 2016-12-16

प्रसंगवश
आज एक संगोष्‍ठी में शामिल हुआ । उसमें एक वक्‍ता ने कई असुविधाजनक प्रश्‍न उठाए । आंकड़े देते हुए। आंकड़े बोलते हैं हम नहीं। मुझे समाहार करना था पर इस ओर ध्‍यान देता तो अपनी बात कह नहीं पाता और उस समय सीमा के भीतर गोष्‍ठी समाप्‍त न हो पाती जितने समय के लिए अनुमति थी। उस वक्‍ता को मैं विशेष रूप से इसलिए चर्चा में रख रहा हूं कि उनकी अधिकांश आपत्तियों का उत्‍तर दूसरे वक्‍ताओंं ने दे दिया था। प्रश्‍न करने वाले वक्‍ता का पहला वाक्‍य सुन कर ही आप अनुमान कर सकते थे कि वह किस विचारधारा से जुडे हुए है और इसी तरह उनका प्रतिवाद करने वाले वक्‍ताओं के तर्कों को सुन कर हम उनकी सोच का भी पूर्वानुमान कर सकते थे। यह कोई नई बात नहीं है। इसके प्रमाण हमारे लेखाों,वक्‍तव्‍यें और अब तो जिसे सामाजिक माध्‍यम कहते हैं उस पर भी देेखने काेे मिलते रहते हैं ।

इन दो धुवों के बीच ही सचाई के अनेक रूप हैं जिस पर कुछ अलग रह कर विचार किया जाय तो हम अपनी समझ में कुछ सुधार कर सकते हैं। उसकी सभी बातेंं गलत थींं और सभी बाते तथ्‍यों पर आधाधारित थींं। तथ्‍य तो तथ्‍य हैं, उन्‍हे झुठलाया तो जा नहीं सकता । प्रश्‍न है एक ही चीज सच होते हुए गलत क्‍यों हो जाती है और गलत होते हुए भी कुछ लोगों को अकाट्य क्‍यों प्रतीत होती है और उसी के दोनों पक्षों के बीच हम सचाई तक कैसे पहुंंच सकते हैं और उस सचाई के कितने उपेक्षित या अनदेखें पहलुओं का साक्षात्‍कार कैसे कर सकतेे हैं।

उसेे देश जैसे विशद विषय पर कुछ कहने में कुछ उलझन हो रही थी । बहुतों को ऐसे प्रश्‍न इस खतरे का संकेत प्रतीत होते हैं, कि इसकी आड़ में देश भक्ति को इस रूप में परिभाषित किया जा सकता है, और उनसे अपने जीवन व्‍यवहार में ऐसी अपेक्षाओं की पूर्ति की मांग की जा सकती है जिसे पूरी न करने पर उन्‍हें देशद्रोही या कम से कम देश के प्रति निष्‍ठा से रहित सिद्ध किया जा सकता है । यह निरा काल्‍पनिक भय नहीं है, परन्‍तु यह भय इतना उग्र नहीं होना चाहिए कि हम ठीक इसके विपरीत उस दूसरी आशंका काेे जन्‍म दे बैठे जिसमें भारत तेरे टुकड़ेे होगे इंशा अल्‍ला इंशा अल्‍ला गाने वालों को हम संकीर्ण देशभक्ति से मुक्ति दिलानेवालों की पहचान मान बैठे और उनके साथ मंच साझा करने लगें और उसमें भारत की बर्वादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी जैसे डरावने इरादे भी अभिव्‍यक्ति की स्‍वतन्‍त्रता में शामिल हो जायंं।

कांग्रेस से लेकर वाम दलों तक की यह साझेदारी जिस देश को बर्वाद करना चाहती है, वह किसका देश है जिसे उसे बर्वाद करना है । उसका नाम भारत है और इन नारों की उदारतम व्‍याख्‍या करते हुए भी आप यह मानने को बाध्‍य हैं कि यह देश कांग्रेस का नहीं है, बामदलों का नहीं है यह केवल हिन्‍दुओं का देश है और इसे बचाने की चिन्‍ता केवल हिन्‍दुओं को हो सकती है इसलिए दूसरे सभी का कर्तव्‍य है कि इसको जितना बर्वाद कर सकें उतना बर्वाद करें । अब तक अपने शासन में देश के साथ यही किया है। सत्‍ता से बाहर होते ही उपद्रवियों, आततंकवादियों, दूसरे देशों से मिल कर इसे बर्वाद करने की योजनाएं बनाई हैं और अपराधियों को बचाया है। दूसरे सभी अपनी मांगे रखते हैं, हमे आरक्षण से ले कर संरक्षण तक सभी कुछ चाहिए परन्‍तु इनकी व्‍यवस्‍था और इनके सुचारु क्रियान्‍वयन की जिम्‍मेदारी इनसे इतर किसी और की है जिसे देश को भी बचाना है और सबकी मांगें पूरी हो सकेें इसका ध्‍यान भी रखना है और यदि नहीं रखता तो उसे और उसके देश काेे बर्वाद करना उनका कर्तव्‍य बनता है। क्‍या इसके बाद भी आप कह सकते हैं कि यह देश हिन्‍दुओं का और केवल हिन्‍दुओं का नहीं है ।

इसे हिन्‍दुओं ने अपना देश नहीं बनाया है, आप ने इसे हिन्‍दुओं का देश बनाया है और यदि आप इसमें अजनवी की तरह रहते हैं तो आपकाे उन मर्यादाओं का सम्‍मान करने के लिए बाध्‍य किया जा सकता है जिनकी चिन्‍ता आपको नहीं है या जिनसे मुक्ति की कामना करते हुए आप भारत की बर्वादी तक पहुंचते हैं। खुदा वो दिन न दिखाए कि सोगवार हो तू ।

एक दूसरी चिन्‍ता नजीब के लापता होने, उसकी मां की और उससे सहानुभूति रखने वालों की वेदना का था। उसे लगा कि पुलिस उसे तलाशने में इसलिए असफल रही है कि वह मुसलमान था और संभव हैैै इस बीच उसकी हत्‍या की जा चुकी हो। यह सच नहीं हो सकता इसका दावा ऐसा कोई व्‍यक्ति नहीं कर सकता जो यह मानता है कि पुलिस का सांप्रदायीकरण हुआ है और यह व्‍याधि जानकारों के अनुसार बीस पचीस साल पुरानी है। परन्‍तु इसे सच मान लेना या इस पर एक संभावना के रूप में बलाघात से तथ्‍य बनाना शायद उचित न हो। इतनेे ही इकहरेपन से दूसरा प्रमाण की कमी के आधार पर यह संदेह जताने का अधिकार रखता है कि संभावना तो यह भी हाे सकती है कि वह डर के मारे आई एस के प्रभाव में आकर पश्चिमी एशिया में पहुंच गया हो। प्रमाण के अभाव का दोहन दोनों सि्थतियों में निष्‍ठुरता का प्रमाण है।

एक दुखद तथ्‍य है कि मनुष्‍य की वेदना को हम या शायद दूसरे समाज भी मनुष्‍य की पीड़ा के रूप में न देख कर धर्म, आर्थिक स्‍तर, जाति, रंगभेद, शिक्षा और यहां तक कि पेशे तक से जोड़ कर देखने के आदी हैं। कितने बच्‍चे और युवतियां राेज गायब होते हैं और इसकी सूचना मिलने पर भी हमें यह विक्षुब्‍ध नहीं कर पाता क्‍योंकि यह पीड़ा उस इतर से संबंधित है जो उस परिधि से बाहर है जिसकी हम चिन्‍ता करते हैं। पीड़ा का यह मजहब अपने को धर्मनिरपेक्ष मानने वालों को हिन्‍दू पीड़ा पीड़ा नहीं प्रतीत होती और मुस्लिम पीड़ा कुछ अधिक व्‍यग्र करने वाली पीड़ा होती है, दलितों की पीड़ा उतनी वेधक नहीं होती जितनी सवर्णो की, गरीबों की पीड़ा सह्य होती है, उन्‍हें इसकी आदत होती है, परन्‍तु संपन्‍न जनों की पीड़ा अधिक उद्वेलित करती है । गोरे देशों के नागरिकों की पीड़ा रंगीन देशों और समाजों की पीड़ा से अधिक विक्षोभकर होती है, इसलिए जब खालिस्‍तानी बसों से हिन्‍दुओं को उतार कर उसी तरह कत्‍ल करते थे जैसे आइएस कुछ साल से करने लगी जिसके शिकार गोरे भी हुए तब उतना भयानक कुकृत्‍य नहीं था क्‍योंकि मरने वाले हिन्‍दू थे या रंगीन त्‍वचा के लोग थे। अमेरिका ने दूसरे महायुद्ध के बाद से लगातार एशियाई और अफ्रीकी देशों के असंख्‍य लोगों का बर्बरता पूर्वक मारा है, परत मानव त्रासदी का हिस्‍सा और दुनिया का जघन्‍यतम अपराध वह तब बना जब वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर की तबाही सामने आई । मनुष्‍य की पीड़ा का यह बटवारा एक दुर्भाग्‍यपूर्ण सचाई है और जब तक यह है दुनिया का कोई देश और उन देशों का कोई समुदाय अपने को सभ्‍य नहीं मान सकता ।

आंकड़े बोलते हैं, हम नहीं, पर हम कुछ आंकड़ो को ही बोलने की छूट देते हैं, तो वेे आंकड़े हो या जीवन के तथ्‍य और अनुभव, वे जितना झूठ बोल सकते हैं उसकी तुलना आंख में आंकड़ों की धूल झोंकने से की जा सकती है। तथ्‍यों की प्रस्‍तुति में संतुलन हमारे मानसिक संतुलन का द्याेतक है और इस संतुलन को सचेत रूप में नष्‍ट किया गया है। संचार विचार के प्रसार के लिए नहीं अपितु उत्‍तेजना के प्रसार के लिए, यह आज की सतही सोच का दुखद पहलू है ।

Post – 2016-12-15

इतिहास का वर्तमान के चतुर्थ खंड की भूमिका

यह बिना किसी पूर्वयोजना के एक नई विधा में लिखी गयी पुस्तक है, जिसे बतकही कहा जा सकता है! पार्कों में, बैठकी के दूसरे अड्डों, चैक चैपाल में लोग राजनीति से ले कर समाज और परिवार की समस्याओं पर चर्चा करते हैं! यह उसी को एक स्तरीय रूप देने और अपने समय का आलोचनात्मक विमर्श बनाने की दिशा में एक प्रयोग है जो प्रयोग की सजगता के बिना इस चिन्ता के साथ आरंभ हो गया कि हमारे बौद्धिक स्तर में लगातार गिरावट क्यों आती चली गई है जब कि प्रतिभा, शिल्प और महत्वाकांक्षा की दृष्टि से हमारी आज की पीढ़ी विश्वविजय से नीचे की कोई लालसा रखती ही नहीं! इसके बाद भी किसी का कद ऐसा नहीं जो पिछली पीढ़ियों के गण्य और मान्य बौद्धिकों के समकक्ष रखा जा सके!

हमारे पास इतिहासकार नहीं है, पर अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का दावा करने वाले इतिहासकारों का मजमा है! बौद्धिक नहीं हैं, परन्तु धूम मचाने वाले बुद्धिजीवियों का जत्था है! आज से साठ सत्तर साल पहले के साहित्यकारों के कद के साहित्यकार नहीं है, पर देश विदेश में चर्चा का जुगाड़ करने वालों की संख्या में असाधारण बढ़त हुई है! हमारे विचार और संचार माध्यमों की संख्या में असाधारण बृद्धि हुई है परन्तु वे आज की बड़ी खबर को दुहराते हुए दिन काट देते हैं और हम देश और समाज का हाल जानने के लिए तरसते रह जाते हैं! उनके विचार स्थिर हैं और उनको चुनने वाले पहले से जानते हैं कि उन पर किस तरह के विचार पेश किए जाएंगे और वे नशे की लत की तरह उसी तरह के समाचारों और विचारों को सुन कर ‘‘क्या खूब कही, क्या खूब कही’’ कहते हुए अपना समय काट देते हैं! इंटरनेट पर अभिव्यक्ति के सामाजिक माध्यमों में बहुत साफ बटवारा पक्ष और विपक्ष को लेकर देखा जा सकता है! पक्ष उजागर है, विचार गायब है, वह फिकरेबाजी के स्तर पर उतर आया है।

दुखद तथ्य यह कि इतने शोरसरापे के बाद भी जनता तक न बुद्धिजीवियों की पहुंच है, न साहित्यकारों की न समाचार और विचार के सामाजिक माध्यमो की क्योंकि इनका सब कुछ पूर्वनिश्चित है। सभी अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, उनके पास समाज को देने के लिए ऐसा कुछ नहीं है जिसका पूर्वानुमान बिना पढ़े या सुने ही समाज न लगा सकता हो! इससे एक बौद्धिक निर्वात पैदा होता है जिसे भरने वाली शक्तियां झुझावात पैदा कर सकती हैं, तबाही मचा सकती हैं, पर समाज और देश को आगे बढ़ाने या अपनी अधोगति से ऊपर नहीं ला सकती।

यह शून्य या निर्वात पैदा कैसे हुआ कि इससे विचार और संचार से जुड़े सभी माध्यम और उन माध्यमों में काम करने वाले इस हद तक प्रभावित क्यों हुए कि वे अपने को बहुत-कुछ समझते हुए न-कुछ में बदल गए और इसका उन्हें आभास तक नहीं! वे विदेशों में दर दर के भिखारी बने अपनी प्रतिष्ठा की तलाश कर रहे हैं जिनको वे तभी रास आएंगे जब कि वे उनके अपने उपयोग के लगें और अपने ही घर परिवार से, अपने ही समाज से वे निर्वासित हो चुके हैं। यह निर्वासन समाज ने नहीं दिया, इसका चुनाव उन्होंने स्वयं किया और इस पर गर्व करते रहे।

इस रहस्य को समझने के लिए, मैंने फेसबुक पर उसकी सामान्य प्रकृति से बाहर जा कर एक गवेषणात्मक चर्चा आरंभ की थी जिसमें असहमत लोगों को इस बात का आमंत्रण था कि वे, जहां मैं गलत लगूं, गलत सिद्ध करते हुए एक सही सोच के विकास में हमारी सहायता करें और वस्तुपरक मूल्यांकन का रास्ता जो अब तक अवरुद्ध था उसे मुक्त कर सकें।

मेरा यह सुविचारित और लंबे ऊहापोह के बाद, जो मेरी प्रकाशित कृतियों में भी देखी जा सकती है, लिया गया निर्णय यह था कि ऐसा समाज से अधिक राजनीति को प्रधानता देने और उसे राजनीति की समझ तक सीमित न रखकर राजनीतिक भागीदारी से जोड़ने और राजनीतिक भागीदारी के कारण इसके सत्ता प्राप्ति और सत्ता को बनाए रखने की उस गजालत में उतारने के कारण हुआ जिसके लिए कम्युनिस्ट पार्टियां उत्‍तरदायी हैं क्‍योंकि, साहित्य और कला के क्षेेत्र में ही नहीं शिक्षा और विचार के क्षेत्र में उसके हस्तक्षेप के कारण ऐसा हुआ और वही गिरावट के अन्य कारणों के साथ इस बौद्धिक निर्वात के लिए भी उत्तरदायी रहा है।

उसका एकाधिकार इतना प्रबल रहा है कि उससे असहमत होने का अर्थ था आत्महत्या। जिन लोगों ने सीधे विरोध तक मोल न लिया, कुछ दबे सहमे से अपना पक्ष रखते रहे, उन्हें उनके कद और कृतित्व का उपहास करते हुए गुमनाम नहीं तो बदनाम इतना किया गया कि वे साहित्य के इतिहास से बाहर कर दिए गए।

असंख्य गलतियों के जनक विचार सत्ता पर इस तरह हावी हो जायं कि कोई विरोध में उंगली उठाए तो उंगली कट जाए, विचार के दमन के बावजूद विचार की स्वतन्त्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के भी एकाधिकारी बने रहे!

वह बचकानी जिद जो मुझे परिभाषित करती है, जो कहती है यदि साहस की कमी के कारण कोई दूसरा यह नहीं करता कि मुझे मिटा दिया जाएगा, उसे मरने को तैयार हो कर मैं करूंगा! समझ यह कि जो बचना चाहता है उसे मिटाया जा सकता है, जो मिटने की ठान कर कोई पहल करता है, वह मिटाया नहीं जा सकता।

परन्तु मेरा उद्देश्य किसी को मिटाना नहीं था, ऐसा व्यक्ति तो मिटने की ठानने से पहले ही मिट चुका होता है। उद्देश्य अपने बौद्धिक समुदाय को इस विषय में सचेत करना था कि इस सनक में हम पराधीनता के दिनों की तुलना में भी अकिंचन हो चुके हैं। अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए हमें अपनी समझ, अपनी नजर, अपने विवेक पर भरोसा करना होगा! दूसरों के उपयोग का सामान बनने की जगह, अपने को पुनर्जीवित करना होगा उस पूंजी से ही अपने सरोकारों और समस्याओं का सामना करना होगा।

मेरा विश्वास है कि समाज की विकृतियों के लिए उसके बु़द्धजीवी दोषी है और यदि समाज मे ऐसीं विकृतियां हैं जो उन्हें भी दिखाई देती हैं तो उन्हें आत्मालोचन करना चाहिए कि समाज की मनोरचना को प्रभावित करने के समस्त औजार उनके पास होते हुए भी समाज ऐसा क्यों बन गया। यहीं से अपनी चूक को समझना और उसमें सुधार संभव होता। यह प्रयत्न न कभी किया गया न इसके महत्व को समझा गया।

एक मात्र उपाय था कि लोग आवेश में बात करने से बचें और विरोध हो या समर्थन, जिसका भी करें, तर्क, प्रमाण और औचित्य का ध्यान रखते हुए करे तो इस अधोगति से बाहर निकलने का रास्ता मिल सकता है। कम से कम हमारे बौद्धिक विमर्श का स्तर तो उठेगा। मैंने इसके लिए उस पक्ष का समर्थन करते हुए अपना हस्तक्षेप आरंभ किया, जिस पर लगातार घृणित अभियोग और आरोप लगाए जाते रहे जो मेरी समझ से गलत थे इसलिए मैंने उसके पक्ष में खड़े हो कर उस जड़ता पर प्रहार करते हुए उसे उकसाया कि वह अपनी रक्षा के लिए यदि अपने तर्क, प्रमाण और साक्ष्य प्रस्तुत कर सकता हो तो करे। यदि वह सही लगा तो मैं उसके विचारों को मान लूंगा। यह अब तक पक्षधरता के कारण जीत और हार का प्रश्न बना था, अब यह औचित्य और सत्यसाक्षात्कार और उसके सम्मान का अनुरोध बन गया।

प्रश्न यह नहीं है कि बौद्धिक वर्ग राजनीति निरपेक्ष रहेगा, या राजनीति संलिप्त अपितु यह कि वह सियासत या व्यावहारिक राजनीति का हिस्सा बनेगा और सत्ता पर अधिकार करने वालों का अनुचर बनेगा या उनका मार्गदर्शक! उसकी राजनीति राजनीतिक समझ से पैदा होगी या किसी दल या संगठन की आकांक्षा से। हमारा हस्तक्षेप इसीलिए जरूरी हुआ!

यह एक खंडनवादी या पोलेमिकल सोच लग सकती है, जिसमें अपर पक्ष के दोषों को ही गिनाया जाता है उसके गुण और योगदान की अनदेखी कर दी जाती है। यदि हमारा लक्ष्य यही होता तो हमें इस व्यायाम की आवश्यकता न थी। हमारा लक्ष्य सचाई का सम्मान करना, उभयपक्ष के गुणदोष का विवेचन करते हुए सत्य की प्रतिष्ठा के लिए प्रयत्नशील होना और इसमें अपने विरोधियों को भी सहभागी बनाना था इसलिए अपनी कथित पक्षधरता के बाद भी मैंने अपनी ओर से अपर पक्ष की, अपनी समझ में आने वाली, सर्वोत्तम आपत्तियों को स्थान देते हुए अपनी बात रखने और प्रतिवाद को आमन्त्रित करते हुए अपना विवेचन किया और शैली बतकही की अपनाई थी इसलिए इस प्रयोजन से अपनी मान्यता के विरोधी चरित्र की सृष्टि करनी पड़ी।

मेरे विचारों का प्रतिवाद नहीं हुआ या प्रभावशाली रूप में नहीं हुआ यह मेरे लिए सुखद बात नहीं है! दुखद यह है कि न तो दूसरों ने अपनी मान्यताओं में कोई लोच दिखाई, न समझ से काम लेते हुए तार्किक प्रतिवाद किया और न आंखें बचाते हुए जुमलेबाजी करने की अधोगति से ऊपर उठ सके। अपने प्रयास की विफलता किसी को सन्तोष नहीं दे सकता, मुझे तो कदापि नहीं!

इन लेखों में जिनके लिए मैंने पोस्ट का प्रयोग किया है कुछ भी सही नहीं है, परन्तु कुछ भी ऐसा नहीं है कि जो प्रमाण, साक्ष्य या औचित्य से शून्य हो, इसलिए वह तब तक अकाट्य है जब तक उसका खंडन करने वाले विचार, तथ्य या साक्ष्य नहीं आ जाते। यह उनका काम है जो मुझसे असहमत होते हुए भी चुप्पी साधे रहते हैं या सलीके से अपना विरोध प्रकट नहीं कर पाते!

शैली बतकही की है तो विषय का कोई प्रतिबन्ध नहीं ! कोई सुनियोजित पूर्वयोजना नहीं ! बात से बात निकलती है, अधूरी रह गई तो अगले दिन उस पर चर्चा होगी। इसलिए कुछ लेख यदि अधिक गंभीर और गहनविमर्श से जुड़े प्रतीत होंगे तो कुछ निहायत अनुभववादी और पहली नजर में सतही, परन्तु यदि उनके प्रेरक तथ्य को समझने का प्रयत्न करें तो पाएंगे वे किसी अधिक गंभीर समस्या के साक्षात्कार से जुड़े हैं और उसके विविध आयामों और संभावनाओं की पड़ताल कर रहे हैं! एक उजड़े हुए पार्क को अकेले दम पर सरसब्ज बनाने के अभियान के क्रम में हुए अनुभवों का विवरण सच कहें तो संचार की उस समस्या से जुड़े हैं जिनको अपनी मेज पर बैठे हम हवाई ढंग से समझना चाहते हैं और इसलिए अपने ही समाज के भीतर अपनी पहुंच बना नहीं पाते। यह प्रयत्न सही है या गलत, उचित या अनुचित यह हमारे लिए विचारणीय नहीं है। विचारणीय केवल यह है कि अपनी बात पूरे सरोकार से उस व्यक्ति के मन में भी उतारी जा सकती है या नहीं जो पहले से ही उससे बिलग होने के लिए कृतसंकल्प है।

कोई विषय किन्हीं पक्षों से पूरी तरह विचारणीय हाने के बाद भी समाप्त नहीं होता जो बतकही में हुआ करता है। कभी कोई प्रश्न दुबारा उठ सकता है, इसलिए निर्णायक बात यह नहीं कि उसमें कितनी बार किन प्रश्नों को उठाया गया है अपितु यह कि उसमें अपनी मेधा और अन्तदृर्ष्टि के अनुरूप पहल की गई है या नहीं!

किसी विशेष अपेक्षा से इसे पढ़ने वालों को इसमें आए विवेचन संभ्रमित कर सकते हैं। इस पक्ष को समझ लेने के बाद उनकी सोच बदल सकती है! और बदल सकती है मेरे उन मित्रों की प्रतिक्रिया, प्रस्तुति और सोच जिससे हम आलोचना-प्रत्यालोचना करते हुए अपनी सोच और विवेचन का स्तर सुधारते हुए उस शून्य को नई पहल में बदल सकें! अस्तु !

Post – 2016-12-14

बता तेरी रजा क्‍या है
”अन्‍याय का विरोध्‍ा करने वाले, तब तक उसका विरोध करते हैं जब तक वह समाप्‍त नहीं होता। कुछ लोगों को वह दिखाई देता है, कुछ को नहीं। अन्‍याय का विरोध करने वालों का कोई अलग पेशा नहीं बना है कि जब भी अन्‍याय होगा, वे सामने आएंगे, उसका विरोध करेंगे और दूसरे लोग अपना काम करेंगे पर अन्‍याय सहते रहेंगे । यह मोटी समझ है जो तुममे नहीं है इसलिए तुमको यह बुरा लगता है कि बुद्धिजीवी सोचने विचारने का अपना काम छोड़ कर अन्‍याय का विरोध करने का ‘फालतू काम क्‍यों करने लगे। बुद्धिजीवी का काम समाज को सही दिशा में ले जाना है। उसका लेखन भी इसी के लिए समर्पित होता है, उसका सामान्‍य आचार भी उसी को समर्पित होना चाहिए। इन दोनों में फांक नही होनी चाहिए।”
असहमत होने का कोई कारण न था। मैंने कहा, ”तुम ठीक कहते हो, बस एक छोटी सी चूक है । पहली बात तो यह कि तुम चिन्‍तन और लेखन को काम नहीं मानते हो, लोगों की चेतना को आन्‍दोलित करने, उनको सोचने और कुछ करने को प्रेरित करने को महत्‍व नहीं देते। लेखक भीड़ का हिस्‍सा बन कर अपना काम ठीक से पूरा कर सकता है। अपने लेखन द्वारा विरोध करके या अपनी उपस्थिति द्वारा विरोध प्रकट करके । मैं समझता हूं कि वह अपनी योग्‍यता और विशेषज्ञता के क्षेत्र में रह कर वह अपना काम अधिक प्रभावशाली ढंग से कर सकता है।
”एक दूसरा प्रश्‍न जिससे तुम बचते हो, वह है, बुद्धिजीवी अपने पिछले कृत्यों के परिणामों की जिम्‍मेदारी लेने से बच नहीें सकता। वह समाज किसने बनाया था और कैसे बनाया था जिसमें समस्‍त मर्यादायें टूट गई और आज भी वह उन मर्यादाओं को तोड़ने वालों के साथ क्‍यों खड़ा दिखाई देता है, इसका जवाब उसे देना चाहिए।
”मैंने कहा, मैं प्रकृति से आन्‍दोलनकारी हूं और विशेषज्ञता की दृष्टि से इतिहासकार । ऐसी खुशफहमी का शिकार इतिहासकार जो यह मानता है कि इतिहास और इतिहासकार की भूमिका को उससे पहले किसी ने समझा नहीं या समझा तो उसे अपने इतिहासलेखन में उतारा नहीं। इसलिए मैं व्‍यक्तियों पर नहीं, किसी ऐतिहासिक क्षण में उपलब्‍ध विकल्‍पों की बात करता हूं और व्‍यक्ति का तभी समर्थन करता हूं जब वह उनमें सर्वोत्‍तम विकल्‍प के साथ खड़ा दिखाई देता है। यदि कोई व्‍यक्ति अनर्थकारी विकल्‍पों के लिए अवसर की तलाश कर रहा हो तो मैं उसे बुद्धिजीवी नहीं मान सकता।”
वह अपने को संभाल नहीं पाया, ”तुम बकवास कर रहे हो । तुम उस आदमी के वकील हो जिसके कारण पूरा देश आज ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है जिसमें लोग अपना पैसा जिन बैंकों के हवाले करके सुरक्षित अनुभव कर रहे थे, उनसे अपना पैसा नहीं निकाल पा रहे हैं। यदि उन्‍होंने उन बैंको पर भरोसा न करके वह पैसा अपने पास रखा होता तो जमाखोर करार दे दिए जाते और पकड़ में आते तो उनके विरुद्ध कार्रवाई भी की जा सकती थी। हमारा पैसा है, हम उसे जिस रूप में सुरक्षित समझें रखें, इसमें सरकार बीच में कहां से आ जाती है । और देखो, रिजर्वबैंक के पिछले गवर्नर ने जो भाजपा सरकार के दौर में ही काम कर रहे थे, उन्‍होंने भी प्रश्‍न उठा दिया कि इसकी जरूरत तो युद्ध आदि की दशा में ही होता है, इसकी जरूरत क्‍या आन पड़ी। छोड़ो राजन की बात जिन्‍हें हो सकता है ऐसे प्रस्‍तावों से असहमति के कारण ही हटाया गया हो, परन्‍तु यह तो एक तटस्‍थ और अधिकारी व्‍यक्ति का बयान है । इसके परिणाम अनिष्‍टकर होने वाले हैं, इसे भी तुम मानने से इन्‍कार करते हो, जब कि हम लोग इसको पहले दिन से ही समझते और कहते आए हैं और तुम उसे नकार कर हमारी आलोचना और इस राष्‍ट्रीय आपदा का समर्थन करते रहे हो और अपने को बुद्धिजीवी भी मानते हो।”
”देखो, मैं उस कष्‍ट को जानता हूं जिससे लोग गुजर रहे हैं। मेरे बाएं बाजू जो हापुड़ लिंक रोड है, उस पर एक दर्जन ठेले वाले सब्‍जी, फल आदि के रेढे लिए खड़े रहते थे और लोग उधर से गुजरते हुए रुक कर उनसे साग, फल आदि खरीदते थे। नोटबन्‍दी के बाद से वे नहीं दिखाई देते। ऐसे दसियों हजार रेढ़े वालों की यही गति हुई होगी। चार दिन पहले मुझे इस बात से राहत अनुभव हुई थी कि स्‍टेटबैक के सामने बीस तीस लोगों की लाइन लगी थी और पंजाब नेशनल बैंक के सामने दस बारह पर आज यह संख्‍या बढ़ कर अस्‍सी और सौ तक पहुंच गई यह मैंने गिन कर देखा। मैंने पांच दिन पहले एक चेक जमा किया, जानना चाहा कि वह आनर हुआ या नहीं, पता चला सात आठ दिन बाद पता चलेगा। बैंकों के सामान्‍य काम काज पर भी जिसका रोकड़े से संबंध नहीं है, कैशलेस लेनदेन से है, वह भी सलीके से नहीं चल रहा है। दूर देहात में जहां दूसरी समस्‍याओं के अतिरिक्‍त बिजली तक नहीं पहुंच पाती उसमें कैशलेस लेनदेन का खयाल शेखचिल्ली की याद दिलाता है। शहरों मे एटीएम काम न करें, पर खरीद बिक्री में क्रेडिट और डेबिट कार्डो का उपयोग बढ़ा है, परन्‍तु उसके खतरे भी हैं और उनकी एक सीमा है। मैं इन सभी सचाइयों को जानता हूं और यह भी अनुभव करता हूं कि मैं जिसका काम लिखना है वह लिखते समय भी जो लिखना चाहता है वह लिखने से रह जाता है, वह दूसरे क्षेत्र की समस्‍याओं से उत्‍पन्‍न असुविधाओं को समझ तो सकता है पर उनका समाधान नहीं दे सकता।”
‘यह तुम कह रहे हो जो यह मांग करता है कि समाज में जो कुछ हुआ उसकी जिम्‍मेदारी बुद्धिजीवी को अपने ऊपर लेना चाहिए । कमाल है । अपने लिए हमेशा एक चोर दरवाजा तलाश लेते हो यार ।”
”तुम मुझे समझने में चूक करते हो । मैं परिणाम से किसी निर्णय या कार्य के औचित्‍य का मूल्‍यांकन नहीं करताा। मैं देखता हूं कि जिस समय किसी ने कोई निर्णय लिया उस समय उसने अपनी सर्वोत्‍तम मेधा का उपयोग करने का समय था तो किया या नहीं। मैं नीयत आैर निर्णय करने वाले की योग्‍यता के आधार पर मूल्‍यांकन करना चाहता हूं और कामना करता हूं कि यदि नीयत ठीक थी तो उसके परिणाम भी स्‍वस्तिकर निकलें और लोगों के कष्‍ट का निवारण हो और जिस लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के लिए उसने वह आयोजन किया गया था वह सफल हो।
”तुम इसके विपरीत न केवल परिणाम से किसी निर्णय का मूल्‍यांकन करते हो, अपितु यह चाहते हो कि नीयत भले अच्‍छी रही हो, यह विफल हो, लोगों का कष्‍ट और बढ़े और बढ़ते बढ़ते उस विस्‍फोट बिन्‍दु तक पहुंच जाये कि यह पूरा आयोजन ही विफल हो जाय और पुरानी स्थिति लौट आए जो तुम्‍हारी परिभाषा के अनुसार तुम्‍हारे अच्‍छे दिनो की वापसी है। तुम देश और समाज केे अनिष्‍ट की कामना करते हुए अपनी इच्‍छापूर्ति चाहते हो और उसके लिए अनुकूल पड़ने वाले तिनके चुन कर अपने को समझदार और सही सिद्ध करना चाहते हो ।
”मैं रिजर्वबैंक के भूतपूर्व और एनडीए काल के गवर्नर की योग्‍यता, निर्णय और आशंका पर टिप्‍पणी करने की योग्‍यता नहीं रखता, परन्‍तु उनके ही दो विचारों के सन्‍दर्भ में उनकेे कथन की अन्‍त:संगति और औचित्‍य का मूल्‍यांकन करना चाहूंगा। पहला यह कि वह कहते हैं कि ऐसा युद्ध की स्थिति में ही किया जा सकता था, पर वह युद्ध काे सामरिक और सशस्‍त्र युद्ध तक सीमित रखना चाहते हैं जब कि एक अर्थशास्‍त्री होने के नाते उन्‍हें लोकतन्‍त्र को पैसों का खेल बना कर पूरे देश के लिए अनिष्‍टकर बना कर लोकतन्‍त्र की हत्‍या करने वालों के विरुद्ध युद्ध को भी अधिक अपरिहार्य युद्ध मानना चाहिए था। और दूसरा उनका यह सुझाव कि इसकी सूचना पहले ही दे दी जानी चाहिए थी जिसका प्रकारान्‍तर से अर्थ है कालेेधन का पहाड़ खड़ा करने वालों को उसे सफेद करने का कुछ समय मिलना चाहिए था। जहां समय नहीं दिया गया वहां भी जिन्‍होंने बैंकों और यहां तक कि रिजर्वबैंक तक में सेंध लगा कर वह सारा धन अपने झोले में भर लिया जो यदि अपने सहज भाव से जनता तक पहुंचता तो न उतनी लंबी कतारें लगतीं न नकदी का वह संकट आता। ”
”पांच सौ और हजार के नोट बंद करके दो हजार के नोट जारी करने की नासमझी के बाद भी। जहालत की हद है यार । वे नोट जिनके हाथ में आए वे भी उनका इस्‍तेमाल नहीं कर सकते थे यह तुम्‍हें दिखाई नहीं देता और ऊपर से तुर्रा यह कि यह नोट भी कुछ समय बाद खत्‍म हो जाएगा और सबसे बड़ा नोट पांच सौ का ही रह जाएगा। है कोई जवाब इस समझदारी का ।”
”समझदारी तो थी और इसे समझने की योग्‍यता भी तुममे है, पर समझ से काम न लोगे क्‍योंकि तुम उच्‍चाटन के शिकार हो। मैं स्‍वयं नहीं जानता कि सरकार ने क्‍या सोच कर यह किया, पर उसका वकील होने के नाते यह बताना चाहूंगा कि जिस परिमाण में हजार और पांच सौ के नोटों की वापसी होेनी थी, उसके सममूल्‍य नोट जारी करने के लिए उच्‍चतर और भिन्‍न मूल्‍यक्रम के नोट की जरूरत थी अन्‍यथा यह मांग पूरी नहीं की जा सकती थी।
”उसकी अगली सोच यह थी कि देर या सवेर सबसे उच्‍च मूल्‍यक्रम के नोट जमाखोरों काे ही रास आते हैं और ये लौट कर वहीं पहुंचेगे।
”इन नोटों का रंग ऐसा रखा गया था जो उड़ता है यह सौ के नोट और दो हजार के नोटों कों घिस कर मीडिया में भी दिखाया गया था और बताया गया था कि पांच साल के बाद यह रंग उड़ कर वह नोट कोरा कागज रह जाएगा। इसलिए इससे पहले ही जमाखोरों को इसे बैंक में जमा कराना होगा और यह धनराशि जो निष्क्रिय पड़ी रहती थी वह चलन में भी आ जाएगी और इस पर उन्‍हें कर और दंड भी देना होगा ।
उसी योजना का अंग था कि केवल छोटी राशि के ही नोट चलन में रहें तो जमाखोरी पर कुछ अंकुश लग सकता है और यह लक्ष्‍य पांच सौ से ऊपर के नोटों की बन्‍दी से और दस बीस पचास के नोटों को बढ़ावा दे कर पूरा किया जा सकता है। यदि इस दृष्टि से देखो तो समझ में आएगा कि यह बहुत दूर की सोच कर लंबी तैयारी के बाद उठाया गया कदम था, परन्‍तु इस बात का अनुमान तक नहीं किया गया था कि बाड़ ही खेत खाने लग जाएगा। बैकर ही कालाबाजारियों से मिल कर जनता के लिए संकट पैदा कर देंगे।”
वह हंसने लगा, ”तुम अब भी नहीं मानोगे कि यह फैसला गलत था।”
”परिणाम से फैसलों की गुणवत्‍ता की जांच नहीं होती। कानून बनाने वाले अपराधियों से सदा पीछे रहे हैं और उनका पीछा करते रहे हैं, अन्‍यथा अपराध कभी का समाप्‍त हो गया होता। इस अभियान ने एक महामंथन का काम किया जिसमें अपराधियों के अदृश्‍य कोने स्‍वत: उजागर हो गए हैं और यदि यह प्रयोग सफल हुआ तो यह उस विराट स्‍वच्‍छता अभियान का सबसे उज्‍जवल पक्ष होगा जिसका अनुमान करना भी इससे पहले कठिन था।”
”उस स्‍वच्‍छता अभियान में कहीं मेरा भी सफाया न कर देना यार । तुमसे बहस करना ही बेकार है ।” वह उठ कर चलने को हुआ ।
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Post – 2016-12-13

हम भी मुंह में जबान रखते हैं

”तुम स्‍वयं मानते हो, हर एक आदमी काे अपनी नजर मिली है, अपना दिमाग मिला है, उसे उसी से काम लेना है, फिर हर एक आदमी अपनी बात अपने ढंग से कहेगा, कोई सूक्तियां दुहराता हुआ, कोई मुहावरों की याद दिलाता हुआ और किसी को लगा कि इसने तो मेरे दिल की बात कह दी तो उसके विचारों को साझा करता हुआ, फिर तुम्‍हें इस पर आपत्ति क्‍यों है। तुम जिस तरह से चाहो या सुझाओ उसी तरह क्‍यों कहेगा कोई, यह तो तुम स्‍वयं मानते हो, एक तरह की गुलामी है।”
”दूसरे के विचार हों, या किसी युग की सूक्ति हो, या कोई मुहावरा, ये सभी लीकें हैं। तुम्‍हारे विचार जो अपनी परिस्थितियों में पैदा होते हैं या होने चाहिए, वे ठीक वे ही नहींं हो सकते जो किसी अन्‍य कथन में, कविता या मुहावरे में व्‍यक्‍त किया गया है, परन्‍तु अधिकांश मामलों में कुछ निकटता देख कर हम आलस्‍यवश उस लीक में ढल जाते हैं । आगे का रास्‍ता आसान हो जाता है। लीक से परिचित लोगों के लिए उसके संचार में सुगमता आ जाती है। हम कहें, यह उस आलस्‍य का परिणाम होता है जिसमें तुम निष्क्रिय हो कर एक लीक में ढल या बहाव में बह जाते हो और उसे अपने पर आरोपित करके उस जैसा आचरण करने लगते हो जो तुम्‍हें, यदि तुम सतर्क होते तो, अपनी परिस्थितियों में नहीं करना चाहिए था। इस सूक्ष्‍म अन्‍तर को समझना और अपनी बात को अपने ढंग से कहना, अपनी सीमा में रह कर कहना, तुम्‍हें वह बनाता है जो तुम होने का दावा करते है, सर्जक या चिन्‍तक या तत्‍वद्रष्‍टा। ये सभी दूसरों का नारा, दूसरों के विचार और दूसरों क कार्यभार ले कर अपना काम नहीं करते। वे अपनी लिखी इबारतों तक को नहीं दुहराते, प्रत्‍येक रचना पहले से अलग होती है, प्रत्‍येक विचार एक नई शुरुआत होता है, प्रत्‍येक विवेचन एक नए धुंधलकेे को चीरता और आलोक में बदलता दिखाई देता है, फिर यह कैसे हो सकता है कि इतने सारे लोग अपने को सर्जक भी मानते हो, और दो साल से एक ही बात को दुहरा रहे हों, अपना काम छोड़ कर दूसरों का काम कर रहे हों और अपना आपा खो कर भी उसकी कीमत वसूल कर रहे हों।”

”रुको, रुको । कीमत वसूल कर रहे हैं, यह आरोप तुम्‍हारा गलत है। कीमत कौन देने वाला है उन्‍हें। उन्‍होंने अपने सिद्धान्‍त के लिए गंवाया तो बहुत कुछ है, अपना पुरस्‍कार और सम्‍मान तक, परन्‍तु वसूल कुछ नहीं किया है। यदि नमक अदा किया है और कर रहे हैं, कहते तो मैं तुम्‍हारे साथ सहमत हो जाता, या कम से कम चुप लगा जाता। कीमत वसूल करने का अभियोग तो मैं तुम पर भी नहीं लगा सकता पर यह अभियोग तो लगा ही सकता हूं कि तुम कीमत वसूल करने की जुगत बैठा रहे हो, वर्ना भाजपा का और उसमें भी मोदी का समर्थन तो नहीं करते । पहले अपने गिरेबान में झांक कर देखो । और सुनो, तुम अपने लिखे को दुहराने वाले को सर्जक, चिन्‍तक, क्रान्‍तदर्शी नहीं मानते और तुमने स्‍वयं अपनी कई बातों को दुहराया है और कहा है, इसे आगे भी दुहरा सकता हूं।”

”तुमने ठीक कहा, मैं सर्जक नहीं हूं । 1970 से पहले था। तुमकाे अभी कुछ ही दिन पहले अपनी उस कविता की और प्रतिज्ञा की याद दिलाई थी जिसमें मैंने कहा था, ‘मैं आज खड़ा होता हूं अपने ही विरुद्ध एक महासमर में । मैं नहीं जानता सर्जक या आन्‍दोलनकारी में कौन किससे छोटा या बड़ा है, परन्‍तु मैं जिस औपनिवेशिक मानसिकता के विरुद्ध संघर्ष कर रहा हूं, दासता से मुक्ति के जिस अभियान से जुडा हूं, उसमें एक ही बात को कितने रूपों में दुहराता आया हूं इसे देखो तो चकित रह जाओगे, यदि चकित होने की संवेद्यता अभी तक बची रह गई हो तो । मेरे भाषा विज्ञान, स्‍थान नामों का अध्‍ययन, उपन्‍यास, उपनिषद की कहानियां और पंचतन्‍त्र की कहानियां, इतिहास और संस्‍कृति के लेखन में इस एक ही बात को इतने रूपों में दुहराया गया है कि इसे चाहो तो लेखन कहो, चाहो तो एक महारास, या जैसा मैं कहता हूं, एक लेखक की भूमिका, विशेषकर एक इतिहासकार की भूमिका, जो या तो एक शिक्षक की होती है या एक चिकित्‍सक की, उसे मनोचिकित्‍सक से ले कर काय चिकित्‍सक तक कही भी रखो। ये सभी हर बार कुछ नया नहीं करते हैं। शिक्षक जब तक अपने छात्रों की समझ में न आ जाय उसी पाठ को अलग-अलग तरीकों से समझाता और अपने को दुहराता रहता है। चिकित्‍सक न रोगनिदान में मौलिक होना चाहता है, न उपचार में हर बार कुछ नया प्रयोग करता है । वह एक ही ओषधि को तब तक दुहराता, उसकी खूराक बदलता, उसके पूरक घटक बदलता उसी को जारी रखता है जब तक उसका लाभ दिखाई देता है। उसका लक्ष्‍य रोगी का उपचार और आरोग्‍य है न कि अपने चिकित्‍सा ज्ञान का आतंक कायम करते हुए उसकी दशा को और भी खराब कर देना, जो चिकित्‍सा व्‍यवसायी करते हैं।”

”तुम बहाने बहुत अच्‍छे बना लेते हो यार । पकड़ने चलें तो मलगे की तरह सरक कर बाहर । अपनी पुनरावृत्ति शिक्षा और चिकित्‍सा और दूसरों की सर्जनात्‍मकता, चिन्‍तन और दूरदर्शिता का अभाव ।”

”तुमने यदि मेरे लिखे को इतने ध्‍यान से देखा है, कहे को इतने ध्‍यान से सुना है तो तुमको यह भी याद होगा कि मैं ख्‍याति और पद को तुच्‍छ मानता हूं। एक आन्‍दोलनकारी के रूप में मैं यह देखना चाहता हूं कि मैने जो लिखा या कहा वह कितना सार्थक है और उससे कितने लोगों की सोच में बदलाव आया। मैं सबसे अधिक गौरवान्वित तब अनुभव करता हूं जब मेरा कोई पाठक यह कहता है कि मेरे लिखे से उसके सोचने के तरीके में बदलाव आया है। ऐसा लेखक मैं अकेला होता तो बहुत गर्व अनुभव करता, परन्‍तु सुनते हैं मुझसे पहले रामविलास शर्मा भी हो चुके हैं। तीसरा कोई दीखे तो मुझे सूचित करना।”

”तुम्‍हें सेल्‍समैन होना चाहिए था। खोटे को भी किस तरह बेच लेते हो कि खरीदने वाला खोट को विशेषता समझने लगता है। दाद देता हूं तुम्‍हारी इस कला की। मौका देखते ही मुुहावरे बदल देते हो । वह क्‍या कहा था तुमने, ”मैं तोड़ूगा कुछ नहीं, सिर्फ परिभाषाएं बदल दूंगा” अौर मौका देख कर, परिभाषाएं बदल कर झूठ को सच, सच को झूठ, अच्‍छे को बुरा और बुरे काे अच्‍छा साबित कर लेते हो।”

”मैं परिभाषाएं बदलता नहीं, सुधारता हूं इसलिए यह मौके के अनुसार रंग नहीं बदलतीं। मैें प्रशंसा को अवांछित और अपने लिखे या कहे से अपने पाठकों और श्रोताओं की चेतना में आए परिवर्तन काे कितना महत्‍व देता हूं इसके लिए मैं आज फिर तुम्‍हें अपनी 10 सितम्‍बर की एक पुरानी पोस्‍ट की कुछ पंक्तियां याद दिलाना चाहूंगा:
”मुझे भी दूसरों की तरह यह सुन कर अच्छा लगता है कि लोगों को मेरा लिखा पसन्द आता है। उर्दू मुशायरों में तो जितना समय लोग शेर पढ़ने पर लगाते हैं उससे अधिक समय घूम घूम कर ‘आदाब, आदाब, आदाब’ कहने में लगाते हैं और तारीफ नहीं हुई तो ”गौर फरमाइये जनाब” कहते हुए अपने मानीखेज शेर को दो तीन बार पढ़ते हैं और तारीफ हो गई तो आदाब बजाने के बाद थोड़ी साँस ले कर वही शेर फिर पढते हैं। पर मेरी जरूरत इससे पूरी नहीं होती।
”मैंने फेसबुक पर लिखने का यह फैसला हमारे बौद्धिक पर्यावरण में आई उस गिरावट से अपने को और अपने मित्रों को बाहर निकालने के लिए किया जो शोर तो मचाते हैं, पर कुछ कह नहीं पाते। वह शोर की जिसकी पहुँच शोर मचाने वालों तक है और वे ही एक दूसरे को दाद दे कर शोर को सराबा तक पहुँचा देते हैं और अपनी ही व्यतर्थताबोध से बोलने और लिखने के क्षणों में भी अप्रासंगकि सा महसूस करते हैं।”

”यह तुम्‍हारी समझ हुई । समझ के भी कई रूप हैं जिनमें किसी के अनुसार तुम भी व्‍यर्थताबोध से त्रस्‍त दिखाए जा सकते हो।”

”मुझे उसका पता है । मैने सोचा था मैं कुरेदूंगा, जिन्‍हें वे लगातार कोसते और गालियां देते आए हैं, उनका पक्ष ले कर अपनी बात कहूंगा तो वे कम से कम उन आरोपों का तो जवाब देंगे जो मैं उन पर प्रमाण सहित लगाता हूं। उन्‍होंने ऐसा नहीं किया। उन्‍होंने अपने तर्क और प्रमाण और विश्‍लेषण को भी दरकिनार कर दिया। कितने दिनों से कितने सारे लोग किस तेवर से कितनी सतही, फिकरेबाजी के स्‍तर की बातें लगातार कर रहे हैं, इससे उनके चिन्‍तन और सर्जना को क्षति पहुंच रही है या लाभ हो रहा है इसका तो ध्‍यान होना चाहिए । नहीं है। यदि विद्रोही तेवर वाले इन लेखकों की उनके ही पहले के लेखन के परिमाण और गुणवत्‍ता की तुलना उनके इस पूरे दौर के लेखन से करें और यह जानना चाहे कि उसमें ह्रास हुआ है या उत्‍थान तो इसके लिए एक सर्वेक्षण की आवश्‍यकता होगी, परन्‍तु पहली नजर में निराशा ही हाथ लगती है, क्‍योंकि वे अपना काम करना छोड़ कर दूसरों का काम कर रहे हैं जहां तर्क, विवेक, औचित्‍य और सत्‍यनिष्‍ठा के लिए कोई स्‍थान नहीं, सफलता या विफलता ही अन्तिम कसौटी है और उसमें भी सफलता हाथ लगती नहीं दिखाई देती। इसे सर्वनाश की स्थिति कहना होगा और यह सब मेरे प्रयत्‍न के बाद भी। व्‍यर्थताबोध तो होगा ही। घर तो यह अपना ही है, उजड़ते देखना किसी के लिए सुखद नहीं हो सकता ।

Post – 2016-12-13

वह पन्‍ना सामने है पर पढ़े भी पढ़ नहीं पाते

”तुम्‍हारा लोहिया ने क्‍या बिगाड़ा था यार । अकेला तो ऐसा विचारक जो हमारे तेजस्‍वी साहित्‍यकारों की आस्‍था का केन्‍द्र रहा है, साही से सहाय तक, अशोक से कमलेश तक, तुमने उनको भी ठिकाने लगा दिया। चलो, हमारे दल सेे नाराजी समझ में आती है, पर वह तो तुम्‍हारे हिन्‍दू मूल्‍यों, पौराणिक चरित्रों, नदियों और तीर्थों का भी आदर करते थे । तुमने उनको भी नहीं छोड़ा ।”

”उनमें और तुम लोगों में अन्‍तर है । तुम लोगों की नीयत में खोट थी । तुम्‍हारा लक्ष्‍य था सत्‍ता पर कब्‍जा करना और फिर उसके बाद अपनी मनमानी करना । तुम कभी न अपने देश के हुए, न अपनी भाषा के, न अपने समाज के, न अपनी अन्‍तरात्‍मा के जो होती कहां है इसका तुम्‍हें पता ही नहीं । तुम लोगों ने बिगड़े सांड़ की तरह भारतीय राजनीति में प्रवेश किया और जब तक बस चला ऊधम मचाते रहे। सींग टूट गए, जख्‍म पर मक्खियां भिनभिना रही हैं पर आज भी आदत से बाज नहीं आते । नेहरू की नीयत में भी कुछ खोट थी । पर समाजवादियों की नीयत में खोट न थी । किसी के बारे में यह नहीं कह सकते न आचार्य नरेन्‍द्रदेव के बारे में, न लोहिया के बारे में, न जयप्रकाश के बारे में, न बेनीपुरी के बारे में । ये अन्दर बाहर एक थे । पर इतिहास में गलतियां तो लगातार होती आई हैं, अपने व्‍यक्तिगत जीवन में हम बार-बार सोचने विचारने और पिछले अनुभवों से सीखने के बाद भी गलतियां करते हैं । इतिहास वह पन्‍ना है जिसकी लिखावट साफ दिखती है पर पढ़ी नहीं जाती या इसके प्रत्‍येक पदबंध के अनेक अर्थ निकलते हैं और हम सही पाठ करने में अक्‍सर चूक जाते हैं । हमारा पूरा स्‍वतन्‍त्रता आन्‍दोलन ऐसे लोगों से भरा रहा है जिन्‍हें रियायतों और अधिकारों और अन्‍तत: सत्‍ता की कामना तो थी, परन्‍तु भारत के भविष्‍य का किसी के पास कोई खाका नहीं था सिवाय एक व्‍यक्ति के जिसका नाम गांधी था और उसी की इस देश में नहीं चली। उसे सत्‍ता नहीं चाहिए थी, पर अपने स्‍वप्‍न को साकार करने के लिए सहयोग चाहिए था। वह न मिला । अकेला वह एक ऐसा भारत बनाना चाहता था जिसमें लोग धार्मिक तो हों, पर संप्रदाय द्वेषी नहीं, जाे सबको अक्षर ज्ञान के साथ कुशल भी बनाना चाहता था, छोटा ही सही पर सबको काम करने और अपनी पेशीय शक्ति का उपयोग करने का पक्षधर था। जो बच्‍चों काे ही नहीं प्रौढ़ों को भी साक्षर बनाना चाहता था। जो गन्‍दगी, बुरी आदतों को छोड़ने, स्‍वस्‍थ जीवन जीने और प्राकृतिक चिकित्‍सा के माध्‍यम से बीमारियों से मुक्‍त होने की शिक्षा ही नहीं दे रहा था एक गिरे हुए समाज को स्‍वतन्‍त्रता का अधिकारी और उसकी चेतना से संपन्‍न बना कर ताड़ से गिरी सत्‍ता को खजूर पर रोक कर कुछ लोगों के लिए समृद्धि का मार्ग खोलने की जगह जमीन से, सबसे पिछड़े व्‍यक्ति के उदय के साथ पूरे देश के उन्‍नयन का सपना देखता था और मार्क्‍स से बहुत आगे के समाज को संभव बनाना चाहता था। उसे जिनसे सहयोग मिलना चाहिए था वे एक दूसरे भारत की कल्‍पना कर रहे थे जिसमें वे एक झटके में पश्चिम की बराबरी पर आने को उतावले थे । उसकी नकल करो और वैसे बन जाओ । जिन्‍हें यह तक दिखाई नहीं देता था कि पश्चिम को अपनी आज की स्थिति में आने के लिए कितने देशों के संसाधनों को लूटना, कितनों को बेकार और अपंग बना कर वह आर्थिक आधार तैयार करना पड़ा है। उनका रास्‍ता हमारा रास्‍ता नहीं हो सकता।

”हम उन्‍हें दोष नहीं दे रहे । विश्‍व इतिहास एेसे निर्णयों और कामचलाऊ उपायों का दस्‍तावेज है जिसमें अनेक बार तो बहुत बड़े फैसले करने पड़े हैं और उन पर सोचने तक का समय नहीं मिला है । किसी न किसी युक्ति से सत्‍ता पर कब्‍जा करके जमे रहने का ही परिणाम था जिसमें गरीबों की गरीबी बढ़ती जा रही थी और कुछ लोग अनुपात से अधिक अमीर होते जा रहे थे, यह लोहिया को खिन्‍न करता था। वह अकेले नेता थे जो गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों की दयनीय दैनिक आय का मुद्दा उठा कर इस प्रवृत्ति को बदलने की आवाज उठाते और सरकार को कठघरे में खड़ा करते थे। समाज को जातियों, धर्मों में बांट कर उन सबका एकमात्र संरक्षक बनने का ढोग करते हुए उन प्रवृत्तियों का बढ़ना लोहिया को खिन्‍न करता था और इसे वह ब्राह्मणवादी चालबाजी से जोड़ कर देखते थे और इसी का जो समाधान उन्‍हें उस समय सूझा उसके लिए उन्‍होंने कुछ प्रयास किया। भारत का विकास भारतीय भाषाओं में शिक्षा और इनमें ही सारा कामकाज होने से जुड़ा है, इसकी चेतना और इसके लिए आन्‍दोलन करने वाले वह अकेले व्‍यक्ति थे और राज्‍यों में उन राज्‍यों की भाषा में काम काज उनके ही अभियान का परिणाम था जिससे नेहरू लगातार कतराते और अंगेजी को शिक्षा और प्रशासन की भाषा बनाये रखना चाहते थे। नेहरू अपना वंशराज्‍य स्‍थापित करने के लिए अपने ही दल में अपने किसी उत्‍तराधिकारी को पनपने नहीं दे रहे थे इस कटु सचाई को लक्ष्‍य करने वाले लोहिया पहले नेता थे जो रह रह कर ‘नेहरू के बाद कौन’ का सवाल उठाया करते थे। नेहरू की सबसे बड़ी दुर्बलता थी पूंजीपतियों के सामने खम खाने की जिसे लक्ष्‍य करने वाले कम लोग थे। यह दुर्बलता सुनते हैं नैपोलियन में भी थी। वह संजय गांधी को प्रशिक्षित करने के बाद छोटी काराें का कारोबार आरंभ करते हुए उन्‍हें उद्योगपति बनाना चाहते थे, इसलिए छोटी कारों का प्रस्‍ताव लगातार टलता रहा था। इस पेंच को समझने वाले और इसे संसद में उठाने वाले लोहिया अकेले नेता थे । सत्‍ता कांग्रेस के पास थी इसलिए आलोचना उसी की होनी थी, परन्‍तु इसे गलत दिशा देते हुए लोहिया के नेहरू द्वेष के रूप में प्रस्‍तुत किया जाता था । लोहिया मानते थे कि समाज निर्माण में बुद्धिजीवियों की सबसे सार्थक भूमिका होती है इसलिए अपने समय के नवोदित बुद्धिजीवियों से उनका जीवन्‍त संबन्‍ध था और इसी कारण अनेक प्रातिभ साहित्‍यकार उनके प्रभाव में आए थे और आज भी लोहिया का नाम आते ही स्‍पन्दित हो जाते हैं । लोहिया भारतीय जमीन से जुड़े और सत्‍ता से नहीं अपितु देशचिन्‍ता से कातर व्‍यक्ति थे जिनकी समकक्षता का दूसरा नेता उस दौर में दिखाई नहीं देता ।”

”और इसीलिए उन्‍होंने ऐसा कबाड़ा किया कि पूरा देश तुम्‍हारे ही शब्‍दों में एक नरक में बदल गया ।” उससे लोहिया की इतनी प्रशंसा सहन नहीं हो रही थी।

”मैं यही बता रहा था कि इतना बड़ा आदमी भी यदि घबरा कर, कोई दूसरा उपाय न देख कर, मर्यादा काे तोड़ते हुए, काम चलाऊ हथकंडे अपनाता हुआ, जो होगा देखा जायेगा वाली मानसिकता का शिकार होता है तो उसकी परिणति वह होती है जो हुई । परन्‍तु आज तो इस काम चलाऊपन की उपासना होने लगी है और सभी मिल कर किसी भी कीमत पर भाजपा को सत्‍ता से हटाने के लिए प्रयत्‍नशील हैं परन्‍तु समाज ने अपने अनुभवों से पता नहीं क्‍या सीखा है कि वे ज्‍यों ज्‍यों जुड़ने का प्रयास करते हैं उनकी शक्ति उतनी ही क्षीण होती जाती है । जो हुड़दंग सड़क पर किया करते थे उसे संसद में पहुंचा देते हैं और सन्‍देश देते हैं कि हम इस सरकार को चलने नहीं देंगे और जिनके बीच इससे अपनी जगह बनाना चाहते हैं उनके बीच उनकी जगह और सिकुड़ती चली जाती है, यहां तक कि राष्‍ट्रपति तक को झिड़कने की जरूरत पड़ती है । जिन बुद्धिजीवियों के ऊपर लोहिया ने इतना भरोसा जताया था और जिन्‍होंने अपनी सीमा में एक स्‍वतंत्र इतिहास चेता के रूप सांकेतिक हस्‍तक्षेप भी किया था वे सक्रिय राजनीति के शोर का हिस्‍सा बन चले हैं। वे कहीं से कुछ भी उड़ा लेते हैं और नित्‍य गया गया अब गया दुहराते हुए बौद्धिक बजबजाहट को बौद्धिक सक्रियता मानने लगे हैं । सक्रिय राजनीति से जुड़ाव सुधी जनों को भी कहां पहुंचा सकता है इसका यह एक नमूना है । लगेगा मैं आज की स्थिति में नया औचित्‍य तलाश कर रहा हूं इसलिए अपनी ही 7 सितंबर की एक पोस्‍ट का कुछ अंश उद्धृत करूं :

”मैं भी यही चाहता हूँ कि कोई मेरी बात न माने, सही प्रतीत होने वाले की भी बौद्धिक गुलामी, गुलामी ही हुआ करती है। जब हम उस सही को समुचित ऊहापोह से अपना सत्य बना लेते हैं, तब वही बात किसी दूसरे की नहीं रह जाती, अपनी खोज बन जाती है। यह बात मैं पहले भी दुहराता रहा हूँ कि आपके पास देखने को अपनी ही ऑंखें हैं, सोचने के लिए अपना ही दिमाग है। वह प्रखर या मन्द जैसा भी है, काम आप को उसी से लेना है। न लिया तो ऑंख रहते अन्धे और दिमाग रहते भी मूर्ख बने रहेंगे। काम लेने से उनमें प्रखरता भी आएगी। परन्तु ज्ञान के अहंकार में लोग दूसरो की नजर और दूसरों के दिमाग से काम लेने के आदी हो जाते हैं और उनके ही काम आते हैं।

”तुमने देखा तो असहमत होने वालों में किसी के पास अपना दिमाग था ही नहीं, न अपनी आंख थी। वे किसी न किसी के कहे को दुहरा रहे थे और यह भी नहीं देख रहे थे कि उसका आधार क्या था।‘’ …

”यदि आपको स्वयं अपने विवेक से ऐसा लगता है कि कोई व्यक्ति या विचार गलत है उसे बिना किसी की बैसाखी के प्रस्तुत करें । फतवा न दें, उसका तर्क दें और उस तर्क से लगे कि आप ने इस पर सोच-विचार किया है तो उसका महत्व है। जब तुम कहो, नब्बे प्रतिशत लोग किसी को ऐसा मानते हैं इसलिए तुम भी मानते हो, तो तुमने अपनी अक्ल से काम ही नहीं लिया, संख्या के दबाव में आ गए। और संख्या जितनी ही बढ़ती जाती है विचार पक्ष उतना ही घटता जाता है, यह हम पहले समझा चुके हैं।

”देखो, तुम्हें एक बार फिर याद दिला दूँ कि मैं यदि इस बात में सफल हो जाऊँ कि सभी लोग मेरी बात मान लें, तो यह मेरे लिए दुर्भाग्य की बात होगी। अमुक ने कहा इसलिए मैं भी मानता हूॅे मार्का लोग सुपठित और वाचाल मूर्ख होते हैं जिन्हें अपना दिमाग और आंख होते हुए भी उससे काम लेने तक का शऊर नहीं होता और सारी दुनिया को अपने अनुसार चलाने की ठाने रहते हैं। और तुम उन मूर्खों के शिरोमणि तो नहीं कहूँगा, पर उसी माला में पिरोए हुए मनके हो जो अपने धागे से बाहर नहीं जा सकते।”

जब मैं अजपा जाप करने वालों को अमुक का विचार शेयर किया कह कर अपने को ढाढस बंधाते देखता हूं तो इसकी याद ताजा हो जाती है । गुण-दोष की समझ है तो विवेचन करो । अपनी महफिल में दाद पाने की जगह व्‍यापक जनसमाज में अपनी विश्‍वसनीयता कायम करो । किसने कब क्‍या कहा, क्‍यों कहा, उसे उठा कर आज पर मत लादो । उस काल को वर्तमान पर मत लादो। अपने काल और इसकी समस्‍याओं की पड़ताल स्‍वयं करो । अपने कार्यभार को समझो । अस्‍तु ।

Post – 2016-12-11

सुनते हो, मेरे बदजबां की अदा

व्‍यक्तिगत जीवन हो या सामाजिक, हम यथार्थ को गढ़ नहीं सकते । यथार्थ में संभव विकल्‍पों के बीच सबसे वांछित का चुनाव करते हैं अौर उसमें जो कुछ हमसे हो सकता है, करते हुए, एक सीमा तक उसे बदलते भी हैं। चुनाव करते समय हम जिसे सर्वाधिक वांछित मानते हैं, या अपनी समझ से जो ठीक लगता है करते हैं, उसके परिणाम यह सिद्ध कर सकते हैं कि जिसे चुनाव के क्षण में हम अवांछित मान कर छोड़ बैठे वह अधिक वांछनीय था या जो कुछ हमने किया उसमें कुछ गलतियां हुईं जिनके कारण उसका परिणाम अपेक्षा के अनुरूप न हो पाया। कहें वांछित और अवांछित की अपनी कमियां होती हैं जिनके आकलन में हमसे चूक होती है और इसमें अपनी भागीदारी में भी हमसे चूक होती है। यह यथार्थवादियों की समस्‍या है ।

इसके विपरीत स्‍वप्‍नजीवियों का संसार होता है जिसमें सर्वशुद्ध और निरापद की एक अवधारणा होती है और उसे वरण करने के अतिरिक्‍त कोई चारा नहीं होता और यदि हम उसका वरण नहीं करते हैं तो हम दुष्‍ट या अपघाती हैं और देश और समाज के भले के लिए ऐसे लोगों को रास्‍ते से हटा दिया जाना चाहिए। इसके सबसे अच्‍छे नमूने मनोरोगियों में मिलते हैं जो श्रुतिभ्रम और दृष्टिभ्रम के कारण सर्वशुद्ध की पुकार सुन पाते या देख पाते हैं, और बाधकों को रास्‍ते से अलग करने के लिए जो भी हाथ में आया उससे प्रहार करते रहते हैं। कुछ सह्य रूप में किसी विचार या मान्‍यता से प्रतिबद्ध लोगों में भी यह पाया जाता है जो मनोगत या इष्‍ट को यथार्थ और यथार्थ को भ्रम मान लेते हैं और इसलिए उसे देखने-समझने की क्षमता ही खो बैठते हैं।

हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जिसमें एक और कष्‍टकर यथार्थ है और दूसरी ओर ऐसी विकल्‍पहीनता जिसमें कष्‍ट झेलने वाले भी वापसी का विकल्‍प नहीं चुन सकते। यह शुरू जैसे भी हो, है एक युद्ध जिसके आरंभ हो जाने के बाद उसको लड़ और मरखप कर ही किसी परिणति तक पहुंचाया जा सकता है। इतिहास में वापसी जैसी कोई चीज होती नहीं, हमें सारे निर्णय यहां और अब लेने होते हैं । इसलिए यह समझना अधिक जरूरी है कि जिसे हम एक व्‍यक्ति का निर्णय मानते हैं, उसे कष्‍टभोगने वाला समाज स्‍वयं अपने हित में किया गया निर्णय मान कर उसके कष्‍ट को झेलता हुआ, असुविधाओं सहता और यदा कदा कुढ़ता हुआ उसी तरह इसकी सफलता की कामना करता है जैसे मोर्चे पर भूख, कुमुक और असले की अपर्याप्‍तता के बीच भी लड़ता, बढ़ता, बचता हुआ योद्धा विजय के लिए विजय के लिए प्राणपण से प्रयत्‍न करता है और संकटापन्‍न स्थितियों में भी अपने देश और समाज को हार और अपमान से बचाना चाहता है ।

किनारे बैठे वे लोग जो अपने स्‍वार्थ या विचारधारात्‍मक कारणों से शत्रु देश के प्रति सहानुभूति रखते और उसकी विजय चाहते हैं, जैसा चीन -भारत युद्ध के समय देखने में आया था। अपने पक्ष की कमजोरियों, गलतियों का दबे या खुले स्‍वर में राग अलापते हैं शत्रु पक्ष के सभी कारनामों का समर्थन करते हैं और अपने ही देश की पराजय की कामना तक करते हैं ।

वे अपने सैनिकों की असुविधाओं और कष्‍टों को तो देख पाते हैं उस संकल्‍प को नहीं देख पाते जो कष्‍ट और असुविधाओं के बीच भी उसे विचलित नहीं होने देता ।

आज की स्थिति यही है । पक्ष बंटे हुए है, देश और जनता एक ओर है, जो इस अभियान की सफलता चाहती है और रहस्‍यमय और प्रकट दोनों कारणों से दूसरी ओर वे हैं जो इसकी विफलता चाहते हैं और हमें समझाना चाहते हैं कि वे भी देश हित से ही कातर है, परन्‍तु देश हित की उनकी परिभाषा अलग है।

यदि विभाजन इतना साफ हो तो तर्क और प्रमाण अपनी सार्थकता खो देते हैं । बीच समर में अपने देश की रणनीति की आलोचना करने वाले विशेषज्ञ जितने भी बड़े ज्ञानी क्‍यों न हों, वे उस पक्ष से जुड़े होते है जो पराजय की कामना करते हैं, अन्‍यथा वे ऐसे सुझाव रखते जिससे विषम स्थितियों में अविचल भाव से लड़ने वालों को राहत दे सकें और मनोबल को बढ़ा सके । वे अपनी विशेषज्ञता का प्रयोग सही गलत की परिभाषाओं को उलटने के लिए तो कर सकते है, परन्‍तु इसे सफल बनाने के लिए क्‍या अपेक्षित है ऐसा सुझाव उनके विवेचनों में नहीं आता।

इन सबके लाख उकसावों के बाद भी, अपनी कष्‍ट कथा बयान करते हुए भी, जनता तात्‍कालिक असुविधाओं का विरोध करने के अतिरिक्‍त भड़काने की कोशिशों उत्‍तेजित होने बचती रही है, क्‍योंकि उसे विश्‍वास है कि यह निर्णय पूरे देश के हित में लिया गया है और इससे केवल देश के भितरघातियों को बेचैनी है। उसका यह विश्‍वास न केवल उसके संयम में दिखाई देता है, उस भारी भीड़ में भी दिखाई देता है जो प्रधान मंत्री की इसी दौर में आयोजित सभाओं में देखने में आ रही है।

इसलिए उस ऊब, खीझ, विवशता और विकल्‍पहीनता के इतिहास को समझना कुछ उपयोगी हो सकता है जिसने भारतीय जन के भीतर इतना आक्राेश भर दिया था कि उसने एक ऐसे विकल्‍प का स्‍वागत किया जिससे विरत करने के लिए संचार माध्‍यम, प्रचार के साधन और लगभग समस्‍त बुद्धिजीवी वर्ग लगा हुआ रहा है।

जिस बिन्‍दु पर यह निर्णय भारतीय जन ने लिया उसे एक शब्‍द में कहें तो यह वह चरण था जिसमें सभी मर्यादाएं टूट चुकी थीं, सभी प्रतिबन्‍ध लगभग समाप्‍त थे। स्थिति ऐसी थी कि प्रचार संचार के वे ही साधन और और वे ही बुद्धिजीवी उस सर्वनाशी दौर के क्षरण और गिरावट पर चिन्‍ता प्रकट करने में किसी से पीछे नहीं थे जो आज उसी की वापसी का गला फाड़ रहे हैं। नरक का रोना रोने वाले नरक के इतने आदी हो चुके थे कि वे अपने नरक से बाहर निकलने में घबराहट अनुभव करने लगे।

मर्यादाओं के टूटने का इतिहास राममनाेहर लोहिया के उस संकल्‍प से जुड़ा था जिसमें वह कांग्रेस से किसी भी कीमत पर मुक्ति चाहते थे या कम से कम एक ऐसा विकल्‍प चाहते थे जो उसका जवाब बन सके । कांग्रेस में ब्राह्णों का वर्चस्‍व था और ब्राह्मण उसे अपनी पार्टी मानते आ रहे थे । लोहिया जी ने इसे सवर्णों की पार्टी के रूप में कल्पित किया और एक ऐसे विकल्‍प की तलाश में रहे जो इनकी धौंस में न आए और अावश्‍यकता होने पर डट कर मुकाबला कर सके । दलितों से उन्‍हें इसकी आशा नहीं थी, परन्‍तु आज की परिभाषा में पिछड़े समुुदायों से जो नियम कानून की भी परवाह नहीं करते थे और इसके कारण ही ऊंची जातियों के लाेग भी इनका दबाव अनुभव करते थे, उनको वरीयता देने में उन्‍हें आशा की किरण्‍ा दिखाई दी। ये थे जाट, भूमिहार, यादव, कुर्मी, गड़रिया आदि । यहां तक उनका निर्णय सही था, परन्‍तु इसके लिए उन्‍होंने जो मर्यादाओं की उपेक्षा का रास्‍ता चुना या मर्यादाओं की अवहेलना के ‘गुण’ के कारण उन्‍हें वरीयता दी वह सही नहीं था जिसमें औचित्‍य का ध्‍यान रखे बिना राजनारायण जी संसद में ही लेट जाते थे और उनके भारी भरकम शरीर को उठा कर बाहर करने में सुरक्षा कर्मियों का दम उखड़ जाता था। यह एक खतरनाक आरंभ था, जिसकी भयावहता का अनुमान कोई उसी तरह न लगा सका जैसे तटबन्‍ध में मामूली रिसाव आरंभ होने पर उसकी उपेक्षा कर दी जाय कि इतने से कुछ नहीं बिगड़ता जब कि वही बढ़ते बढ़ते तटबन्‍ध को तोड़ और बहा कर पूरे क्षेत्र के लिए आपदा का कारण बन जाता है। अपनी इसी करनी के बल पर नेता जी का मतलब राजनारायण हुआ करता था जो उनके जीवन काल तक बना रहा । अब सुनते हैं नेताजी का ताज मुलायम सिंह के सिर है और वह भी अपने को लोहिया जी का सच्‍चा उत्‍तराधिकारी मानते हैं।

कांग्रेस को किसी भी कीमत पर हटाने का उनका दूसरा सूत्र था विचारधारा की चिन्‍ता किए बिना सभी विरोधी दलों का एक जुट हो कर चुनाव लड़ने और सत्‍ता पर कब्‍जा जमाने की सलाह। उसके बाद क्‍या होगा यह ‘तब की तब देखी जाएगी’ पर छोड़ देना। तब की तब देखी जाएगी, किसी को सत्‍ता से बाहर करना पहला और अन्तिम लक्ष्‍य बन जाय तो जयप्रकाश के पूर्ण स्‍वराज्‍य से लालू भी पैदा हो सकते है और नीतीश भी। यह एक जोखिम भरी विकल्‍पहीनता है जिसे उसकी परिणति से ही जाना जा सकता है ।

लोहिया को गठबन्‍धन राजनीति के आरंभ का श्रेय जाता है और श्रेय जाता है उस ध्रुवीकरण का जिसे मोरारजी देसाई के द्वारा स्‍थापित मंडल कमीशन ने संभव बनाया और विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने अमली रूप दिया। परन्‍तु ‘किसी भी कीमत पर सत्‍ता’ का सिद्धान्‍त देश के लिए भी खतरनाक सिद्ध हुआ और बाद की समस्‍त विकृतियों की जड़ भी। पहले तो इसने नव गठित केन्‍द्र सरकार के भीतर ही विश्‍वासघातियों का एक धड़ा पैदा कर दिया जिसमें कांग्रेस के समर्थन के आश्‍वासन पर चरण सिंह की महत्‍वाकांक्षा को उकसाया गया और फिर उसके समर्थन वापस लेने पर उस संभावना को ही कुचल कर उसी कांग्रेस का रास्‍ता साफ कर दिया गया जिसके लिए इतना भगीरथ प्रयत्‍न इतने लंबे समय तक जारी रहा। किसी कीमत पर सत्‍ता के मन्‍त्र ने वोट के लिए पहले बाहुबलियों के प्रयोग, मतपेटियों की लूट, फर्जी वोटों से चुनाव परिणामों को उलटने के प्रयास का रास्‍ता खोला और फिर बाहुबलियों की अपनी महत्‍वाकांक्षा जाग्रत करके उसके राजनीति में प्रवेश को संभव और राजनीति के अपराधीकरण का रास्‍ता तैयार किया।

अपराधियों का सहारा न रह जाने पर नोट के बदले वोट का रास्‍ता खोला जो कांग्रेस संस्‍कृति का अंग आपात काल के साथ ही बन गया था परन्‍तु इतना नग्‍न रूप नहीं लिया था जो इसने बाहुबलियों से भरोसा उठने के बाद लिया। देश के विकास का पैसा विभागों में बंटता और अधिकारियों से रिश्‍वत के रूप में सरकार में बैठे लोगों द्वारा वसूल किया जाता, थानों चौकियों के ठेके लगते, और इसके बदले में उन्‍हें अपनी भरपाई के लिए जो वे करना चाहें करने की छूट दी जाती जिसमें न विकास संभव था न व्‍यवस्‍था। शीर्ष पदों पर बैठे लोग यह सब कानून का सम्‍मान करते हुए नहीं कर सकते थे इसलिए उनकी इच्‍छा ही कानून बनती चली गई जिसमें अधिकस्‍य अधिकं फलं की सूझ ने माफियाओं के असंख्‍य रूपों को जन्‍म दिया और ये असामाजिक तत्‍व समाज में सबसे प्रभावशाली तबके के रूप में उभरे । अब कोई भी कुछ भी कर सकता था, अपहरण, फिरौती, बलात्‍कार अर्थात् बच्‍चों से गलती हो जाती है और गलती होती रहनी चाहिए, भयदोहन ने अराजकता से भी बदतर स्थिति पैदा कर दी और इसका विस्‍तार तब केन्‍द्र की ओर हुआ तो इस महाप्‍लावन में कुछ भी नहीं बचा रहा । किसी से कुछ छिपा नहीं था इसलिए किसी को किसी का डर नहीं रह गया था और इस तरह बना था वह नरक जिसमें पूरा देश झोंक दिया गया था। आम जन असहाय, निरुपाय। इस नंगी नाच पर वाचाल शोर न मचायें इसलिए पत्रकारो, संचारमाध्‍यमों, वाचाल बुद्धि‍जीवियों को भी कुछ रियायतें दी जाती रहीं जिनका व्‍यौरा देने चलें तो पन्‍ने भरने के बाद भी बहुत कुछ छूट जाएगा इसलिए नरक कुंड में असहज अनुभव करते हुए भी वे यह सिद्ध करने के लिए कि उनकी अन्‍तरात्‍मा मरी नहीं है कभी कभी बिना किसी पर उंगली उठाए संगीत लहरी वाले स्‍वर में अपना असंतोष भी प्रकट कर देते थे फिर भी बाद की सचाई ने यह सिद्ध कर दिया कि वे उनके अच्‍छे दिन थे और अब वे उसकी वापसी के लिए व्‍यग्र हैं।

समस्‍त मर्यादाओं का लोप वह स्थिति है जिसमें लोकतन्‍त्र सबसे पहला शिकार होता है। इस देश में लोकतन्‍त्र पाखंड बन गया था, तानाशाही के विविध रूप पूरे देश में प्रचलित थे जिसमें देश के रक्षक देश को लूट रहे थे।

यह वह बिन्‍दु था जिस पर पिछला चुनाव हुआ और अब जनता ने एक ऐसे तानाशाह के चयन का मन बनाया जिसमें ईमानदारी हो, देश निष्‍ठा हो, साहस हो और अप्रिय निर्णय लेने की क्षमता हो जिसमें संभव विकल्‍पों में मोदी सर्वोपरि थे और मोदी जो तानाशाही की भगुरता और लोकतन्‍त्र की शक्ति को बहुत अच्‍छी तरह समझ चुके थे, जनता की अन्‍य अपेक्षाओं पर सही उतरने के संकल्‍प के बाद भी उस तानाशाही को ऐसे लोकतन्‍त्र में बदलने के लिए प्रयत्‍नशील हैं जिसमें शासक अपने सभी निर्णयों और कार्यों के लिए सीधे जनता के प्रति उत्‍तरदायी हो और उसे अपनी सफाई दे सके ।

यह वह बिन्‍दु है जहां दोनों धड़े साफ अलग हैं । दुख झेलती जनता और उसके दुखों का कारगर इलाज तलाशने वाला एक ओर और जगदीश वैद के उपन्‍यास नरक कुंड में वास के मुरीद दूसरी ओर । वे मोदी को गालियों की भाषा में संबोधित करते हुए फेसबुक पर जो जी में आता है बोलते हैं और उस पक्ष में खड़े होने वालों को भी उसी रौ में संबोधित करते हैं परन्‍तु इस शिकायत के साथ कि उनको बोलने तक की आजादी नहीं मिल पा रही है।

मीर का शेर है,
बात कहने में गालियां दे है ।
सुनते हो मेरे बदजबां की अदा ।

Post – 2016-12-09

चिन्तित रहने वाले लोग

”कहो कुछ भी यह विचित्र तो लगता ही है कि पूरे देश में सोच समझ का इतना सीधा विभाजन है कि एक को रोज कोई न कोई खामी नजर आ जाती है, दूसरे इतने निश्चिन्‍त कि उन्‍हें कहीं कोई दोष दिखाई ही नहीं देता। राजमार्गों पर, गांव देहात में नकदी की कमी से कष्‍ट भोग रहे लोगों की तकलीफ, उनकी मौत तक इनको विचलित नहीं कर पाती । प्रश्‍न कुछ हितबद्ध लोगों या राजनीतिक ऊसर क्षेत्र तक सीमित नहीं है, विशेषज्ञ हैं और उनकी आशंकाएं है, इन सभी की अनदेखी कैसे कर सकते हो तुम ?”

”भरे बैठे थे, लगता है। एक साथ इतने सवाल कि सोचना पड़ जाय कि किसका समाधान करूं और किस तरह । पहली बात तो यह कि मैं साहित्‍य का और इतिहास का विद्यार्थी हूं। अर्थशास्‍त्र की बारीकियां नहीं जानता। यहां तक कि वे कूटनीतिक शंकाएं जो कई देशों ने व्‍यक्‍त की हैं, उनकी पेचीदगी से परिचित नहीं हूं। उनको यथातथ्‍य मान भी नहीं सकता, नकारने का प्रश्‍न ही नहीं उठता, पर यह तो मानना ही होगा कि इस प्रयोग के कई पहलू हैं जिनको लेकर ऐसे लोग चिन्तित है जिनकी नीयत पर सन्‍देह नहीं किया जा सकता।

” पहले हम इन विशेषज्ञों की बात लें, जिनमें राजनयिक पहलू की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। उनमें सबका एक निष्‍कर्ष है कि हमें अभी कुछ समय तक प्रतीक्षा करनी होगी, जिसमें हालत सुधरने की संभावना है। यह संभावना एचडीएफसी के सीईओ ने भी प्रकट की जो कभी इस निर्णय के प्रशंसक थे और फिर आलोचक बन बैठे। उन्‍होंने कठिनाइयां गिनाई हैं और कुछ आशंकाएं प्रकट की है पर साथ ही यह कहा कि जनवरी तक हालत में सुधार संभव है। उनका एक समय का आकलन उनकी ही समझ से गलत हुआ, और दूसरा आकलन दूसरे कारणों से उतना सही नहीं हो सकता ।

”एक प्रश्‍न इस सन्‍दर्भ में यह भी कि पिछले दिनों एचडीएफसी के विषय में नाम ले कर लोगों की शिकायतें आती रहीं कि उसमें कुछ ही घंटों के बाद यह ऐलान कर दिया जाता है कि कैश नहीं है। अकेले इस बैंक के साथ यह शिकायत नाम ले कर आई । क्‍या सीइओ के नये आकलन और दूसरे बैंकों से अलग इस बैंक के व्‍यवहार और चोर दरवाजे से कैश के गलत हाथों में चले जाने में कोई संबन्‍ध हो सकता है? यदि हां तो अभी तक इसके किसी शाखा प्रबन्‍धक का नाम क्‍यों नहीं आया? और यदि नहीं, तो इसका कैस इतनी जल्‍द क्‍यों खत्‍म हो जाता रहा कि एक दो बार लोगों को अपना आपा खोना पड़ा। ये भी उतने ही टेढ़े सवाल है जो विशेषज्ञता और उसके अलग अलग चरणों के आकलन आदि से जुड़े हैं जिन पर कुछ कहने की योग्‍यता मुझमे नहीं है ।

”लोगों काे असुविधा है और इसका तीखा बोध मोदी सरकार को भी है, यह पहली बार मैंने 28 नवम्‍बर की अपनी पोस्‍ट में कुशीनगर में मोदी जी के सुझाव को सुन कर उनकी भावभंगिमा को देख कर कहा था। यह चिन्‍ता सभी को है सिवाय उनके जो इनकी फेहरिश्‍त तैयार करते हुए अपने को दूसरों से अधिक चिन्तित दिखाते हैं और घूम घूम कर इसका राग अलापते हैं, क्‍योंकि इसमें उन्‍हें जनता की तकलीफ नहीं दिखाई देती, इसकी आड़ में एक दुर्लभ अवसर दिखाई देता है जो उनकी आकांक्षा को फलीभूत कर सकता है। कयामत के दिनों की भविष्‍यवाणियों करने वालों में कुछ तो मर्सिया भी लिखने लगे हैं।

”हमने उसी पोस्‍ट में लिखा था, जनता कष्ट झेल रही है, इसे झेलने की एक सीमा है । उपचार उस सीमा के भीतर हो जाए यह शुभ होगा।” परन्‍तु अन्‍तर शुभ के आकांक्षी और अशुभ की प्रतीक्षा में खड़े कराहने वालों का है । आज की स्थि‍ति यह है कि अनगिनत शिकायतों के बाद भी शहरों में हालत सुधरी है। मेरे निकट स्‍टेट बैंक की एक शाखा है और दूसरी पंजाब नेशनल बैंक की । पहले जहां अछोर लाइन लगती थी, वहां कल 20 लोग स्‍टेट बैंक में और आठ दस पंजाब नेशनल बैंक में दीखे। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जो काले को सफेद करने के जंग में उतारे गए लोग थे, उनको यह आभास हो गया है कि यह सौदा उन्‍हें मंहगा पड़ सकता है। वे रास्‍ते से हट गए हैं।

”गांव देहात में सुधार हुआ होगा, पर स्थिति अभी गंभीर है। इसकी चेतना मोदी सरकार को है। वह स्‍वयं इसमें जो भी संभव है करने को तत्‍पर है। अभी पचास दिन पूरे नहीं हुए। इसके पूरे होते ही काफी अन्‍तर वहां भी दिखेगा। बाढ़, सूखा, फसल की अकाल वृष्टि से बर्वादी आदि की तकलीफों से गुजरने वाले गांव के लोग परेशानी में भी शहरी लोगों की तरह धीरज नहीं खोते । अपना तरीका निकाल लेते हैं। ये शहरी लोग हैं जो मामूली असुविधा होने पर तोड़ फोड़ और आगजनी पर उतारू हो जाते हैं । दंगे भी ये ही भड़काते हैं। इस बार नोटबन्‍दी के पीछे के महान लक्ष्‍य को देखते हुए उन्‍होंने भी अपना धैर्य बनाए रखा। इसलिए आशा है ग्रामीण जनों का मनोबल टूटने से पहले स्थिति पूरे देश्‍ा में सामान्‍य हो जाएगी। नोटों की भरपाई ही नहीं, छोटे मूल्‍य के बीस, पचास, सौ, ही नहीं हजार और पांच सौ के नोट लाने का प्रयत्‍न हो रहा है। यह भी दुष्‍प्रचार है कि पूरे तन्‍त्र को रोकड़मुक्‍त कर दिया जाएगा। उपदेश देने वालों की तुलना में मोदी को गरीबों, किसानों और मजदूरों की अधिक अच्‍छी समझ है। वह भी जानते हैं कि रोकड़ के बिना ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था नहीं चल सकती। शहरों में भी हमारा अर्थतन्‍त्र विकसित देशों से भिन्‍न है। परन्‍तु इस क्राइसिस से ही टकाहीन लेन देन की संस्‍कृति शहरों में और फिर मोबाइल के प्रचलन की तरह देहातों तक में जन्‍म लेगी जो नकली नोटों, जमाखोरी, मिलावट, कालाबाजारी, टैक्‍स चोरी जो मुनाफाखोरी और कालाधन की जड़ है, का कारगर इलाज है।

”जिन्‍होंने केवल विलाप किया है वे इसके साथ जुड़े सेवा कर आदि का इकहरा चित्र पेश करके डराने या विचलित करने का प्रयत्‍न कर रहे हैं, परन्‍तु वे उन विकृतियों को जिनसे इसने मुक्ति दी है नहीं देख पाते। वे नहीं देख पाते कि कथित रूप में रिजर्व बैंक तक में नकली नोटों का इतना बड़ा भंडार जमा हो चुका था, एक ही नंबर के आवर्ती नोट तक छापे गए थे और हमारे पूर्ववर्ती प्रशासनिक तन्‍त्र की जानकारी के बिना यह संभव नहीं लगता। पाकिस्‍तान से पंप किए जाली नोटों से भी अधिक भयानक समस्‍या घरेलू स्‍तर पर बैंक के छापाखानों में हुई इस हेराफेरी की है। यदि ये खबरें सही हैं तो नोटबन्‍दी के अलावा कोई उपाय ही न था।

”कांग्रेस ने इतने असंख्‍य घोटाले किए। स्‍वच्‍छ शासन का अपना नैतिक अधिकार खो चुके सभी दलों ने कर अपार काला धन जमा कर रखा था, उसे इस एक ही निर्णय ने कूड़े की ढेर में बदल दिया। लोकतन्त्र की बहाली का इतना कारगर उपाय धन, जाति, धर्म के उन क्षुद्र हथकंडों से पार जा कर कर पाना असाधारण साहस और दूरदर्शिता का प्रमाण है जिसे आम जन जानते हैं, विशेषज्ञ इसकी ओर ध्‍यान ही नहीं दे पाते। यह उन रहस्‍यों में से एक है जिसके कारण जनता के निर्णय बार बार विशेषज्ञों के निर्णय से अधिक निखोट होते हैं।

”जिन दलों ने काले धन के तहखाने भर रखे थे वे संसद में चीत्‍कार कर रहे हैं और वहां कोई काम होने नहीं दे रहे हैं और उन पर पलने बढ़ने वाले बाहर चीत्‍कार कर रहे हैं और लोगों का ध्‍यान केवल आहो फुगां पर ही टिकाए रखना चाहते हैं और जाति औ धार्मिक विद्वेष और अलगाव को हवा देते रहना चाहते हैं जिसने समाज को भीतर से जर्जर कर रखा है जब कि जनता को दिखाई देता है पहली बार ऐसा नेता जो तोड़ने और बांटने वाली क्षुद्रताओं से ऊपर उठ कर जोड़ने और देश को विकास की दिशा में ले जाने वाली राजनीति करना चाहता है। ये क्षुद्र लोग हैं जिन्‍होंने पवित्र शब्‍दों की मर्यादा को उसी तरह नष्‍ट किया है जैसे ईसाइयत के पोपतान्त्रिक विनाश ने किया जिससे यूरोप में अन्‍धकार युग आया था। मैंने कहा था न कि उस पोप को जिसने यूरोप के पुराने पुस्‍तकालयों, देवालयों, वास्‍तुकृतियों को नष्‍ट करने का आरंभ किया और बुद्धिजीवियों को देश से पलायन करके अपने प्राण बचाने को विवश किया था, उसका नाम इन्‍नोसेंट था और जिसने मातृदेवी के मन्दिर को नष्‍ट किया था उसका नाम स्‍वर्ग का द्वार या थियोडेारस था। इनके अभियान का नाम सेक्‍युलरिज्‍म पड़ गया और उसके तहत क्‍या कारनामे किए गए इसका इतिहास तक उन्‍हें पता नहीं, उससे पीछे के इतिहास की तो बात ही अलग है।

”यदि तुम्‍हारी शंकाओं का समाधान हो गया हो, तो कल से मोदी केन्द्रित और मुद्रा केन्द्रित सवाल न करना। मोदी मेरे लिए राजनीतिज्ञ से अधिक एक द्रष्‍टा और युगनिर्माता के रूप में सार्थकता रखते हैं।”

”और इसीलिए तुम उनके भक्‍त हो जिसे उसमें कोई दोष नहीं दिखाई देता।” उसने फिकरा कसा।

”गालियों की यह भाषा कभी बड़े बड़ों की छुट्टी कर देती थी। आसमान छूते शिखरों को तुमने गालियों से जमीदोज कर दिया। लोगों पर इतना प्रभाव था तुम्‍हारा और तुम्‍हारे प्रचार तन्‍त्र का। जिनकी संगत में तुम पाए गए उनके चरित्र को जानने वाले तुम्‍हारे प्रभाव से, उस प्रचारतन्‍त्र के भी प्रभाव से मुक्‍त हो गए इसलिए पहले जहां तुम्‍हारी गालियों के कारण दूसरे डरते थे, वहां अब तुम्‍हें डरना चाहिए क्‍योंकि इनके प्रयोग के कारण अब वे ही लोग तुम्‍हें बदतमीज समझते हैं। भाषा के स्‍खलन में तुम्‍हारा योगदान सबसे अधिक रहा है । अब भी समय है, तर्क और प्रमाण के साथ बात करो और दूसरों के तर्क और प्रमाण का सामना करो। सर्वनाशे समुत्‍पन्‍ने अर्धं रक्षति पंडित: । अब भी कुछ कहना हो तो मेरे पास सुनने का धैर्य है ।”

वह कुछ कहने की जगह उठ खड़ा हुआ ।

Post – 2016-12-08

पततो पततो न वा
पंचतन्त्र में जिन कहानियों काे को एक बड़े कथा सूत्र में पिरोया गया है उन सभी के रचनाकार इसके रचनाकार विष्णु शर्मा नहीं हैं । इनके रचनाकारों का पता भी नहीं चल सकता । ये लोक में प्रचलित कथाएं थीं । ठीक इसी तरह इसमें जिन सूक्तियों का प्रयोग इस कथाबंध में किया गया है वे दूसरे कवियों की हैं । यह संभव है आवश्यकता होने पर उन्होंने स्वयं भी कुछ सूक्तियां अपनी ओर से रच दी हों । लोक रचित में कई बार कुछ भदेस सामग्री भी अाजाती है ।
ऐसी ही एक कथा एक सियार की है । वह अपनी जोरू के साथ नदी किनारे टहल रहा है । इसी समय एक सांड़ उधर से गुजरता है । सांड़ झूमता चला जा रहा था और उसका ललौहां कोश नीचे को लटका झूल रहा था । सियार ने इससे पहले किसी सांड़ को देखा नहीं था । उसने समझा यह कोई फल है । पक कर तैयार है अब गिरा कि तब गिरा । उसने अपनी जोरू को समझाया यहीं बैठी रहो अभी मै बहुत अच्छा उपहार लेकर आता हूं ।
वह सांड़ के पीछे इस आशा में लग गया कि फल तो गिरना ही है, झूल भी रहा है । अब गिरा कि तब । पर वह गिरने का नाम ही न ले । वह बहुत दूर तक उसका पीछा करता रहा। अन्त में निराश होकर वापस लौटा तो पाया कि उसकी जोरू किसी दूसरे सियार के साथ चली गई है ।
इस कहानी की याद इसलिए आ गई कि जब से मोदी के सत्ता में आने के आसार बने हमारे बीच कुछ ने, जिनके हित या तो ऐसे दलों से जुड़े थे जो लूट पाट में लगे हुए थे और जिनका टुकड़ा इन्‍हें भी पहुंच जाता था, या ऐसे दलों से नाता जोड़ चुके थे जिनक पास किसी ठोस कार्यक्रम के अभाव में, भाजपा को सत्ता से बाहर रखने का एकमात्र कार्यक्रम बच रहा था, और जिन्होंने अपने इस दुराग्रह से उसके सत्ता में आने का रास्ता अपनी ओर से भी आसान बनाया। वे अपनी बचकाने अायोजनों से पहले यह सोचते थे कि उसे हल्‍ला मचा कर आने से ही रोक देंगे, फिर यह आस लगाए रहे कि इसे अब गिराया कि तब । अनावृष्टि हो या कुवृष्टि, अातंकवादी हमले हों या अलगाववादी आन्दोलन, सीमारेखा पर तनाव हो या देश के भीतर विघटनकारी कारनामे इनकी सहानुभूति और समर्थन देश और समाज का अहित करने वालों के साथ रहा । कारण वे सोचते रहे कि इसके साथ ही मोदी अब गया कि तब । उन्हें किसी कीमत पर, यहां तक कि देश की बर्वादी की कीमत पर भी मोदी को सत्ता से हटाना था । प्रतीक्षा करते हार गए पर आस न छोड़ी ।
विमुद्रीकरण का फैसला बहुत बड़ा फैसला था । शायद ही कोई हो जिसे इसकी आंच न सहनी पड़ी हो । इन पंक्तियों के लेखक को कुछ कम असुविधा नहीं झेलनी पड़ी । कालाबाजारियों ने ठीक वही तरीका अपनाया जो रेलवे टिकट के कारेबारी अपनाते थे । इन्होंने बैंकरों को पटा कर अपना काला सफेद कर लिया और किसी को कानोकान खबर न हुई। करोड़ों की रकम सीधे बैंक से जमाखोरों के पास पहुंच गई और उनके गुर्गो ने कतार की लंबाई को तो बढ़ाया ही जिसका कुफल आम जनों को भोगना पड़ा, उनके माध्‍यम से निकासी के कारण कतार में खड़े लोगों का नंबर आए इससे पहले ही पैसा खत्‍म होता रहा । इसने उनकी आशा को आशातीत रूप में उत्‍तेजित कर दिया ।
वे कतारों की लंबाई, उनमें खड़े लोगों की असुविधा की कहानियां सुना कर मौके पर पहुंंच कर लोगों को भड़काते रहे और लोग कालेधन को खत्‍म करने के इस फैसले से इतने अनन्‍य भाव से जुड़े रहे कि इतनी कठिन असुविधाओं को झेलते हुए भी, उस देश में जहां मामूली से उकसावे या असुविधा पर लोग रास्‍ता जाम कर देते, तोड़ फोड़ पर उतर आते, वे अपना संयम बनाए हुए हैं। वे सारे दुख जो पहली बार जनता के दुख से कातर होने का अभिनय करने वाले अपनी जगह पर बैठे लंबी उसासें भरते हुए सुनाते है, उन्‍हें झेलते हुए वे यह समझ रहे हैं कि इससे निबटने का उतना ही अथक प्रयास सरकार कर रही है । कुछ असुविधा जनक स्थितियां आएंगी, कुछ थके ऊबे लोग आपसी झड़प पर भी उतारू होंगे, खास तौर से तब जब उनको पता है कि कतार में कालाबाजारियों के गुर्गे भी खड़े हैं जिनके कारण उन्‍हें असुविधा हो रही है, नोटों की आपूर्ति की शिकायते, एटीएम में पैसों की कमी, आदि की परेशानियों ने इनकेा उत्‍साह से भर दिया है कि अब की बार तो टपकेगा ही। अभी तक नहीं गिरा, संभव है जनता इसे यह जानकर झेल जाय कि यह एक व्‍यक्ति का फैसला नहीं है अपितु उनकी अपनी आकांक्षा का कार्यान्‍वयन भी है। गिरना तो संभव नहीं लगता और यदि कोई संकट सचमुच आया तो यह ग्रीक त्रासदी का मंचन होगा जिसमें सहानुभूति आपदा झेलने वाले के साथ रहती है ।
फिर भी गिरा अब गिरा की आश में पीछा करने वालों के धैर्य की भी दाद तो देनी ही पड़ेगी ।

Post – 2016-12-07

इतिहास का इतिहास

”बात कहीं से शुरू हो तुम घूम कर इतिहास पर चले जाते हो । पहले मानविकी की शाखाओं की बात की और फिर अन्‍त में इनमे से इतिहास पर जम गए । तुम्‍हें पता है कई देश ऐसे हैं, जिनमे इतिहास नहीं पढ़ाया जाता और वे दुनिया पर राज कर रहे हैं।”

”तुम्‍हारा ध्‍यान इस बात की ओर नहीं जाता कि वे अपने इतिहास का सामना नहीं कर सकते । इसकी क्षतिपूर्ति के लिए वे दूसरे देशों का इतिहास और पुरातत्‍व पढ़ते और उनको उसके माध्‍यम से अपने वश में रखना चाहते हैं । इतिहास के बारे में मैंने पहले कई बार अपनी समझ तुमसे साझा की है । जो इतिहास से बच कर, अपने वर्तमान से आरंभ करते हैं उनकी आबादी में मनोविकृतों की संख्‍या का अनुपात अधिक होता है। वे केवल यह देखते हैं कि अमुक के पास इतना था आज इ‍तना हो गया और इस होड़ में जिस भी साधन से अधिक से अधिक जोड़ा जुुगाया जा सकता है उसे जोड़ने सहेजने में लग जाते हैं । मिलावट, नकली उत्‍पाद, अपराध के विविध रूप, नैतिक गिरावट के सभी रूप इसी से जुड़े हैंं जिनको इस बात की याद तक नहीं कि अपनी साख को बचाने, आत्‍मसम्‍मान की रक्षा के लिए उनके ही पुरखों ने किस तेवर से ऐसे प्रलोभनों का सामना किया था।

”तुम्‍हारे पास घर हो, तो तुम घर बनाने पर अपना समय नष्‍ट न करोगे, उस घर को बसाने, सुखी रखने की चिन्‍ता ही पर्याप्‍त होगी। परन्‍तु यदि तुम्हारा घर किसी आपदा के कारण या किसी की दरिंदगी के कारण उजाड़ दिया गया हो, तो तुम्‍हारी पहली जरूरत अपना घर बनाने की होगी। इतिहास के साथ भी यही है । हमारे पास जैसा तैसा एक इतिहासबोध था जिससे हमारा काम चल जाता था। उसका सही होना उतना जरूरी नहीं जितना उसके सही होने पर हमारा विश्‍वास होना जरूरी है । वह इतिहास भी हो सकता है और पुराण्‍ा भी या साहित्‍य का एक कल्पित चरित्र भी जैसे मजनू । वह हमें प्रेरित करता है, हमारे आचरण को प्रभावित करता है और सामान्‍य जीवन में हम जिस तरह के बलिदान के लिए तैयार नहीं हो सकते, उसके लिए वह हमें प्रेरित करता रहता है । हमारे उस अतीत बोध को नष्‍ट कर दिया गया और जो हमारा वास्‍तविक इतिहास हो सकता था उसे भी विकृत करके प्रस्‍तुत किया गया जिससे हमारा वह बावला समाज पैदा हुआ है जिसके समझदार लोग भी यह नहीं समझ पाते कि वे जो कर रहे हैं, वह उनका काम है या किसी दूसरे के घर पानी भर रहे हैं। इस समाज को देख कर घबराहट होती है। अधकचरे दिमाग के लोग नैतिक शिक्षा पर जोर देने का सुझाव देते हैं । सच कहें तो यह काम हमारे इतिहास का है, उसके प्रेरणा के स्रोतों का है। उसी की विकृति से यह व्‍याधि पैदा हुई है और उसे सही करने से समाज के उस मेरुदंड को शक्ति मिल सकती है जिससे वह अपने स्‍वाभिमान के साथ खड़ा हो सके । तुम भारतीय समाज को देखो, इसका स्‍वामिमान नष्‍ट हो गया है और उस खाली जगह को अहंकार और दंभ ने भर दिया है। जरूरत इसके स्‍वाभिमान को जाग्रत करने की है, उसी से देश निष्‍ठा, समाजनिष्‍ठा, सत्‍य निष्‍ठा सभी जाग्रत हो जाते हैं।

वह हंसने लगा, ”तो अब हमें ज्ञान विज्ञान को छोड़ कर इतिहास और पुराण की ओर मुड़ना चाहिए और उसी से हमारी सारी समस्‍यायें हल हो जाएंगी । पीछे चलते हुए हम आगे बढ़ते चले जाएंगे ।”

”मैंने युद्ध की मिसाल दी थी और यह बताया था कि यदि सभी लोग अपना काम छोड़ कर मोर्चे पर खड़े होने को दौड़ पडें तो वह देश बिना लड़े ही हार जाएगा क्‍योंकि उसके मोर्चे पर ऐसे लोगों की भीड़ बढ़ जाएगी जो लड़ना नहीं जानते और दूसरे सारे काम हो ही नहीं पाएंग। मोर्चे पर कटने वाले उत्‍साही लोगों की जमात अवश्‍य मिलेगी। इसलिए युद्ध पूरा देश लड़ता है परन्‍तु अपने मोर्चे पर खड़ा हो कर । ज्ञान विज्ञान और प्रशिक्षण के मामले में भी यही लागू होता है । इतिहास की गहन खोज के लिए कुछ थोड़े से लोगों की जरूरत होती है, पूरे देश की नहीं । एक बार तुम्‍हारा इतिहास सही सही लिख लिया गया तो बाद में श्रम मामूली सजावट और मरम्‍मत तक सीमित रह जाती है। और जो हमारा समाज है वह तो उसी मकान में रहने वाला परिवार है जिसके सिर पर छत न रहने पर वह बावला सा बना रहता है, छत के मिलते अपने अपने सुकून के काेने तलाश लेता है । जिस समाज का इतिहास गड़बड़ है उसका समाजशास्‍त्र भी गड़बड़ रहेगा, रीति नीति या नृतत्‍व भी अटपटा रहेगा, मनोविज्ञान भी लुंजपुंज रहेगा, इसलिए मैं इतिहास को इतना महत्‍व देता हूं । इसे यदि नष्‍ट किया गया है तो पहले इसे ठीक करना होगा और इसके लिए किसी सेना की आवश्‍यकता नहीं है, कुछ दर्जन लोगा ही यदि समर्पित भाव से काम करें तो इसके लिए पर्याप्‍त हैं।”

”तुम जब कोई बात कहते हो तो लगता है ठीक ही कह रहे हो । कुछ लोग बात गढ़ना जानते हैं और गलत को भी सही सिद्ध कर देते हैं। तुम भी इसी कोटि में आते हो । जब कह रहे हो इतिहास की शिक्षा, इतिहास की खोज और इतिहास का पुनरुद्धार सबसे जरूरी काम है तो मानने के अतिरिक्‍त कोई उपाय नही रह जाता। परन्‍तु कुछ अलग जा कर सोचता हूं तो बात कुछ अतिरंजित तो लगती ही है ।”

”मैं अदना सा आदमी, मेरी बात पर तो वैसे भी विश्‍वास करते हुए झिझक बनी रहेगी। मैं तुम्‍हें एक इतिहासवृत्‍त सुनाता हूं। इर्फान हबी‍ब के पिता मोहम्‍मद हबीब जो असाधारण प्रतिभाशाली छात्र थे इंग्‍लैंड में पढ़ रहे थे । वह आक्‍सफोर्ड मजलिस से भी जुडे थे और एक बार उसके अध्‍यक्ष भी रहे थे । विचार उनके राष्‍ट्रवादी थे । उसी बीच मुहम्‍मद अली इंग्‍लैंड पहुंचे थे । उनसे मुलाकात हुई तो उन्‍होंने कहा, असली ज्ञान इतिहास का जरूरी है क्‍योंकि समाज को इसी से नियन्त्रित किया जाता है और उनके प्रभाव में उन्‍होंने इतिहास की ओर रुख किया अौर इंग्‍लैंड में बसने की जगह भारत को अपना कार्यक्षेत्र बनाया । वह उसी जामिया मिल्लिया में अध्‍यापक बने जिसकी स्‍थापना मुहम्‍मद अली ने की थी। मुहम्‍मद अली मुस्लिम लीग के संस्‍थापक (1906) सदस्‍यों में से एक थे और बाद में कांग्रेस को खिलाफत का समर्थन करने के लिए मना लिया था। खिलाफत कांग्रेस का अपना आन्‍दोलन सा बन गया था। मुहम्‍मद अली ने भी खिलाफत में भाग लिया था और 1922 में जब चौरीचौरा कांड के बाद गांधी जी ने आन्‍दोलन वापस लिया तो अध्‍यापन उनका मुख्‍य क्षेत्र बन गया परन्‍तु राजनीति से कभी दूर नहीं हुए । वह अलीगढ़ विश्‍वविद्यालय में रीडर बने और फिर प्रोफेसर और अपने सेवानिवृत्ति के बाद एमेरिटस प्रोफेसर रहे। यदि मुहम्‍मद अली ने गांधी जी से निकटता पैदा की थी तो मुहम्‍मद हबीब नेहरू के मुरीद बने रहे और अपने वेतन का कुछ भाग कांग्रेस को दान देते रहे । बाद में वह कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की ओर भी मुड़े थे ।

वह बहुत प्रतिष्ठित और प्रभावशाली इतिहासकार थे जिनका जोर मूल स्रोतों के अध्‍ययन पर अधिक रहता था। मेरे अनुमान से यह उनके ही प्रभाव का परिणाम था कि कोसंबी, जो दो सालों के लिए अलीगढ़ विश्‍वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर थे, इतिहास की ओर मुड़े और स्‍वयं इस बात के कायल हो गए कि विज्ञान की तुलना में इतिहास का अध्‍ययन अधिक जरूरी है । उस प्रभाव में और कतिपय दूसरे कारणों से जिनका कुछ विस्‍तार से उल्‍लेख मैंने कोसंबी पर अपनी पुस्‍तक में किया है, कोसंबी ने मूल स्रोता का इकहरा और ध्‍वंसात्‍मक पाठ करते हुए प्राचीन भारत का इतिहास लिखा जो मार्क्‍सवादी इतिहास का पर्याय बना दिया गया और जिससे आगे प्राचीन भारत पर किसी अध्‍ययन अौर ज्ञान की आवश्‍यकता ही समाप्‍त कर दी गई ।

मैं मुहम्‍मद हबीब के ज्ञान और प्रभाव और निस्‍पृहता का सम्‍मान करता हूं और निस्‍पृहता के मामले में इर्फान हबीब का भी सम्‍मान करता हूं पर इस आडंबर के नीचे मुहम्‍मद अली और उनके लीगी झुकाव और मुहम्‍मद हबीब पर उनके प्रभाव को देखते यह नहीे सोच पाता कि दिखाने के दांत चबाने के दांत भी रहे हैं। इतिहास पर अधिकार करके पूरे समाज का कितना अनर्थ किया जा सकता है इसे समझ सको तो ही यह समझ सकते हो कि इस अनर्थ से बाहर आने का रास्‍ता भी इतिहास के स्रोतों तक पहुंचने और उनकी नई व्‍याख्‍या से ही संभव है । अपने तई मैंने यही किया परन्‍तु अकेला चना भाड़ नहीं तोड़ सकता । जरूरत समर्पित अध्‍येताओं की है, सरकारी वजीफे से न कवि पैदा होते हैं, न चिन्‍तक, न इतिहासकार । सरकार यदि सही रही तो सुयोग्‍य जनों का उपयोग करती है, अन्‍यथा यह परखती है कि यह पूरी तरह हमारी विचारधारा से अनुकूलित है या नहीं । ऐसी सरकार शिक्षा को भी नष्‍ट करती है और सर्जनात्‍मकता को भी । कई बार मुझे वर्तमान सरकार से भी इसी बात का डर लगता है ।

Post – 2016-12-06

मुक्तिमार्ग

”तुम बताओगे जिस अधोगति की बात तुम करते हो, उससे उबरने का क्‍या तरीका हो सकता है ?”

”मैं बताता आया हूं, पर तुम्‍हारी समझ में यह नहीं आया । सवाल पूछ रहे हो । एक मोटी बात समझ लो, सामान बनाना आसान तो नहीं, पर बहुत मुश्किल नहीं । अवसर, साधन, प्रशिक्षण सुलभ हो तो कोई भी सामान, किसी भी कोटि का सामान तैयार किया जा सकता है। इसका लाभ उठा कर हमने अन्‍तरिक्ष विज्ञान में अग्रणी देशों को भी कुछ दृष्टियों से पीछे छोड़ दिया है । यह काम रक्षा और दूसरे क्षेत्रों में भी किया जा सकता था । किया जा सकता है । उसकेे लिए संसाधनों की और अनुसंधान की सुविधाओं की आवश्‍यकता है, जिसकी ओर ध्‍यान नहीं दिया गया। मोदी का ध्‍यान कौशल के विकास और लघु उद्योगों के प्रोत्‍सान के पीछे यही दिखाई देता है। इसमें सभी को यथा संभव सहयोग करना और समर्थन देना चाहिए । वह कर कितना पाते हैं, वह तो परिणामों से ही पता चलेगा ।
परन्‍तु सामान बनाने से अधिक कठिन चुनौती है, इंसान को इंसान बनाने की । यह मानविकी की शिक्षा से संभव है । वह जितनी वस्‍तुपरक या आग्रह से मुक्‍त होगी उतनी ही सफलता से अपना काम कर पाएगी। इसकी ओर लंबे समय से ध्‍यान नहीं दिया गया है और जिनके सुपुर्द इसे किया गया वे अपने दायित्‍व को समझ नहीं सके और पूरी शिक्षा प्रणाली को ही लुंजपुंज करते चले गए । आज हमारे विश्‍वविद्यालयों में उस स्‍तर के भी विद्वान नहीं है जो आज से पचास साठ साल पहले थे । अपने क्षेत्र के प्रति समर्पित, अपने कर्तव्‍य के प्रति सचेत, अपनी अकादमिक उपलब्धियों पर अपने ठाट बाट की तुलना में अधिक गर्व करने वाले और इन कारणों से अपने छात्रों के बीच उतने ही समादृत । विषय कोई हो, उनका मुख्‍य आकर्षण राजनीति की ओर हो गया।

”राजनीति से तुमको इतना परहेज क्‍यों है ।”

”मुझे राजनीति से परहेज नहीं है । मेरा समस्‍त लेखन राजनीतिक है, यह मैं बता आया हूं। इसीलिए मुझ सकि्रय राजनीति से जुड़ने के प्रति उदासीनता रही है और इसीलिए सक्रिय राजनीति को ही राजनीति का एकमात्र विकल्‍प मानने वाले अक्सर मुझसे असहज अनुभव करते रहे हैं । मेरी राजनीति रही है भारतीय मानस काे औ‍पनिवेशिक दासता से मुक्ति दिलाना । भौतिक स्‍वतन्‍त्रता के अधूरे कार्यभार को पूरा करना । राजनीतिक सत्‍ता की लड़ाई हमें दूसरों से लड़नी पड़ी और विभिन्‍न कारणों से ब्रिटेन को सत्‍ता अपनी खिन्‍नता और आक्रोश के बाद भी हस्‍तान्‍तरित करनी पड़ी । औपनिवेशिक मानसिकता को बनाए रख कर हम पूरी तरह स्‍वतंत्र न तो हो सकते थे, न ही हो सके । औपनिवेशिक मानसिकता के विरुद्ध लड़ाई अपने लोगों से, औपनिवेशिक औजारों को अपना कर अपने लिए सत्‍ता को सुनिश्चित करने वालों के विरुद्ध लड़ाई थी। हमारे राजनीतिक दलों में से कोई ऐसा न था जो औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्‍त रहा हो या मुक्‍त रहने केे लिए प्रयत्‍नशील तक दीखे। इसका कुछ अपवाद समाजवादी पार्टी को माना जा सकता था। यह एक कठिन संघर्ष था जो आत्‍म से आरंभ होकर अपर तक पहुंचता था। इसे सत्‍य की खोज और प्रतिष्‍ठा के माध्‍यम से ही लड़ा जा सकता था । मैंने इस राजनीति को चुना था और जब चुना था तब और उसके बहुत बाद तक यह तक समझ नहीं पाया था कि मैं एक राजनीतिक मोर्चा संभालने जा रहा हूॅ क्‍योंकि तब यह भ्रम बना हुआ था कि यदि सत्‍य का उद्घाटन हो जाय तो जो लोग गलत मान्‍यताओं में उलझे हुए हैं, वे उसे स्‍वीकार करने में संकोच या उसका विरोध करेंगे । यद्यपि अपनी 1970 में प्रकाशित कविता की पंक्तियों में इसे एक वैचारिक संघर्ष के आरंभ के रूप में ही लिया था।”

”इसका हवाला तुमने एक बार और दिया था, मुझे याद है। पर कविता मेरी नजर से नहीं गुजरी ।”

”कुछ लंबी कविता है, पर उसकी कुछ पंक्तियां मेरे मन्‍तव्‍य को स्‍पष्‍ट कर सकती हैं। कविता का शीर्षक ही था, ‘मैं फिर तोड़ता हूं इस तिलिस्‍म को। यदि किसी को मेरे उस संकल्‍प का ध्‍यान न हो जिसका निर्वाह मैंने अविचल भाव से किया है तो यह कविता बड़बोलेपन का उदाहरण प्रतीत होगी, यदि ध्‍यान हो तो एक प्रतिज्ञा।”

”तुम बात बात पर सिद्धांत क्‍यों बघारने लगते हो,वह प्रतिज्ञा तो सूनूं।”
मैं उसकी एक प्रतिज्ञा की याद दिलाऊंगा :
मुझे पता है/ मैं भाग खड़़ा हुआ था कई मोर्चों से/ पर आज उतरता हूं एक महासमर में/ अपने ही विरुद्ध/ मैं तोड़ूंगा कुछ नही/ सिर्फ परिभाषा बदल दूंगा और धुएं में तने कंगूरे हवामुर्ग में बदल जाएंगे।

मेरा समस्‍त लेखन परिभाषाएं बदलते हुए सत्‍य के साक्षात्‍कार का अभियान रहा है ।
एक लेखक की राजनीति, एक शिक्षक की राजनीति, एक दार्शनिक की राजनीति उस व्‍यावहारिक राजनीति से भिन्‍न होती है जिसमें सभी मूल्‍यों, मानों, आदर्शों को तिलांजलि दे कर केवल सफलता पाने की कामना होती है। व्‍यावहारिक राजनीति को तो लिंकन से ले कर गोएबेल्‍स तक ने गर्हित माना है। वह संस्‍कृतिविरोधी है । पाखंड उसका दुर्ग है।”

”उससे बचा जा सकता है ? उसके बिना काम चल सकता है ?”

”उसमें इस तरह भाग लिया जा सकता है कि हम अपने को भी और पूरे समाज को भी उसकी मलिनताओं से बचाए रख सकें और इस तरह व्‍यावहारिक राजनीति के स्‍तर को भी ऊपर उठा सकें ।”

वह हंसने लगा, ”जरा प्रकाश तो डालो ।”

”तुमने कभी युद्ध देखा है ? मेरा मतलब है, देखा तो होगा ही और न देखा हो तो सुना और जाना तो सभी ने होगा। युद्ध मोर्चे पर खड़ा सिपाही ही नहीं लड़ रहा होता है। देश का प्रत्‍येक नागरिक युद्ध के मोर्चे पर होता है, परन्‍तु उसका मोर्चा भिन्‍न होता है । यदि युद्ध लंबा खिंचे और देश में अनाज की ही कमी पड़ जाय तो शत्रु का सामना किया जा सकता है? यदि रसद समय से न पहुंच पाए, गाडि़या समय से न चल सकें, शस्‍त्रागारों में असला तैयार न होता रहे, या यदि घबराहट में नागरिकों का मनोबल ही टूट जाये तो तुम केवल बहादूर सैनिकों और उनकी गोलियों और बन्‍दूक से युद्ध जीत नहीं सकते । इसलिए एक किसान जो अधिक मुस्‍तैदी से अपनी खेती करता है, एक कारोबारी जो ईमानदारी से सामान की भरपाई करता है, जमाखोरी से बचता है, एक कारखानेदार जो अपना उत्‍पादन अधिक तत्‍परता से करता है, परिवहन से जुड़ा प्रत्‍येक व्‍यक्ति जो सैनिकों से ले कर असले तक के संचलन में अपनी भूमिका निभाता है, और यहां तक कि खतरों की संभावना होते हुए भी एक नागरिक जो सामान्‍य भाव से अपने काम से ले कर मनोरंजन तक में जुटा रहता है जिससे लोगों का मनोबल बना रहे, ये सभी उस समर में अपने अपने मोर्चे पर युद्धरत होते हैं । किसी की शिथिलता का विजय की संभावना पर असर पड़ सकता है। युद्ध का पहला पाठ है अपने मोर्चे पर पूरी ईमानदारी और निष्‍ठा से काम करना न कि अपना काम छोड़ कर इधर उधर भागना।

”ठीक यही बात राजनीति पर लागू होती है। हम अपने कार्यक्षेत्र में पूरी निष्‍ठा से काम करें, अपने विषय के अपनी क्षमता के अनुसार अधिकारी व्‍यक्ति बन सकें तो वह अनुशासन, वह निष्‍ठा, विषय पर वह अधिकार एक ऐसा स्‍वस्‍थ माहौल बनाने में सहायक हो सकता है जिसमें व्‍यावहारिक राजनीति की मलिनता से मुक्ति पाई जा सके और उसका स्‍तर अधिक शालीन और मर्यादित बनाया जा सके । आज तो गिरावट उस स्‍तर पर आ चुकी है जिसमें सभी मर्यादाएं नष्‍ट हो चुकी हैं । यदि यही राजनीति छात्रों, अध्‍यापकों सभी में प्रवेश कर जाय तो वहां भी समस्‍त मर्यादाएं टूटेंगी, यह समझाने की बात नहीं है । यही हो रहा है और हमारे बौद्धिक दिवालियेपन का सबसे बड़ा कारण यही है ।”

”तुम यह क्‍यों भूलते हो कि छात्रों ने आन्‍दोलनों में भाग लिए हैं, उन्‍होंने अपने आन्‍दोलन से सत्‍ता के चरित्र को बदला है।”

”उन्‍होंने जब भी ऐसा किया है, अपना नुकसान किया है । उनके किए कुछ खास नहीं हुआ है । अक्‍सर उन्‍हें यह पता ही नहीं चला है कि वे क्‍या कर रहे हैं, क्‍योंकि उनको उकसा कर उनका इस्‍तमाल धूर्तों और देशद्रोहियों द्वारा किया गया है। इस पर कोई शोध उपलब्‍ध नहीं है, या कम से कम मेरी जानकारी में नहीं है, परन्‍तु मोटा निष्‍कर्ष यही निकलता है । पर तुमने राजनीति को बीच में ला कर मुझे अपने विषय से भटका दिया ।”

वह कुछ बोला नहीं, उत्‍सुकता से मेरी ओर देखता रहा ।

”मैं कह रहा था कि सामान बनाने से अधिक जरूरी है आदमी बनाना जो मानविकी की शिक्षा को वस्‍तुपरक बनाने से ही संभव है। न इस ओर पहले ध्‍यान दिया गया न मोदी को इसका आभास है और न ही उनके मानव संसाधन मंत्रालय का कार्यभार संभालने वालों की समझ में इसका महत्‍व आ सका है ।”

”तुम्हारे पास कोई सुझाव हो तो उसे भेज दो।”

”सुझाव तो दे सकता हूं, पर वह अमल में नहीं आ सकता । उसकी तैयारी तक नहीं है । हां यह कह सकता हूं कि मानविकी को नष्‍ट इतिहास के विकृत लेखन से आरंभ किया गया था और इसे सुधारा इतिहास को तथ्‍यपरक और वस्‍तुपरक बना कर जा सकता है, परन्‍तु उन तथ्‍यों की खोज के लिए बुनियादी तैयारी तक नहीं है। पहले उसे प्रोत्‍साहित करना होगा । प्राचीन भाषाओं का ज्ञान या कहो उन भाषाओं का ज्ञान जिनसे मूल ग्रन्‍थों तक हमारी पहुंच हो सके ।”

उसने फिकरा कसा, ‘दिल्‍ली दूर एस्‍त ।” और उठ खड़ा हुआ ।