Post – 2019-10-07

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (4)

क्या आप उन घटनाओं से परिचित हैं जिनमें एक आदमी हाथ जोड़कर किसी व्यक्ति से लिफ्ट मांगता है, वह उसे लिफ्ट दे देता है और फिर गाड़ी लेकर चलता है तो पाता है उस आदमी ने उसकी कनपटी पर पिस्तौल की नोक लगा रखी है मालिक को धक्का देकर गाड़ी से नीचे गिरा देता है और गाड़ी पर कब्जा कर लेता है। यदि पता है तो यह भी पता होना चाहिए अंग्रेजों ने भारत पर इसी तरह कब्जा किया था।

क्या आपको किसी ऐसी घटना का पता है जिसमें फटेहाल अपना कुनबा ले कर किसी भव्य भवन में घुस आता है और फिर अपने लोगो से कहता है यह भवन इसका नहीं अब हमारा माना जाएगा।
कुनबे के लोग हैरान, ‘इसे मानेगा कौन?’
‘अपने पर भरोसा रखो। पहले तुम्हें मानना होगा तभी दूसरों से अपना दावा मनवा सकते हो। उसके अपने लोगों को विश्वास नहीं होता। वे जानते हैं भवन किसका है, ‘इस पर कब्जा जरूर हमारा है पर घर तो यह इसका तब से है जब से दुनिया बनी। उसके पास इसके कागजी सबूत हैं। वह मानने को तैयार ही न होगा।’
वह हँस कर कहता है, ‘यही तो समझाना चाहता हूँ कि भवन दुनिया बनने के बहुत बाद में बनने शुरू हुए इसलिए इसके कागजी सबूत नकली हैं। मुझे ऐसा लगता है कि जैसे हम बाहर से आए हैं उसी तरह कभी यह भी बाहर आया होगा।’
उनकी हैरानी कुछ कम होती है पर खत्म नहीं होती, वे उत्सुक हैं यह जानने को कि कहाँ से। ‘मैं अभी सोच कर बताता हूँ कहाँ से ।’ और कुछ देर तक सोचने का अभिनय करने के बाद वह कहता है, ‘लो, पता चल गया, इसका घर इस भवन के और हमारे घर के बीच कहीं रहा होगा। यही कारण है कि हमारी और इसकी जबान इतनी मिलती जुलती है।’
उनका आत्मविश्वास कुछ और बढ़ जाता है, फिर भी वे जानना चाहते हैं कि ठीक कहाँ से। और वह कहता है इसके लिए बीच के सभी घरों की छानबीन करनी होगी। वह घर तो बचा न होगा, खंडहर भी शायद ही मिले, जगह तलाश करनी होगी। धीरज रखो उसका भी पता लगा लूँगा।’

इस काल्पनिक कहानी के इतिहास से आप परिचित हो चुके हैं। यही एशियाटिक साेसायट की स्थापना से ले कर तीसरे व्याख्यान तक का इतिहास है।

इसे इस कहानी का रूप यह बताने के लिए किया कि यह शुरू से ही एक कूट योजना थी और कुचक्र को अमल में लाने के लिए अंग्रेजों को अपने समय के बौद्धिक और नैतिक दृष्टि से सबसे ऊँची साख के व्यक्ति की सेवाएँ सुलभ हुईं । जो व्यक्ति निजी लाभ के लिए तनिक भी झुकने को तैयार नही हो सकता था वह अपनी कौम – और इस कौमियत में पूरे यूरोप के सभी देशों के लोग आते थे – को काले लोगों की संतान (दोगला और काला, बैस्टर्ड और निगर उनकी सबसे गंदी गालियाँ थीं ) या सुदूर अतीत में कभी उनके अधीन रहने की ग्लानि और हीनभावना तथा कंपनी की पहले से अपनाई गई योजना के साथ ही प्रशासनिक अपरिहार्यता के लिए स्वेच्छा से वह सब कुछ करने को तत्पर हुआ जिसे अपने लाभ के लिए करने को उसकी अंतरात्मा तैयार न होती।

भौतिक संपदा के मामले में कब्जा करने से काम चल जाता है परंतु सांस्कृतिक मामले में जोर नहीं चल पाता, ताकत के बल पर ग्लानि से मुक्ति नहीं पाई जाती। इसलिए विलियम जोंस के सामने चुनौतियाँ दुहरी थीं। सबसे बड़ी चुनौती स्वयं अपना खोया हुआ आत्मसम्मान और आत्मविश्वास पाना और इस नई व्याख्या को सही मानने की थी। एशियाटिक सासायटी के सभी सदस्य ऊँचे पदों पर आसीन अंगरेज ही थे। इसलिए पहले साल सोसायटी की स्थापना के बाद दूसरा व्याख्यान उनका मनोबल ऊँचा करने के लिए दिया गया था और अगले व्याख्यान में ही उन्होंने यह प्रतिपादित कर दिया था कि ग्लानि या शर्म की कोई बात नहीं, हमारी भाषाओं से भले लगता हो कि हमारी भाषाएँ संस्कृत से पैदा हुई हैं कि वे संस्कृत की पुत्रियाँ हैं, पर सचाई यह कि ये सभी किसी एक ही भाषा की संतानें हैं इसलिए छोटी और कालक्रम की दृष्टि से बाद की होती हुई भी ये परस्पर बहनें या संस्कृत से घट कर नहीं हैं। रही गोरे-काले की बात तो संस्कृत भारत की भाषा भी नहीं इसलिए इस ग्लानि से भी मुक्ति मिल गई। कहाँ की भाषा थी इसे जाँच कर देखा जाएगा।

इस प्रसंग में हम कुछ और तथ्यों की ओर संकेत करना चाहेंगे। पहला यह कि कंपनी ने 1586 में ही यह घोषित कर दिया था कि उसे भारत में एक विशाल और स्थायी राज कायम करना है, Already in 1686 the directors had declared their intention to establish … a large, well grounded, sure English dominion in India for all time to come. Case for India, Will Durant, 1930
इसलिए धूर्तता और बदकारी गवर्नर जनरलों की अपनी सनक के कारण नहीं योजना बना कर की जा रही थी।

दूसरे विलियम जोंस इस जातीय ग्लानि से मुक्ति का कोई उपाय तलाशने के लिए चार साल से भारत में पहुँचने की जुगत में लगे हुए थे परन्तु उनके स्वतंत्र विचारों के कारण जिनमें अमेरिकी नेताओं के ब्रिटिश संसद में अमेरिकी हिताें की रक्षा के लिए प्रतिनिधित्व की मांग के खुले समर्थन के कारण उनको यह अवसर नहीं मिल पा रहा था। वह उस बौद्धिक क्लब के सदस्य थे जिसके अध्यक्ष सैमुएल जॉन्सन (Dr. Johnson, was an English writer who made lasting contributions to English literature as a poet, playwright, essayist, moralist, literary critic, biographer, editor, and lexicographer. He was a devout Anglican. विकीपीडिया) थे, और वारेन हेस्टिंग्स से उनकी व्यक्तिगत सिफारिश पर नियुक्ति मिली थी।

तीसरी बात यह कि समस्या केवल भारत में काम करने वाले अंग्रेजों की आत्मग्लानि कम करने की नहीं थी, अकेले इंगलैंड की भी नहीं, पूरे यूरोप, समूची गोरी जाति की थी इसलिए उनको इतनी ही चिंता इनको प्रकाशित करा कर उनको भेजने की थी। अपने चौथे व्याख्यान या भाषा और जातीयता से जुड़े दूसरे व्याख्यान के अंत में उनके निम्न कथन पर ध्यान दें: In the mean time it shall be my care to superintend the publication of your transactions, in which, if the learned inEurope have not raised their expectations too high, they will not, I believe, be disappointed: इसलिए यह सोचने का पर्याप्त आधार है कि वह इसी दुखती रग का कोई न कोई हल निकालने का संकल्प लेकर आए थे। यदि आप जानना चाहते हैं कि पूरे यूरोप के विद्वान भारत की प्राचीन उपलब्धियों को नकारने के मामले में एकजुट क्यों थे तो इसका भी उत्तर इसी से मिल जाएगा।

Post – 2019-10-06

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (3)

कल मैं विलियम जोंस की कूट-योजना समझाने के लिए एक- दो और किश्तें लिखने की सोच रहा था तभी एक साथ दो विचार कौंधे। पहला यह कि मेरी नियमित पाठकों को किस बात की शिकायत हो सकती है कि मैं जिस विषय को लेता हूं उसके ‘अनावश्यक’ विस्तार में चला जाता हूं । चुटकुलों से लंबी चीज पढ़ने में उन्हें परेशानी होती है, अपने पेज पर भी वे अधिकांश समय चुटकुलेबाजी में ही बिताते हैं। उनके विचार सालों से एक ही धुरी पर घूमते रहते हैं। रूचि और जिज्ञासा का स्तर तक ऊपर नहीं उठता। जिस पिछड़े देश के पढ़े लिखे अपनी जिंदगी का इतना अधिक समय मखौल में बर्बाद करके खुश हो जाते हों, उसके दुर्भाग्य पर रोया भी नहीं जा सकता, हंसने का तो सवाल ही नहीं — सिर्फ ग्लानि अनुभव की जा सकती है क्ह म स्वाधीन होकर भी, स्वतंत्र होने की इच्छाशक्ति तक खो बैठे हैं, इसका बोध तक बाकी नहीं।

एक दूसरा विचार यह आया कि विलियम जोंस के जिस एक पैराग्राफ को हजारों बार दोहराया गया, उसकी पृष्ठभूमि क्या है, उसके आगे-पीछे
जोंस ने क्या लिखा, उस तीसरे व्याख्यान में जिसमें यह पैराग्राफ आया है उन्होंने और क्या कहा; एशियाटिक सोसाइटी के माध्यम से अपने भारत निवास के पूरे दौर में उन्होंने क्या किया और क्यों किया, इसका अध्ययन हमारे उन विद्वानों ने क्यों नहीं किया जिनको महान कहाने का इतना चस्का है कि इसके बिना वे अपना नाम तक पहचान नहीं पाते उन्होंने यदि संस्कृत का विधिवत अध्ययन नहीं किया तो उस भाषा में उपलब्ध सामग्री का भी गहराई से अध्ययन क्यों नहीं किया जिससे प्राचीन इतिहास की सभी समस्याएं आरंभ होती हैं। शायद दरिद्रता के बीच ही महान लोग — महाकवि, महान चिंतक, महान इतिहासकार, महान निठल्ले — पैदा होते हैं।

इन्होंने अंग्रेजी के माध्यम से भी क्या पढ़ा, जो पढ़ा उसे कितना समझा, इस पर उदाहरणों के बिना बात नहीं की जा सकती, इसलिए अन्यमनष्क भाव से ही सही, अपने कथन को स्पष्ट करने के लिए यह अप्रिय विकल्प चुनना ही पड़ेगा।

इस अप्रिय प्रसंग के दो पक्ष हैं। एक संघ और भाजपा से जुड़ाव रखने वाले उद्दंड लोगों की प्रतिक्रिया का जिसके कारण इन दोनों संगठनों की छवि खराब होती है या यदि खराब ना होती तो यह संगठन सचमुच अपनी बनावट और बनावट में खराब है इसका लाभ हमेशा उन्हें मिलता है जिनकी झवि ये बिगाड़ना चाहते है। इनकी भाषा, प्रतिक्रिया का रूप, इतना अशोभन होता है कि कोई भी सुसंस्कृत व्यक्ति इनके प्रति सहानुभूति तक नहीं रख सकता। यदि संघ और भाजपा की भीतरी सोच भी ऐसी ही नहीं है, तो उनसे जुड़ाव रखने वाले सुलझे लोगों को उनकी भर्त्सना करते हुए इस प्रवृत्ति को रोकने का प्रयत्न करना चाहिए। ऐसा मेरे देखने में नहीं आया।

दूसरा पक्ष योग्यता के अभाव सें नारेबाजी और विज्ञापन के बल पर अपनी महिमा का प्रबंधन और विपणन करने वालों का है जिनके प्रतिनिधि के रूप में रोमिला थापर से जुड़े ताजे विवाद के कारण रोमिला थापर का नाम आ गया। उन्होंने कभी कोई व्याख्यान दिया था जिसमें एक संभावना की ओर संकेत किया था, कि शांति पर्व में युधिष्ठिर के द्वारा युद्ध में पूरे कुल के नाश के बाद जो पश्चाताप प्रकट किया गया है, वह कलिंग युद्ध के बाद अशोक द्वारा व्यक्त किए गए अनुताप की नकल हो सकता हा।

यह इतिहास नहीं है, एक कविता है जिसमें प्रमाण के अभाव में सतही साम्य देखकर एक उद्भावना की गई है, हो सकता है और नहीं भी हो सकता है के बीच बीच। अशोक के किस अभिलेख में दर्ज है यह मुझे नहीं मालूम।

रोमिला जी का लेखन कविताओं से हुआ है और इसी के कारण किसी नई खोज के बिना ही उन्होंने देश देशांतर में धूम मचाई है। चर्चा में आने के लिए वह ऐसी बातें बड़े सलीके से कह लेती हैं जिनसे विवाद पैदा हो, लोग उत्तेजित हों, और जिसे यदि सही नहीं ठहराया जा सके तो वाहियात भी न सिद्ध किया जा सके। उनका यह कथन भी इसी श्रेणी में आता है।

उनके इस वक्तव्य का फुटेज किसी अनपढ़ दक्षिणपंथी के हाथ लग गया जिसे यह पता तो था युधिष्ठिर नाम का एक चरित्र महाभारत में, यह भी पता था की महाभारत की घटना उससे बहुत पहले घटित हुई थी, परंतु यह पता नहीं था कि महाभारत में कितनी बार कितनी तरह की मिलावट की गई, शांति पर्व महाभारत का हिस्सा नहीं है, उसे ज्ञानकोश बनाने की लालसा में पहले की रचनाओं से उन विषयों से संबंधित जानकारी को सबसे बाद में इसी में प्रक्षिप्त किया गया था। उसके हाथ यह बटेर उस समय लगा जब रोमिला जी से पिछले साल किए गए एक निर्णय के अनुसार विश्वविद्यालय यह जानना चाहता था एमेरिटस प्रोफेसर के रूप में सुविधाएं लेने वाली प्रोफेसर का इस दौरान ज्ञान, शोध और शिक्षण के स्तर पर योगदान क्या है।

रोमिला जी के उस फुटेज पर जितनी सतही और अभद्र भाषा में फब्तियां कसते हुए लोग आपत्तियाँ करते रहे वह ठीक इस मौके पर रोमिला जी के काम आया। इससे आगे अपने शब्दों में कुछ कहने की जगह मैं जिस अंग्रेजी के समाचार पत्र को पढ़ता हूँ उसकी कुछ कतरनों को प्रस्तुत करना चाहूंगा:

एक – Sep 3, 2019 – JNU’s pettifoggery over Romila Thapar’s fitness to remain professor emerita makes its administration a laughing stock. … English; Today’s Paper · ePaper … by calling for the CV of Romila Thapar, professor emerita, premier historian of ancient …. who has been vocally critical of its functioning in recent years.

दो- On the JNU row, historian Romila Thapar said the university is only trying to “dishonour someone who has been critical of the changes that have been introduced by the present administration”. (Written by Yashee |Edited by Explained Desk |New Delhi |
Updated: September 3, 2019 4:59:52 pm)

तीन-To target Romila Thapar is to target a new way of asking questions and writing history
The truth is that, regardless of the governments in power, universities need academic freedom to flourish, they need fresh air.
Written by Vijay Singh |

Updated: October 1, 2019 10:41:09 am
Before heading back to Paris, I decided to visit Romila Thapar who had been in the news for the insidious interrogation of her status as professor emerita at JNU. … The immediate context for referring to this principle was our conversation about the spate of ill-informed and foul comments she has been receiving, and how far their writers could be from the debating siddhanta of ancient India. I was outraged to hear about such language, insulting as they were to one of our most eminent intellectuals in the world.
When I reached Paris, I reached out to Charles Malamoud, an honorary professor of history at L’Ecole of Hautes Etudes en Sciences Sociales and a very respected historian of ancient India. It was Malamoud who first translated DD Kosambi’s work into French. “I was outraged to hear about Romila being asked for her CV,” he fumed. “It’s an act of hostility against independent science, against Romila and all that she represents…”
The conversation with Malamoud led me to speak to Gérard Fussman, the renowned Sanskrit scholar and professor emeritus at the Collège de France…
Fussman, who has worked closely with Indian scholars on historical and archaeological projects, wondered if people seeking Thapar’s credentials realised what her contribution to Indian history, and to India, has been. “She is an excellent historian — and much more. She is a towering intellectual in India and abroad. And her greatest contribution is to have Indianised Indian history.”
यहां, अभी मैं केवल इतना ही कहूंगा की फ्रांस में रहने वाला यह नाटककार लौटने के बाद विद्वानों से मिलकर केवल एक ही बात की शिकायत करता रहा, इसके पीछे रोमिला थापर का सुझाव रहा हो सकता है क्योंकि इसका मुझेअनुभव है।

शिक्षा और संस्कृति के मामले में मुझे भाजपा सरकार से भारी शिकायतें हैं, परंतु जिस तरह इसने फर्जी विश्वविद्यालयों को खारिज किया और एमेरिटस की सुविधाएँ भोग रहे प्रोफेसरों से उनकी करनी का हिसाब माँगा वह सर्वथा उचित है। निकम्मे लोग ही इससे परिचित कराने की जगह बवाल मचा सकते हैं। यह अपेक्षा दूसरे अनेक से की गई थी। जिसने ऐयाशी की थी उसे बवाल मचाना पड़ा, जिन्होंने काम किया था उनकी हुंकारी भी सुनने को न मिली।

Post – 2019-10-05

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (2)

गुलाम आजाद लोगों से कम शक्तिशाली, कम समझदार, कम बहादुर नहीं होता। वह आलसी होता है, ऐयाश होता है। वह कुछ खोना नहीं चाहता, किसी चीज की कीमत नहीं देना चाहता, वह अल्पतम श्रम से अधिकतम पाना चाहता है।

हम गुलाम हुए नहीं, हमारे बीच, हमारा नेतृत्व करने वाले स्वयं भी किसी तरह का खतरा उठाना नहीं चाहते थे, कोई शारीरिक श्रम नहीं करना चाहते थे, और हर तरह की सुविधा और सुख भोगना चाहते थे। इसे प्रतिष्ठा का मानदंड बनाकर, समाज में प्रतिष्ठित रहने की शर्त बना दिया था। त्याग और उदारता के पाखंड के भीतर उन्होंने इस सचाई को छिपाने का प्रयत्न किया था कि जिस अभाव को वे त्याग कहते हैं, उसे पूरा करने के लिए श्रम और अध्यवसाय कभी किया ही नहीं। अक्लेशेन शरीरस्य कुर्यात धन संचयम्, कहने वाला किसके श्रम से अर्जित धन का संचय करना चाहता था?

मेरे पाठकों और प्रशंसकों में ब्राह्मण और क्षत्रियों की संख्या अधिक है। जब मैं अपने समाज के प्राचीन बौद्धिक नेतृत्व की आलोचना करता हूं तो मेरे लेख को पसंद करने वालों की संख्या घट जाती है। मन में यह विचार आता होगा कि मैं किन्हीं कारणों से ब्राह्मणो से क्षुब्ध होने के कारण इस तरह सोचता हूं। बरनवाल जी ने यही विचार मेरे उपन्यास अपने-अपने राम पर आयोजित एक गोष्ठी में न व्यक्त किए होते तो मेरा ध्यान इस ओर जाता ही नहीं कि कोई मेरे बारे में ऐसा भी सोचता होगा।

कौन, कहां, किस स्रोत की सूचना के आधार पर आपके बारे में क्या सोच रहा है, इसे जानने का कोई उपाय नहीं। परंतु यहां मैं केवल यह याद दिलाना चाहता हूं कि बिना कुछ किए पाने वालों ने इस देश में गुलामी की मानसिकता तब भी फैला कर रखी थी जब हम कहने को आजाद थे पर हमारे अपने ही समाज के वे लोग जो इस देश को समृद्ध करने के लिए उत्पादन से जुड़े हुए थे आजाद न थे।

हमने ऊपर जो प्रस्ताव रखे उनके अनुसार आलसी और श्रम से परहेज करने वाले लुटेरे हो सकते थे, स्वतंत्र नहीं। आप लोगों में से अधिकांश लोग उसी अल्तपम बौद्धिक श्रम से अधिकतम पाने की कोशिश करने वाली जमात के हैं। आजाद नहीं है, आजाद नहीं हो सकते, कीमत दिए बिना कुछ भी पाना लूट का पर्याय है।

आज अतीत का रोदन करने से और कुछ तो मिलेगा भी नहीं सहानुभूति तक नहीं मिल सकती। मैं अतित का नहीं, आज का रोना रो रहा हूं। आज का बौद्धिक वर्ग, अंग्रेजी परस्त वर्ग, आज का नया ब्राह्मण ठीक वही आचरण कर रहा है, और इस के नेतृत्व में इसी को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसकी वाकपटुता पर वाह-वाह किया जा सकता है, परंतु न आजाद रहा जा सकता है, न ही सौदेबाजी में मिली स्वाधीनता को स्वतंत्रता में बदला जा सकता है।

दूसरा, जिसने आप को गुलाम बना रखा था, वह गुलामी को फायदे का सौदा न पा कर, या उदारता से, आपको गुलामी से मुक्त कर दे, स्वाधीन कर दे, तो भी स्वतंत्र आप तभी होते हैं जब अपने श्रम और तप से उस तंत्र का निर्माण कर लेते हैं जिसमें आप, पुराने मालिकों के सामने हाथ नहीं पसारते।

अमेरिका में जब अब्राहम लिंकन के निर्णायक युद्ध के बाद गुलामों को मुक्ति मिली तो मुक्त होने के बाद अनेक गुलाम अपने पुराने मालिक के पास इस अनुरोध के साथ आने लगे हमें फिर गुलाम बना लीजिए। लंबी गुलामी के द्वारा उनकी चेतना को इतना नष्ट कर दिया गया था कि वे भूल गए थे खड़ा कि पहल कैसे की जाती है, अपने पांवों पर खड़ा कैसे हुआ जाता है।

पुराने ब्राह्मणों, अंग्रेजी के बल पर पैदा हुए नए ब्राह्मणों, और उनको कोस कर खुश होने वालों के बौद्धिक दारिद्र्य के पीछे एक ही कारण दिखाई देता है: अल्पतम श्रम से अधिकतम पाने की आकांक्षा। इसके लिए मैं अंग्रेजी परस्तों को ही जिम्मेदार नहीं मानता आप सबको अपने मन में टटोलकर यह देखना होगा कि आप जो कुछ बनना चाहते हैं उसके लिए कितना अधिक श्रम और बलिदान करने को तत्पर हैं। अंग्रेजी को कोसना, और कोसने से संतुष्ट होकर और कुछ न करना उससे भी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

अंग्रेजी पर अधिकार करना जरूरी है, अंग्रेजी के अधिकार से बाहर आने के लिए ही यह जरूरी है, जिसे आप जानते नहीं उसकी पकड़ से बाहर कैसे आ सकते हैं। आज अंग्रेजी दुनिया की महत्वपूर्ण भाषा बन चुकी है उससे बचना संभव नहीं, उसकी गिरफ्त में रहकर आत्मोत्थान संभव नहीं.।

इसलिए उसे दुनिया से जुड़ने के लिए, और संस्कृत को अपने अतीत से जुड़ने के लिए दोनों को संदर्भ भाषा के रूप में सीखना जरूरी है परंतु अपने जरूरी काम उन से बाहर आकर, अपनी भाषाओं में ही किए जा सकते हैं।

वर्णवाद यदि कार्य विभाजन था तो प्राचीन समाज को देखते हुए, दुनिया के दूसरे देशों से तुलना करते हुए, यह विश्व का सर्वश्रेष्ठ कार्य विभाजन था जो आज की दुनिया के लिए व्यर्थ हो चुका है। इसलिए भारत का उद्धार प्राचीन वर्णवादी मानसिकता से बाहर आने की हमारी योग्यता पर निर्भर करता है।

वह योग्यता मैं अपनी प्रशंसा करने वालों में नहीं देखता, अपने से परहेज करने वालों को तो मैं कभी नहीं समझा सकता कि आप का पतन ब्राह्मणवादी होने के कारण हुआ है। मार्क्सवादी जो अपने को वर्णवाद का कट्टर विरोधी मानते हैं, वहेआधुनिक ब्राह्मणवाद के सच्चे प्रतिनिधि हैं।

उनकी भाषा समाज को गुलाम बनाए रखने वालों की भाषा है। जिन लोगों से उनके विचार नहीं मिलते उनको अछूत मानते हुए विचारों का सामना करने से भागते रहना, जिन आयुधों का इस्तेमाल करते हुए कोई दल या विचार समाज में जगह बना रहा है, उन आयुधों को समझे बिना कोस कर, श्राप देकर भस्म करने की आकांक्षा पर कभी ब्राह्मणों को भरोसा था, आज कम्युनिस्टों को भरोसा है, उनको तिनके का सहारा मानकर उनके साथ ही डूबने वालों को भरोसा है। भारत की मानसिक दासता के लिए ये दोनों जितने जिम्मेदार हैं उतने या उनसे भी अधिक जिम्मेदार उनको कोस कर गहन अध्ययन और अध्यवसाय से बचने वाले हैं।

एक बात तो करने से ही रह गई कि यदि ब्राह्मणों क्षत्रियों ने अल्प से अधिक पाने की और शारीरिक श्रम से बचने की आदत के कारण मनोवैज्ञानिक रूप से अपनी स्वतंत्रता बहुत पहले खो दी थी, भारतीय सभ्यता के उन्नयन में उनका कोई योगदान ही नहीं था, तो यह सभ्यता विश्व में हिंदुओं के अध्यवसाय के कारण इतने लंबे समय तक इतनी ऊंचाई पर कैसे बनी रह गई कि भारत के लोग ही नहीं दूसरे देशों के लोग भी भारत को सर्वोपरि मानते थे, तो दो वर्ण बचे रह जाएंगे। वैश्य और शूद्र।

शूद्रों को इस बात पर गर्व हो सकता है कि भारतीय सभ्यता और अर्थव्यवस्था उनके श्रम के उत्पाद के बल पर सभी दृष्टियों से शिखर पर बनी रही, परंतु मैं इससे सहमत नहीं हो पाता। गुलाम महान सभ्यताओं का निर्माण नहीं करते, उनके निर्माण में उनकी योग्यताओं और शक्ति का इस्तेमाल किया जाता है। सभ्यता का निर्माण पहल करने वाले करते हैं और यह पहल पूरे इतिहास में वैश्यों के पास रही। उन्होंने शूद्रों की योग्यताओं का उपयोग किया जिस तरह हम आज यंत्रों और यंत्रमानवों का उपयोग करते हैं। सभ्यता के निर्माण में उनके योगदान को कभी समझा ही नहीं गया।

हमें स्वतंत्र होने के लिए कई तरह की मनोवैज्ञानिक बाधाओं को पार करना होगा, कई तरह के संकीर्ण विचारों से बाहर आना होगा। यह देश के हित में है कि हम अपने लोगों की समझ पर विश्वास रखें, अपने श्रम पर विश्वास रखें, स्वतंत्रता और अध्यवसाय और जोखिम उठाने की क्षमता और गुलाम होने की जगह आजाद रह कर मर जाने की जिद के महत्व को समझें। अपने क्षेत्र के उन्नयन के लिए जितना काम करते आए हैं उससे अधिकाधिक करने की आदत डालें।

यदि यह कर सकें तो ही आप मुझे पढ़ने पसंद करने का अधिकार पा सकते हैं। ध्यान रहे कि मैं समय-समय पर अपने प्रशंसकों की प्रोफाइल जांच कर यह देखने का प्रयत्न करता हूं के वे केवल लफ्फाजी कर रहे हैं या सचमुच ऐसा कुछ कर रहे हैं जिसके लिए मैं उनकी भी प्रशंसा कर सकूँ।

जितना बड़ा बनना था बन चुका हूं,अधिकतम श्रम से अल्पतम पाकर प्रसन्न रहने वालों के साथ स्पर्धा अवश्य करना चाहता हूँ। मुझे प्रतीक्षा आपकी सराहना करने का अवसर पाने की है अपनी सराहना की जरूरत नहीं, क्योंकि मेरा प्रत्येक काम मेरी अपनी प्रशंसा से जुड़ा हुआ है। प्रशंसा की भाषा अलग है। मैं तो स्वयं अपनी हर सतर के साथ अपने विषय पर भी लिखता हूँ लिखते हुए कोशिश करता हूं कि वह अपने स्तर से नीचे न आने पाए। इससे बड़ी आत्म श्लाघा क्या हो सकती है। फिर भी अपनी कमियों को जानने की उत्सुकता और इसके लिए आपकी टिप्पणियों की प्रतीक्षा रहती है।

Post – 2019-10-05

अब अपने ही चमन में ऐसी हालत हो गई अपनी
न काँटों से चुभन होतीं, न गुल पहचान आते हैं ।
हर आती-जाती सूरत सिर्फ आईना सी लगती है
मैं खुद को देखता हूँ, वह दरक कर टूट जाती है।

Post – 2019-10-04

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (1)

दिवेदी जी विंटरनित्ज की तरह “समस्त भारतीय साहित्य का एक परिचयात्मक इतिहास हिंदी में” लिखना चाहते थे। वह नहीं लिख सके। लिख नहीं सकते थे। आज तक कोई लिख न सका। शायद नहीं, निश्चय ही समस्त भारतीय साहित्य का अर्थ संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश समझते थे। इसमें हिंदी के लिए भी स्थान न था। होता तो भारत की दूसरी सभी भाषाओं का साहित्य भी आ जाता जिनमें भाषा भले हिंदी के साथ बंगला भी आती रही हो, पर साहित्य की जानकारी के विषय में आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता। इसलिए यदि उन्हें सुविधा और अवकाश मिला भी होता तो जो इतिहास लिखते उससे इतिहास और साहित्य दोनों का अनिष्ट होता। हिंदी के आदिकाल का जो इतिहास लिखा उनकी साहित्य और इतिहास दोनों की समझ पर संदेह होता है।

उनके सामने इतिहास का एक गलत खाका था। विंटरनित्ज हों या कोई दूसरा यूरोपीय अध्येता, वह भारत को समझने के लिए नहीं भारतीय चेतना को नियंत्रित और भ्रमित करने के लिए लिखते रहे हैं और आज तक लिखते आ रहे हैं, ईमानदारी के नाम पर वह सिर्फ इतनी सावधानी बरतते रहे हैं कि उनकी चालाकी आसानी से पकड़ में न आए। यही सावधानी विंटरनित्ज ने भी बरती थी। इसका आरंभ विलियम जोंस के साथ ही हो गया था।

उनके भारत पहुँचने से लगभग सौ साल पहले से ही धर्मप्रचार करते समय भारतीय संपर्क में आने के बाद से उनके सामने दो बातें साफ हो गई थीं कि भारतीय भाषाओं का यूरोप की भाषाओं से गहरा संबंध है और संस्कृत का पल्ला भारी पड़ता है। रंगभेद उस दौर के यूरोप के गोरों में इतना प्रबल था कि काला और नेटिव या जानवर एक जैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करते थे इसलिए भाषाई साक्ष्य यह कहते थे कि उनकी भाषाएं संस्कृत से निकली हैं; उनका ऐतिहासिक अनुभव यह कहता था कि इस तरह की समानता तभी हो सकती है जब वे या तो लंबे समय तक भारतीयों के अधीन रहे हों या उन्हीं की संतान हो; उनका नस्ली पूर्वाग्रह यह मानने को तैयार नहीं था कि वे भारत के काले लोगों की संतान हो सकते हैं। मद्रास से लेकर बंगाल तक के जिस भारत से वे परिचित थे उसमें काले लोग ही बसते थे।

इसको लेकर किसी न किसी पैमाने पर सौ साल से यूरोप के भारत से परिचित मिशनरियों में और उनके संपर्क में आने वाले दूसरे लोगों के मन में खलबली सी मची हुई थी। कंपनी शासन के लिए यह गले में फँसा सोने का हँसिया था। भय यह कि जिस दिन भारतीयों को इसका पता चलेगा उनका मनोबल इतना बढ़ जाएगा कि उन पर नियंत्रण रखना एक समस्या बन जाएगी।

विलियम जोंस भारत में आने से पहले कई भाषाओं के ज्ञाता और अपने फारसी ज्ञान के कारण प्राच्यविद के रूप में प्रसिद्धि पा चुके थे।
Jones entered University College, Oxford, in 1764. He had already developed a reputation for his impressive scholarship, and college enabled him to increase his knowledge of Middle Eastern studies, philosophy, Oriental literature, and Greek and Hebrew. In addition, he learned Spanish and Portuguese, and also mastered the Chinese language. …Even at a very early age, Jones demonstrated his multi-linguistic skills. He would develop into a hyperpolygot, someone possessing fluent understanding of more than six languages. Eventually, Jones would know 28 languages and was self-taught in several. (Encyclopedia of Biography)

इंग्लैंड से भारत पहुँचने तक (अप्रैल -सितंबर 1783) की लंबी यात्रा में उन्होंने वह पूरी रूपरेखा तैयार कर रखी थी जिसे भारत पहुँचने पर एशियाटिक सोसायटी के माध्यम से किया।

यह गौर करने की बात है कि जज के पद का भार उन्होंने दिसंबर 1783 में ग्रहण किया और उसके तुरत बाद जनवरी 1784 में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की जिसके वह आजीवन अध्यक्ष रहे। दूसरा काम उन्होंने नदिया के प्रसिद्ध विद्वान से संस्कृत सीखना आरंभ किया।

इसलिए इस बात के लिखित प्रमाण के अभाव में केवल यह अनुमान ही लगाया सकता है कि यदि भारत में न्यायाधीश के रूप में उनकी नियुक्ति के पीछे यह योजना न भी रही हो तो भी उनके मन को व्यग्र करने वाले सवालों में सर्वोपरि चिंता इसका कोई सम्माजपक समाधान निकालना अवश्य था। एसियाटिक सोसायटी के प्रथम अधिवेशन में उन्होंने सोसायटी के लक्ष्यों पर प्रकाश डाला था। अगले साल के व्याख्यान में उन्होंने गोरी जाति की जन्मजात श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया था।
Whoever travels in Asia, especially if he be conversant with the literature of the countries through which he passes, must naturally remark the superiority of European talents: the observation, indeed, is at least as old as ALEXANDER; and, though we cannot agree with the sage preceptor of that ambitious Prince, that “the Asiaticks are born to be slaves”, yet the Athenian poet seems perfectly in the right, when he represents Europe as a sovereign Princess, and Asia as her Handmaid:

इन दो वर्षों में उन्होंने संस्कृत का जितना ज्ञान प्राप्त कर लिया था, उसके आधार पर 2 फरवरी 1786 के व्याख्यान में उन्होंने जिन तथ्यों की ओर ध्यान दिया था उनमें एक यह था कि भारत के लोग मानते कि उनके पूर्वजों का पूरी दुनिया पर आधिपत्य था:
The Hindus themselves believe their own country, to which they give the epithet madhyama or Central, and Punyabhumi, or the land of virtues, to have been the portion of Bharat, one of the nine brothers, whose father had dominion of the whole earth;
यही वह ग्रथि थी जिससे मुक्ति पानी थीं क्योंकि भाषा से इसकी पुष्टि होती थी। उनके इस व्याख्यान के जिस अंश को लोग मुग्ध होकर दुहराते हैे वह निम्न प्रकार है:
The Sanscrit language whatever be its antiquity, is of a wonderful structure; more perfect than the Greek, more exquisitely refined than either, yet bearing with both of them a stronger affinity, both in roots of verbs and in the forms of grammar, than could possibly have been produced by accident; so strong indeed, that no philologer could examine them all three, without believing them to have sprung from some common source, which, perhaps, no longer exists; there is a familiar reason, though not quite forcible, for supposing that both the Gothick and the Celtick, though blended with a very different idiom, had the same origin with the Sanscrit; and the Old Persian might be added to the same family, if this were the place for discussing any question concerning the antiquities of Persia.34

जिसमें प्रशंसा में जो कुछ कहा था वह उससे दो दशक पहले एक अन्य विद्वान कह चुका था। इसमें उन्होंने अपनी ओर से जोड़ा था वह यह कि यद्यपि संस्कृत उन सबसे पुरानी है पर ये सभी आपस में बहनें हैं क्योंकि ये किसी ऐसी भाषा से पैदा हुई हैं जिसका आज अस्तित्व नहीं है।
और अपने इसी भाषण में उन्होंने इसका निपटारा भी कर दिया था जिसको कभी याद नहीं किया जाता:
Of these cursory observations on the Hindus, which it would require volumes to expand and illustrate, this is the result: that they had an immemorial affinity with the old Persians, Ethiopeans, and Egyptians, the Phoenicians, the Greeks, and Tuscans, the Scythians or Goths, and Celts, the Chinese, Japanese, and Peruvuans; whence, as no reason appears for believing, that they were a colony from any one of those nations, or any of those nations from them, we may fairly conclude that they all proceeded from some central country, to investigate which shall be the object of future Discourses.

अब आगे मात्र इसको गंभीर विचारविमर्श का अभिनय करते हुए उदाहृत करना था। उसकी चर्चा हम कल करेंगे। आज इतना ही कि किसी पाश्चात्य लेखक को बहुत ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए पर माडल तो किसी को बनाया ही नहीं जा सकता। वह अनर्थकारी है और यह अनर्थ द्विवेदी जी ने भी किया।

Post – 2019-10-03

सुनो जब दर्द होता है तो हँसकर झूठ मत बोलो
कहो, हाँ दर्द होता है, तुम्हें भी दर्द होता है।
कहाँ होता है? क्यों होता है? कब से? लोग पूछेंगे
बताना यूँ, यहाँ, ऐसे, इसी से दर्द होता है।
बदन का है, जहन का, या सितम का यह भी पूछेंगे
बताना जिसका भी होता हो पर दुश्वार होता है।
न सिसकी काम आती है, न आँसू साथ देते है
हँसी की आँच से जब तब बयाँ यह दर्द होता है।
मैं हँस कर लिख रहा या आँख भर कर हमसे पूछोगे
पता कुछ भी नहीं चलता है जब यह दर्द होता है।।

Post – 2019-10-03

#रामविलास_शर्मा पर #धनंजय_वर्मा

धनंजय वर्मा के रामविलास शर्मा की पुस्तक पर व्यक्त विचार उनकी समझ पर प्रश्न उठाते हैं परंतु उनकी नीयत पर नहीं। उन्होंने अपने अध्ययन और ज्ञान के बल पर जो राय कायम की है आधार पर जितनी बेबाकी से अपनी बात कही जा सकती है, कहने का प्रयत्न किया है।

रामविलास जी की 79-80 के बाद लिखी लगभग सभी पुस्तकों से विषय की प्रस्तुति को लेकर मुझे शिकायत रही है। परंतु उनमें व्यक्त विचारों को लेकर बहुत कम असहमति है।

धनंजय वर्मा का लेख पोलेमिकल तो नहीं है परंतु उनके मन में यह डर है कि कुछ खास निष्कर्षों पर पहुंचने के बाद मनुष्य को एक विद्वान के रूप में राष्ट्रवादी, पुरातन पंथी या दक्षिणपंथी विचारधारा का माना जा सकता है। उनके लेखन में इससे बचने की कोशिश दिखाई देती है और यह एक सेंसर का भी काम करती है।

ऐसे आदमी को समझा पाना आसान नहीं होता। मेरे लिए यह काम और भी कठिन है, क्योंकि वर्मा जी के लेखन से पता चलता है उन्होंने बहुत कुछ पढ़ा है फिर भी मुझे पढ़ने के लिए या तो वह समय नहीं निकाल सके हैं, अथवा बिना कुछ पढ़े मेरे विषय में कोई धारणा बना ली इसलिए मुझे इस योग्य नहीं समझा मेरे लिखे पर भी ध्यान दे सकें।

रामविलास शर्मा ने अपनी इसी पुस्तक के पृ.153-54 मेरे कुछ विचारों को संक्षेप में रखा है और उनसे सहमति भी व्यक्त की है। वर्मा जी साधनसंपन्न व्यक्ति हैं। यदि उन्होंने इसे देखकर ही उस पुस्तक को उलट-पुलट लिया होता जिसका रामविलास जी ने हवाला दिया है तो उन्हें लगभग उन सारी आपत्तियों का उत्तर मिल जाता जिन्हें जिन्होंने रामविलास जी की समीक्षा करते हुए उठाया है।

किसी समीक्षा से समीक्षित वस्तु का परिचय मिलना चाहिए पर इस लेख से धनंजय जी के व्यापक ज्ञान का परिचय तो मिलता है परंतु प्रयत्न करने के बाद भी पुस्तक का परिचय नहीं मिलता। जहां उनके ज्ञान का परिचय मिलता है वहां यह भी स्पष्ट होता जाता है कि अपनी व्यस्तता के करण जो कुछ पढ़ा है उसे समझने की फुर्सत नहीं निकाल सके। इस दुर्घटना का शिकार रामविलास जी के साथ उनकी पुस्तक भी हो गई है। समय का अभाव है, विस्तार में न जाकर मैं वर्मा जी के ज्ञान वर्धन के लिए कुछ सूचनाएं दर्ज करना चाहूंगा :

1. रामविलास जी जैक ऑफ ऑल नहीं थे। यह सीमा धनंजय वर्मा की है। एक विद्वान किसी एक विषय का गहराई से अध्ययन करता है और उससे मिली दृष्टि से दूसरे अनुशासनों की कृतियों और उनके विद्वानों को समझने परखने की योग्यता अर्जित कर लेता है। अनेक विषयों की कामचलाऊ जानकारी से मिली सूचनाओं काे अपने अधिकार क्षेत्र की जानकारी से मिलाकर देखने के बाद वह ऐसे निष्कर्षों पर पहुंचता है जिसमें विशेषज्ञों के अंतर्विरोध और असंगतियाँ – उनकी नासमझी, ईमानदारी, बेईमानी सब समझ में आ जाती है। अंग्रेजी का एक शब्द पोलीमैथ है. रामविलास जी पर वही लागू होता है।

2. मार्शल और व्हीलर के विषय में उनका आरोप निराधार नहीं है । मार्शल अपनी रिपोर्ट 1931 में प्रकाशित कर रहे थे। उसी दौर में पूर्ण स्वराज्य का घोष भी हुआ था। वह अपनी रपट में यह सिद्ध करने के लिए कि सिंधु सभ्यता वैदिक नहीे थी, सिंधु सभ्यता की पूर्ववर्ती नहीं थी, बाद में उसका सिंधु सभ्यता से कोई संपर्क नहीं हुआ था, लंबी बहस करते हैं। मैंने उसी पुस्तक पृ. 32-35 (2016सं.) में उसकी विस्तार से जांच करते हुए दावा किया था कि “ मार्शल की आपत्तियां सतही और गलत है” (पृ.34)।

3. मार्शल की बेईमानी का एक बड़ा सबूत यह है की ट्रेंच MD पर राखल दास द्वारा तैयार की गई रपट को उन्होंने अपने ग्रंथ में शामिल नहीं किया था नही उसे उन्हें वापस लौटाया था। यहाँ तक कि उसकी पुरावस्तुओं को नष्ट कर दिया था। उनके भारत से चले जाने के बाद उनके पीए हारग्रीव ने नए सिरे से टाइप्ड कॉपी उन्हें लौटाई थी परंतु के चित्र और ड्राइंग और मूल प्रति नहीं लौटाई थी। यह रपट उसके 60 साल बाद पृथ्वी प्रकाशन ने जीराक्स करा कर प्रकाशित की थी। इस पर नजर डालने का मुझे भी सौभाग्य मिला था।

4. वर्मा जी की यह जानकारी सुनी सुनाई है कि राखालदास बंदोपाध्याय ने सिंधु सभ्यता को द्रविड़ सभ्यता कहा था। उन्होंने आसुरी सभ्यता कहा था, परंतु इससे भी बड़ी बात यह कि उन्होंने उसी के समकालीन सरस्वती सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहा था। इसकी संपन्नता का वर्णन करते हुए इन्होंने ऋग्वेद की एक ऋचा का भी उद्धरण दिया था:
चित्र इद्राजा राजका इदन्यके यके सरस्वतीं अनु ।
पर्जन्य इव ततनत् हि वृष्ट्या सहस्रं अयुता ददत् ।। 8.21.18

5. इसमें प्रयुक्त सहस्र, अयुत (=लाख) का दान करने वाले सरस्वती तटवर्ती राजा से वर्मा जी का यह भ्रम तो दूर ही हो जाना चाहिए कि जिन्हें चरवाहा बताया जाता रहा और वह इसलिए उन्हें चरवाहा मान लेते रहे कि कहीं उनको दक्षिणपंथी न मान लिया जाए, वे सभ्य और संपन्न नगरवासी थे।

6. उनकी समझ में यह बात भी आ जानी चाहिए कि क्यों एक सबसे महत्वपूर्ण ट्रेंच की रिपोर्ट और पुरा सामग्री को मार्शल ने नष्ट कर दिया था – क्योंकि यदि सिंधु सभ्यता असूर् सभ्यता मान भी ली जाती तो भी उस समय से ही उसके पड़ोस में वैदिक सभ्यता के अस्तित्व का प्रमाण उपलब्ध था। इसी को नकारने के लिए मार्शल ने वह लंबी भूमिका लिखी थी जिसका मैंने उल्लेख और तब तक की जानकारी के आधार पर खंडन किया।

7. व्हीलर ने मोहेंजोदड़ो पर आर्यों का हमला और उनके द्वारा किए गए कत्लेआम का प्रमाण देने के लिए जिन कंकालों का प्रयोग किया वे पहले गुहा द्वारा जाँचे जा चुके थे। 1964 में जब डेल्स ने एक्सपीडिशन के अंक में कंकालों जुटाए जाने की तरकीब, ुनके पुरातात्विक संदर्भ देते हुए यह दिखाया कि इनसें के किसा की पृत्मैंयु हिंसा से नहीं हुई थी कि इनकी प्रसितुति में धूर्तता काम लिया गया था और अपना लेख मिथिकल मैसेक्र ऑफ मोहनजोदड़ो के नाम से प्रकाशित किया तो 1968 के अपने एडिशन में उसने अपनी लाज बचाते हुए लिखा कि मैं एक खब्त में ऐसा लिख गया था। परंतु यह खब्त नहीं था। एक संस्कृत के विद्वान के पास अपने समर्थन के लिए( नाम मुझे याद नहीं आ रहा है) वह गटा तो उन्होंने पूछा संस्कृत जानते हैं। उसने स्वीकार किया,नहीं। उन्होंने पूछा आप दासों और दस्युओं को सिंध घाटी का निवासी बता रहे हैं। मालूम है उनका निवास पर्वतीय क्षेत्र में था। मुलाकात समाप्त हो गई। उसने अपने मत में कोई परिवर्तन नहीं किया, इसलिए यह खब्त में लिया गया निर्णय नहीं था। शरारत थी।

7. वर्मा जी का मानना है, पाकिस्तान के लोग पाकिस्तान का इतिहास 5000 साल तक ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी सूचना गलत है। यह काम व्हीलर ने स्वयं किया था।

Post – 2019-10-02

#रामकथा_की_परंपरा(32)
राम का दूसरा निर्वासन

हम सीता के दूसरे वनवास की कथा से परिचित है। उत्तरकांड की यह उद्भावना बौद्ध मत में स्त्रियों के प्रवेश की अनुमति की प्रतिक्रिया थी। भारत में इससे पहले भी कभी महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त न थे, परंतु इसके बाद उनके आत्म सम्मान और अधिकारों का जिस कठोरता से हनन किया गया वैसा पहले के इतिहास में नहीं दिखाई देता। इसके विस्तार में नहीं जाएंगे।

हम राम के एक निर्वासन से परिचित हैं जो राज्य के कारण कैकेई के प्रभाव में दिया गया था। परंतु बौद्ध मत के विरुद्ध रामायण को हथियार बनाने के प्रयत्न में राम का अतिमानवीकरण करते हुए अवतार बना दिया जाना मानवता से उनका निर्वासन था। इसकी ओर हमारी नजर नहीं जाती।

पहले निर्वासन का परिणाम था दक्षिण भारत का काया-पलट।

दक्षिण भारत में आहार संग्रही मनुष्यों का निवास उत्तर भारत की तुलना में यदि अधिक पहले से नहीं था तो लगभग एक ही समय में था। यदि उत्तर में सो(ह)न इंडस्ट्री (पाहन-उद्योग) थी तो दक्षिण में मद्रास (पाहन-उद्योग) और दोनों के अपने अटन क्षेत्र थे। सो(ह)न पाहन-उद्योग मध्य प्रदेश के गाेदावरी क्षेत्र तक पहुँचता था परंतु उससे आगे न बढ़ पाता था। भारत से बाहर इसकी पहुँच भूमध्यसागर तक थी। मद्रास पाहन उद्योग की पहुँच गोदावरी के उस सिरे तक थी जिससे आगे सो(ह)न पाहन-उद्योग नहीं बढ़ पाता था।

अभी तक आपको यदि अटवी का कोश लिखित अर्थ, जंगल ही मालूम हो तो अपने ज्ञान में सुधार करें, अटवी का अर्थ वह भौगोलिक क्षेत्र था जिसमें अनेक मानव समुदाय विविध मौसमों में आहार की सुलभता के अनुसार पर्यटन या परिक्रमा करते थे।

इनकी पहचान इनके पूरे विस्तार में पाए जाने वाले पुरापाषाणी हथियारों की समानता पर निर्भर करती है। इसलिए यदि सो(ह)न पाहन-उद्योग को किन्ही कारणों से नकारना भी पड़ जाए तो इन शिल्पगत समानताओं को नहीं नकारा जा सकता।

इसका अर्थ है उत्तर भारत जितना मध्य सागर तक के क्षेत्र से जुड़ा हुआ था, उसी तरह अपने ही देश के दक्षिणी भाग से जुड़ा नहीं था। और इसके कारण जहां भारत से लेकर भूमध्य सागर तक इतने कम समय में कृषि का प्रचार हो गया कि लगे सारा परिवर्तन एक छोटी अवधि में जादू के खेल से हो गया है, वहां दक्षिण भारत उसके हजारों साल बाद तक कृषि से अपरिचित रहा और यह मात्र संयोग नहीं है कि राम का दक्षिण क्षेत्र में कृषि संस्कृति के साथ पहली बार प्रवेश होता है और इस ऐतिहासिक सत्य को जो संभव है पुरानी राम कथा में प्रतीकात्मक रूप में बची रह गई हो, राम के ऐतिहासिक श्रेय से अवतारवाद में नष्ट कर दिया गया।

Post – 2019-10-02

प्रदीप सक्सेना के लेख को पढ़कर मुझे बड़ी निराशा हुई। लगा वह अलीगढ़ विश्वविद्यालय की जरूरतों के अनुसार लिखना पसंद करते हैं। पूरे लेख में उन्हें शिकायत सिर्फ उन लोगों से है, जिन्होंने रामविलास शर्मा के लेखन की सराहना की है, परंतु उन्होंने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि उनकी प्रशंसकों का यह दल उन पर लंबे समय तक किए जाने वाले प्रहारों की प्रतिक्रिया में, अन्याय के विरोध के रूप में पैदा हुआ था। ये प्रहार तब आरंभ हुए थे जब रामविलास जी ने कम्युनिस्ट पार्टी की भाषा नीति का पूरी दृढ़ता से विरोध आरंभ किया था, और इसकी प्रतिक्रिया में मुँहजोर लोगों ने हिन्दी को हिंदुत्व से जोड़ कर भर्त्सना अभियान चलाया था। यह भी ठीक उसी तरह का लेख है और इसमें मुख्यतः हिंदी प्रदेश और नवजागरण को ही रखा गया है। यदि उनके प्रशंसकों को रामविलास जी में कोई दोष नहीं दिखाई दिया, तो प्रदीप सक्सेना को पूरे लेख में उनका कोई गुण भी नहीं दिखाई दिया।

लगता है प्रदीप जी ने न तो रामविलास शर्मा को ध्यान से पढ़ा है न कभी उनके संपर्क में आए हैं। अजय तिवारी के जिस संस्मरण का उन्होंने उल्लेख किया है, उसके उद्धृत अंश को भी नहीं समझ पाए। उसमें रामविलास जी ने साफ कहा है कि मैं इतिहासकार नहीं हूं , आंदोलनकारी हूँ, मेरे पूर्वाग्रह हैं, वह पूर्वाग्रह राष्ट्रवादी हैं उपनिवेशवाद विरोधी हैं।” ऐसे व्यक्ति को पेशेवर विद्वानों की अपेक्षाओं की कसौटी पर कसा जा सकता है?

यदि एक जिम्मेदार लेखक अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर के विषय पर कुछ कह ही नहीं सकता, तो क्या प्रदीप सक्सेना पेशेवर इतिहासकार हुए बिना रामविलास शर्मा के इतिहास पर कुछ कहने का अधिकार रखते हैं?

यदि अजय तिवारी ने पूछा होता कि विद्वानों के बीच में आपको कहां रखा जा सकता तो संभवत है रामविलास शर्मा का उत्तर होता, मैं विद्वान हूं ही नहीं। मैं अध्येता हूँ, आंदोलनकारी हूँ, और आन्दोलन लेखन के माध्यम से भी किया जा सकता है यह मैंने मार्क्स और ऐंगेल्स से सीखा है। मैं समाज को जाग्रत करने के लिए, अपने समाज के अधिकतम लोगों की समझ में आने वाली भाषा में लिखता हूं। विद्वान लोग विद्वानों की बीच में अपनी को स्थापित करने के लिए विद्वानों के बीच स्वीकृत भाषा में लिखा करते हैं, और यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वे कितने जानकार हैं और अपने हर कथन के लिए स्रोत का हवाला देते हैं। पुस्तक के अंत में शब्दानुक्रमणी देते हैं। विद्वान होता तो उस भाषा में लिखता और इन सारी अपेक्षाओं की पूर्ति करता।

मुझे कुछ ऐसा याद है कि एक बार मार्क्स को ऐसे भी ऐसे ही उल्टे सवाल का सामना करना पड़ा था। उनका साक्षात्कार लेने वाले व्यक्ति ने पूछा था आप तो पत्रकार हैं, अर्थशास्त्र के पेशेवर आदमी ही नहीं है, आप जिस मत का प्रतिपादन करते हैं उसे अर्थशास्त्र पढ़ाने वाला कोई विद्वान पढ़ाता नहीं। मार्क्स ने इसका क्या उत्तर दिया था यह मुझे याद नहीं, परंतु विज्ञान में प्रोफेशन और कुर्सी नहीं देखी जाती, प्रामाणिकता पर ध्यान दिया जाता है और हमेशा किसी की आलोचना इसी आधार पर की जानी चाहिए।

जिन कम्युनिस्ट इतिहासकारों का प्रदीप जी ने उल्लेख किया है वे कैसे मार्क्सवादी थे औपनिवेशक भाषा में लिखते थे औपनिवेशिक इतिहास को दोहराते थे? उनमें से अनेक अपने को जिस काल का अधिकारी बताते थे उसके साहित्य की स्रोत भाषा से ही परिचित नहीं थे। क्या प्रदीप जी को पता है कि इरफान हबीब अपने को वैदिक काल का भी विद्वान मानते हैं? रोमिला थापर मध्यकाल के इतिहास में भी दखल रखती हैं? उन्होंने इतिहासकार के रूप में रामशरण शर्मा के विशिष्ट योगदान के रूप में सामंतवाद पर उनके काम को गिनाया है। मुखिया ने अपने एक लेख में उसका खंडन करके रख दिया उसके बाद लोग उस काम को भूल गए। रोमिला थापर विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार है। क्या कोई बता सकता है उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान इतिहास में क्या है? वह कौन सी नई स्थापना उन्होंने दी है जो पहले से किसी न किसी रूप में दी न जा चुकी थी?

कोसंबी महान मार्क्सवादी इतिहासकार हैं, परंतु उन्होंने जिन स्रोतों का इस्तेमाल अपनी व्याख्या में किया है उनकी पड़ताल करने की योग्यता किसी दूसरे मार्क्सवादी में थी? कभी किसी ने उनकी आलोचना की। बिना समझे, बिना जांचे परखे महान विद्वान मानकर आगे पढ़ने से छुट्टी कर लेना यह छोटा रास्ता मार्क्सवादियों ने अपनाया इसके बाद भी उनमें से कोई अपने को विद्वान कहे इससे बड़ी मस्खरी क्या हो सकती है? कुर्सी की रोटी खाने वाले कुर्सी की भाषा में बात करते हैं, और इसी भाषा में रामशरण शर्मा ने कहा था यह हिंदी वाला इतिहासकार कहां से हो गया।

रामविलास शर्मा में बहुत सारी कमियां हैं। अपने क्षेत्र से संबंधित कुछ को मैं भी जानता हूं। परंतु अध्येता के रूप में भाषा विज्ञान और इतिहास के क्षेत्र में उनके जिस योगदान से मैं परिचित हूं वह अनेक कमियों के बावजूद अकेला इतना बड़ा है जिसके सामने प्रदीप जी ने महान इतिहासकारों की जो लिस्ट दी है उन सभी के समस्त काम को तुच्छ सिद्ध किया जा सकता है। 1961 में भाषाऔर समाज में उन्होंने भाषा वैज्ञानिक आधार पर यह सिद्ध किया था कि आर्यों की कोई जाति नहीं थी; कि भारोपीय भाषा का प्रचार भारोपीय क्षेत्र में भारत से हुआ था; कि प्रसारित होने वाली भाषा में द्रविड़ और मुंडारी का भी योगदान था, वह केवल संस्कृत नहीं थी; कि आदिम भारोपीय की ध्वनिमाला वह नहीं थी जिसका दावा तुलनात्मक भाषा विज्ञानी करते हैं। और प्राचीन इतिहास का सारा तथाकथित मार्क्सवादी लेखन, बल्कि बाद के कालों का भी लेखन, उन्हीं अवधारणाओं पर किया जाता रहा जिनका खंडन रामविलास जी ने उस समय कर दिया था जब किसी पुरातत्ववेत्ता की, नजर किसी दूसरे अध्येता की नजर, इस ओर नहीं पड़ी थी और आज यह सर्वमान्य सा है।

Post – 2019-10-01

#रामकथा_की_परंपरा (31)
वाल्मीकि -2

राम और रामकथा के अधिकांश पात्रों का किसी न किसी रूप में सीधे या व्याज रूप में पहले भी नाम आया है भले कुछ मामलों में उनका चरित्र मेल न खाता हो। उसमें राम का भी नाम है पर वह कोई अन्य राजा या व्यापारी है।
प्र तद्दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवत्सु ।
ये युक्त्वाय पञ्च शतास्मयु पथा विश्राव्येषाम् ।। 10.93.14
(सायण भाष्य में – पंचशता-पंच शतानि रथानि, युक्त्वाय- अश्वैः युक्ता, विश्रावि – देवानां लोके अथवा श्रावकगुणयुक्तं, दुःशीमे पृथवाने -दुःशीमनाम्नि पृथवाने, असुरे- बलवति, रामे -च एतेषु राजसु , प्रवोचं -प्रवीमि, प्रख्यापयाम, मघवत्सु – धनवत्सु)
परन्तु एक सूक्त (10.110) के ऋषि के रूप में ‘जमदग्निर्भार्गवः, जामदग्न्यो रामो वा’ आया है जिसे परशुराम का पूर्वरूप माना जा सकता है। पूर्वरूप इसलिए कि इसमें परशु नहीं है।

रावण एक तो अराव्ण (उच्चारण के लिए र से पहले अ जोड़ना तमिल की विशेषता है (राजा>अरसन). दशोणि और दशशिप्र के (यथा सोमं दशशिप्रे दशोण्ये स्यूमरश्मावृजूनसि ।। 8.52.2) रूप में। दशरथ का प्रयोग एक अग्रणी व्यापारी के रूप में (चत्वरिंशद् दशरथस्य शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणिं नयन्ति।), शत्रुघ्न (मम पुत्राः शत्रुहणोऽथः मे दुहिता विराट्।), भरत, लक्ष्मण (लक्ष्मण्यस्य सुरुचो यतानाः) आदि नाम संदर्भ से अलग आए हैं पर व्यक्तिनाम के रूप में भी वाल्मीकि (कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, परशु-राम आदि का नाम नहीं का नाम मेरी जानकारी में रामायण और महाभारत से पहले देखने में नहीं आता।

वाल्मीकि के विषय में एक परंपरा है जिसका एक जनवादी पाठ है दूसरा वर्णवादी। जनवादी परंपरा के अनुसार राम के जीवन को लेकर जनगाथाएं तैयार हुईं जिन्हें लोग बहुत चाव से सुनते थे और इन्हीं गाथाओं मैं एक मार्मिक गाथा वाल्मीकि के नाम थी और लोक भाषा में थी। ऐसी गाथाएं अपने शौर्य और त्याग असाधारण प्रेम के कारण प्रसिद्ध चरित्रों को लेकर बहुत प्राचीन काल से लिखी और सुनी जाती रही है। ऋग्वेद में नाराशंसी गाथाके रूप में याद किया गया है। लोरिक, आल्हा, भरथरी, आदि की गाथाएँ लोग जितनी तन्मयता से सुनते और गाते रहे हैं उतनी तन्मयता से साहित्य की कृतियों का पाठ लोग नहीं करते होंगे। इसलिए इस धारणा को गलत कहना नासमझी होगी। रामायण के अनुसार भी वाल्मीकि की गाथा का गान करते हुए लव और कुश या कुशीलव विचरते हैं।

इसी मार्मिक गाथा को किसी संस्कृत कवि ने, उसका नाम जो भी रहा हो, एक महाकाव्य के रूप में प्रस्तुत किया जिसके विषय में हम यह निवेदन कर आए हैं कि उसका आकार बहुत छोटा था।

बौद्ध मत के विरोध के लिए इस लोक प्रचलित गाथा को सर्वाधिक उपयोगी पाकर संस्कृत कवियों ने बहुत सारी सामग्री इसमें भर कर इसके आकार को और विस्तृत किया। इसके बाद भी पूरा संतोष नहीं हुआ तो बालकांड और उत्तरकांड काफी बाद में जोड़े गए।

इसलिए वर्तमान रूप में उपलब्ध रामायण को किसी एक कवि की रचना नहीं कहा जा सकता।

लोकगाथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके अच्छे गायक कुछ समय तक तन्मयता से गाते रहने के बाद स्वयं भी कवि हो जाते हैं और गायन के क्रम में अपनी ओर से भी कुछ जोड़ते बदलते रहते हैं। यदि आल्हा या लोरिकायन के एकाधिक गायकों काे टेपरेकार्ड करें तो पाएँगे कि कथा एक ही रहते हुए प्रत्येक गायक की गाथा एक अलग संस्करण है। पाठ सुनते समय श्रोताओं का जो व्यक्तित्वांतर होता है उसे अनुभव से ही जाना जा सकता है। गुप्त जी ने जाने क्या सोच कर लिखा था, “राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है।” पर लोक साहित्य पर यह पूरी तरह घटित होता है।

एक और बात गाथापरंपरा के साथ यह है कि किसी एक का मानक लिखित पाठ तैयार हो जाने के बाद भी इसके मौखिक पाठ विराम नहीं पा जाते, मानक पाठ से कुछ दब भले जाएँ। वे समानांतर चलते रहते हैं।

सबसे रोचक बात यह है कि लिखित काव्य बनने के बाद भी रामायण लोकगाथा की परंपरा से मुक्त न हो सका। इसकी प्रतिलिपियाँ तैयार करने वाले अपनी ओर से कुछ जोड़ते गए। उनका यह साहस न हो सका कि जो पहले से चला आ रहा था उसका कोई अंश निकाल भी सकें। इसी के कारण इन प्रक्षेपों के बाद भी इसके घटाटोप के नीचे पुरानी कथा की अन्तर्धारा बनी रही जो एक ओर तो हमें मूल कथा को समझने में सहायक होती है, दूसरे इस बात को समझने में भी सहायक होती है कि इसमें जो कुछ भरा गया वह किस इरादे से और कब भरा गया।

इस दृष्टि से विचार करने पर रामायण किसी एक कवि की रचना न होकर जातीय महाकाव्य है जिसके साथ वाल्मीकि का नाम जुड़ गया। ठीक यही बात महाभारत के विषय में कही जा सकती है, जिसके साथ वेदव्यास का नाम जोड़ा गया। ये नाम जोड़ने वाले ब्राह्मणवादी थे।

मैं जानता हूँ यह शब्द कुछ लोगों को क्षोभकर लगता है और इससे बचने के लिए ही हमने ऊपर वर्णवादी का प्रयोग किया, परन्तु वह वस्तुस्थिति पर परदा डालता है। बौद्ध और जैन मतों की लोकप्रियता और इन्हें मिले राजकीय समर्थन और वणिकों के मुक्त दान का किसी अन्य वर्ण पर नहीं केवल ब्राह्मणों पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा था कि उनके लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न बन गया और इस चुनौती को उन्होंने इसी रूप में स्वीकार कर इसे परास्त करने के औजारों का आविष्कार किया और अपने समय के सबसे प्रबल आन्दोलनों को सामाजिक तिरस्कार और उपहास का विषय बना दिया और अपनी खोई प्रतिष्ठा को पहले की तुलना में अधिक मजबूती से स्थापित किया।

अतः आज के संदर्भ में इसकी नोक की चुभन को समझते हुए भी इसे किसी अन्य नाम से अभिहित करना सचाई का सामना करने में हमारी असमर्थता को ही प्रकट करेगा।

इसी के चलते वाल्मीकि के नाम और चरित्र की आवश्यकता अनुभव हुई। रामकथा का गायक किसी अन्य जाति का हुआ तो कथा दूषित न भी हो तो भी जिसे इसका आदि गायक माना जाएगा उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी और इसका उल्टा प्रभाव पड़ेगा।

इस आदि गायक को ब्राह्मण तो होना ही पड़ेगा। परन्तु जवाब बौद्ध मत की श्रेष्ठता के लिए गढ़ी गढ़ी गई कहानियों का भी देना था। इन्हीं में थी अंगुलिमाल नामक एक दस्यु के हृदय परिवर्तन की कथा। इसके लिए राम को कष्ट देना जरूरी न था। उस कथा में इसकी जगह भी न थी। अब यह भार भी वाल्मीकि पर ही डालना था। जिन परिस्थितियों में यह हृदय परिवर्तन होता है, उससे अधिकांश पाठक परिचित हैं। वह इतना क्रूर है कि वह राम भी नहीं कह सकता। उसे मरामरा कहते रहने का उपदेश दिया जाता है और इसी से वह सिद्धि पा लेता है।

परंतु बुद्ध को जितनी कठिन साधना के बाद सत्य का साक्षात्कार हुआ था उसका भी जवाब देना है। अब उल्टा नाम जपते हुए भी वाल्मीकि इतने तन्मय हो जाते है कि दीमकें उनके ऊपर बाँबी बना लेती हैं और उन्हें इसका पता तक नहीं चलता। बुद्ध तो वाल्मीकि के सामने भी ठहर नहीं सकते, राम के सामने क्या टिकेंगे?

इस तरह तैयार होता है एक ब्राह्मणवादी वाल्मीकि जिसके बारे में आधा अधूरा आप जानते हैं और जो बाकी है उसे आप्टे या मोनियर विलियम्स के संस्कृत- इंग्लिश कोष से समझ सकते हैं।

वाल्मीकि इसी कारण रामकथा के आदि कवि बनाए जाते हैं और उनका रामायण आदि काव्य बन जाता है।

परन्तु अपनी इन सीमाओं के बाद भी मेरी नजर में कालिदास और व्यास को भी अतिक्रान्त करने वाली अदुभुत रचना है और इससे बड़ी रचना तुलसी का रामचरित मानस ही हौ क्योंकि यह लोकभाषा में पर उसी वैभव के साथ, उन्हीं सीमाओं से ग्रस्त होते हुए भी, अनन्य रचना है।