Post – 2016-05-18

‘’तुम बातें गढ़ लेते हो। लाजवाब कर देते हो। यह बताओ, जो चुप रह जाता है, उस खास मौके पर सही जवाब नहीं तलाश कर पाता है, कहो मात खा जाता है, क्या वह गलत होता है।‘’

सवाल उसने बहुत सही उठाया था। इससे पहले मेरा भी ध्या न इस पक्ष की ओर न गया था। मुझे मानना पड़ा, ‘’नहीं, कई बार चुप लगाने वाला इतना सही होता है और उसकी चुप्पी् के कारण अपने को सही समझने वाला इतना गलत होता है कि चुप लगाने वाला अपनी चुप्पी से भी यह बता जाता है कि ऐसे नासमझ से बहस करना भी उसे इज्ज त बख्शना है। इसलिए वह हारता नहीं है, न गलत सिद्ध होता है, वह शालीनता की रक्षा करता है और आहत होता भी है तो इसका उसके मनोबल पर कोई असर नहीं पड़ता।
वह खुश हो गया, ‘ यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था।”
”केवल सुनना चाहते थे, कु छ जानना नहीं चाहते थे। अपने को सही सिद्ध करना चाहते थे। क्‍या इस बात पर गौर किया कि इस चिन्‍ता ने तुम्‍हें उस औकात में पहुंचा दिया जहां लोग जुआ खेलते हैं, जीतना चाहते है, समझना नहीं।

Post – 2016-05-17

निघर्घट माहात्म्य

‘‘यह बताओ, पुरातन से तुमको इतना मोह क्यों है कि वर्तमान से मुंह मोड़ कर हजारों साल पीछे भटकते रहते हो?’’

मैं हँस पड़ा तो उसका आत्मविश्वास डगमगा गया, हँस कर बोला, ‘मैंने कुछ गलत कहा?’

‘यह सवाल बार बार क्यों पूछते हो, गलतियाँ सिर्फ उनसे होती हैं जो सही गलत का फर्क जानते हैं और उसका घ्यान रखते हैं। एक बात बताओ, तुम तो हिन्दी के आचार्य हो, निघर्घट का मतलब जानते हो। इसकी धातु प्रत्यय उपसर्ग वगैरह!’

वह खीझा तो, ‘कैसी कैसी ऊलजलूल बातें बीच में भिंड़ाते रहते हो!’’ परन्तु साथ ही सोचने भी लगा। माथे पर त्यौरियाँ पड़ गईं। न धातु समझ में आ रही थी न उपसर्ग- प्रत्यय। पर हार मानने की जगह आरोप लगाने लगा, ‘मेरे सवाल का जवाब देते नहीं बन रहा था इसलिए ऐसा तुक्का मारा जो तीर का काम करे!’

मैंने कहा, ‘देखो, तुम जिस धातु, प्रत्यय, उपसर्ग से शब्द का अर्थ समझना चाहते हो उससे भाषा को समझा नहीं जा सकता क्योंकि वह बाद में आविष्‍कार की गई एक युक्ति है भाषा का विवेचन करने का और बहुत वैज्ञानिक भी, परन्तु क्या विज्ञान आत्मा की खोज कर सकता है जिसे उसके बोधवृत्त से बाहर रखा गया है।

‘इस शब्द में वह सब कुछ है जिसका सहारा अर्थ समझने के लिए लिया जाता है, परन्तु यह एक मुहावरे का कैप्सूलीकरण है! मुहावरा है ‘धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का’। अब देखो तो इस शब्द के निर्माण में पहले पद-बन्ध को छोड़ दिया गया। इसे तो सभी जानते हैं। न घर का न घाट का संस्कृतीकरण करके न को नि उपसर्ग में बदला गया, घर को केन्द्रीयता दी गई, घाट से पहले के न को गायब कर दिया गया और गायब कर दिया गया का को भी। शब्द संस्कृत की माँगों के अनुसार बना और रह गया भदेस! तत्सम शब्दों में इसकी गणना हो नहीं सकती, लौट कर जनभाषा में भर्ती हो गया।’

वह खीझ गया, ‘तुममें किसी को बोर करने की अनन्त क्षमता है!’

‘उसका ज्ञान मुझे है, इसलिए इस बात पर गौर करो कि इस शब्द में जो छूट गया वह था कुत्ता! मुहावरे की रचना की बारीकी को समझो! कुत्ता की जगह गधा भी हो सकता था, परन्तु गधा धेाबी के लिए घर से घाट तक उपयोगी है और उसका अर्थशास्त्र यह कि उसे चारा भी नहीं डालना पड़ता, चर कर स्वयं आ जाता है। कुत्ते को कौरा भी दो, पर न धोबी के घर पर काम आता है, क्योंकि गन्दे कपड़े कौन चुराएगा, इसलिए घर पर रखवाली जरूरी नहीं, घाट पर धेाबी स्वयं होता है!‘

कौरा का मतलब उसकी समझ में नहीं आया था, वह इसे चैारा या चबूतरा समझ बैठा था। समझाना पड़ा, ‘देखो शब्दों के भीतर इतिहास के वे सूत्र कैसे छिपे होते हैं जो इतिहासग्रन्थों में अँट नहीं सकते, परन्तु जिनके बिना राजाओं के कारनामों वाला इतिहास तो समझा जा सकता है परन्तु लोक और संस्कृति को नहीं!

‘कौरा एक कवल या ग्रास का सूचक है। पहले निजी कुत्ते विशेष पेशे के लोगों द्वारा ही पाले जाते थे। सामान्य नागरिक कुत्तों के लिए अपने भोजन का एक ग्रास अलग कर देते थे और उसे बाहर ला कर कुत्तों के लिए रख देते थे। इस तरह कुत्ते निजी नहीं सामाजिक होते थे और सभी की सुरक्षा का घ्यान रखते थे। जानते हो, अपने मकान में मैं ऐसा ही एक ग्रास बाहर रखता था और एक कुत्ता जो उसको अपना ग्राह्य समझता था मेरी बेटी को एक किलोमीटर तक साथ छोड़ने जाता था और जब वह बस में बैठ जाती तब लौटता था।’

‘देखो, मैं ज्योतिष नहीं जानता पर यह जानता हूँ कि पिछले जन्म में तुम कबाड़ी रहे होगे। कहाँ कहाँ की सड़ी गली चीजें इस शान से पेश करते हो कि यही तुम्हारी दौलत है!’

मैं उसको सुनते हुए मुस्कराता रहा। जब वह चुप हुआ तो कहा, ‘इतनी देर बाद भी नहीं समझ में आया कि मैंने निघर्घट का अर्थ क्यों पूछा था। तुम न घर के हो न घाट के ! न अतीत के न वर्तमान के! तुम इतिहास से भी भागते हो और वर्तमान से भी। न इतिहास को समझते हो न वर्तमान को, न इनके संबन्ध को न इनके द्वन्द्व को न इस द्वन्द्व से प्रकट होने वाले उस आलोक का सामना कर पाते हो, जिसकी आवश्यकता भविष्यनिर्माण में होती है और इसके बाद भी अपने को वाचडाग या पहरेदार कुत्ता समझते हो! तुम जिनकी रक्षा का भ्रम पालते हो उन्हें तुम्हारी जरूरत नहीं! जो तुम्हें दूसरों पर अकारण भौंकने के लिए डिश पेश करते हैं, तुम्हारी जरूरत उनको है परन्तु न उनके पास वर्तमान है न अतीत, न भविष्य। तीनों की दहशत अवश्य है। इसकी व्याख्या करो और उसके बाद मुझसे बात करना।

‘तुमको तो इस मुहावरे के घर और घाट का और इन दोनों के बीच में पड़ने वाले रास्ते का भी अर्थ पता न होगा। घर का मतलब है अतीत, रास्ते का मतलब है वर्तमान, और घाट का अर्थ है भविष्य । पहले हिन्दी सीखो और फिर हिन्दुस्तान सामने होगा और फिर उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य को समझ पाओगे।

’तुम्हें पता नहीं है, हिन्दी में हम एक अखबार भी निकालते हैं।‘

’ उसमें तुम हिन्दी का शोषण करते हो, उसकी सेवा नहीं। उसे समझने की कोशिश नहीं। यह उसी तरह का प्रयत्न है जो पादरियों ने भारतीय भाषाओं में अपने विचार का प्रचार करने के लिए किया था, फिर भी उनका योगदान तुमसे कई गुना अधिक है।‘

‘इस पर कल बात करेंगे’, उसने कहा और उठ लिया।

Post – 2016-05-16

व्‍याजस्तुति

– मैं जानता हूं आप अपनी बदनामी से डरते हैं! मैं भी डरता हूं! पर तभी जब मैंने कोई गलत काम किया हो।

-हत्यारा आप के जीवन का अंत कर देता है पर कीर्तिको नहीं मिटा पाता। कई बार उस अत्याचार से ही आप की कीर्ति को चार चांद लग जाते हैं। परन्तु निन्दक का आघात आपकी कीर्ति पर ही होता है जिसके बाद आप एक जीवित लाश में बदल जाते हैं: एक ऐसी लाश जिसे लोक की उपेक्षा में सड़ते हुए, मुंह छिपाते हुए, देखने वालों से बचते हुए, अपनी दुर्गति का गवाह बनना पड़ता है।

परन्तु उस विचित्रता पर ध्यान दो जिसमें हत्यारा उल्टे सिरे से छुरा पकड़ ले या रिवाल्वर की नली अपनी ओर फेर ले और उसके बाद जो कुछ घटित हो उसमें आप अपने हत्यारे को बचाने के प्रयत्न में लग जाएं तो आप की कोई क्षति न होगी। उसे, यदि वह बच गया तो, उस ग्लानि और अपमान में जीना पड़ेगा जिसमें आपका निन्दक या दुर्भावनाग्रस्त आलोचक आपको पहुंचाना चाहता था।

इसलिए ध्यान इस पर दो कि गलती तुमसे हुई है या नहीं! डरना वहीं है जहां तुम गलत थे और गलती की ओर ध्यान जाने या दिलाए जाने के बाद भी उसके लिए खेद प्रकट नहीं किया! अपने विरुद्ध दुष्प्रटचार की जमीन तुमने तैयार की। यहां खंजर सही सिरे से पकड़ा गया है और उसकी चोट तुम पर होनी है और तुम्हे जीते जी लाश की तरह विचरना है और अपने अपयश के साथ मर जाना है।

– ‘तुम उपदेशक कमाल के हो, इतने सारे चैनेल हैं, किसी को घेर लो, बाबाओं की छुट्टी हो जायगी! तुम कहो तो मैं बात करूं।‘

‘‘लोगों के शरीर पर चाम होता है, तुम्हारे दिमाग पर भी खाल चढ़ी हुई है। समझ न पाओगे, पर हिन्दी पढ़ाते रहे हो, इसलिए व्याजस्तुति और व्याजनिन्दा अलंकारों से तो परिचित होगे ही।

– तुम मुझे काव्यशास्त्र और छन्‍दशास्त्र पढ़ाओगे, जिसे पढ़ाते मैंने उम्र काटी है!

– मैं तुम्हें यह बताना चाहता हूं कि मैं तुमको कुछ पढ़ा नहीं सकता! जिसकी पढ़ने की उम्र खत्म हो गई उसकी बढ़ने की उम्र खत्म हो गई। यह पत्रा की तिथि से तय नहीं होता, जीवट से तय होता है। मैं अलंकारशास्त्र के माध्यम से यह बताना चाहता था कि मेरे आलोचकों ने गलत सिरे से खंजर पकड़ने के कारण आत्मघात किया और इसके परिणाम भुगते। काव्यशास्त्र और छनदशास्त्र कविता के क्षेत्र में नहीं आते। ये भाशाविज्ञान के क्षेत्र में आते हैं।

परन्तु मैं यह बताना चाहता हूं कि बारूद के भंडार पर कब्जा जमाए लोग एक सच का सामना करने ही स्थिति में न थे] उसके लिए वे तिकड़मों का सहारा ले रहे थे! संचार माध्यम अपनी फीस ले कर सुपारी किलर की भूमिका में थे,] परन्तु उनकी बेकली मुझे अपनी अकाट्यता का प्रमाण प्रतीत होती रही। वे तोहमत लगा रहे थे, पर वे चिपक नहीं रहे थे, उल्टेे वापस जा रहे थे। मैं उनकी बेचैनी को जानता था। उनमें जो किसी भी कारण आदरणीय थे उनका सम्मान भी करता था। वे अपनी ही कुटिलता और कुत्सा के ग्रास होते जा रहे थे। मैंने 1991 में जिन दो लेखों के माध्यम से आगाह किया था कि यह ढर्रा रहा तो तुम बेघर हो जाओगे, वे घर बदलने की उथलपुथल में मेरे हाथ लग गए। जो भविष्यवाणी की थी वही घटित हुई पर इसलिए नहीं कि मैं बहुत अच्छा‍ ज्योतिषी हूं, अपितु इसलिए कि पूर्वाग्रह के कारण जिसे देखने से इन्कार‍ किया जा रहा था, उससे मुक्त होने के कारण मैं भविष्यलेख को पढ़ पा रहा था। भाजपा और संघ दोनों दिमागी दिवालियापन के नायाब नमूने हैं इसलिए उन्हें किसी देश का कोई खुराफाती जो जय हिन्दू, जय हिन्दुस्तान करता मिले उसे गले लगा लेते हैं कि लो विदेशी भी भारत की जैकार करने लगे। वे यह तक नहीं जानते कि वे अपना काम कर रहे हैं या उनका काम कर रहे हैं जो उन्हें भारत में रहने, विचरने, संपर्कसूत्र विकसित करने और एक सम्‍मानजनक जीवन जीने का खर्चा दे रहे हैं।

एक ऐसा ही आयोजन संभवत: 2010 में एक सेमिनार में देखने में आया। दो नौजवान ग्रीक अध्येाता थे। वे आर्यों के जीनोम की बात करने लगे। किसी की चूक से मुझे उसका अध्यगक्ष बना दिया गया था और जब मैंने उनके नस्लववादी रुख की भर्त्स ना की तो वे सारी मर्यादाएं तोड़ कर अपने कथन को वैज्ञानिक सत्य बनाने पर कायम रहे। बहस में हमें लंच से भी हाथ धोना पड़ा।

पर यह बौखलाहट क्या उस खेमे का मृत्यु नाद नहीं है जो किसी भी तर्क से नस्ल वादी सोच से वैज्ञानिक सोच को दबाना और हारी हुई बाजी जीतना चाहता है। इसलिए जब किसी प्रेरणा और प्रबन्धन से सम्मोहित हो कर नीतीश का दल जान पर खेल कर वहां पहुंचने को तैयार हुआ जहां सांस लेने में दिक्‍कत होती है और जिसके बारे में किसी ने बता दिया था कि अपने को आर्य कहने वाले वहीं मिलते हैं तो मुझे वह गठरी नजर आने लगी जो उन्हें या उनके चैनल कोरे इस काम के लिए दी गयी होगी। मैंने उनको इंटरव्यू देने से पहले पूरी स्थिति समझाई थी जिससे वे सही प्रश्न कर सकें, परन्तु उन्हें जानना कुछ नहीं था, अपना राग अलापना था, इसलिए उनका कारनामा मित्रों को खटका, मुझे रोचक लगा। यह इस बात का प्रमाण था कि अब आर्य आक्रमण की बात करने वालों को डूबते हुए सहारे के लिए तिनके तलाशने पड़ रहे हैं। किसी ने आर्य या स्‍त्री ने पति को आर्यपुत्र कह दिया तो वह आर्य हो गया और इस तर्क से ऋग्‍ेवद के सभी छन्‍दों को आर्या छन्‍द कहा जाना चाहिए। बूढ़ा होने पर आदमी आर्य – आजा/आजी – हो जाता है, जवानी में अनार्य रहता है। दक्षिण भारत के ऐयर आर्य हो गए, पंजाब के नैयर अनार्य हो गए और उनका झगड़ा केरल के नायरों से रह गया कि कौन शुद्ध अनार्य है कौन नकली, परन्तु हमारे लिए मजेदार बात यह है कि आर्यजाति या नस्ल को उभारना दूसरे सभी तीरों के बेकार हो जाने और इसका फलक टूट जाने के बाद भी इसे जब तक चल सके चलाए रखने की बेचैनी है जिसके पीछे साधन और धन है, औचित्य नहीं और उसे इसका भान भी है।

Post – 2016-05-15

जो सच है वहां नहीं है

– कल तुम्हें एक चैनेल में देखा था। तुमसे एक वाक्य से अधिक कुछ बोला ही नहीं गया, जब कि विषय तुम्हारी रुचि का था।
– यह आश्चर्य की बात है कि वह एक वाक्य तुमको सुनने को मिल गया, अन्यथा वह एक वाक्य भी हटा दिया जाना चाहिए था, क्योंकि मेरे विचार उनके कारोबार के हित में न थे। उनके कारोबार को तुम पसन्द करते हो, और तुम्हारा रुतबा देख कर लोग उनके कारोबार में अपनी सोच और समझ भी इनवेस्ट करने लगते हैं।

– सच कहता हूं, मैंने समझा नहीं।

– समझ भी नहीं सकते क्योंकि तुम्हारे लोग जहां से इनाम इकराम जुटाते है, कुर्सियां दखल करते हैं, इस बात की डुगडुगी पिटवाते रहते हैं कि उन्हें कहां कहां से क्या क्याा मिला है, उनके ज्ञान का स्तर या तो यह है कि वे जानते ही नहीं कि जहां जहां से, जो कुछ मिला है, उसके लिए उन्हे क्या देना पड़ा है – तुच्छ के लिए अपना सर्वस्व, नग्न हो जाने की शर्त मानते हुए, या जानते भी है तो मानते नहीं कि उन्होंने कुछ गलत किया है।

– तुम चकरघिन्नी की तरह नाचते क्यों हो, साफ अपनी बात कहते क्यों नहीं। नाम लो।

– साफ कहूं तो मानहानि का केस बन जाएगा। व्यंजना और वक्रोक्ति अलंकार नहीं हैं, लाचारी और जुबांबन्दी में अपनी आवाज लोगों तक पहुंचाने के तरीके हैं, यह दीगर बात है कि अलंकार हमारे हैं, हमने इनका नजाकत से प्रयोग किया, उर्दू के कवियों ने इन्हें खंजर बना दिया।

– जब तुम साफ बात करते हो तब भी बहुत कुछ ढका रह जाता है। बताओगे क्योे।

– बता तो सकता हूं पर आत्मप्रशस्ति के आरोप से विचलित भी होता हूं, डरता भले न होउुं सहमता जरूर हूं। क्या तुम उसे झेल पाओगे।

– अपनी बात तो कहो।

– तो ध्यान दो, मैं जैसा कि कहता हूं, मैं मौलिक नहीं प्रामाणिक होना चाहता हूं, वही बना भी रहा हूं।
– माना।
– 1987 में हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य का प्रकाशन हुआ। उससे पहले छोटे-बडे, परंपरावादी और उपनिवेशवादी सभी अध्येता इस बात पर, बीच बीच में उठाई गई आपत्तियों के बाद भी, सहमत हो जाया करते थे कि संस्क़ृत भाषा और उसके वाहकों का प्रवेश किसी न किसी युक्ति से यूरोप से भारत में हुआ होगा। किसी ने यह नहीं सुझाया या माना था कि हड़प्‍पा सभ्यता ही वैदिक सभ्यंता थी। इसका दावा प्रमाणों के साथ मैंने किया तो इसे दबाने की योजनाएं बनाई गईं। दुष्प्रचार किए गए, और फिर जब उसके पहले खंड का अंग्रेजी में पुनर्लेखन दि वेदिक हड्प्पन्स के रूप में अंग्रेजी में हुआ और यह विश्व बाजार में पहुंचा तो इसके खंडन के प्रयत्न विफल हो गए और उसके बाद ही यह स्वी्कार किया गया कि भारत पर कोई आक्रमण उस कालावधि में हु‍आ ही न था। परन्तु यह अधूरा स्वीकार क्यों। इस बात का स्वीकार क्यों नहीं कि हडप्पाा सभ्यता वैदिक सभ्यता थी और इसकी भाषा, संस्क़ृति और ज्ञानभंडार का प्रसार उस रीति से हुआ जिसका चित्र उस कृति में उपलब्ध‍ है। इस स्थापना को झुठलाने के प्रयत्न‍ उन लोगों द्वारा हो रहे हैं जो साधनो, सुविधाओं, प्रलोभनों और सम्मानों के बल पर बुद्धिजीवियों को खरीदते रहते हैं। अब तुम बताओ, आर्यों को एक रेस सिद्ध करने के लिए कृतसंकल्प वह संचार माध्यम क्या बता सकता है कि उसे किससे कितना कुछ किस रूप में मिला है कि वह उन विचारों को सहन नहीं कर पाता जो उस विचार का खंडन करते हैं जिसके लिए उसने कुछ पाया है। इसका रहस्य मैं बताउूंगा, पर अभी नहीं।

Post – 2016-05-14

बात होश की नहीं हवास की है

-क्या तुमने कभी सोचा कि तुम जब मध्यकालीन बर्बरता की बात करते हो, ईसाइयत को एक खतरा बताते हो, तो तुम हिन्दू सम्प्रादायवादियों के साथ हो जाते हो और अपने अब तक के किए-कराए पर पानी फेरने को तैयार हो जाते हो। बुढापे में यही बच रहा था, करने को। सुसाइड। इतनी उम्र हो गई, एक दिन तो मरना ही है, फिर इतनी जल्दीवाजी किसकी। कम से कम अपना नाम तो बचा लेते ।

– क्या तुम हिन्दी जानते हो।

वह हंसने लगा, ‘इसका क्या जवाब हो सकता है।’

– मैं जानता हूं तुम हिन्दी बोलते हो, हिन्दी पढ़ाते रहे हो, हिन्दी में जब तब लिखते भी हो , हिन्दी में मुझसे बात कर रहे हो, फिर भी भाषा का विषय तो अगाध है न। संस्कृत के इतने प्रकांड पंडित पतंजलि और वह कहते हैं कि एक शब्द को भी पूरी तरह जानना इतना बड़ा काम है कि उसी के ज्ञान से लोक परलोक दोनो सुधर जाय। फिर तुम लोग तो खुद हिन्दी पढ़ाते रहे और अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाते रहे और आश्चर्य प्रकट करने पर बताते रहे कि शिक्षा के मामले में समझौता नहीं किया जा सकता जब कि कर समझौता ही रहे थे और वह भी तलवा चाटते हुए। समझौता शब्द को जानते थे, उसके व्यावहारिक तात्पर्य को नहीं जानते थे। हो सकता है सांप्रदायिकता का भी व्यावहारिक अर्थ न जानते हो नहीं तो पता होता कि कम्युनिज्म् और कम्युनलिज्म में जुड़वा भाइयों का रिश्ता है। और यह भी शायद ही जानते हो कि यूरोपीय सन्द‍र्भ में इसका अर्थ भिन्न है और भारतीय सन्दर्भ में भिन्न । यह भिन्नता केवल कम्युनिज्म तक नहीं सीमित है, विज्ञान तक पहुंचती है। भाषाविज्ञान में भाषा का अर्थ स्पीच या बोली जाने वाली भाषा है, पर भारत में यह लिपि भेद पर आधारित हो जाती है इसलिए वही जबान नागरी में लिखी जाय तो हिन्दीत और अरबी में लिखी जाय तो उर्दू अर्थात् भाषा जबान नहीं लिपि होती है, जब लिपि नहीं थी तो लोगों के पास भाषा नहीं थी, जब से लिपि का प्रयोग आरंभ हुआ भाषा का जन्म हो गया। जायसी ने पद्मावत अरबी लिपि में लिखी तो उसकी भाषा उर्दू होनी चाहिए और उसे नागरी में छापें तो वह हिन्दी हो गई, अवधी भी हो सकती है। तुलसी के रामायण की प्रतियां अरबी लिपि में भी मिलती हैं, इसलिए उर्दू में लिखी रामायण उर्दू हो गई और नागरी में लिखी हिन्दी। इस धूर्तता के जनक जो थे वे ही सांप्रदायिकता की उस छवि के जनक थे जो भारतीय सन्दर्भ में विषाक्त‍ हो गई जब कि भारत में संप्रदाय का अपना एक परंपरागत अर्थ और इतिहास था। उससे जोड़ कर इसे देखा ही नहीं गया। तुम उसी उपनिवेशवादी समझ के उत्तराधिकारी हो और उसको किसी न किसी रूप में बनाए रखने के लिए प्रयत्नशशील हो फिर भी हिन्दी की औपनिवेशिक समझ के कारण यह न जानते हो कि हिन्दी है क्या और इसमें व्यावहारिक आशय किस तरह अपने कोशीय अर्थ से उलट जाते हैं।

लेकिन एक और कारण है ऐसा कहने का। तुम हिन्दी जानते हो तो तुम्हें यह जानना चाहिए कि 1970 से ही, जब मैंने यह व्रत लिया कि इस औपनिवेशिक और वर्चस्ववादी फरेब को उजागर करके सही समझ पैदा करते हुए मैं इनसे मुक्ति का मार्ग अकेले अपने दम पर निकालूंगा, तब से मेरा सारा लेखन उसी को समर्पित रहा है, फिर यदि वही संप्रदायवाद है तो संप्रदायवादी तो मैं पहले से हूं। यह स्वीीकार करने का साहस मुझमें है परन्तु तुममें यह साहस न होगा कि कह सको कि तुमलोग उपनिवेशवाद के भड़ुओं के रूप में काम करते रहे हो, इसके दोनों अर्थों में भड़ैती करने वालों के रूप में भी और भाड़े पर काम करने वाले अर्थ में भी।

उसने जवाब देने की मुद्रा अपनाई तो मैंने बरज दिया, – पता नहीं इस समय मुझे प्रूफ भी देखना पड़ रहा है।

Post – 2016-05-13

इतिहास का वर्तमान का पहला खंड प्रकाशित हो कर चार दिन पहले मिला और साथ ही मिला दूसरे खंड का प्रूफ! प्रूफ सुधारते समय मेरी नजर एक महत्वपूर्ण अंश पर गई जिसकी फेाटो प्रति प्रमाण के रूप में लगा रखी थी। आपने देखा भी होगा तो पढ़े बिना ही मान लिया होगा कि मेरा दावा सही है पर उसको पढ़ने की अपनी सार्थकता है इसलिए मैंने सोचा उसे टाइप करके नए ढंग से प्रस्तुत किया जाय!

ईसाइयत और यूरोकेन्द्रिता

मैने कहा, अगर तुम ईसाइयत का असली चेहरा देखना चाहते हो तो इसे पढ़ो और इसके साथ ही उसी विश्वकोश का एक पन्ना सामने कर दिया! उसने उसे अनमने भाव से पढ़ना आरंभ कियाः
Many scholars fled from Christian persecutions eastward to Iran where the Sassanid king helped them found a school of medicine and science.This was the world’s intellectual capital for two centuries. Already in 529, when Justinian closed the Athenian Schools, Hellenistic learning had dispersed to Sassanian Persia, Gupta India and Celtic Ireland.

वह बीच में ही उछल पड़ा – देखो यदि यही बात मैं कहता तो तुम कहते हमलोग भारत की महिमा को सहन नहीं कर पाते इसलिए यह देखने दिखाने का प्रयत्न करते हैं कि इसका कौन सा तत्व कहां से आया है। अब जिस ज्ञानकोश को तुम प्रामाणिक मानते हो उसमें भी यह बताया गया है कि जिस गुप्त काल को हम भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कहते हैं, उसकी प्रेरणा भी यूरोप से आई थी।

मैं खीझ गया – पहले पूरे पन्ने को पढ़ तो लिया होता।

– पढ़ूंगा। वह भी पढ़ूंगा, पर यह सच तुम्हें इतना चुभ क्यों गया, यह तो पता चले।

– चुभ इसलिए गया कि तुम्हें फिर गधा कहना होगा, जो तुम हो नहीं, पर तुम्हारी पार्टी ने तुम्हें बना रखा है। मैंने कितनी बार समझाया कि प्रामाणिक कुछ नहीं होता, जिस कथन के पक्ष में ऐसे प्रमाण होते हैं जो किसी तथ्य, प्रमाण या सिद्धान्त से खंडित नहीं होते वह प्रामाणिक होता है। जिस पर तुमने भरोसा किया वह मात्र एक कथन है जिसके समर्थन में कोई प्रमाण नहीं दिया गया है और इसमें वही मानसिकता काम कर रही है जिसमें सभ्यता का उत्स यूरोप में सिद्ध् करने का प्रयत्न किया जाता है और इसकी पड़ताल तक नहीं की गई है! मैंने एक बार कहा था न कि तुम लोग सोचना तो दूर पढ़ना और समझना तक नहीं जानते । इसीलिए कहता हूँ किसी भी चीज को जाँचते हुए पढ़ो, जिरह करते हुए समझो! आलसी आदमी ऐसा नहीं कर सकता इसलिए यदि कुछ भी छपा मिल जाय तो वह मुद्रण को ही प्रमाण मान लेता है।

– बर्दाश्त नहीं हुई बात तो व्याख्यान देने लग गए। कैसे पढ़ा जाता है जिरह करते हुए, मैं भी तो सुनूँ।

-तो सुनो! पहली बात तो यह कि हमारे पास न उस तरह का इतिहास था न राजा को उतना महत्व दिया जाता था जितना कवियों, दार्शनिको, विचारको आदि को इसलिए व्यास और वाल्मीकि और कालिदास का नाम बहुतों को मालूम था गुप्त वंश या उसके राजाओं का शायद ही किसी को ज्ञान था। राजा स्वयं भौतिक समृद्धि‍ को बहुत महत्व नहीं देता था और विद्वानों के समक्ष नम्रता दिखाता था। इसलिए हिन्दू राजाओं के सिक्कों पर उनके नाम या चित्र का अंकन न मिलेगा, न उनके नाम से स्थानों का नाम, न स्मारकों के नाम! उनकी मूर्तियाँ नहीं मिलेगी! यह मूल्य व्यवस्था का अन्तर है जिसे न अच्छा कहा जा सकता है न बुरा, भिन्न अवश्य कहा जा सकता है। इस उदासीनता के कारण कुछ हानि भी हुई । पश्चिमी ढंग के इतिहास के लिए सामग्री की खोज और उनका क्रमांकन और कालांकन का काम यूरोप के विद्वानों ने अपनी तुलना के लिए किया जिसमें उनके निहित स्वार्थ भी थे। इसलिए हमारे यहाँ किसी वंश या राजा के काल को स्वर्णयुग कहने की जरूरत नहीं थी। समय के लिए सोना चांदी हमारी सोच का हिस्सा नही रहा है! इससे तुम लोगों को असुविधा होती रही कि प्राचीन भारत में किसी असाधारण उपलब्धि के स्वीकार से कहीं पिछड़ापन न पैदा हो जाय लेकिन रोचक बात यह है कि तुम्हीं लोगों में से एक इतिहासकार को मध्य काल में स्वर्णयुग देखने की जरूरत महसूस हुई हालाँकि उसने इसे वैभव काल कहा!- एज आफ स्प्लेंडर. और रोचक बात यह कि इसमें अकबर का काल नहीं आता!

– कोई बात संक्षेप में नहीं कह सकते?

– अब रही गुप्त काल की उपलब्धियों का प्रेरणास्रोत यूरोप की देववादी संस्कृति के घ्वंस और तत्कालीन विद्वानों के पलायन को मानने की बात तो ध्यान इस बात पर दो कि दोनों की काल रेखा क्या है? यदि यह उत्पीड़न और पलायन आरंभ होने से पहले गुप्तकालीन भारत अपने वैभव पर पहुँच चुका था तो यह कथन तो काल्पनिक हुआ ही कि गुप्तकाल की उपलब्ध्यिों का प्रेरणास्रोत यूरोप रहा है।
Dark Ages, the early medieval period of western European history. Specifically, the term refers to the time (476–800) when there was no Roman (or Holy Roman) emperor in the West; or, more generally, to the period between about 500 and 1000, which was marked by frequent warfare and a virtual disappearance of urban life.
Dark Ages | European history | Britannica.com

The Gupta Empire stretched across northern, central and parts of southern India between c. 320 and 550 CE

– अब उल्टे यह माना जा सकता है कि रोम और ग्रीस की उपलब्ध्यिों के पीछे भारतीय प्रेरणा रही है। जिस चिकित्सा संस्थान केा सासानी फारस में पलायन करके आने वाले यूरांपीय वैज्ञानिकों द्वारा स्थापित बताया गया है उसका भी उल्टा पाठ बनता है। भारत चिकित्सा के क्षेत्र में तुम्हारे ‘हास्यास्पद वैदिक काल’ से ही अग्रणी रहा है और यह अग्रता कायचिकित्सा, शल्यचिकित्सा और मनोचिकित्सा तीनों क्षेत्रों में रही है। यह भारत था जिसने व्याधियों की कायिक और मानसिक प्रकृति को हजारों साल पहले समझा जब कि साइकोसोमैटिक नेचर और अंगांगीभाव की समझ यूरोप में हाल के वर्षों में पैदा हुई। व्याधि के निवारण या प्रिवेंशन को आरोग्य का मूलाधार यहाँ बहुत पहले से माना जाता रहा और यह मनोचिकित्सा में अन्तःप्रकृति की समझ और षड्विकारों या शत्रुओं की पहचान और उनके नियन्त्रण में दिखाई देता है। वैदिक काल में ही त्रिधातुओं की प्रकृति की समझ और इनके निवारण में मधु की भूमिका के हवाले मिलते हैं – त्रिधातुवारणं मधु।

अब इन पंक्तियों का अर्थ उलट गया। ईरान से भारत का पड़ोसी जैसा संबन्ध था और कई संस्थाएँ दोनों में समान थीं। भारत में नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला आदि विश्वविद्यालय बहुत पहले से स्थापित थे और ऐसे संस्थान सासानी फारस में भी रहे लगते हैं जिनमें पलायन करके आने वालों को अध्यापन और अनुसंधान का अवसर मिला हो सकता है परन्तु उनकी पहल से सासानी राजा ने महापीठ की स्थापना की यह निराधार है। शरण लेने वाले पहल नहीं करते, पहले से मौजूद संस्थाओं में कुछ नए काम कर अवश्य सकते हैं। परन्तु यदि वह ज्ञान भारतीय ज्ञान और अनुसंधान से मिलता जुलता था और अंधकार युग के समापन में इन संस्थाओं से परिचित होने वाले यूरोपीय विद्वानों की भूमिका थी तो वे अपने प्राचीन ज्ञान को जो फारस के शिक्षाकेन्द्रों में बचा रह गया था लेकर लौटे यह कृतघ्नता भी है और धूर्तता भी। यह भारत से लेकर फारस तक के ज्ञानसंगम में यूरोपीय जिज्ञासा और अवशेष का मिला जुला रूप था जिससे पश्चिमी विद्वान दुराग्रहपूर्वक मुकरते ही नहीं रहे हैं, अपितु भिखारी हो कर भी दाता का अहंकार पालते रहे हैं जब कि उनकी वर्तमान अग्रता उस नीव पर टिकी है जो पूर्वी ज्ञानसंपदा से तैयार हुई।

– अगर इस तरह प्याज के छिल्के उतारते हुए सत्य की खोज करने चलोगे तब तो कुछ हाथ ही नहीं लगेगा।

-इसी डर से तुम प्याज के सूखे और छील कर तुम्हारी तरफ फेंके गए छिल्के को अपने हिस्से की प्याज समझ कर संतोष करते रहे हो। जिन्दगी भर दूसरों को पढ़ाते रहे, सेवाविरत हो गए और आज तक यह न समझ पाए कि पढ़ा और समझा कैसे जाता है और बात बात पर कूद कर सामने आ जाते हो अपनी फजीहत कराने के लिए! अब पढ़ो उन तथ्यों को जिनको झुठलाया नहीं जा सकता और जिन्हें आज के पश्चिमी विद्वान छिपाने या झुठलाने का प्रयास करते हैं, तब तुम्हारी आँखें हो सकता है खुल जाएँ, गो तुम्हारे जैसे जिद्दी आदमी के मामले में यह जरूरी नहीं।

वह आगे का अंश पढ़ने लगाः

Church Historians have claimed, nothing of real value was lost in the destruction of pagan culture. The havoc that afflicted art, science, literature, philosophy, engineering, architecture and all other fields of achievement has been likened to the havoc of the Gigantomachia – as if the crude giants overthrew the intelligent gods. The widespread literacy of the classical period disappeared. Aqueducts, harbors, buildings, even the Roman roads fell into ruin. It has been pointed out that centuries of devastating war could hardly have shattered Roman civilization as effectively as did the new obsession with an ascetic monotheism.
Books and artworks were destroyed because they expressed un-Christian ideas and images. The study of medicine was forbidden on the ground that the diseases were caused by demons and could be cured only by exorcism. The theory was still extant in the time of Pope Alexander III, who forbade monks to study any technique of healing other than verbal charms. Under the Christian emperors, educated citizens were persecuted by the illiterate who claimed their books were witchcraft texts. Often ‘magical’ writings were planted by Christian magistrates for the sake of the financial rewards they received when they caught and executed heretics – a system the Inquisitions also used to advantage in later centuries. Priestesses were especially persecuted, because they were female, wealthy, and laid claim to spiritual authority.

अन्त तक आते आते वह माथा पकड़ कर बैठ गया! तो यह है ईसाइयत का असली तन्त्र जो मेमने की खाल ओढ़ कर भेडि़ये की तरह आचरण करता है?

Post – 2016-05-12

लौट के बुद्धू घर को आए

– कल तो तुमने मुझे बहुत इज्जत बख्शी यार! सीधे तुम से आप कहने लग गए।

– गाली देने का मेरा यही तरीका है, जब बात असह्य हो जाय तो अगले को इज्जत देने लगता हूं, लखनवी जबान की ताजपोशी का मतलब जानते हो न ?

दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया तो इधर उधर टहल रहे लोग चौंक कर देखने लगे कि माजरा क्या है! उनमें से अधिकतर ने हमें झगड़ते तो देखा था, परन्तु एक साथ ठहाका भरते नहीं देखा था!
हँसी थमी तो उसने कहा- देखो पहले तो मैं ही तुम्हारे ऊपर आरोप लगाता था कि तुम बहकी बहकी बातें करते हो, अब तुम्हारे मित्र भी शिकायत करने लगे हैं कि तुम्हारी बातों में बिखराव बहुत है । अभी तो शुरुआत है!

– यदि वह बिखराव था तो आज तुमको महा बिखराव का सामना करना पड़ेगा।

उसने हैरानी जताने की मुद्रा अपनाई।

– दो तीन साल पहले यमन में एक लड़के ने अपने पिता को इसलिए गोली मार दी थी कि उसने उससे कोई खिलौना ले कर आने को कहा था! शाम को जब लौटा और लड़के ने पूछा कि खिलौना कहाँ है और उसने खेद जताते हुए कहा वह भूल गया था! लड़के को इस पर क्रोध आया और उसने उसे गोली मार दी!

– हो सकता है उसने असावधानी में रखी पिता की पिस्तौल उठा ली हो और उसे खिलौने की पिस्तौल समझ कर दाग बैठा हो! ! ये समाचार का बाजार चलाने वाले आजकल बहुत हेराफेरी करते हैं।

– हो सकता है। तुमने सुना़ चीन ने अपने उस कानून को बदल दिया है जिसमें माता-पिता एक ही सन्तान पैदा कर सकते थे! सुनते हैं बच्चे हिंसक होने लगे थे । चाहे वह मेरे मित्र का पुत्र हो या यमन का वह बालक, या चीन के एकल बच्चे, इन सबके साथ और हमारे एकल परिवारों के बच्चों के साथ जो सर्वनिश्ठ घटक है वह यह कि उनको अपने पिता माता का स्नेह बहुत अधिक मिलने लगा है और इनकी प्रत्येक इच्छा को पूरा करने की कोशिश की जाती है! ये नहीं शब्द सुनने के आदी नहीं हैं। जहां माता पिता की एक ही सन्तान हो, दूसरी हो ही नहीं, वहाँ तो पिता माता घोर कष्ट उठा कर भी, अपने को कुछ सुविधाओं से वंचित करते हुए भी उनकी बेतुकी माँगों को भी पूरी करने को तैयार रहते हैं। इससे पैदा होता है वह दिमाग जो केवल अधिकार जानता है, कर्तव्य नहीं! जिसकी माँगों का कोई अन्त नहीं, क्योंकि वे निरन्तर बढ़ती जानी हैं और उस सीमा तक पहुँच सकती हैं जिस पर उनकी पूर्ति संभव ही नहीं है। अब यदि उन बालकों को या ऐसी पीढि़यों को तुम दोशी ठहराते हो तो तुम्हारी गलती है। तुमने उनको सही शिक्षा दी ही नहीं, उनको उचित अनुचित का बोध कराया ही नहीं। तुमने उन्हें स्वयं बिगाड़ा और बिगड़ने पर उन्हें दोश दे रहे हो जब िक वे उससे भिन्न कुछ कर ही नहीं सकते।

– तुम्हारा मतलब है कि हमने स्वयं उनको ऐसा बनाया या बनने दिया इसलिए अब भी उनकी उल्टी सीधी मांगों को जिन्हें वे अपना अधिकार समझते हैं, पूरा करते रहना चाहिए।

– ऐसा मैं नहीं कहता, तुम लोग कहते हो। लेकिन इसका दृष्टान्त दूँ इससे पहले यह याद दिला दूं कि आज की परिस्थितियों में इसका विस्तार हुआ है परन्तु ऐसी परिस्थितियों में सदा से ऐसा ही होता आया है। तुमने कभी चाणक्य के अर्थशास्त्र पर नजर डाली है।

– जब मेरी सीमाएँ जानते हो तो ऐसे सवाल क्यों करते हो यार!

– चाणक्य परंपरालब्ध मान्यता का उल्लेख करते हैं जिसमें राजपुत्रों को केंकड़े के समान पितृभक्षी या पिता के लिए खतरे का कारण माना जाता रहा है, ‘कर्कटसधर्माणो जनकभक्षाः राजपुत्राः । अर्थात् वयस्क होने पर जल्द से जल्द राज्यसुख और सत्ता पाने के लिए राजपुत्र अपने ही पिता की हत्या कर सकते हैं, इसलिए उनकी शिक्षा, दीक्षा और पालन पोशण में राजा को इसका घ्यान रखना चाहिए कि उनमें ऐसी प्रवृत्ति पैदा न होने पाए।
एक अन्य स्थल पर चाणक्य कहते हैं कि जिन बच्चों को सुख और लाड़ अधिक नहीं मिला होता है वे अपने पिता से द्रोह नहीं करते, उनका सम्मान करते हैं, ‘सुखोपरुद्धा हि पुत्राः पितरं नाभिद्रुह्यन्ति इति। अतः सुख सम्पन्नता में पले बच्चे उस संपदा को हासिल करने के लिए अपने पिता के शत्रु बन जाते हैं। इस दृश्टि से उनका सुझाव है कि राजा को अपने पुत्रों को ऐसे कष्टसाध्य कामों में नियुक्त रखना चाहिए जिससे वे आज्ञाकारी बने रहें ‘राजपुत्रः कृच्छ़रवृत्तिरसदृशे कर्मणि नियुक्तः पितरमनुवर्तेत !

– कितने हजार साल पुराना कूड़ा भरा है तुम्हारे दिमाग में लिससे तुम आज की समस्याओं का समाधान करना चाहते हो।

– अशोध्य मूर्ख हो तुम। यह समझ ही नहीं सकते कि मनुष्य किन प्रलोभनों, किन परिस्थितियों, किन उकसावों में क्या कर सकता है इसकी वैज्ञानिक व्याख्या है यह जिसका वह अंश जो हमें मानव स्वभाव और इतिहास को समझने में मदद करता है, उसका सम्मान किया जाना चाहिए। जहां उसके सुझाव किन्ही कारणों से ज्याज्य लगें उनको त्याग दिया जाना चाहिए! परंपरा बोध है, बिसाता नहीं कि लाद कर फेरी लगाने चल पड़े। इस बोध को अर्जित करने के बाद तुम बिंबिसार और अजातशत्रु के व्यवहार को भी समझ सकते हो और मध्यकालीन इतिहास में पिता, चाचा, ससुर किसी के वध या उसके विरुद्ध भड़कने वाले विद्रोह को भी, भाइयों की हत्याओं को भी और आज के अतिरिक्त स्नेह से बिगड़े या मांग पूरी होती जाने के साथ उसमें शराबियों की तरह और और करते लुढ़कने तक माँगते और पीते चले जाने को भी और उस गिरावट को भी समझ सकते हो कि क्यों जिन केन्द्रशासित विश्वविद्यालयों में सर्वाधिक सुविधाएँ पहले से दी गई हैं वहीं ऐसी आजादी की माँग क्यों बढ़ती जा रही है जिसको खुल कर बताया तक नहीं जा सकता। और इसी से तुम अपना चेहरा पहचान सकोगे कि तुम किस सीमा तक नीचे जा कर ऐसी आजादी की माँग की आड़ में सत्ता का खेल खेल सकते हो।

– तुमने यह तो बताया नहीं कि चाणक्य अपने पहले के सत्ता के लिए हुए द्वन्द्वों का उदाहरण देते हैं वह उसके बाद देखने में क्यों नहीं आता और इसकी वापसी मध्यकाल में ही क्यों होती है?

– यहीं तो बुद्धिजीवी की भूमिका, सही शिक्षा प्रणाली और सही नीति की भूमिका, मानव चेतना को सही दिशा देने से शिक्षा की भूमिका का प्रश्न उठता है! जब इसका लोप होता है, इसमें स्खलन आता है तो अराजक प्रवृत्तियाँ जोर मारती हैं, जब इनको सुनिश्चित करने वाली संस्थाएँ अपना काम करती हैं तो समाज की कारक शक्तियाँ सही दिशा ले पाती हैं।

– शिक्षा से तुम्हारा मतलब केवल अमीरों और राजकुलों से जुड़े लोगों की शिक्षा से है या ब्राह्मणों की शिक्षा से? दूसरे लोगों को शिक्षा का अधिकार था ही नहीं!

– भारतीय शिक्षा प्रणाली में अक्षरज्ञान की शिक्षा से अलग साहित्य के माध्यम से लोक शिक्षण की ओर भी ध्यान दिया गया था। साहित्यिक कृतियों, इतिहास, पुराण आदि के श्रवण को पुण्यलाभ से जोड़ कर इन्हें बार बार सुनने और जीवन में उतारने का आयोजन था। मैं जब शिक्षा की बात कर रहा था तो मेरा ध्यान इस व्यापक शिक्षा पर ही था और इसके माध्यम से ही समाज में सन्देश जाता था कि हमें रामवत आचरण करना चाहिए, रावणवत नहीं!

– यहीं से मूल्यव्यवस्था में धार्मिकता का प्रवेश होता है और हम हिन्दू आदर्ष और मुस्लिम आदर्ष में मानवीय मूल्यों को बाँट कर एक दूसरे पर सन्दह करने लगते हैं और एक दूसरे को समझने से जानबूझ कर इन्कार करने लगते हैं।

– तुम ठीक कहते हो, पर असली प्रश्न जिससे हमने अपनी बात आरंभ की थी वह यह कि हम सोचते विचारते समय भी पूरे होश हवास से काम नहीं लेते। यदि लें तो बहुत सी गुत्थियां स्वतः समाप्त हो जायँ और इसका सीधा तरीका है हम अपने विचारों को भावनाओं से कुहाच्छन्न न होने दें जिससे समस्या के चरित्र को समझ सकें और उसका कोई समाधान भी खोज सकें!

Post – 2016-05-11

बड़ी खबर के छोटे पहलू

उसका कल का फिकरा मेरी जहन मे कांटे की तरह चुभा हुआ था, इसलिए जब सामना हुआ तो उस पर बरस पड़ा – जहालत का भूगोल नहीं होता, उसका दौर होता है. समझदार से समझदार आदमी कई बार जाहिलों जैसी बात करता है! जब वह अपनी समझ से चतुराई कर रहा होता है और किसी सवाल का सामना न कर पाने की स्थिति में दूसरे को ही जाहिल सिद्ध करना आरंभ कर देता है तो वह जाहिलों की उस टोली में पहुंच जाता है जिसके तन पर लंगोट तक नहीं रह जाती! मैं अहंकार वश किसी भी सिरे से बहस करने का निमन्त्रण नहीं दे रहा था, बल्कि यह कह रहा था कि जब तुम व्यक्ति को दोशी मानते हो, उन परिस्थितियों पर ध्यान नहीं देते जिनमें वही आदमी कमीनेपन से लेकर बुलन्दी के सिरों के बीच विचित्र व्यवहार करता है तो तुम मार्क्सवादी या भौतिकवादी रह ही नहीं जाते। जब तुम यह नहीं देखते कि अर्थशास्त्र हमारे जीवन, कार्य, व्यवहार और नैतिकता में कितनी निर्णायक भूमिका निभाता है तो तुम मार्क्सवादी के रूप में विचार नहीं कर रहे होते हो! यह समझ तुममें है पर राजनीतिक टुच्चेपन के कारण तुम इसे दरकिनार ही नहीं कर देते, किसी के याद दिलाने पर भी ध्यान नहीं देना चाहते! नैतिकता भी निरपेक्ष नहीं होती!

-यह तुम किसे उपदेश दे रहे हो, यह भी पता है! मार्क्सवाद का ककहरा यहीं से शुरू होता है, यह भी नहीं जानते!

– जानता हूं! यह भी जानता हूं कि जिन मार्क्सवादियों से तुम्हारी यारी है वे ककहरा सीखने के बाद अपना ककहरा ही भूल जाते हैं! वह उन्हें पिछड़ापन प्रतीत होता है! अपनी जमीन पर और अपने पांवों पर भरोसा करना तक यथास्थितिवाद लगता है और इसलिए जमीन से परिचित होने के लिए उन्हें धूल तक विदेषों से मंगानी पड़ती है! पहले इसका आयात रूस से होता था, अब अमेरिका से होने लगा है! पर मैं तुम्हें यह बताना चाहता था कि मैं अपने मित्र को जानता हूं, उसके पुत्र को बचपन में कभी देखा था पर उसकी शक्ल तक याद नहीं! यह अवश्य देखा था कि उसकी बहनों को इतनी प्रतीक्षा के बाद एक भाई मिला था और वे उस पर जान निछावर करती रहती थीं। माता पिता तो दूसरी पुत्री के बाद से ही पुत्रेष्टि पर जुटे हुए थे] इसलिए उनके लाड़ के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं!

-तुम्हारे मित्र के साथ क्या बीती यह तुम्हारी चिन्ता का विषय भले हो, आजकल जो कुछ देखने में आ रहा है उसमें क्या कुछ संभव नहीं है! जानते हो मेरे पड़ोस में एक किरायेदार रहता था! पिता पुत्र और पुत्रबधू। बाप शायद दर्जी का काम करता था! दुबला पतला बहुत निरीह सा बूढ़ा ! बहू का बहुत खयाल रखता था! लड़का भी देखने में उसी का पुत्र और उसी के कदकाठी और स्वभाव का लगता था! उसका कोई मकान रहा होगा जिसे बेच कर उसने हमारी कालोनी में मकान लेने का प्रबन्ध किया होगा! लड़के की नजर उस बिके हुए मकान के पैसे पर थी! मेरे मकान से सटा प्लाट खाली था और उससे अगला मकान उसका! मार्क्सवादी अपने को भले कहूं पर शिक्षा, संस्कार और समाज से जुड़े स्तरभेद चेतना में तो रहते ही है, इसलिए कभी उससे राम-राम भी नहीं हुआ, लाल सलाम क्या होता! एक दिन देखा उसके घर पर बर्फ की सिल्लियां आ रहीं हैं! मैंने सोचा कोई ऐसा व्यापार कर रहा होगा जिसमें इसकी जरूरत पड़ती है! तीन चार दिनों तक बर्फ की सिल्लियों का आना जारी रहा फिर एक दिन जब हम छत पर सो रहे थे तो इतनी सड़ाध कि हमारी नींद टूट गई ! उठ कर इधर उधर देखने का प्रयत्न किया और जब कुछ न मिला तो लौट कर सो गए! तीन दिन बाद पुलिस उस लड़के को तलाशती घूम रही थी और तब पता चला कि लड़के ने अपने बाप की, गला दबा कर, हत्या कर दी थी और जब वह पकड़ा गया तो पता चला कि उसने किसी कहासुनी में उसके टेंटुए पर हाथ लगा दिया था और टेंटुआ कुछ अधिक दब गया था. इसलिए उसने घबराहट में उसे घर में ही छिपा रखा था और सही अवसर की तलाश में गर्मी के दिनों में लाश को सड़ने से बचाने के लिए बर्फ की सिल्लियां मंगाई जा रही थीं और जब घर के भीतर भी असह्य हो गया तो आधीरात को उन्होंने लाश को बाहर निकाला और उसकी दुर्गन्ध ने हमें बेचैन कर दिया था! तुम्हारा ज्ञान और अनुभव दोनों कम है इसलिए तुम जिसे जानते हो उसे दुहराते रहते हो! यह भी नहीं समझते कि ऐसी घटनाएं इतने बड़े पैमाने पर घटने लगी हैं कि उनकी नवीनता भी बासी लगती है और उस पर कोई ध्यान नहीं देता!

– यही तो समस्या है! तुम नवीनता और सनसनी को पसन्द करते हो, समस्याओं का ढिढोरा पीटते हो, उनसे टकराने का साहस नहीं, महत्व राजनीतिक शगल को देते हो समस्या को नहीं! यदि यह इतने बड़े पैमाने पर घटित होने लगा कि इसकी सनसनी तक खत्म हो गई है तो समझो यह समस्या बन चुकी है! सनसनी का खात्मा समस्या की उग्रता और व्याधि बन जाने का प्रमाण है! और खबर बना और बेच कर मालामाल होने वाले जहां से ऐसी खबरों की उपेक्षा करना आरंभ करते हैं, वहां से सरकारों का काम आरंभ होता है! तुम समझ रहे हो मैं क्या कह रहा हूं! अगर मैं जौक की इबारत को कुछ बदल कर पेश करूं तो ‘मजा कहने का जब है एक कहे और दूसरा समझे, जो तुम कहते हो उसको तुम न समझो ना खुदा समझे!

– मैं पहले से जानता था, न तुम समझोगे, न तुम्हारे भीतर समझने की ताकत बची है! तुम्हें जो समझ में नहीं आ रहा है उसका कारण भी मुझे ही समझना होगा! देखो, तुम दौर का अर्थ ले रहे हो समय का बीतना और उसके बाद दूसरी कालावधि का आना! यह सही था या गलत, परन्तु हमारे यहां रैखिक काल या समय के बाण की जगह कालचक्र या युगचक्र की अवधारणा रही है जिसमें काल के आगे बढ़ने के बाद भी कोई समाज नीचे जा सकता है और उसे अपने को समझने और आगे बढ़ने के लिए नए जीवट का सहारा लेना होगा जो चरम निम्नता पर लगभग चुक सी जाती है इसलिए अपने उन्नत अतीत पर गर्व करने वाली सभ्यताएं आत्मसम्मोहित होने के कारण अपने को, अपने भविष्य को, जान ही नहीं—

– वर्तमान को जानना क्या अधिक जरूरी नहीं है कि उसे पूरी तरह समझे बिना भविष्य के नियतिवाद में या अतीत के यातनावाद में से किसी एक का चुनाव करने को बाध्य हों! आप को यह जानना चाहिए कि आप किस दुनिया में रहते हैं और यह भी कि उससे बाहर निकलने का रास्ता आपको मालूम है या मेरी मदद की जरूरत होगी!

Post – 2016-05-08

8-5-16
– तुमने उस ‘बड़ी खबर’ को देखा था जिसमें छोटा भाई सत्तर साल के बड़े भाई को पीट रहा था और बाद में उसका लड़का आया तो उसने भी एक लात लगाया। बताया जा रहा था कि यह चित्र वायरल हो गया है, गरज कि इसका मजा वायरस की तरह चारों ओर फैलता जा रहा है और लोग खुशी खुशी इसकी चपेट में आते जा रहे हैं।
– बड़ी खबरें तुम्हें ही मुबारक। मैं तो उन छोटी खबरों की तलाश में रहता हूं जो सूचना और विचार के नाम पर, खोजी पत्रकारिता के नाम पर चल रहे मनोरंजन के फूहड़ उद्योग के सुनामी में लुप्त होती जा रही हैं और हम पत्रकारिता की उस आदिम अवस्था की ओर लौट चलें हैं जिसमें समय काटने के लिए कहीं बैठे बूढ़े गली मुहल्ले के लोग, प्रतिष्ठित परिवारों के अंतरंग किस्सों और अफवाहों का बाजार गर्म रखते थे और फिर किसी को सूझा कि इसे जुटा कर, छाप कर एक धन्धा क्यों न बना लिया जाय. उस आदिम जिज्ञासा से आगे बढ़ते हुए यह उस महिमा तक पहुंचा था, जिसमें यह लोकतंत्र का चौथा पाया बन गया था. बड़ी खबरें जो अपराध की दुनिया का पड़ताल करके कहानियां गढ़ती हैं, जो अंडरवर्ल्ड को सबसे महत्वपूर्ण वर्ल्ड बनाने का काम कर रही है और धनकुबेर बनने की होड़ में अंडरवर्ल्ड के नुस्खोंं पर काम कर रही हैं, उन छोटी खबरों को हजम कर गई हैं जो सभ्य समाज की चिन्ताओं और सरोकारों का संसार से जुड़ी थीं । मुझे यह जान कर पीड़ा हुई कि मेरा दोस्त ‘बड़ी’ खबरों की तलाश में रहता है।
– तुम यह क्यों भूल जाते हो कि इन ‘बड़ी’ खबरों को लोकप्रिय बनाने में तुम लोगों की भूमिका सबसे अधिक है और वह भी इसलिए कि ‘छोटी’ खबरों को जिनमें आम जनों की समस्याओं और विचारों का पता चलता है, तुम स्वयं देखना नहीं चाहते. उनका सामना नहीं करना चाहते. जो उनसे रू-ब-रू होना चाहते हैं, संतुलन की अपेक्षा करते हैं उनका उपहास करते हो. कारण यह कि तुम यथास्थितिवादी बन गए हो और उस दुनिया में कोई फेर बदल करने का न तो तुम्हारे पास कोई कार्यक्रम है, न इरादा, न उसकी तुम्हें जरूरत है। तुम लोग स्वयं अंडरवर्ल्डत के हथकंडे अपना कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए अपराधों और भटकावों का नया दर्शन गढ़ रहे जो जो तुमसे पैदा हो कर मीडिया तक खत्म हो जाता है, जो बड़ी खबरों का सबसे मजबूत पाया बन चुकी है और इसके कारण ही वह पाया जो कभी सत्ता को उन सूचनाओं और विचारों और भावी योजनाओं और उनकी कमियों को प्रकाश में लाते हुए, सच कहो तो एक जरूरी और अधिक लोकतांत्रिक तीसरे सदन की भूमिका निभाता था, आज वह इन बड़ी खबरों, उत्तेजक विचारों, खबरों को जुए के पासों की तरह घुमा कर फेंकने के कारनामों के कारण उस क्षरण पर, इतनी जल्दी, पहुंच गया कि लगता है, यह पाया हो कर भी है नहीं। यह अपना औचित्य खो चुका है, भुरभुरा हो चुका है और इसमें तुम्हारी सक्रिय भूमिका रही है। तुम तेवर शहीदों का अपनाते हो और हाथ कमीनों से मिलाते हो और रोब उन पर गांठते हो जो इस नाटकीयता को सभ्य जीवन के लिए जरूरी नहीं मानते, गो गलतियां वे भी करते हैं। यह समाचार तो तुम्हारे लिए खास था, क्योंकि इसके वायरल होने के पीछे जो सबसे बड़ा कारण था वह यह कि अपने ही बड़े और बुजुर्ग भाई को पीटने वाला यह व्यक्ति भाजपा का नेता है। कम से कम भाजपा में उसकी गहरी पैठ है। यह वह दल है जो पारिवारिक और पारम्परिक नैतिक मूल्यों की दुहाई देता रहता है। यह बताता फिरता है कि हमारे पारंपरिक मूल्यों के ह्रास के कारण ही वर्तमान समाज की विकृतियां पैदा हुई हैं। तुमको ऐसी खबरों की कितनी तलाश रहती है और मैं तुम्हारी कितनी चिन्ता करता हूं यह तो इस बात से ही प्रकट है कि मैं चाहता था कि तुम इसे देखो, और हो सके तो भाजपा के खिलाफ इसका इस्तेमाल भी करो।

– मैं तो ऐसा कर लूंगा, पर तुम क्याा करोगे। उनके वकील बन कर उनके विरोध में काम कर रहे हो, पेशे की नैतिकता को भी भूल गए।

– मैं बताउूंगा कि देखो, ये इतने गिरे हुए लोग हैं कि खुद ही जिस प्रवृत्ति और पर्यावरण के जनक हैं उसका उत्तरदायित्व तक नहीं ले सकते, परन्तु यदि कोई दूसरा सुझा दे तो उसको लुटेरों की तरह अपनी झोली में भर कर बांटते हुए अपने कुकर्म को छिपाएंगे। अरे भई, मैंने कल की उस समस्या को केन्द्र में लाने के लिए इसे दृष्टांत के रूप में पेश किया था और तुमको इस बहाने भी अपनी राजनीति की याद आ गई। उूंचे तेवर और घटिया गंठजोड! दुर्भाग्य तुम्हारा यह कि पब्लिक है सब जानती है के सूत्र के आगे तुम्हारी कलई खुल जाती है। समझ लो, मैं फीस लेने वाले वकीलों में नहीं हूं जो जजों को घूस देने की योग्याता रखते हैं और अपने पेशे की नैतिकता को नीलाम करते हुए इतने धनी और ताकतवर और अदालतों से अपने रसूख के कारण इतने अपराजेय हो जाते हैं कि उनके झूठ को झूठ, उनके कमीनेपन को कमीनापन कहना परिभाषाओं के जंगल में खो जाता है।

– इस घटना का उस मनोवृत्ति से क्या संबंध जिसका विस्तार हो रहा है और जिसको लेकर मैं चिन्तित था। क्या तुमको नहीं लगता कि यह उपभोक्तावाद का, जो पूंजीवाद का घृणित औजार है, परिणाम है।

– तुम गलत कभी होते नहीं, सिर्फ अधूरे रह जाते हो। समग्र को जानना और देखना तो तत्वादर्शी के लिए भी असंभव है, परन्तु संभव पहलुओं को जानना, उनका ध्यान रखना और इसके बाद किसी निर्णय पर पहुंचना हमारे लिए अधिक जरूरी है। कल की समस्यां को यदि तुम चाहो तो इस सिरे से भी समझने का प्रयत्न कर सकते हैं, और उस सिरे से भी जहां मैंने कहा था कि अपनी त्रासदी के लिए मेरे मित्र भी जिम्मेदार थे, परन्तु यदि वह चाहते भी तो होना वही था जो हुआ जो कि नियतिवाद का रूप ले लेता है। तुम बताओ तुम उस समस्या को समझना चाहते हो या राजनीति करना चाहते हो। यदि चाहते हो तो भाई को पीटने वाले भाजपाई के सिरे से समझना चाहते हो या अपनी ही लाड़ली संतान के द्वारा अपने ही घर से निकाले गए पिता के सिरे से, या साम्यावाद की विफलता और पूंजीवादी उपभोक्ताावादी नैतिकता के सिरे से। मैं सभी के लिए तैयार हूं, पर इस शर्त के साथ‍ कि तुम उसकी पूरी पड़ताल करने के बाद अपना फैसला करो।
– मजा आ गया, यार। मैंने अपने गांव जवार के पहलवानों को लंगोटा पहने, अपना जांघिया फहराते, पूरे उपस्थित दर्शक समुदाय को प्रतीकात्मक रूप में ललकारते कि है कोई माई का लाल जो मेरा मुकाबला कर सके, देखा तो था, पर इसे जहालत से जोड़ता था। आज देखा कि जाहिलों के बीच भी बौद्धिक स्तरभेद है और तुम पढ़े लिखे जाहिलों के शिरमौर दिखाई देते हो। (आगे जारी)

Post – 2016-05-07

ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः (edited)

– तुमने मुझे कल सचमुच डरा दिया! हम किस तरह का संसार रच रहे हैं! क्या होगा इस समाज का!
– डरने के लिए किसी चीज का होना जरूरी नहीं, लोग भूत-प्रेत से डरते रहते हैं, वे वहम पाल लेते हैं और अपने उन खयालों से डरते हैं जिनका उनसे बाहर कहीं कोई आधार नहीं होता ! ऐेसे विचार और विश्वास दूसरों के द्वारा भी भरे जा सकते है, परंपरा, संस्कार और व्यवहार में रीति-रिवाज में अज्ञात युगों और हमारे ही समाज में मिल कर अदृश्य हो जाने वाले समुदायों के अवशेष हो सकते हैं जिनको हमने सांस्कृतिक दाय के रूप में ग्रहण कर रखा हो! हमारी शिक्षा प्रणाली को विकृत करके उसे जुगुप्सु या डरावना बनाया जा सकता है।

– बात भूत-प्रेत की नहीं है, न वहम की है। यह तो हमारी आज की वास्तविकता का हिस्सा है! आज से छह सात दशक पहले संयुक्त परिवार के टूटने, एकल परिवारों के अस्तित्व में आने की आशंका जताई गई थी! कहा गया कि यह शहरीकरण के विस्तार के कारण हो रहा है! अब देखो तो इस एकल परिवार में भी भावनात्मक लोप आरंभ हो गया है। तुमने जो कहानी सुनाई उससे लगा कि उपभोक्तावाद हमें मनुष्यों से भोगलिप्सु पशुओं में बदलता जा रहा है। इसकी ओर तो मेरा ध्यान इस रूप् में गया ही न था। इसने तो मेरी आंखें खोल दीं!

– सचाई को देख कर घबराहट में लोग आंखें बन्द कर लेते हैं! पूरा देखने या जानने का साहस नहीं जुटा पाते और इसलिए उस खास नुक्ते को नहीं समझ पाते जिसके कारण वह विकृति पैदा हुई है। मुहावरा है अनाड़ी कारीगर औजार को कोसता है!

– उसे बुरा लगा! लगना भी चाहिए था! और ऐसे लोगों को खास बुरा लगेगा जो एक खराबी देख कर किसी प्रजाति, जाति, समाज या देश को गर्हित सिद्ध करने लगते हैं और मजे की बात यह कि उसी गर्हित समाज के मूल्यों की दुहाई देते हुए उसे कोसते हैं! वे अपने ही समाज के दूसरे लोगों को गर्हित सिद्ध करके अपने को साफ-पाक सिद्ध करना चाहते हैं। हिन्दू समाज की छोटी से छोटी विकृति को बिभ्राट रूप दे कर हिन्दू समाज को सबसे गर्हित समाज बताने वाले, उसके हिन्दू काल को…

वह कूद कर सामने आ गया, ‘तुम हिन्दूकाल, मुस्लिमकाल, ईसाईकाल में बांट कर इतिहास को समझने चलोगे तो इतिहास को क्या खाक समझोगे। हमें तुम लोगों से इसीलिए चिढ़ है कि तुम्हारी सोच ही सड़ी हुई है!

– तुमने पहली बार एक सही बात कही है कि इस तरह का बंटवारा सड़े दिमाग वालों का ही हो सकता है। इस तरह के बंटवारे से इतिहास को ही नहीं वर्तमान को भी नहीं समझा जा सकता। और यह काम तुम लोगों ने किया है और तुम ही कर सकते थे। तुम्हारे लिए ही मिल भारतीय इतिहास का जनक भी है और सबसे बड़ा इतिहासकार भी। और जानते हो क्यों, क्योंकि उसने इतिहास को हिन्दू, मुस्लिम और ब्रिटिश कालों में ही नहीं बांटा था, यह भी सिद्ध किया था कि यूरोप और इसलिए वहां की जातियां गोरी होने के प्रताप से सदा से दूसरो से श्रेष्ठ रही हैं और सभ्यता का जन्म उनके द्वारा ही हुआ और उसी का प्रसार एशिया की ओर हुआ इसलिए जो उनके निकट थे, जैसे कि अरब वे उनसे घट कर तो थे, पर अपने से पूरब वालों से अधिक सभ्य थे। उसी तर्क से मुसलमान हिन्दुओं से अधिक सभ्य थे और मुस्लिम काल हिन्दूकाल से अधिक उन्नत था! अब देखो तो यह तुम्हारे विकासवादी सिद्धान्त से भी सही ठहराया जा सकता है! विकास में अगली अवस्थाएं अपनी पिछली अवस्थाओं से उन्नत होती ही हैं। ‘हिन्दूकाल’ बहुत प्राचीन है इसमें सन्देह नहीं, इसलिए उसे मुस्लिम काल से पिछड़ा होना ही था जो हिन्दू काल के लगभग अवसान के साथ जन्म लेता है और यूरोप उसमें भी ब्रिटेन, उसमें भी इंग्लैंड और इसलिए अंग्रेज तो सबसे उन्नत हुए ही। हिन्दू और मुस्लिम काल के रूप में इतिहास के बटवारे पर सबसे पहले आपत्ति मजूमदार और मुंशी के तत्वावधान में प्रकाशित इतिहास में की गई थे जिनको तुमने संप्रदायवादी और राष्ट्रमवादी कह कर खारिज ही नहीं कर दिया और इसकी मखौल भी उड़ाने से बाज न आए। मिल को महान इतिहासकार मानने वाले कोसंबी का भारतीय इतिहास में यह भी एक योगदान है कि प्राचीनकाल को उन्हों ने हिन्दू काल और ब्राह्मण काल के रूप में देखने और दिखाने का कुटिल प्रयास किया! तुमसे एक बार कहा था न कि नाम का अर्थ व्यवहार और गुण से तय होता है उसके लिए प्रयुक्त अक्षरों से नहीं और यदि तुम्हारी सोच वही है तो उस शब्द के लिए कोई दूसरा उपनाम लगा कर वही व्याख्या जारी रख सकते हो। अब इस सिरे से देखो और बताओ सड़ी सोच और सड़ा दिमाग किसका है और साक्ष्यों के आधार पर जिनको तुम विकृतचित्त मानते हो उन्हें तुम्हें कुत्सितचित्त मानने का अधिकार है या नहीं!

– तुम कहां की बात कहां खीच ले गए।

– हम विषय पर ही हैं। मनुष्य के व्यववहार में आए अन्तर को झपटमारों की तरह नहीं समझा जा सकता कि किसी एक व्याक्ति के व्यंवहार में कोई विकृति या भटकाव दिखाई दिया कि पूरी पीढ़ी, पूरे दौर, एक पूरी व्यवस्था से विरक्त हो उठे। मैं तुम्हें कल बताउूंगा कि यदि मेरे मित्र को एक त्रासदी से गुजरना पड़ा तो उसके लिए मेरे मित्र भी कुछ हद तक जिम्मेदार थे और हम सभी अपनी पूरी समझदारी का, हर समय, प्रत्येेक निर्णय करते समय, लाभ उठाना चाहें तो उठा नहीं सकते। सोचते रह जाएंगे। कुछ करने का अवसर ही न आएगा।