Post – 2016-06-26

मैं अपनी तुकबन्दियां प्रकाशित कई कारणों से नहीं कराता, जिनमें एक है यह सचाई कि मैं इनको संवारने माजने का समय नहीं दे पाता। उन्‍हीं का दबाव होता है तो टांक लेता हूं कहीं भी और कई बार खो भी देता हूं। जानता हूं इससे उनमें कुछ खोट रह जाती है पर अब सोचता हूं इन्‍हें इस्‍लाह के लिए पोस्‍ट कर देने में कोई हरज नहीं है। हो सकता है कुछ लोग इनमें कुछ सुधार सुझा सकें और वे ठीक ठाक लगें इसलिए अभी अभी जो टांका वह यह रहा:

मुझे बर्वादियों का डर नहीं है,
उन्हीं ने मुझको जो कुछ हूं बनाया।
भटकने के कई मौके दिये पर
सही रस्ता उन्होंने ही दिखाया।
उन्होंने ही तो संभाला तब जतन से
न जब अपना ही अपने काम आया
उन्हीं के चैत्य पर तन कर खड़ा हूं
गिराया गर तो उूपर भी उठाया।
उन्हीं से दोस्ती का है नजीता
सभी सहमे थे मैं कुछ बोल पाया।
२६/०६/१६ ९:२०:२९

Post – 2016-06-25

मैंने आज ऐसी पोस्‍ट पहली बार सार्वजनिक की जिसको पढ़ना उसकी लंबाई के कारण एक सजा जैसा था और उूपर से उसकी कुछ बातें कुछ मित्रों के लिए हृदयविदारक थीं। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए मेरी पहली गजल जो 1963 में मसूरी में, एक ही रात में, लिखी पांच गजलों में से अन्तिम थी और जो पता नहीं कैसे जहां तहां से याद आ गई। इसे जब मैंने अपने किसी मित्र को सुनाया था तो उसने इसे कूडेदान में डालने की सलाह दी थी क्‍योंकि दूसरे ही शेर में तुक गड़बड़। पूरी गजल में ‘हो’ की तुक है इसमें ‘हों’। यह उर्दू में चलता नहीं और उस्‍ताद लोग इसी तरह की गलतियां सुधारते हुए शुअरा को नौसिखुआ से उस्‍ताद बनने का अभ्‍यास कराते रहते थे। मैंने कहा, यार यदि यह उर्दू में नहीं चलती तो हिन्‍दी में चला लेंगे। मैंने एक वाकया बयान किया। जयशंकर प्रसाद के यहां कभी राय‍कृष्‍णदास के साथ गुप्‍त जी पहुंचे और उन्‍होंने उन्‍हें कामायनी का प्रथम सर्ग सुनाना चाहा, प्रसाद ही ने पढ़ा, हिमगिरि के उत्‍तुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छांह । एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रबल प्रवाह । गुप्‍त जी अपने को रोक न पाए इस्‍लाह दे मारी, छांह की तुम प्रवाह से निभती नहीं। उन्‍होंने कहा नहीं, पर किसी जुगत से प्रवाह की जगह बांह होता तो चल जाता। प्रसाद जी ने कहा हेंह और सुनाने का प्रलोभन समाप्‍त। आज तक किसी ने कामायनी पर इस तुक के कारण उंगली नहीं उठाई। तो जो दरबारी संस्‍कारों में पली बढ़ी उर्दू ग़जल में मंजूर नहीं, वह हिंदी में चल सकती है जिसमें कथ्‍य सलीके से अधिक महत्‍वपूर्ण रहा है और थोडी दाएं बाएं की छूट रही है। इसी अधिकार से आज इसे आपकी वेदना की क्षतिपूर्ति के लिए पेश कर रहा हूं। पर मेरे मित्र की टिप्‍पणी का यह असर तो हुआ ही कि मैने मान लिया कि यह काम मेरे बस का नहीं और शायरी से मुंह मोड़ लिया। पर मैंने अपनी पिछली गजल में जिसमें काफी तालियां बजीं एक चूक की थी रक्‍स को रक्‍श लिख दिया था। एक मित्र ने सुझाया कि रक्‍़स करो तो रक्‍़स कर दिया पर अब सोचता हूे जिस‍ हिन्‍दुस्‍तानी का मैं कायल हूं उसमे आम लोग क़, ख़, ग़, ज़, फ्र का उच्‍चारण क, ख, ग, ज, फ के रूप में ही करते हैं इस लिए ज़ेर और ज़ब्र पर अधिक आग्रह न हो तो ही हिन्‍दुस्‍तानी जबान बन पाएगी जिसमें जानकार लोग उच्‍चारण दुरुस्‍त कर लिया करेंगे। अत: इसकी कमियों को सुझाने का आग्रह भी है क्‍योंकि इस घर को अपना घर बनाया ही नहीं।

अपनी मस्ती का ज़माना तुमको शायद याद हो ।
जी में जो आया किया होना है उसके बाद हो ।।
मैं हँसूँ तो यह अंधेरा खुद ही बन जाए मशाल
मैं चलूँ वीरानगी गुलजार खुद शादाब हो ।।
आदमी चाहे तो दुनिया को बदल सकता भी है
हाँ नजर में आने वाली जिन्दगी का ख्वाब हो ।।
क्या नहीं मुमकिन है इंसां के लिए ऐ दोस्तो
हाँ कि दिल में हौसला हो फैसला हो ताब हाे ।।
हाँ ज़रा ठहरो अभी आया अभी आता हूँ मैं
क्यों मेरी बर्वादियों मेरे लिए बेताब हो ।।

Post – 2016-06-25

शंकानिवारण

‘’मैंने एक बार कहा था न तुमसे कि पिछले जन्म में तुम चारण रहे होगे। पहले मेरा जन्म‘ जन्माकन्तर में विश्वास नहीं था, तुम्हें देखने के बाद और तुम्हारी आदत को समझने के बाद हो गया, और यह विश्‍वास भी तभी तक रहता है जब तक तुम सामने रहते हो।‘’

मैं चुपचाप मुस्कराता रहा ।

’’तुम जिसकी भी प्रशंसा करना शुरू कर दोगे, तो एक तो कबित्त पूरा होने तक रुकने का नाम नहीं लोगे, और दूसरे यदि किसी ने कोई नुक्स गिना दिया तो तारीफ में एक और कवित्त रच दोगे। तुम्हें गंभीर बातों पर चिन्ता करना छोड़ कर तुकबन्‍दी ही करनी चाहिए। देखाे न इतनी खुल कर दाद मिलती है कि सामने की हवा भी आईने में बदल जाय और उसी में अपनी शक्ल निहारते हुए झूमते रहो।‘’

मैंने उसी तरह मुस्कराते हुए कहा, ‘’आज तो तुम्‍हीं कबित्त पर कबित्त सुनाए जा रहे हो, निन्दा में ही सही, जो पुराने चारण इनाम न मिलने पर किया करते थे। आखिर पता तो चले कि इसके पीछे तुक ताल क्या है।‘’

’’मैं क्या कहूंगा, अब तो तुम्हा‘रे दोस्त ही कह रहे हैं कि बकवास बन्द करो, तुम्हारे कहने से हम अपना विचार बदल लेंगे क्‍या। पहले उनका जवाब दो तब मुझे गांधीवादी ट्रस्टीशिप और वर्णव्यवस्था समझाना। तुम्हारे विवेचन का मूल्यांकन तो यह रहा: Bahut bhramak. Bas ek hi bat siddh hoti hai – Hindustan mai bhi democracy baki hai. Khuda kare yeh baki rahe.

”अब तुम्हारी समझ में आ ही जाएगा कि मैं मैंने भरी बोतल क्यों जमीन पर पटक कर तोड़ दी थी । वह पानी की बोतल न थी, वह तुम्हारा सिर था और जो बह रहा था उसको सही नाम तुम खुद दे लोगे। अब रहे तुम्हारे ही मित्रों के सवाल तो यह लो और यह लो वाले अंदाज में दे दनादन:

सवाल नंबर एक: गुरूजी एक प्रश्न है कि गाँधीजी को मुसलमान जब इतना मानते थे तो नोआखली में उनकी बात क्यों नहीं मानी ? गाँधीजी के सारे आंदोलन बीच में ही क्यूँ बंद हो जाते थे और सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस छोड़ने पर मजबूर क्यों किया ?
आपत्ति यह भी कि ‘’गाँधीजी में ईमानदारी, सच्चाई, दूरदृष्टि और निस्पृहता तो थी किंतु वे निरभिमानी/ निरहंकारी नहीं थे।‘’

और फिर: खिलाफत आंदोलन के समर्थन को लेकर उसके दुष्परिणाम के बारे में जिन्ना ने गाँधीजी को आगाह भी किया था। बाद में जिन्ना की महत्त्वाकांक्षा पाकिस्तान के निर्माण की ओर ले गई। केरल के मोपला आंदोलन के समय भी गाँधीजी ढुलमुलपन का शिकार रहे और विभाजन के समय भी। इस कारण पाकिस्तान में रहनेवाले हिंदू-सिख अनिश्चय का शिकार बने रहे।

और उूपर से एक और चोट। इसे भी संभालो: गांधी के सामजिक निर्णयों से तो सहमत हुआ जा सकता है लेकिन राजनीतिक निर्णयों से कतई नहीं ।राजनीति में देश समाज व धर्मद्रोहियों के प्रति कठोरता व जरूरत पड़ने पर उनका वध करना ही पड़ता है ।बबूल और केले के पेड़ एक साथ नहीं उगा सकते चाहे जितना बड़ा महात्मा हो । ईश्वर और अल्ला दोनों एक ही हैं इसे अल्ला के मानने वालों ने न तब माना था न अब मानते हैं । और यह बात फेसबुक के बाहर भी कही जाती थी लेकिन आवाज दबा दी जाती थी जो अब सम्भव नहीं ।”

”देखो मैं इनका जवाब दूं उससे पहले अपने प्रिय कवियों में से एक वाल्ट ह्विटमैन की कुछ पंक्तियां सुना दूं। इससे तुम्हें और मेरे मित्रों को भी गांधी को समझने में मदद मिलेगी:
I exist as I am, that is enough,
If no other in the world be aware I sit content,
And if each and all be aware I sit content. …
Do I contradict myself?
Very well then I contradict myself,
(I am large, I contain multitudes.) (Walt Whitman)

ये पंक्तियां हैं तो ह्विटमैन की परन्तु ये उस पर उतनी नहीं लागू होतीं, जितनी उन महान व्यक्तियों पर लागू होती हैं और जिनकी छवि में अपने को उतार कर कवि गण दर्पोक्तियां कर बैठते हैं।”

‘’रुक जाओ जरा नहीं तो बाद में भूल जाउूंगा, यह सांग आफ माइसेल्‍फ तो मुझे भी पसन्द् है, पर यह बताओ लीव्ज अफ दि ग्रास लिखने से पहले ह्विटमैन ने गीता या उपनिषद पढ़ा था या नहीं।‘’
‘’यह सवाल उसकी कविताओं को पढ़ने वालों के दिमाग में उठता जरूर है। शायद यह भी एक कारण हो कि हमें उसकी कविताएं बहुत अपनी सी लगती हैं। यह सवाल उससे पूछा भी गया था, और उसने कड़क उत्तर दिया था, नो, नाट ऐट आल। और अब इमर्सन उसके बारे में क्या सोचते थे इसे मेरी नोटबुक के एक पन्ने, से देख सकते हो-
When Thoreau, in Nov. 1856, came to tell him that his Leaves of Grass recalled to his mind the great oriental poems and to ask if he knew them, Whitman replied with a categorical ‘No’
[Fn. But he had read the ancient Hindoo poems before writing his Leaves of the Grass. See his own admission to his ‘A Backward Glance O’er Travelled Roads.’ Romain Roland, Life of Vivekanand and the Universal Gospel, F.F.Malcom Smith, 1960, p.58
Fn. Once or twice he mentioned Maya Calamus (कल्मष) “The basis of all metaphysics”., Avatar (Song of Farewell) and Nirvana (Sands at Seventy)”Twilight), but in the way of an illiterate, Nirvana, ‘repose and night, forgetfulness’. P.59
It is then all the more interesting to discover how without going beyond himself – a hundred percent American Self – he could unwittingly link up with Vedantic thought for its kinship and not escape any of the Emersion’s group beginning with Emerson himself whose genial quip is not sufficiently well known, “Leaves of the Grass seems to be a mixture of the Bhagwat Gita and the New York Herald.

इसलिए भारत के अतीत का मजाक उड़ाने का जो कार्यक्रम मिशनरियों ने हीन भावना के कारण अपने मजहब के प्रचार के लिए जमीन बनाने के लिए आरंभ किया और जिसे अपनी असाधारण समझदारी से भारतीय मार्क्समवादियों ने बिना सोच विचार के अपना दाय समझ लिया, उससे बाहर आए बिना न प्रगति को समझ सकते हो न विज्ञान को न आधुनिकता को। और गांधी को तो समझ ही नहीं सकते।‘’

’’आत्मश्लाघा एक तो सभ्य समाज में अशोभन मानी जाती है, दूसरे इससे आत्मरति पैदा होती है, और आगे देखने की जगह पीछे देखने की प्रवृत्ति पैदा होती है। इसलिए इससे बचा करो।‘’

‘’तुम खुद ही सवाल करते हो, उत्तर देने चलता हूं तो खुद ही बीच में व्यवधान डालते हो और भेजा बकरे से भी कम मिला है इसलिए पूरी बात सुनने से पहले ही गरम हो जाता है। इस तरह तो आज तुम्हें लाद कर ले जाना पड़ेगा।

”फिर भी यदि पूछ दिया तो इसे भी समझ लो। अपने बारे में पुरानी भूली बातों को याद करने से आत्म श्ला़घा नहीं आत्मबोध पैदा होता है, मैं कौन हूं और क्‍या क्षमता मुझमें है और मैं क्‍या कर सकता हूं। अपने सोये हुए शक्तिपुंज की पहचान पैदा होती है। अपनी या अपनों की मामूली सफलता भी आत्मविश्वास से भर देती है जैसे गामा पहलवान का गोरे पहलवान सैंडो को परा्स्‍त करने या राममूर्ति के योगसाधना की शक्ति प्रदर्शन से हुआ था या जापान की रूस पर विजय से हुआ था।

”किसी समाज को रौंद और कुचल कर रखने वाली ताकतें और योजनाएं अपनी प्रशंसा के लिए झूठी कहानियां गढ़ कर भी अपनी श्रेष्ठ ता का खुला प्रचार करती और दूसरे की वास्‍तविक उपलब्धियों को आत्‍मश्‍लाघा न हो जाय आत्‍मस्‍फीति न पैदा हो जाय का हौवा दिखा कर उन्‍हें हर तरीके से नकारते हुए उनके मनोबल को गिराने के लिए काम करती हैं जैसे यूरोपियनों ने आर्य आक्रमण, जाली तुलनात्मबक भाषाविज्ञान आदि गढ़ कर यह साबित करते हुए किया कि यूरोप सदा से सम्‍यता और ज्ञान का प्रेरक और उस एशिया की सम्‍यताओं का जनक रहा है जिनके उच्छिषट भोग से ग्रीक की महिमा का आरंभ हुआ था। उनकी उन्‍ही कहानियों को तुम जैसे लोग स्वरयं दुहरा कर अपनी हीनता, दीनता पर गर्व करते हुए अपनी रोटी मक्खन का इन्तजाम राष्‍ट्रीय अपमान की कीमत पर करते हैं। तुम जैसे बिके हुए लोगों की समझ में न भारत का अतीत समझ में आ सकता है न जामवन्त का हनुमान को उनके पराक्रम की याद दिला कर समुद्र पार करने की क्षमता जगाने का रहस्य समझ में आ सकता है और गांधी तो समझ में आ ही नहीं सकते । चलो इस बहाने तुम्हारे प्रभाव में रहने वाले पहले शंकालु की लघु शंका का निवारण हो चुका होगा। अब आराम करो, अगले सवालों पर जब सुनने का जज्बा पैदा हो जाय तब लौटेंगे। आधा घंटा तो लग ही जाएगा।

2
अब जैसे तुमने मेरे मित्रों के कुछ सवाल पेश किये है वैसे ही मैं चाहूंगा कि वे गांधी जी के कुछ विचारों पर ध्यान दें तो हमें एक दूसरे के विचारों को समझने में मदद मिलेगी: However much I may sympathize with and admire worthy motives, I am an uncompromising opponent of violent methods even to serve the noblest of causes. There is, therefore, really no meeting-ground between the school of violence and myself.
But my creed of non-violence not only does not preclude me but compels me even to associate with anarchists and all those who believe in violence. But that association is always with the sole object of weaning them from what appears to me to be their error. For experience convinces me that permanent good can never be the outcome of untruth and violence. Even if my belief is a fond delusion, it will be admitted that it is a fascinating delusion. (यंग इंडिया 11-12-1924, p. 406) सोचो, सुभाष जैसे अनार्किस्‍ट जो एक अलग किस्‍म की व्‍यवस्‍था के पक्षधर थे जिसे वह बोसिज्‍म कहते थे कैसे कांग्रेस में रहे और उनमें किसी तरह का सुधार न देखकर गांधी जी ने उनसे मुक्ति पानी चाही।

But from what I know of Bolshevism, it not only does not preclude the use of force, but freely sanctions it for the expropriation of private property and maintaining the Collective State ownership of the same. And if that is so, I have no hesitation in saying that the Bolshevik regime in its present form cannot last for long. For it is my firm conviction that nothing enduring can be built on violence. (यंग इंडिया 15-11-1928, p. 381)

Socialism and communism of the West are based on certain conceptions, which are fundamentally different from ours. One such conception is their belief in the essential selfishness of human nature. I do not subscribe to it, for I know that the essential difference between man and the brute is that the former can respond to the call of the spirit in him, can rise superior to the passions that he owns in common with the brute and, therefore, superior to selfishness and violence, which belong to the brute nature and not to the immortal spirit of man. (आटोबायोग्राफी, 2-8-1934) मूल्‍यव्‍यवस्‍था के इस अन्‍तर को शायद तुम आज भी समझ न पाओगे।

I cannot accept benevolent or any other dictatorship. Neither will the rich vanish nor will the poor be protected. Some rich men will certainly be killed out and some poor men will be spoon-fed. As a class the rich will remain and the poor also, in spite of dictatorship labeled benevolent. The real remedy is non-violent democracy, otherwise spelt true education of all. The rich should be taught the doctrine of stewardship and the poor that of self-help. (हरिजन 8-6-1940, p. 159) बलप्रयोग से वह किसी की संपत्ति के हरण का विरोध क्‍यों करते थे । किसी ने उनका उपयोग किया या यह उनके सुचिन्तित विचारों का हिस्‍सा था।

I cannot accept benevolent or any other dictatorship. Neither will the rich vanish nor will the poor be protected. Some rich men will certainly be killed out and some poor men will be spoon-fed. As a class the rich will remain and the poor also, in spite of dictatorship labeled benevolent. The real remedy is non-violent democracy, otherwise spelt true education of all. The rich should be taught the doctrine of stewardship and the poor that of self-help. (हरिजन 8-6-1940, p. 159) गांधी मेरी समझ से अपने नैतिक बल के बल पर दूसरों को अपने अनुकूल ढालने और अपनी बात समझाने में सफल होते थे क्‍योंकि जो उनके विचार में था वही कर्म में। इच्‍छा, क्रिया और ज्ञान का यह संगम था।

और अन्तत:
I call myself a communist also….My communism is not very different from socialism. It is a harmonious blending of the two. Communism as I have understood is a natural corollary of socialism. (हरिजन 4-8-1946, p. 246)

तुम जानते हो मैं बहुत पढ़ा लिखा आदमी नहीं हूं क्योंकि इतने सारे क्षेत्रों में टांग अड़ाने से अपने को रोक नहीं पाता जिनमें से किसी एक का अधिकारी विद्वान होने के लिए किसी को पूरा जीवन लगाना होता है। इसलिए इतना सारा हाथ पांव मारने के बाद भी हाथ में जो आता है वह कुछ उड़ता उड़ता ज्ञान ही होता है। मैं यह नहीं मानता कि मैं अपने मित्रों में से किसी से अधिक जानता हूं। यह बात तुम जैसे दुश्मनों के विषय में भी मानता हूं कि तुम्हारी जानकारी अधिक होगी। मैं कविता से दूर भागता हूं और जब मजबूर हो जाता हूं तभी लगभग बनी और अधबनी पंक्तियों को दर्ज कर लेता हूं जो मेरे सोचविचार के क्रम में ही रास्ता रोक कर आ खडी होती हैं। कविता को इतना आसान या चलती राह कुछ टांक कर अपने को कवि मान लें यह कविता का सम्मान नहीं है। पर यदि मैं बहुत अच्छा कवि हो जाउूं तो भी मुझे जितनी भी प्रशंसा मिल जाय पर अपने पाठकों को आह्लाद के कुछ क्षण ही दे सकता हूं जब कि मेरे लेखन का लक्ष्य अपने समाज की सोच को बदलना है। विरोध और प्रतिरोध सह कर भी। उपेक्षा झेलते हुए भी । वह बेकार नहीं जाता, धीरे धीरे जगह बनाता है । गांधी जी के ही शब्दों में ‘’पहले वे तुम्हारी उपेक्षा करेंगे, फिर तुम्हारा विरोध करेंगे, फिर वे तुमसे टकरा जाएंगे और फिर तुम जीत जाओगे।‘’

मैं इसे गांधी जी को पढ़ने से पहले से जानता था और इसे जीवन में घटित होते देखा है। मैं जो गांधी जी पर यह ज्ञान बघार रहा हूं वह आनन-फानन में इधर उधर से जुटाया हुआ है, इसलिए मेरी डायरी में दर्ज उनके कुछ सूत्र तुम्हें देने के बाद तुमसे चाहूंगा कि तुम स्वयं इस मामूली सी पूंजी के बल पर उन प्रश्नों के उत्तर तलाश करने की कोशिश करो। गांधी में नम्रता के साथ अपार दृढ़ता थी। उसे अहंकार समझने वाले को आत्म निरीक्षण करना चाहिए। गांधी का तरीका था कि “In a gentle way, you can shake the world.” ये उन्‍हीं के शब्‍द हैं।

किसी कौम के साथ, भले वह हमारी नजर में बहुत बड़े पैमाने पर घटित दिखाई दे, इकहरी राय बनाना जिस महासंहार की दिशा में ले जाता है उस महासंहार का ही आरोप लगा कर आप उससे घ़णा करने लगते हैं। वही रास्ता अपना कर आप अपने को घ़णित बनाना चाहेंगे क्या । गांधी की समझ सीधी थी “An eye for an eye will make the whole world blind.”

गांधी किसी महान उद्देश्य” के लिए किसी तरीके से काम करने वाले का सम्मान करते थे, परन्तु वह अपने तरीके को सही मानते थे और उसमें व्यवधान बनने या बन सकने वालों को रास्ते से हटाने का प्रयत्न करते थे इसलिए वे भी उनका सम्मान तो करते थे पर उनसे सहमत न थे। सुभाष के मन को और उनके तेवर को वह जानते थे, उनकी क्षमता का सम्मान करते थे लेकिन ‘’तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’’ वाले इतने ओजस्वी नेता के लिए उस क्रांग्रेस में जगह नहीं थी जिसे उन्होंने एक भिन्न सिद्धान्तू में ढालने का प्रयत्‍न आजीवन किया था। नेहरू आर्थिक नीति में उनसे अलग थे, अन्य सभी मामलों में उनके अनुयायी थे पर अधकचरे।

और अंतत: सफलता या असफलता के सवाल पर “Glory lies in the attempt to reach one’s goal and not in reaching it.”

गांधी जी विचार और आचार और दृढ़ता को सबसे बड़ा हथियार मानते थे न कि हथियार को जिसकी होड़ ने गांधी को दुबारा संगत बनाया है। उन्हों ने कितने सारे पत्रों का संपादन किया : इंडियन ओपिनियन, यंग इंडिया, नवजीवन, हरिजन बन्धु्, हरिजन, हरिजन सेवक और फिर प्रतिदिन प्रार्थना सभाओं में उनके प्रेरक विचार। इतना बड़़ा पत्रकार कोई दूसरा हुआ हो तो मुझे पता नहीं। पर संभव है मैं गांधी को बिल्कुनल समझ ही न पाया हूं, गांधी को गढ़ कर ही उनको नमन करता होउूं। मुझसे सहमति नहीं विचार प्रक्रिया का जारी रहना और भावुक उदगारों से बचना जरूरी है। और जहां तक मुसलमान उन्‍हें प्‍यार करते थे या नहीं का सवाल है, ऐसे सवालों के जवाब दंगाग्रस्‍त परिस्थितियों से नहीं मिलता। वहां भी वह एक मुसलमान के घर ही ठहरे थे जहां से बच कर आ गए पर एक हिन्‍दू के हाथों जान गंवाई क्‍या इसके आधार पर कह सकते हैं कि हिन्‍दू भी उन्‍हें प्‍यार करते थे। केवल भ्रष्‍ट व्‍यक्तियों को छोड़ कर सभी गांधी का सम्‍मान करते हैं, भ्रष्‍ट उनका नाम तक इस्‍तेमाल कर ले जाते हैं।

Post – 2016-06-24

नम्रता में भी वह पर्वत सा उठा लगता था

कमाल की बात तो यह कि वह आज सचमुच छड़ी की जगह पानी की बोतल ले कर आया था। पानी की बोतल का उसे एक ही उपयोग दिखाई दिया। बेंच पर हमारे और उसके बीच की सीमा तय करने के लिए गड़ी खूंटी की जगह लेना। मैंने इसे लक्ष्य किया। मुस्कराते हुए पूछा, ‘’तुम किस देश में रहते हो? पता है?’’

सवाल था ही बेतुका। उसने मुझे खीझ भरी दृष्टि से देखा जिसका हिन्दी, अनुवाद होगा, ‘क्यां बकवास करते हो।‘

मैंने समझाया, ‘’देखो एक दिन मैंने तुम्हें समझाया था कि हमारा देश महान है। जो दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा, वह यहां मिलेगा, जैसे तुम्हारे जैसा नमूना। दुनिया के किसी अन्य देश का एक नाम होता है, कभी कभी दो भी हो जाते हैं, जैसे ब्रिटेन को हम लोग उसके एक हिस्से के नाम पर अक्सर इंगलैंड कह लेते हैं। हमारे देश के बहुत सारे नाम और रूप हैं, इंडिया, दैट इज भारत, हिन्दुस्ताल दैट इज हिन्दुस्थान, हिन्द, पाकेट्स आफ पाकिस्तान इन दि मेकिंग विदिन इंडिया, और एक्सपैंडिग पाकेट्स आप पोपेसी इन इंडिया। अन्तिम दो के निर्माण में नेहरू, तुम्हारा और हिन्‍दुस्‍तान को हिन्‍दुस्‍थान मानने वालों का भी कुछ हाथ है इसलिए पूछ लिया कि तुम किस देश में रहते हो?’’

वह और चिढ़ गया। ‘’तुम्हें बात करने की तमीज कब आएगी।‘’

‘’देखो सच बात तो यह है कि तुम सचाई का सामना करने से घबराते हो पर घबराहट दुर्गति को बढ़ाती है उसे मिटाती नहीं। तुम या तो इन सभी देशों को एक मानते हो, या इन सभी में रहना चाहते या अपने ही देश में टूरिस्ट की तरह विचरण करते रहना चाहते हो । मेरे सामने भी कई बार दिक्कत पैदा हो जाती है यह तय करने में कि मैं किस देश में रहता हूं कि तभी एक फिल्मी गाने से मदद मिल जाती है और अपने को या कोई पूछे तो उसे समझाते हुए बोल पड़ता हूं ‘मैं उस देश का बासी हूं जिस देस में गंगा बहती है।‘ पर यहां भी चैन नहीं मिलता, यही पंक्ति लौटती है तो सुनाई देता है, अबे रहता दिल्ली में जमुना के किनारे है और बताता है जिस देश में गंगा बहती है। यह भी नहीं जानता कि इसको अपनी गंगाजुमनी तहजीब पर नाज है न कि मैं गंगा की मौज और गंगा की धारा पर।‘’

अब वह थोड़ा नार्मल हुआ, हंसते हुए बोला, ‘’शैतानी से बाज नहीं आओगे। बस यही बताने के लिए मुझसे रूकने को कह रहे थे?’’

’’बताना यह चाहता था, कि गांधी के जमाने में भी इसके कई नाम थे, भारतवर्ष, हिन्दुहस्तान और इंडिया तो थे ही उसके भीतर रियासतों और रजवाड़ों के रूप में कई सौ छोटे छोटे हिन्दुस्थान और सलामिस्‍तान भी थे, और इसके कारण दूसरों को कई तरह के भ्रम थे, अकेले गांधी थे जो निश्चित रूप में जानते थे कि वह हिन्दु्स्तान में रहते हैं, इसकी भाषा और संस्कृति हिन्दुस्तानी होनी चाहिए जिसमें हिन्दू और मुसलमान और क्रिस्तान अपने धर्म, विश्वास और रीति-नीति से बिना किसी टकराव के रह सकें और ऐसी कारगुजारियों से बचें जिनसे दखलन्‍दाजी और अविश्‍वास और टकराव पैदा होता है। वह हिन्‍दुस्‍तान उनके साथ ही दफन कर दिया गया।

”तुमने ठीक कहा था वह हिन्दुओं की प्रार्थना गाते थे, अपने को हिन्दू कहते थे। वह किसी मुसलमान से नहीं कहते थे कि वह भी उनकी प्रार्थना सभा में आए और ऐसे भजन गाए। वह हिन्‍दुओं की मानसिकता में परिवर्तन लाने के लिए यह भजन गाते थे। उनके भीतर वह दोगलापन, क्षमा करो यह शब्द लापरवाही में निकल गया, दुहरापन कहना चाहता था, तो उनमें उस तरह का दुहरापन नहीं था जिसे तुम सेक्यु लरिज्म कहते हो। वह प्रार्थनासभा का आयोजन करते थे, मुसलमानों को खुश करने के लिए उन्हों ने कभी प्रार्थनासभा को जमाते बन्दगी जैसा … अरे यार जबान पर फिर वही शब्द आ रहा था, रास्ते में ही रोक लिया। तुमने देखा है वह चित्र जिसमें हमारे नेताओं में बहुत सारे जालीदार टोपी अपने सेक्युालरिज्मे का प्रमाण देने के लिए पहन लेते हैं।‘’

’’टोपी में ऐसा क्या रखा है कि इसे भी तूल देते हो। हम सभी अंग्रेजी पोशाक पहनते समय कभी इस तरह का मीन मेख करते हैं।‘’

’’कोट पैंट के साथ भी एक संदेश था परन्तु वह सन्देश मजहब से जुड़ा नहीं था। वह जुड़ा था सुविधा से और हैसियत से। पोशाक में इस तरह की ढील सदा से रही है यह तो शेरवानी, मिर्जई, कमीज, समीज, सलवार आदि शब्दों से ही प्रकट है ।पर जब इसका संदेश मजहबी हो तो एक नामुहमदन को इसका प्रतिरोध करना चाहिए। सच तो यह है कि इसका प्रतिरोध मुसलमानों को भी करना चाहिए था क्योंकि यह तो ईसाइयत से आई हुई चीज है, पर उन्हों ने अपना सब कुछ वहीं से लिया है, तीज त्यौहार तक, इसलिए उनकी बात अलग है।

”गांधी ऐसा नहीं कर सकते थे न कोई गांधीवादी ऐसा कर सकता है। गांधी चन्दन भी नहीं लगा सकते थे, गेरुआ भी नहीं पहन सकते थे। उनका सब कुछ एक आविष्कार था जिसमें परंपरा की गंध विश्वमानवता की गंध से और अन्तिम जन की वेदना के अन्तंर्नाद से सुवासित और ध्वनित था। वह अपने जैसा अकेला आदमी था – भीतर-बाहर एक होते हुए भी अपनी सरलता में ही रहस्यमयता का आभास देता था- सादगी और पुरकारी, बेखुदी और हुशियारी का अनन्य मेल जिसकी लंगोट के सामने सम्राट और उनके वायसराय भी सहमते थे। नम्रता में इतनी शक्ति, सादगी में इतनी महिमा कभी इससे पहले प्रकट हुई हो तो जिन्होंने उसे देखा होगा उन्‍हें हमने नहीं देखा।‘’

वह मेरी बात को अब बहुत ध्यान से सुन रहा था।

’’और जो तुम कह रहे थे कि वह अपनी प्रार्थनासभाओं में जो हिन्दू गाना गाते थे उसे लेकर मुसलमानों में मलाल था और रामराज्य नाम से उनमें व्यग्रता पैदा होती थी, वह तुम लोगों की पैदा की हुई थी। मुसलमानों के दो मुल्‍ला हैं, एक मजहबी और दूसरे सेकुलरिस्‍ट और जब तब बाद वालों के सामने पहले वाले घुटना टेक देते हैं। फिर भी मुसलमान उन ढोंगियों पर विश्वास नहीं कर सकता जो उसे खुश करने के लिए जाली टोपी पहन लेते हैं। अपने धर्म और विश्वास पर आस्था रखने वालों के प्रति उनमें एक सम्मान का भाव रहा है और मैंने स्वयं ऐसे लोगों के अनन्य स्नेह को देखा है। उसकी भाषा में कहो तो, ‘जो अपने दीन और ईमान का न हुआ वह हमारा कैसे हो सकता है।‘

” इसलिए मुसलमानों के मन में भी गांधी के प्रति उतना ही गहन आदर था। जिस इतिहास का उकेर कर जिन्नां ने अलगाव के बीज बोए थे वह सावरकर का तो हो सकता था, गांधी का नहीं। यहां मैं यह तय नहीं कर रहा कि सावरकर गलत थे या सही, वह गांधी को पचा नहीं सकते थे। सच्चा हिन्दू भी ढ़ोगियों पर विश्वास नहीं कर सकता, परन्तु गांधी के पंथ से किनारा कसने का एक परिणाम यह है कि पाखंड आधुनिक भारत का अघोषित धर्म बन गया है जिसके उत्थान में तुम्हारी भूमिका सबसे अधिक है और तुम्हारी सफलता यह कि तुमने उन अन्तर बाहर एक व्यक्ति को ही ढोंगी प्रचारित करने में शिक्षितों के एक तबके में सफलता अवश्य पाई।

’’और जो तुम कह रहे थे कि कांग्रेस का चवन्निया सदस्य हुए बिना भी पूरे दल को अपने इशारे पर चलाते थे तो पहले यह तो सोचा होता कि जिस व्यक्ति ने इतनी वीतरागता अर्जित कर ली उसके पास ऐसी कौन सी शक्ति थी कि दूसरे सभी उसके इशारे पर पुतलियों की तरह नाचने को तत्पर रहते थे। उसकी उस शक्ति का स्रोत क्या था? वह था आत्मबल, दूरद़ृष्टि जिसके सभी लोग कायल हो जाते थे, निस्पृ्हता और अपनी भूलों को सुधारने की लोच और ईमानदारी।

”इसीलिए कह रहा था, वह इस देश को समझते थे, तुम गांधी तक को नहीं समझ सके और अपनी पैशुनी वृत्ति से उनको कलंकित करने के प्रयत्न में लगे रहे।‘’

अब उसे कुछ घबराहट महसूस होने लगी थी।

‘’तुमने कभी बादाम खाया है? नहीं, नहीं, खाया तो होगा यह मैं जानता हूं पर कुछ दिनों तक अधिक मात्रा में खाया होगा तो यह समझ गए होगे कि इसके बाद कंडा बंध जाता है। खूनी पेचिस हो जाती है। बेचारी बकरी तो वैसे भी साग पात खाने के बाद भी लेंड़ी करती है, नियमित बादाम क्या पचाएगी। यह तुम लोगों का ही आविष्कार है जिसका सार सत्य केवल यह है कि गांधी की बकरी चरने के लिए जाय इसकी जगह उसे चारा और खल-चोकर अपने बथान पर ही मिल जाता रहा होगा।

’’देखो, मैं तुम्हें आहत करने के लिए नहीं कह रहा हूं। सचाई को समझने में तुम्हारी मदद कर रहा हूं। गांधी स्वराज्यं और सुराज को अलग करके नहीं देखते थे और उनके यहां पहले से इकट्ठा लोगों को भड़का कर अपना बनाने की धूर्तता न जैसा तुमने पहले मजदूरों के साथ किया और उनको मिटाने के बाद अब छात्रों के साथ कर रहे हो। वह भेदभाव किए बिना पूरे देश का आवाहन करते थे। यदि उसमें किसी रूप में किसी चरण पर पूंजीपति घरानों में कुछ जागरूक लोग यह साहस कर सके कि दमन के उस दौर में भी आन्दोलनकारियों की मदद करे या किसी आयोजन में आर्थिक सहायता देने को तत्पर हों तो यह गांधी की समस्या नहीं थी, वह तो नवविवाहिताओं से उनके जेवर तक उतरवा लेते थे।

”अन्तर केवल यह कि उसका राई रत्ती भी अपने लिए या अपनों के लिए नहीं खर्च करते थे। इस तरह के सवाल तो तुमको उठाना भी नहीं चाहिए क्योंकि तुम उन देशों का काम करते रहे हो जो तुम्हें पैसा देते रहे हैं मैंने इसलिए भी यह सवाल किया था कि तुम किस देश के रहने वाले हो क्योंकि तुम लोगों ने सदा देश के विरुद्ध उन देशों के लिए काम किया जिनसे पैसा मिला। दूसरे महायुद्ध में देश अंग्रेजो से असहयोग कर रहा था और तुम सहयोग कर रहे थे, क्योंकि तुमको पैसा देने वाला उनके साथ था। अब वह बिखर गया तो सुना मार्क्सवादियों और सेकुलरिस्टों की सबसे बड़ी जमात उन अनिवासी भारतीयों की है जो ईसाइयत के साथ मिल कर काम करता है कयोंकि उससे उसे पैसा और सम्मान मिलता है।

’’रुको, रुको यार, अभी तो बात पूरी हुई ही नहीं, वह वर्णव्यवस्था वाली और ट्रस्टीशिप वाली बात तो रह ही गई। उठ क्यों रहे हो?’’

’’तुम और तुम्हा्रा ट्रस्टीशिप जाए भाड़ में।‘’ उसने पानी की भरी बोतल उठाई और नीचे इतने जोर से पटका कि वह फट गई और पानी इधर उधर बहने लगा। दूसरी बेंचों पर बैठे लोग चौंक कर देखने लगे कि मामला क्या है!

23 जून 2016

Post – 2016-06-23

फकत आगाज था वह तो अभी अंजाम बाकी है।
अभी आधा हुआ है और आधा काम बाकी है।।
अभी तो रंगो रानाई की लम्बी शाम ठहरी है
तेरे हिस्से की पी है, और मेरा जाम बाकी है।।
तुम्हारे नाम लिखता और तुम्‍हें ही सौंपता आया ।
तुम्हारे नाम के नीचे मेरा सरनाम बाकी है ।।
अभी तो सुगबुगाहट ही हुई है पूरी महफिल में ।
अभी तो मौज बाकी है अभी तूफान बाकी है ।।
अभी पायल बंधे है और लाखाें लुट गए देखो।
तुम्हारे हुस्न का और रक्‍़स का तूफान बाकी है ।।
बहुत कुछ लुट गया फिर भी मेरी लुटने की मजबूरी ।
न है सामान घर में पर मेरा ईमान बाकी है ।।
खुदारा तू बचा इसको बुलंदी चाहता है तो ।
वगर्ना जान देने को तेरा नादान बाकी है ।।
मिले मुद्दत हुई भगवान से पर याद आता है
किसी ने कल कहा मुझसे कि वह शैतान बाकी है।।
23 जून 2016

Post – 2016-06-23

दरपन मलिन मलिन छबि गहई

‘‘क्या तुमने पूरा गांधी वाङ्मय पढ़ा है ।”

‘‘एक बार उलट-पलट कर देखा था।”

‘‘उलट पलट कर देखने से तुम्हारा क्या मतलब है!”

‘‘मैं उन दिनों दिल्ली प्रशासन में था जिसे आज दिल्ली राज्य कहा जाता है। प्रशासन की लाइब्रेरी में कुछ पठनीय पुस्तकें त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी जो तब मुख्य सचिव थे और आदित्यनाथ झा जो लेफ्टिनेंट गवर्नर थे, के कारण उपलब्ध थीं। उस लाइब्रेरी का थोड़ा बहुत लाभ मैं भी उठाता रहा। एक बार गया तो देखा एक बड़ा सा गट्ठर बंधा पड़ा है। जिज्ञासा की तो पता चला संपूर्ण गांधी वाङ़मय है। अलमारियों में जगह नहीं, कोई पढ़ने वाला भी नहीं, इसलिए गट्ठर खोला ही नहीं गया। मैंने कहा, यह तो ठीक नहीं है। जरा खोलो तो इसे। लाइब्रेरियन ने गट्ठर खोला। अब तो यह भी याद नहीं कि कितने खंड थे, परन्तु इतने तो थे ही कि मैं उन्हें उठा नहीं सकता था! मैंने एक खंड को उठाया कुछ पन्ने उलटे फिर पलटे और रख दिया। फिर दूसरे तीसरे के साथ भी यही किया और तय किया कि इसे पढ़ पाना उसी के लिए संभव है जो गांधी जी से आतंकित होकर उनसे दूर भागना चाहता हो। मैंने उसके बाद दूसरी बहुत सी पुस्तके पढ़ीं, परन्तु गांधी वाङ्मय के किसी खंड पर हाथ नहीं लगाया। लाइब्रेरियन ने ही समझाया था, साहब यह पढ़ने के लिए नहीं है, विदेश का कोई अतिथि आये तो यह पूरा सेट उसे भेंट करने के लिए तैयार किया गया है। तो समझो मैंने एक बार उलटा-पलटा तो था पर पढ़ा नहीं।”

‘‘तुमने प्यारे लाल की डायरी पढ़ी है।”

इसके बारे में तो यह जानता तक नहीं था कि वह प्रकाशित भी हुई है।

‘‘तुमने घनश्‍याम दास बिड़ला की बापू की परसादी पढ़ी है।”

यह भी मेरे लिए नई सूचना थी। ‘‘परन्तु यदि इस पुस्तक से परिचित होता और वह मेरे सामने की मेज पर होती और मैं कोई और चारा न होने के कारण बोर हो रहा होता तो भी उसे नहीं पढ़ता। जो आदमी प्रसाद को परसादी लिख रखा है वह भी पढ़ने योग्य हो सकता है!”

”तुमने कुछ पढ़ा भी नहीं और फिर भी मुझे ही गांधीवाद समझाने लगे, गांधी और नेहरू का फर्क बताने लगे। और तो और, कम्युनिस्टों पर भी अपनी भड़ास निकालते रहे।”

‘‘देखो मैं जिन विषयों को नहीं जानता उन्हीं पर पूरे विश्‍वास से बात कर पाता हूँ। यह रहस्य तो मैंने तुम्हें भी बताया था कि अज्ञान आत्मविश्‍वास का जनक है। जितना कम जानोगे उतनी ही दृढ़ता से जानोगे और जिसे जानते हो उसे ही ज्ञान की पराकाष्ठा मानोगे! हां कुछ उड़ती फिरती बातों की जानकारी अवश्य होनी चाहिए, किसी चीज को समझने के लिए। परम ज्ञान में विषय गायब हो जाता है और ज्ञान ही विषय बन जाता है।”

”जब तुम कुछ नहीं जानते तो मुझसे सुनो। गांधी सीधे सादे व्यक्ति नहीं थे। भीतर से बहुत कांइयाँ थे। पाखंड ऐसा कि जैसे अपना कुछ नहीं, जब कि उनकी बकरी भी बादाम खाती थी। निस्पृहता ऐसी कि स्वयं कभी कांग्रेस के अध्यक्ष तक नहीं बने, कांग्रेस के चवन्नी के सदस्य तक नहीं बने और पूरी पार्टी को अपनी उंगलियों के इशारे से नचाते रहे। और उनके सारे कांइयापन के बाद भी हमारे पूँजीपति घराने, बजाज और बिड़ला, उनका भी इस्तेमाल कर ले गए। उन्‍होंने बिदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करा कर देसी धन्‍ना सेठों की चांदी कर दी और वे, इसीलिए, जब यह समझ गए आजादी तो मिल कर ही रहेगी तो उन्होंने उनकी सेवा आरंभ कर दी! अरे भई, गाय को भी पहले चारा देते हो उसके बाद ही तो उसे दूहते हो। तुम्हें पता है आन्दोलनों में के समय जो कांग्रेसी जेल चले गए थे उनके परिवारों को पैसा कौन देता था? गांधी के अछूतोद्धार के लिए बिरला ने कितना पैसा दिया था? उन्हें पता था कि यही आदमी अपने प्रभाव से हमारे कल कारखानों का राष्‍ट्रीकरण रोक सकता है। यही भारत में कम्युनिज्म को रोक सकता है। कम्युनिज्म के प्रति घृणा भी उनके मन में उन्हीं पूंजीपतियों ने डाली होगी। अगर एक शब्द में सुनना चाहो तो मैं कहूँगा, वह पूंजीपतियों के दलाल थे। पेट न भरा हो, कुछ और सुनना हो तो, बताओ!”

मैंने कुछ कहा नहीं, मुस्कराता रहा।

‘‘देखो, नेहरू आधुनिक थे, गांधी की सोच मध्यकालीन थी। वह यथास्थितिवादी थे। चाहे वह वर्णव्यवस्था का प्रश्‍न हो, या संपदा पर स्वामित्व। न तो वह जमीदारी प्रथा को समाप्त करने के पक्ष में थे न पूंजीवाद को। वह जिस ट्रस्टीशिप की बात करते थे वह एक दिवास्वप्न था, जिसे किसी भी दशा में व्यावहारिक नहीं बनाया जा सकता था। और गांधी का अहिंसा का रास्ता तो सुरक्षा की दृष्टि से आत्मघाती था। तुम जिस गांधी की बात करते हो वह उनकी प्रधान दुर्बलताओं पर पर्दा डालकर, उन्हें रियायतें देते हुए, अतिरंजना के सहारे गढ़ा गया महिमामंडित चित्र है! अन्तर्विरोध और कनफ्यूजन नेहरू की तुलना में गांधी मे अधिक थे। एक ओर तो वह ‘ईश्व र अल्ला तेरे नाम’ गाते थे और दूसरी ओर राम राज्य का आदर्श पेश करते थे जिससे मुस्लिम समुदाय में यह डर पैदा हुआ कि यदि भारत स्वतन्त्र हुआ तो यहां हिन्दू शासनतन्त्र स्थापित होगा जिसमें मुसलमान सुरक्षित रह नहीं सकते। मुसलमान उनके भजन को भी बर्दाश्‍त करते रहे, क्योंकि यह हिन्दू भजन था…”

मेरे मुंह से बिना सोचे ही निकल गया, ‘‘हिन्दू भजन!”

‘‘हाँ भई, वैष्‍णव जन की बात, वह पीर पराई जानेगा या नहीं, यह तो बाद की बात हुई। और वह ईश्वर अल्ला तेरे नाम भी हिन्दू भजन है। तुम्हारे तो परमात्मा के हजार नाम हैं उसमें गाड, खुदा, अल्ला, रहीम, करीम सब जोड़ लो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। विष्‍णु के बगल में अल्‍ला को भी रख दिया जाय तो तुम्‍हें फर्क नहीं पड़ने वाला। हिन्‍दुओं ने ही अल्‍लाहोपनिषद लिखा था न! परन्तु उनको तो यह स्वीकार ही नहीं कि अल्लाह के अलावा कोई दूसरा, किसी दूसरे नाम से अस्तित्व में हो या किसी और को अल्लाह की बराबरी में रखा जाए। वे इसे सहते रहे और रामराज्य पर मन ही मन कसमसाते रहे थे। पाकिस्‍तान की मांग के लिए केवल गांधी जिम्‍मेवार थे। खिलाफत आन्‍दोलन के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं। अब समझ में आया कम्‍युनिस्‍ट गांधी का क्‍यों विरोध करते थे ।”

मैंने कहा, ‘‘मैं तो सोचता था कि तुम भजन कीर्तन में विश्‍वास नहीं करते, आज मुझे लगा मैं गलती पर था।”

इतना प्रभावशाली विवेचन करने के बाद वह इतने उत्साह में था कि अब इस इन्तजार में था कि मैं उसके सामने अब ढेर हुआ कि तब । अपेक्षा के विपरीत मेरा प्रश्‍न सुन कर उसका हाल उस व्‍यक्ति जैसी हो गई जो आवेश में आगे बढ़ कर किसी को पकड़ने के लिए तिरछा हुए शरीर और बढ़े हाथ की पकड़ की चूक से स्वयं मुँह के बल गिरने गिरने को आ जाय।

‘‘मैं किसी का भजन कीर्तन नहीं करता! यह तुम जाहिलों का काम है! एक ही वाक्य को लगातार रटते रटते उस इबारत का अर्थ तक समाप्त हो जाता है!”

‘‘मैं इसीलिए कह रहा था! पिछले सत्तर सालों से गांधी के बारे में तुम जिस तरह का दुष्‍प्रचार करते रहे उसकी एक एक इबारत तुम्हें याद है, यह नियमित भजन के बिना तो संभव है ही नहीं ! और तुमने ठीक कहा, अगर लगातार एक ही तरह की बात को दुहराते चले जायँ तो दिमाग सुन्न हो जाता है और उसका अर्थ ही नहीं रह जाता! मैं तुम्हें समझाता हूं। पर आज तो तुम्हारा माथा अपने ही आवेश में गर्म हो चुका होगा! समझ पाओगे।”

उसने कोई जवाब नहीं दिया और कुछ उखड़े हुए मन से छड़ी सँभाली और चलने को उठ खड़ा हुआ।

मैंने कहा, ‘‘चलो, कल सही! पर एक काम करना। कल छड़ी की जगह ठंडे पानी की एक बोतल लेकर आना।”

उसने मुड़ कर देखा तक नहीं!

Post – 2016-06-22

कुछ भाव की कुछ बेभाव की

आज वह सचमुच छड़ी लेकर आया था। ‘’हां अब बोलो!’’

‘’बोलने को तो एक ही बात है यार, कि प्रतिरोध क्षमता कम हो जाय तो बीमारियों का अन्त नहीं होता। स्वत्व खोकर दूसरे जैसा बनने की कोशिश में तुम दूसरा तो बन नही पाते, आत्मबल भी क्षीण होता जाता है, प्रतिरोध क्षमता घटती जाती है और फिर समस्याएं इतनी अधिक और उग्र हो जाती हैं कि तुम उनको ठीक से देख नहीं पाते हो, एक को समझने चलते हो तब तक दूसरी प्रचंड रूप धारण कर लेती है, समाधान तलाशने के लिए जिस सुस्थिरता और घैर्य की अपेक्षा होती है वही चुक जाता है।

‘’हमने आज तक अपनी समस्याओं से मुंह चुराया है, अपनी छोटी से छोटी समस्या का समाधान करने की दृढ़ इच्छाशक्ति प्रकट नहीं की। यह दृष्टि और संकल्प केवल गांधी में थी, समस्या की पहचान भी, समाधान का संकल्प भी और समाधान की योजना भी, उसके लिए अहर्निश प्रयत्न भी। और इसका निपट अभाव, भारतीय समाज, संस्कृति, मनोरचना किसी को भी समझने के प्रति दारुण उपेक्षा और किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द सत्ता हासिल करने की व्यग्रता कम्युनिस्टों में थी! हमारे वामपंथी विचारक भले हमेशा हाशिये पर ही रहे हों, पर सबसे अधिक मुखर वे ही रहे हैं और नौजवानों में सबसे अधिक नहीं तो भी बहुत अधिक लोकप्रिय आरंभ से ही रहे क्योंकि नौजवान में जोश होता है, वह भी एक झटके में ही कुछ कर गुजरने और बदलने को आतुर रहता है! नौजवानों के पास सपना था पर समझ नहीं, कम्युनिस्टों के पास सपने बेचने का एकाधिकार था परन्तु न समझने की योग्यता, न अपना दिमाग नहीं, न परिश्रम करने की आदत! लगभग सभी आरंभ से समाज के परजीवी तबके से निकले हुए थे और अपना जनाधार तैयार करने के लिए किसी भी कारण से एकट़ठा हुए जत्थे जहां भी मिल जायं उनको झपटने की तैयारी में रहते थे और आज तक रहते हैं! वे कारखानों के मजदूर भी हो सकते थे या कालेजों और विश्वविद्यालयों के छात्र । डनकी जनता में पैठ कभी बनी ही नहीं! इसे दुबारा दुहरा दूं कि वे अमर बेलि की तरह पहले से लहराते हुए झाड़ो और झाड़ियों पर छा जाना चाहते थे।

‘’गांधी इस देश की रंग रंग को समझते थे और ये गांधी तक को समझने की योग्यता नहीं रखते थे इसलिए उनको अव्यावहारिक ठहराने में सबसे बड़ी भूमिका इनकी ही रही। अपनी दर्शनी वामपन्थिता के कारण उसका बुखार नेहरू पर भी पड़ा।

‘’गांधी जी के सामने बहुत पहले से साफ था कि स्वतन्त्र भारत का प्रधान नेहरू को न बनाया गया तो उनकी भूमिका जिन्ना की तरह ही सत्यानाशी हो सकती है। गांधी जिन्ना के बाद कोई दूसरा सत्यानाशी पैदा करने का साहस जुटा नहीं सकते थे। इसलिए यह जानते हुए भी कि उनके सपनों को साकार करने की क्षमता, सादगी और समर्पण भाव पटेल में ही है, वह अपने को समझा चुके थे कि नेहरू की महत्वाकांक्षा की राह में वह नहीं आएंगे! वह बार बार उनको ही अपनी कार्ययोजना के महत्व को समझाने का प्रयत्न करते और यह प्रयत्न अन्तिम दिनों तक जारी रहा, पर नेहरू उन्हें पिछड़े दिमाग का मानते थे और उनके सुझावों का उनके सामनेसे भी विरोध करते थे। उनकी समझ थी कि दुनिया इतनी आगे बढ़ गई है कि इतने पीछे लौट कर शुरुआत करना देश को पीछे ले जाना होगा! वह एक झटके में देश का दुनिया के विकसित देशों की बराबरी पर लाना चाहते थे और उनके यहां जो विकास हो चुके थे जल्द से जल्द कर दिखाना चाहते थे। नेहरू जी स्वयं भी इस विषय में सचेत नहीं थे कि वह अन्तर्विरोधें का संगम थे और इसलिए उूपर से बहुत सुलझे दिखाई देने के बाद भी भीतर से नितान्त भाववादी, स्वप्नजीवी और बहुत कन्फयूज्ड थे। नानएलाएन्ड की कल्पना, मिश्रित अर्थव्यवस्था का चुनाव, आधा अमेरिका आधा सोवियत संघ बराबर भारत का भविष्य में इसे देखा जा सकता है। परन्तु उस दौर में जो आभामंडल था उसमें मेरी तो कोई औकात नहीं, बड़े बड़े भी इसे भांप नहीं सकते थे।

” गांधी की दृष्टि साफ थी। उनके चिन्तन में अन्तर्विरोध न था! उनकी योजनाओं में एकांगिता नहीं थी, उनके सामने केवल सत्ता नही, समाज की गरिमा थी। अपने समाज की सीमाओं में संभव उपायो को ध्यान में रखते हुए, शिक्षा, कौशल और रोजगार, शिष्टाचार, आरोग्य, और नैतिक आत्मोत्थान सभी पक्षों का एक समन्वित कार्यक्रम उनके पास था। कहें, उनके पास वह था जिसके आश्‍वासन लोकतन्त्री व्यवस्था में लोग सत्ता पाने के लिए करते हैं पर न उसका खाका उनके सामने होता है न उसकी याद उन्हें बाद में आती है। ‘’

उसने कुछ कहा नहीं, गला साफ किया और छड़ी को बाईं ओर से दांए हाथ में लंबवत पकड़ कर उसकी मूठ अपनी मुट्ठी में ले ली।

मैंने मुस्कराते हुए उसकी चेतावनी का सम्मान किया, ‘’गांधी जी नेहरू को केवल यह समझाना चाहते थे कि सबसे समृद्धि और सुख को बढ़ाने से भी अधिक जरूरी है। यह आदर्श राज्य की युगों पुरानी भारतीय अवधारणा थी, जिसमें आदर्ष राज्य की कसौटी थी दैहिक, दैविक, भौतिक ताप से समस्त प्रजा को मुक्ति दिलाना! प्रहृष्टम मुदितो लोकः तुष्ट : पुष्टि: सुधार्मिकः । निरामयो हृयरोगष्च दुर्भिक्ष भय वर्जितः !! …न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्कर भयं तथा! नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्य युतानि च!

”गांधी अपने कामगारों को उनका कारोबार और पुराना औजार और उपकरण वापस कराना चाहते थे जिसके उत्पादों का मुकाबला ब्रिटिश पूजीपति अपने मशीनी उत्पाद से भी नहीं कर पा रहे थे और इसलिए उन्होंने इसे बलप्रयोग से बन्द किया था। उससे आगे का विकास वे स्वयं अपनी आवश्‍यकता, प्रतिभा और साधनों के अनुसार करते जाते। यह वह रास्ता था जिसे कम्युनिस्ट चीन ने अपनाया और किसी भी अन्य देश की अपेक्षा अधिक तेजी से विकास किया। गांधी का रास्ता आर्थिक आत्मनिर्भरता, आत्मिक और बौद्धिक स्वतंत्रता और दूरगामी विकास का था। नेहरू इसे समझने में अक्षम तो थे ही, हमारे अधिकांश बुद्धिजीवी आज भी इसे समझने में अक्षम हैं इसलिए इसके लिए अकेले नेहरू को दोश देना भी सही नहीं है।‘’

वह मुस्कराने लगा! छड़ी को उठा कर दो तीन बार नीचे की ठक् ठक् बजाया पर बोला इस बार भी नहीं! मुझे भी लगा कि यदि यह काम यह पहले से करता तो हमारा बहुत सारा समय इधर उधर की बातों में बर्वाद न हुआ होता! मैंने जब उससे अपना विचार प्रकट किया तो उसने कहा, ‘’जानते हो तुम क्या कह रहे हो और इसका इनाम क्या होता है।‘’

मैं सचमुच इस विषय में सावधान नहीं था, बल्कि यह भी तय करने से पहले ही कि इसे उससे कहना चाहिए या नहीं, असावधानी में ही कह गया था! उसी ने बताया, ‘’तुम अपनी जबान नहीं बोल रहे थे, विज्ञापनों के एक घिसे हुए जुमले को दुहरा रहे थे, और इसका इनाम था, थप्पड !’’

‘’बात तो तुम्हारी ठीक लगती है पर इस तर्क से तो थप्पड़ तुम्हें पड़ना चाहिए था कि तुमने पहले छड़ी का ऐसा उपयोग क्यों न किया, पर मैं चाह कर भी तुम्हें थप्पड मार नही सकता था क्योंकि तुम्हारे हाथ में छड़ी है।

‘’देखो, दीवानगी में भी होश न खोने वाले पतंग लौ पर जान देने की जगह उस के चारों ओर मडराते रहते हैं! मैं विषय से भटक कर भी विषय के आभावृत्त में ही मंडराने वालों में हूं इसलिए मेरे कहे का जो व्यर्थ लगा वह भी व्यर्थ नहीं है।

‘’मैं कह रहा था कि आत्मनिर्भरता की नीति से हट जाने के कारण हमने परजीवियों की और पीड़कों की जमातें पैदा की जिनके अनन्त रूप तैयार हुए जो तेजी से आगे बढ़ने और ऊपर चढ़ने की उसी आतुरता की अभिव्यक्तियां थी जिसमें नेहरू जी एक झटके में भारत को पश्चिम की बराबरी पर लाने के लिए व्यग्र थे और इससे उपजी विडंबनाओं को उग्र रूप धारण करने से पहले ही रोकने के लिए मध्यकालीन आडंबरों को अपनाना पड़ा जिनमें यतीमखाने, लंगर, सदावर्त, धर्मशालाओं के नए रूप आए।

”गांधी की योजना में आत्मोत्थान की चुनौतियां थीं, दैन्य और कातरता के लिए जगह नहीं थी! व्यवस्था ने ही यह संभावना पैदा की कि कुछ लोग बहुत अधिक धनी हो जाएं और दूसरे पहले से अधिक विपन्न हो होते हुए आदमशक्‍ल कीड़ों में बदल जाएं। तन्‍त्र बड़े उद्योग के साथ था, धनिको के साथ था इसलिए गरीबों को अपनी सदाशयता के जाल से छलने की कोशिश में उसे यह तो करना ही था! परन्तु ये वे टोटकेके हैं जिनसे मनुष्यता का पतन होता है! देश स्वाभिमानी बनने की जगह परजीवी बनता चला जाता है और परजीवी बनने का अर्थ है जीवट का अभाव। अब उन समस्‍याओं के समाधान के लिए वह सरकार का मुंह देखने लगता है जो उसकी निजी हैं और जिनका समाधान वह स्‍वयं कर सकता था, पहले से करता आया था। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे लोगों की संख्या में निरंतर वृद्धि, जाटों, कुर्मियों और पटेलों जैसी स्वाभिमानी जमातों से उतर कर टुकड़खोरी के लिए संघर्ष करना इसी प्रक्रिया का हिस्‍सा है!’’

उसने छड़ी पर कुछ इस तरह का दबाव डाला कि जिसका अर्थ था, वह उठ कर चलना चाहता है!

मैंने कहा, ‘’रुको! मैं जानता हूं तुम्हारे दिमाग में कितनी बातें अंट सकती हैं! अधिक कुछ नहीं कहना है, बस यह पूछना है कि गांधी अपने देश, समाज और इतिहास की जनवादी समझ रखते हुए आधुनिक और अपने समय से अधिक आगे थे या किताबों से देश को समझने वाले और किताबी दुनिया में ही कैद रह कर मध्ययुग के नुस्‍खों की वापसी कराने वाले नेहरू आधुनिक थे। और एक बात और, इस बात पर गौर करो कि जिस प्रगतिशीलता और प्रगतिवाद के डंके बजाए जाते रहे उसमें दुखी मनुष्य के नाम पर बहुतों की अपेक्षा अधिक सुखी रोजगार पाए हुए मिल मजदूरों के लिए जगह थी, पर यातना के दूसरे रूपों के लिए नहीं! और उन्हीं के कारनामों से मिलें बन्द हुंईं, मिल मजदूर बेकारों की जमात में शामिल हो गए, और पहले से अधिक विपन्‍न और बेसहारा हो गए। सामाजिक भेदभाव के सताए और अस्पृश्य समझे जाने वालों ने यदि पहली बार किसी को अस्पृश्य समझा तो तुम्हे और तुमको पता ही नहीं!
तराना पुराना ही गाते रहेंगे
हम लोगों को लल्लू बनाते रहेंगे!
बहुत फायदे हैं, इन्हें गिन के देखो।
हम आने ही वाले हैं आते रहेंगे।
आलसी, धूर्त, कामचोरों और लफ्फाजों की इतनी बड़ी और इतनी ताकतवर जमात जो पसीना नहीं बहा सकती पर खून बहा सकती है, इतिहास में पहली बार पैदा हुई जिसने एक अच्छे खासे दर्शन को कर्मकांड में बदल दिया और वामपंथी शंकराचार्यों से बौद्धिक जगत को भर दिया।

Post – 2016-06-21

एक सन्नाटा है पसरा हुआ सन्नाटे सा
कई युगों की दहाड़ों से पुकारों से बना !
उसी में धुलता हुअा आर्तनाद भी है एक
कई युगों के साफ पाक विचारों से बना
कट गए मिट गए हैवानों के जंगल कब के
एक जंगल है गगनचंुबी मकानो से बना।
उन्हीं में गूंजता टकराता हुआ घूमता है
चैनलों, खबरनवीसो के बयानों से बना
काटने, कटने, मिटा, मिट कर बचाने का जुनून
कमीनेपन से और खाने कमाने से बना ।
कोई सुनता नहीं भगवान तेरा राग है यह
कई तंजों से कई तरह के तानों से बना ।

21 जून 2016

Post – 2016-06-20

आज का दिन शगल में ही निकल गय। सोचा विषय पर लौटूं पर लगा आराम बड़ी चीज है सिर तान के लिखिए लिखने काे न हो कुछ तो अधिक शान से लिखिए, इस लिए सोचा आज का दिन इन पंक्तियों के साथ ही विदा ले:

सोचिए हम भी उसी राह के पत्थर नि`कले
जिस पर सर फोड़ कर बैंडेज लगाए फिरते थे
देखिए हम भी उसी इश्क में बर्वाद हुए
जिसके चर्चे भी जहां से छिपाए फिरते थे!
देखिए हमको बहुत याद आ रहे हैं आप
आप हमको हम आपको मिटाए फिरते थे
देखिए कितने भरम टूटते हैं बनते हुए
सोचिए हम भी कभी सिर झुकाए फिरते थे

Post – 2016-06-20

क्षेपक का शेष

”तुम्‍हें पता है सभी सभ्‍य देशों में लोग कुत्‍ते पालते है ।”

”सभ्‍य न कहो, आगे बढ़े हुए देश कहो। सभ्‍य लोग कुत्‍तों से दूरी बना कर रखते हैं। वे कुत्‍तों का पोसते हैं, पालते नहीं।”

”अरे यार, पालने और पोसने में क्‍या फर्क पड़ गया । शब्‍दों का फेर है।”

”पालने में अपना बना कर रखने का भाव है। पोसने में उनको उपयोगी पाकर उनके पोषण के लिए के लिए अपने आहार में से कुछ निकाल कर बाद में उनके लिए रख देने का भाव है जैसा भारत में गांवों में आज भी किया जाता है। ये सामाजिक कुत्‍ते होते हैं। पूरे मुहल्‍ले की पहरेदारी करते हैं।”

”परन्‍तु वे उतने स्‍वामिभक्‍त नहीं होते जितने पालतू कुत्‍ते।”

”तुम्‍हें कहना चाहिए वे उतने गुलाम नहीं होते जितने सामाजिक कुत्‍ते परन्‍तु यदि कोई उनका निय‍मित प्राप्‍य देता रहता है तो वे इतने सहायक होते हैं जिसकी कल्‍पना पालतू कुत्‍तों से नहीं की जा सकती। मैंने एक बार अपने पास पड़ोस के एक कुत्‍ते का किस्‍सा तुम्‍हें सुनाया था जिसके लिए मैं कुछ अंश निकाल कर बाहर उसके लिए बने बर्तन में डाल दिया करता था और उसे इसका समय पता था इसलिए पहुंच जाता था। वह मेरी बेटी को कालेज जाने के समय कहीं भी होता, लगभग एक किलोमीटर दूर तक बस अड्डे तक छोड़ने जाता। जब तक बस नहीं आ जाती और वह उसमें बैठ नहीं जाती वहीं खड़ा रहता, और फिर अपनी चाल से लौट आता। यह काम पालतू कुत्‍ते नहीं कर सकते क्‍योंकि उनको वह आजादी नहीं मिली होती है जो इन कुत्‍तों को मिली रहती है।”

वह हारे हुए की तरह चुप लगा गया ।

मैंने कहा, ”पश्चिम में अधिकांश समाज अभी कुछ शताब्‍दी पहले तक चरवाही पर पलते रहे हैं और उन्‍हें कुत्‍तों को उसी तरह पाल कर रखना होता था जैसे कई बार हमारे यहां भी भेड़ पालने वाले करते हैं। अपनी भेड़ों को भेडियों से बचाने के लिए भी उन्‍हें इसकी जरूरत होती। फिर गुलामी का दौर आया और गुलामों को डराने, धमकाने, भागने से रोकने के लिए पालतू कुत्‍तों की जरूरत होती। गुलामों की सेवा के आदी समाज को अपना हुक्‍म मानने वाले जान वर की जरूरत अनुभव हुई और उसका परिणाम है ये विविध प्रकार के कुत्‍ते।

”इसलिए कुत्‍ता पालने का सभ्‍यता से कोई सीधा संबन्‍ध नहीं, कुत्‍तों को पोसने का कुछ हद तक हो सकता है।

”हमारे यहां कुत्‍ता पालने वाले उनके कुत्‍तों से भी गए बीते हैं, क्‍योंकि उनके कुत्‍तो के लिटर का खयाल वे खुद रखते हैं। हमारे यहां उनकी नकल तो करते हैं लेकिन नकल करने वालों में आत्‍मसम्‍मान का भाव नहीं होता अन्‍यथा मुंह बिदकाने वालों का नित्‍य सामना होने के बाद वे अपनी आदत में तो कुछ सुधार करते। रास्‍ता चलना मुश्किल कर देते हैं ये कम्‍बख्‍त।”