Post – 2017-03-18

भाषा और समाज
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रामविलास जी ने भाषाशास्त्र के क्षेत्र में कुछ बहुत महत्वपूर्ण स्थापनाएं दी थीं। तुलनात्मक भाषाविज्ञान के क्षेत्र के अन्यतम विद्वानों में उनका स्थान होना चाहिए। उनका दुर्भाग्य यह कि वह हिन्दी में लिख रहे थे, हिन्दी का दुर्भाग्य है कि इसमें अपने अध्यवसायी विद्वानों की कृतियों को समझने तक की योग्यता और फुर्सत जिन्हें नहीं रही है वे अपने निकम्मेपन की क्षतिपूर्ति के लिए उनका अपमान करते रहे हैं और यदि किन्ही लोगों ने उनके समर्थन में कुछ लिखा तो उन्हें उनका भक्त कह कर अपमानित करते रहे हैं। रामविलास जी के साथ ऐसा ही हुआ।

हिंदी में निंदा का काम जितने योजनाबद्ध रूप में किया जाता है उसका दसमांश भी रचनात्मक प्रतिस्पर्धा होती तो हिंदी वांग्मय इतना सम्रद्ध होता कि हिंदी लेखकों को बात बात में अंग्रेजी लेखकों के उद्धरण देकर अपने को दूसरों से अधिक जानकार सिद्ध करने कि व्याधि से मुक्ति मिल जाती। टुच्चेपन को महिमा कि पहचान बना देना उथले लोगों की करतूत हो तो लोग उनकी औकात समझ कर उन्हें दरकिनार कर दें] परंतु टुच्चापन गम्भीर कार्यों में बाधक बने] उसकी उपेक्षा ही नहीं उसको निंदनीय कह कर विज्ञापित करने लगे तो और प्रचार साधनों पर ऐसे ही लोगों के अधिकार के कारन, ऐसे कामों और प्रयत्नों के प्रति उदासीनता का वातावरण तैयार हो तो हम किसी भाषा और समाज की नियति को समझ सकते हैं।

कुछ दिनों से एक विचित्र अभियान चल रहा है। लोग हिंदी बचाने पर जुट गए है। यह इस्लाम खतरे में का हिंदी अनुवाद है। जज्बाती नारे खुराफाती दिमाग की उपज होते हैं और खुराफाती लोग किसी चीज में निष्ठा नहीं रखते। वे अपने को आगे बढ़ाने के लिए हमारी सबसे मूल्यवान और पवित्र निधियों को सरे बाजार बेच सकते हैं। खतरा उन्हें हिंदी की बोलियों से है। इन दिनों भोजपुरी से है। ये बोलियां वे हैं जिन्होंने हिंदी को अपने सर उठा रखा है और आगे भी उठाये रहेंगी।
यह कुछ वैसी ही मुहिम है जैसे कोई सोचे कि शूद्रों को बढ़ने का या बराबरी का अधिकार मिल गया तो हिन्दू समाज खतरे में पड़ जाएगा इसलिए हिन्दुत्व की रक्षा के लिए शूद्रों को दबा कर रखना होगा। मेरी समझ उलटी है। हमारे शरीर का प्रत्येक अंग निरोग और स्वस्थ हो तभी हम स्वस्थ हो सकते हैं। सभी स्वस्थ अंग एक दूसरे के सहायक होते है] और इस तरह सभी अपने अबाधित रूप में ही हमे वह निश्चिन्तता दे पाते हैं जिसमे उनके होने के प्रति हम सचेत तक नही रहते। हमारे पास दिल है] वह लगातार बिना आराम किये रातदिन इतना विकट काम कर रहा जिसकी हम कल्पना भी नही कर सकते। पर वह हमारे सीने में है यह तब पता चलता है जब उसमे खराबी आ जाती है। यदि क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी पहचान की ललक पैदा हुई है तो इसका कारण तलाशना होगा।

कारण यह है कि दबे और पिछड़े लोगों को हिंदी भी संस्कृत जैसी लगती है। उन्हें पाठशालाओं से डर लगता है। आंचलिक बोलियों के क्षेत्र के शिशु को स्कूल जाने से डर लगता है – किसी की छड़ी के कारण नही, उस भाषा के कारण जो उनके ऊपर बिना किसी पूर्वसूचना के लाद दी जाती है। एक से दूसरी में स्थानांतरण बिना किसी मध्यवर्ती चरण या प्रिपरेटरी कोर्स के! यह झटका उन कारणों में से एक हो सकता है जिनको हिंदी के प्रति उस भावनात्मक लगाव की कमी में अनुभव किया जाता है। प्रश्न उठेगा कि क्या दूसरी राज्य भाषाओं की अपनी बोलियां नहीं रही हैं और क्या उनमे वह लगाव नही है जिसकी हम हिंदी क्षेत्र के बारे में शिकायत करते हैं।

मैं इस पर चलते राह कुछ कहूँ तो उस पर भरोसा न करें, परन्तु अपनी जानकारी में मुझे किसी राज्यभाषा क्षेत्र में इतनी सशक्त और साहित्य&समृद्ध भाषा] उपभाषा या बोली का पता नहीं है जितनी हिंदी क्षेत्र में पाई जाती हैं। यदि हिंदी का शिक्षाशात्रीय उपयोग वैज्ञानिक तरीके से हुआ होता तो हिन्दी के प्रति वह अनुराग पैदा किया जा सका होता जिसके लिए हिंदी प्रदेश की एकता और भाषा के प्रति अनुराग पैदा करने के प्रयास में रामविलास जी ने अपना खून पानी किया।

अनुराग या भावात्मक एकजुटता का एक भौतिक आधार होता है। मोहभंग का भी एक कारण कार्य सम्बन्ध होता है। हिंदी देशभाषा तक न बन पाई, जलसेबाजों ने इसे विश्व भाषा बना दिया] हिंदी विश्व सम्मेलन करके वे जश्न मनाने लगे। विश्व में जिन भी दुर्भाग्यपूर्ण कारणों से हिंदी की एक बोली का प्रसार हुआ था वह भोजपुरीभाषी गिरमिटियों के कारण था । ऐसे में भोजपुरीभाषियों को अपने जश्न का अवसर क्यों न याद आता? भोजपुरी की हिंदी से होड़ तो तभी आरम्भ हो गई जब हिंदी के मजमेबाजों को भोजपुरी की व्यापकता का अपहरण करना आरम्भ कर दिया ।

भाषा राजदरबार में पहुंच कर अपना सत्व खो देती है। भाषा को जनता बनाती, सत्ता लादती और सर्जक समृद्ध करता है। यह समझ लुप्त हो गई है। राज्य भाषा को भ्रष्ट करता है। किसी अनुसूची में आकर महत्व पाने की लालसा किसी भाषा के लिए अनिष्टकर है। पर इससे हिंदी को इतना खतरा पैदा हो जाय कि वह आर्तनाद करने लगे यह अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है।

संख्याधिक्य के कारण हिंदी को लाभ मिल चुका है। मनोबल की कमी के कारण वह राजभाषा न बन पाई। हिंदी राजभाषा है। मैं अपने पूरे सेवाकाल में हिंदी में काम करता रहा। इसके दम पर मैं अंग्रेजी भाषा में काम करने वालों पर भारी पड़ता रहा! आप राजभाषा के जंग में न उतरें। वह जीता जा चुका है । समस्या जीतने की नही, जीते हुए भूभाग को बसाने और उसमे व्यवस्था कायम करने की है।

अपने से सवाल करें, आप कितना काम हिन्दी में करते हैं? जहां द्विभाषी फॉर्म उपलब्ध है उनको किस भाषा में भरते हैं? अपने हस्ताक्षर किस भाषा में करते हैं?

समस्या हिंदी को राजभाषा बनाने की नहीं अंग्रेजी के वर्चस्व को कम करने की है। आंदोलन उसके लिए किया जाना चाहिए। हिंदी में अपना ऐसा काम करते हुए किया जाना चाहिए जिसमे विकल्प खुले हैं। रामविलास जी की चिंता का मैं आदर करता हूँ पर सभी मामलों में उनसे पूरी तरह सहमत नहीं हो पाता।

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हम अपने विषय पर आएं। रामविलास जी की जिन स्थापनाओं की बात कर रहा था उनमें एक है भारोपीय की आदि जन्मभूमि वह अंचल रहा है जिसमें घोष महाप्राण ध्वनियां बहुत प्रबल रही हैं। आज भी उस क्षेत्र से बाहर किसी भी दिशा में जायं] महाप्राणता क्षीण पड़ती जाती है। यह क्षीणता भारतीय भाषाओं में भी लक्ष्य की जा सकती है। दूसरी बात यह कि हम जिस वर्णमाला का प्रयोग करते हैं] वह कई भाषाओं की ध्वनिमाला के संयोग से बनी है। आरंभ में किसी भाषा में सभी ध्वनियां नहीं पाई जाती थीं। इसके अतिरिक्त जिन भाषाओं में कोई ध्वनि पाई जाती थी जरूरी नहीं की किसी वर्ग की पांचों ध्वनियां उसमें पाई जाती रही हों ।

हम पाते हैं आज भी इस देश में एक भाषा ऐसी है जिसमें वर्गीय अक्षरों की प्रथम और अन्तिम ध्वनि नही पाई जाती है। दूसरी भाषाओं के संपर्क के कारण संस्कृत शब्दों में आने वाली शेष ध्वनियों को लेकर काफी भ्रामक स्थिति देखने में आती है। यह भ्रामकता आर्यभाषाओं में भी कुछ ध्वनियों को ले कर देखने में आती है। बंगाली ण, य, व, स, ष का ही नहीं अ, ऐ, औ जैसी ध्वनि का भी उच्चारण नहीं कर पाता । इससे मिलती-जुलती स्थिति अनेक ध्वनियों को लेकर दूसरी आर्यभाषाओं और उसकी बोलियों में भी है।

रामविलास जी सोचते थे कि इन ध्वनियों के केन्द्र अलग थे और हमारी ध्वनिमाला का निर्माण उन केन्द्रों के निकट आने से हुआ है। यहां पर मेरी उनसे कुछ असहमति है, क्योंकि मुझे प्रारभिक अवस्था में ही सभी क्षेत्रों में ठीक अपने पड़ोस में दूसरी भाषाएं बोलने वालों के जत्थों का अस्तित्व आहारसंग्रह के चरण से ही दिखाई देता है और सामाजिक निर्माण की प्रक्रिया में इनके मेल जोल से आंचलिक भाषाओं का निर्माण हुआ । प्रश्न इनके अनुपात या कौशल या प्रभाव का था जिसमें अग्रणी बोली में दूसरो का मिश्रण होता गया।

हमने ‘ती’ ध्वनि के ‘दी’, ‘धी’ में बदलते और यूरोपीय संदर्भ में ‘दी’, ‘जी’, ‘थी ‘ में बदलते देखा वह मूलतः किस भाषा का शब्द था जिसे दूसरों ने अपनाया यह तय करना भी आसान नहीं है। जिस तरह अघोष अल्पप्राण और अनुनासिक ध्वनियों वाला समुदाय है जिसमें घोष और महाप्राण ध्वनियां नहीं मिलतीं, उसी तरह संभवतः घोषमहाप्राण प्रेमी समुदाय में अघोष अल्पप्राण ध्वनियां न रही हों, इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। कहे ध्वनिमाला का निर्माण सामाजिक निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा है और यह इस बात का प्रमाण है कि रेस या नस्ल जैसी किसी चीज की भारत में कल्पना भी नहीं की जा सकती। शूद्र और ब्राह्मण में इस मामले में कोई फर्क नहीं किया जा सकता।

Post – 2017-03-17

भाषा और समाज
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मैं केवल एक बार को सुनीतिकुमार जी से मिला था। 1970 में उन दिनों स्थाननामों पर काम कर रहा था। मुझे उनसे कुछ स्पष्टीकरण चाहिए था। नियत समय पर पहुंचा। चर्चा आरंभ करने के लिए उनकी एक पुरानी मान्यता का हवाला दिया जिसमें उन्होंने भारत से कृषिविद्या का ज्ञान लेकर चीन पहुंचे आस्त्रिक जनों का और उनके साथ ही नदी के लिए गंगा शब्द गांग, ह्वांग, आदि चीनी नदियों के नामों का उल्लेख किया था। उनका मानना था कि गंगा का अर्थ नदी है, जो नदी विशेष के लिए स्थिर हो गया।

उन्होंने कहा, वह मान्यता गलत थी, इसलिए उसे छोड़ दिया।

मैंने कहा, गलत तो थी, परन्तु उसे छोड़ दिया यह और गलत किया। सुनीतिबाबू चकित, उनका मनोरंजन भी हुआ। उनको जिज्ञासा करनी ही थी कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं। मैंने बताया गंगा का अर्थ नदी नहीं है, कं, गं का अर्थ पानी है और इसलिए जलतटीय स्थलों में कं/कन् का प्रचुर प्रयोग मिलता है। गं को गगरा, गगरी, गंगाल में भी देख सकते हैं जिसका अर्थ जलपात्र है न कि नदी पात्र। कं/कम् को कंज और कमल में देख सकते हैं जिसका अर्थ जलज है।

इसके बाद मेरी उनसे घंटे डेढ़ घंटे तक बात हुई और उन्होंने कहा, तुमको मेरे पास आने के लिए अपाइंटमेंट लेने की जरूरत नहीं है, जब चाहो सीधे मेरे पास आ सकते हो। मैं उनसे दुबारा नहीं मिला क्योंकि स्थाननामों पर काम कर रहे कुछ लोगों का नाम उन्होंने सुझा कर उनसे संपर्क करने को कहा, पर वे लोग पुराने ख्यात स्थाननामों की पहचान कर रहे थे जिनका अर्थ और इतिहास सबको पता था, मैं ऐसे स्थाननामों का अर्थ पता लगाने का प्रयास कर रहा था जो बेतुके लगते है।

मैंने यह उल्लेख इसलिए किया कि भाषा पर काम करते हुए व्युत्पत्ति को ले कर बड़ी मनोरंजक गलतियां होती हैं क्योंकि हम आवेश में कुछ कड़ियों का ध्यान नहीं रख पाते । पतंजलि ने तो एक शब्द तक के सम्यक ज्ञान को एक महान उपलब्धि बताया और बताया भी उस शब्दश्रृंखला के कारण ही जिसमें एक शब्द के अनगिनत रूप् होते जाते हैं और उनके पीछे एक इतिहास और संस्कृति होती है। सच कहें तो एक भिन्न उपस्तरीय भाषा की भूमिका होती है जिसकी ओर उनका ध्यान नहीं जा सकता था, क्योंकि वह विद्वानों की उस ब्राह्मणवादी परंपरा की उपज थे जिसमें यह मान्य था कि सृष्टि से पहले वेद विद्यमान थे, फिर संस्कृत भाषा आदि और नैसर्गिक भाषा हुई ही। दूसरे उसी के अपभ्रंश हैं।

अपभ्रंश का कारण उनके सामने स्पष्ट न था। वेद की आप्तता को नकार नहीं सकते थे, और यह तक नहीं देख सकते थे कि उसी वेद में भाषा की उत्पत्ति का मार्मिक विवेचन है, इसलिए इस मनोबाधा के कारण वेद को भी समझ नहीं सकते थे। यह सीमा स्वामी दयानन्द की भी थी। वेद को उन्होंने हिन्दुओं, क्षमा करें, आर्यों की ‘किताब’ मान लिया था और इसलिए इसकी आप्तता की रक्षा के लिए वह थोड़ी खीेंचतान तो कर सकते थे, पर वेदवाक्य को पुनर्विचार के योग्य नहीं मान सकते थे।

अतः भाषा पर विचार करते समय अतिशय विनम्रता की जरूरत है और इसके बाद भी अपने आंकड़ों की पवित्रता और उन पर विश्वास और उनको मुखर होने का अवसर देना ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। आंकड़ों में चूक हो सकती है, उनकी सही पहचान में चूक हो सकती है, इसे अचूक बनाने में आपकी, आप जितना भी कम क्यों न जानते हों, एक भूमिका हो सकती है। इसका एक उदाहरण राज्याध्यक्ष जी का यह सुझाव था कि दिक दिक्कत से व्युत्पन्न हो सकता है, इसलिए इसे खींचतान कर सही करने से अच्छा है इस आंकड़े को संदिग्ध मान कर इसे छोड़ दिया जाय। जोशी जी ने सुझाया कि टी तमिल के ती से नहीं, चीनी के ते से व्युत्पन्न है। मुझे डिक्शनरी देखने पर लगा उनका मन्तव्य सही है। पाठ में तदनुरूप सुधार कर दिया।

परन्तु इन सुधारों के बाद भी जो बचा रह गया वह सर्वशुद्ध है क्या? यह सही है, क्योंकि इसकी कुछ गलतियों की ओर अभी तक किसी का ध्यान न गया हो सकता है, और तब तक शुद्ध भी है जब तक इसकी कोई दूसरी कमी या इस पद्धति की कमी को निर्णायक रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता।

मेरा अनुरोध है कि आप को जहां भी कोई कमी दिखाई दे, उपकारी भाव से उसे बिना झिझक प्रस्तुत करें, विचार करने के बाद मैं उचित सुधार पाठ में कर लूंगा, प्रत्येक प्रश्न का उत्तर न दे पाऊंगा । अब इसके बाद भाषा और समाज की तीसरी टुकड़ी और इसका विमर्श कल।

Post – 2017-03-17

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अब हम एक ओर तो ऐसे शब्दों और भावों के लिए इस ‘ती’ ध्वनि से साधर्म्य के आधार पर निकले शब्द भंडार पर दृष्टि डालें जिनसे कोई ध्वनि पैदा नहीं होती – तिज, तिग्म, तेज (प्रखर), तेज (पैना), तेज (अधिकता – धूप/रौशनी/भाव आदि ), तेजन, उत्तेजन, तेगा, तीखा/तीक्ष्ण, तिक्त/तीता, तिमिंगल, तिमिर आदि .
दूसरी ओर ती का घोषीकरण और महाप्रानीकरण – थी-, दी-, धी- होते पाते है, और अर्थ प्रकाश और ज्ञान की दिशा में विकसित होता है फिर भी जलने का भाव देवन में बना रहता है. युरप की दिशा में घोषमहाप्राण का उच्चारण नही हो पाता इसलिए अघोषमहाप्राण बन कर थिंक, थॉट, थियो-, में दिखाई देता है. भारतीय भूभाग में थी- का पता नहीं चलता, भोजपुरी में दिकदिकाह हल्के बुखार के लिए प्रयोग में आता है और गर्म करने के लिए धिकाना (धिकावल) का प्रयोग होता है. कहें आग वाला भाव जारी रहता है.
हम दी से व्युत्पन्न दीपक, दीपन, उद्दीपन, देव, दिव, पानी के आशय को अंग्रेजी dew, आदि में देखते हैं. इनकी संख्या विशाल है और आप उनसे परिचित हैं.
धी, धीति, ध्यान से आप परिचित हैं ही. पर अब बताएं कि संस्कृत तिज निशाने तीक्ष्णीकरणे , तिज निशातने और ध्यै चिन्तायाम्, धृ´् धारणे ; धि धारणे के रूप में धातु की कल्पना कर लेती है तो भरोसे की यह धातु है या हमारी अनुनादी श्रृंखला जो बोलियों से लेकर संस्कृत तक की ही नहीं यूरोप की भाषाओं में फैले शब्दभंडार की जड़ों की तलाश करने में सक्षम है ?

Post – 2017-03-16

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भाषा और समाज

हमारी समाज रचना और स्वयं अपने इतिहास को समझने में हमारी भाषाएं कितनी सहायक हो सकती हैं इसकी ओर आपने ध्यान न दिया होगा। ध्यान न देने का एक कारण यह भी हो सकता है कि आप सोचते हैं हमारे पास समग्र भाषा संपदा होती है। उसका कौन सा घटक किस काल का है यह तय करने का हमारे पास कोई साधन नहीं है। हम तो यह तक नहीं कह सकते कि जिन बोलियों के इतिहास की दीर्घता की बात हम कर रहे हैं वे आज से हजार दो हजार साल पहले कैसी रही होंगी। बोलियां बदलती रहती है, शब्दों के अर्थ बदलते रहते हैं, ऐसी दशा में कोई भी ऐसा दावा, जिसका लिखित प्रमाण न हो अविश्वसनीय है।

आप ने मैकाले का वह भारत भर्त्सना कथन तो पढ़ा ही होगा जो उसकी अपनी सोच थी। वह बंगाल को ही भारत मान रहा था। बंगाली भी बंगाल को ही भारत मानते है। खैर दूसरे अंग्रेज भी मैकाले की जबान बोलते रहे।

मुझे मैकाले की इस पीड़ा से शिकायत नहीं है कि यहां की जलवायु में लोहा तक गल जाता है, कोई चीज बहुत जल्द सड़ने लगती है, पर इस तर्क से भारत में न पुरातत्व की आशा की जा सकती है न उसका लाभ उठाया जाता है। खुदाई से पहले जो मलबे का पहाड़ समझा जाता था उसकी खुदाई की सही समझ के बाद मलबे से इतिहास निकलने लगता है, जिसे सन संवत में बांधने की समस्यायें भले हों, उनका स्तरभेद समझने में कोई चूक नहीं होती। इसलिए अतीत को जानने का हमारा सबसे भरोसेमन्द अनुशासन, पुरातत्व, तिथि को नहीं मानता, स्तरभेद को मानता है।

तिथि में धन-ऋण दोनों लगाकर बात करता है, जिसे अपने पूर्वाग्रह से लोग धनाधन और ऋणाऋण बना देते हैं, परन्तु स्तर भेद को ले कर उसके मन में कोई दुविधा नहीं होती। रंचमात्र की भी नहीं। भाषासंपदा पुरातत्व की पार्थिव संपदा जैसी ही है। जो इसके विश्लेषण का सही तरीका नहीं निकाल पाएगा, उसके लिए इसकी संपदा युगों के मलबे की ढेर प्रतीत होगी।

मैं अकेला मूर्ख हूं जो यह मानता है कि भाषा विवेचन, या पुराभाषाविज्ञान पार्थिव पुरासंपदा के विवेचन से अधिक महत्वपूर्ण है। इसमें अनिश्चितताएं पार्थिव पुरातत्व से भी कम हैं। पुरासंपदा बेजबान है और भाषाविज्ञान के पास जबान ही जबान है. इसकी इतनी भिन्न व्याख्यायें की जा सकती हैं कि पाणिनि की महिमा को स्वीकार करते हुए मुझ जैसा अदना व्यक्ति सबको नकारता और सबको सर झुकाता यह निवेदन कर सकता है की पाणिनि को भी संस्कृत की निर्माण प्रक्रिया का पता न था। इस हिमाकत पर मुझे मुझे सर फिरा तो माना जा सकता है, मेरे तर्कों की उपेक्षा नहीं की जा सकती.

बात तिथिक्रम ये आरंभ हुई थी इसलिए आज लगे हाथ तिथि के झोंझ को छेड़ते हैं। झोंझ केवल लाल चींटों के उस खतोने या नीड के लिए प्रयोग में आता है जो चारों ओर से पत्तियों को चिपका कर बना होता है, और जिसे किसी ने छू दिया तो उसकी खैर नहीं।

हम आग के लिए तमिल में परिरक्षित ‘ती’ और उसी में प्रयुक्त ‘ती’ अर्थात पानी, मीठापानी को लें जिसे चाय के लिए अंग्रेजों ने चुन लिया। ती का अर्थ था, पानी। फिर जैसे रस के साथ हुआ, इसके साथ भी हुआ। यह मीठे पानी के लिए प्रयोग में आने लगा। इसे ही अंग्रेजों ने चाय के लिए अपना लिया जिसे हम उनके प्रभाव में या तो टी बोलते हैं या चाय ।

यह ती जिसका अर्थ आग भी है और मीठा पानी भी वह तमिल में वैदिक और संस्कृत की अपेक्षा अधिक सुरक्षित है। परन्तु यह ऐसी भाषा नहीं है जिससे सभी परिवारों की भाषाएं पैदा हुई हों, अपितु ऐसी स्थिति जिसमें एक रहस्यमय लेन देन के कारण यह पता ही नहीं चलता कि कौन सा शब्द किस परिवार या भाषा का है और यह गहनता हमें चकित करती है।

जैसे रस सरस या मीठा के लिए प्रयोग में आता है, उसी तरह ‘ती’ भी मीठे पानी के लिए प्रयोग में आने लगा। यह तेलुगु में तिय्यन – मीठा या स्वादिष्ट का जनक है और भोजपुरी के तिउना/तेवना या वह स्वादिष्ट पदार्थ जिसके सहारे रूखे सूखे भोजन को गले के नीचे उतारा जा सके। अंग्रेजी में कैचअप जिस आशय में प्रयोग में आता है और हमारी अपनी भाषा में जिसको चटनी कहा जाता रहा है।

हम मान सकते थे कि ती- आग सं. दी का तमिल ध्वनिसीमा में ग्रहण है। संस्कृत में ‘दी’ प्रकाश ज्ञान आदि के आशय में प्रयुक्त तो होता है, पर आग के अर्थ में मात्र व्यंजित होता है, दीपक, दीपन, देवन और परिदेवन या पश्चात्ताप के आशय में । ‘ती’ पहली नजर में दिखाई ही नहीं देता। पर तभी पता चलता है दिवस के साथ तिथि भी है। दाहकता के आशय में तेज भी है। जलन अनुभव करने के लिए तिलमिलाना भी है। कहने को कह सकते हैं कि आग के लिए संस्कृत में अग्नि है इसलिए यह मूलतः द्रविड़ शब्द हो सकता है, पर तभी तमिल नेरुप्पु – आग की याद आ जाती है जिससे यह उसका भी मूल शब्द नहीं रह जाता।

Post – 2017-03-15

प्राच्यविमुखता का इतिहास – 51

हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि भारतीयों को उच्च पदों पर नियुक्त किए बिना कंपनी या राज का शासन चलने में कोई समस्या थी। यदि होती तो वे इसके लिए प्रयत्न करते। उन्होंने छोटे पदों पर हिन्दुस्तानियों को रखा पर ऊपर के सभी पद अपने हाथ में रखे। अंग्रेजी इतनी सिखाते रहे जितनी से उनका काम सध सके, परन्तु अंग्रेजी को उच्चशिक्षा का माध्यम बनाना नहीं चाहते थे। वे भारत को मध्यकालीन सोच से बाहर आने देना नहीं चाहते थे। हम प्राच्यविदों की प्राचीन भारत की प्रशंसा , या मिल द्वारा मध्यकाल की तारीफ के पीछे उसी राजनीति को काम करते देखते हैं।

अंग्रेजी शिक्षा और प्रशासन में निर्णायक या निगरानी के पदों पर हिन्दुस्तानियों की नियुक्ति की वकालत सबसे पहले चाल्र्सग्रान्ट ने की थी । उसका इरादा भारत के ईसाई करण का था। चाल्र्स ग्रांट ने भारतीयों के अंग्रेजी सीखने से पैदा होने वाली आशकाओं का निराकरण करने के लिए जो तर्क दिए थे उन्हीं से उनके मन में घर कर चुके अंदेशों का पता चलता है । ग्रांट का खयाल था कि अंग्रेजी सीखने वाले ईसाइयत अपना लेंगे और यदि उनको कुछ उच्च पदों पर नियुक्त किया जाय तो इससे ईसाई बनने की ललक पैदा होगी। अंग्रेजी सीखे और ईसाइयत अपनाए ये हिन्दुस्तानी भरोसे के ताबेदार होंगे।

Need we ask whether it would make them better servants and agents, make them more useful and valuable in all the relations of life? Would not such a person be a real accession to European masters; and must it not be supposed, that men professing Christianity, whose interests would be promoted by employing such converts, would not reject them, upon a principle which even Paganism could not justify, that is, because they had honestly followed their convictions?

ग्रांट की सोच यह थी कि संख्या में कम होते हुए भी मुसलमानों ने फारसी को राजभाषा बना कर और उससे अपनी धौंस जमा कर निश्चिन्तता से शासन किया और हिन्दुओं ने उनके सामने कोई चुनौती पेश न की।

To introduce the language of the conquerors, seems to be an obvious mean of assimilating the conqueredpeople to them. The Mahomedans, from the beginning of their power, employed the Persian language in the affair of the government and in the public departments. This practice aided them in maintaining their superiority and enabled them, instead of depending blindly on the native agents, to look into the conduct of public business

मैं एक तरह से इन बातों को दुहराते हुए याद दिला रहा हूं कि कंपनी के कारण इग्लैंड मालामाल हो रहा था। चोर उचक्कों को भी चोरी से अधिक लाभकर कंपनी में नौकरी पाना था, जिसके बाद उनकी कई पीढ़ियों के दुख दूर हो जाते थे। यह कहने की जरूरत नहीं कि ब्रिटिश पार्लमेंट पूरी तरह कंपनी के साथ थी पर दूसरे यूरोपीय देशों की तुलना में वे अपने को अधिक सभ्य और उदार भी सिद्ध कर लेते थे, इसलिए कुछ मामलों में पार्लमेंट के सदस्यों का दृष्टिकोण अधिक उदार था। इसे चार्टर एक्ट 1833 में देखा जा सकता है जिसमें अन्य बातों के अतिरिक्त निम्न व्यवस्था थीः
The section 87 of the Charter Act of 1833, declared that merit was to be the basis for employment in Government Services and the religion, birth place, and race of the candidates were not to be considered in employment.
· This policy was not seen in any other previous acts.k~ So the Charter act of 1833 was the first act which provisioned to freely admit the natives of India to share an administration in the country.

परन्तु ये विधान घड़ियाल के आंसू थे। पार्लमेंट अपने को सभ्य देषों की गणना में अधिक सभ्य दिखाना चाहती थी। उसके हित कंपनी से जुडे़ हुए थे इसलिए उसने 1793 के चार्टर की उस व्यवस्था को खारिज नहीं किया जिससे यह कागज में आ सकता था जमीन पर उतर नहीं सकतामर्ष था। इसे ऐडवान्स्ड हिस्ट्री आफ इंडिया के शब्दों में पढ़ेंः
The Charter Act of 1833 legalised the appointment of Indians even to the highest ffoice of State but the provisions in the Act 1793, still unrepealed, laid down that ‘none but covenanted servants of the Company, could hold any ffoice with a salary of more than £800 a year.

दिया कुछ ऐसे लगा अपना घर लुटा बैठा।
लोगों ने देखा सवाली को कुछ मिला ही नहीं।

इस ऐक्ट में भारतीय विधि व्यवस्था को सुुधार कर आधुनिक बनाने का भी प्रावधान था जिसके लिए मैकाले भारत पधारे थे और गवर्नर जनरल की परामर्शदात्री समिति के चार सदस्यों में एक बने थेः

· First Indian Law Commission: The first law commission was set up by the Charter act of 1833 and Lord Macaulay was its most important member and Chairman.k~ The objectives of the law commission was to inquire into the Jurisdiction, powers and rules of the courts of justice police establishments, existing forms of judicial procedure, nature and operation of all kinds of laws.k~ It was directed that the law Commission shall submit its report to the Governor General-in-council and this report was to be placed in the British parliament.
हम पहले कह आए हैं कि मैकाले ने इसका निर्वाह करते हुए भारतीय दंड संहिता तैयार भी कर दी, उसे मुद्रित भी करा दिया परन्तु हाउस आफ कामन्स के सम्मुख विचारार्थ ही नहीं रखा गया। कारण उसमें सभी विधान इंग्लैंड के अपने दंडविधान जैसे ही थे। बाद में 1861 में संषोधन करके इसे अपनाया गया।
यह सब इस आषंका से प्रेरित था कि इससे भारतीयों का प्रषासन में हस्तक्षेप बढ़ता जाएगा तो वे आगे चल कर संकट भी पैदा करेंगें।

अठारह सौ तैंतीस के चार्टर ऐक्ट के अनुसार भेदभाव रहित चयन प्रक्रिया को अपनाया नहीं गया इसलिए इसे फिर 1861 में दुहराया और एक सीमा तक लागूू किया गया।

सुरेन्द्र नाथ बनर्जी इस सुविधा का लाभ उठा कर ही पहली बार आइसीएस बने थे पर उनके साथ क्या हुआ इसे विकीपीडिया में दर्ज विवरण में देखें। विकीपीडिया को मैंने उद्धरण के लिए इस विवषता में चुना है कि मजूमदार और अन्य द्वारा लिखित ऐडवांस्ड हिस्ट्री आफ इंडिया में यह बहुत बिखरा हुआ है पर है यहीः

He cleared the competitive examination in 1869, but was barred owing to a dispute over his exact age.k~ After clearing the matter in the courts, Banerjee cleared the exam again in 1871 and was posted as assistant magistrate in Sylhet.
anerjee was soon dismissed for making a serious judicial error.k~ He went to England to appeal his discharge, but was unsuccessful because, he felt, of racial discrimination.k~ He would return to India bitter and disillusioned with the British.[1] During his stay in England ;1874–1875), he studied the works of Edmund Burke and other liberal philosophers.k~ These works guided him in his protests against the British.k~ He was known as the Indian Burke.
Upon his return to India in June, 1875, Banerjee became an English professor at the Metropolitan Institution, the Free Church Institution[2] and at the Ripon College, founded by him in 1882.k~ He began delivering public speeches on nationalist and liberal political subjects, as well as Indian history.k~ He founded the Indian National Association with Anandamohan Bose, one of the earliest Indian political organçations of its kind, on 26 July 1876.k~ He used the organçation to tackle the issue of the age-limit for Indian students appearing for ICS examinations.k~ He condemned the racial discrimination perpetrated by British ffoicials in India through speeches all over the country, which made him very popular.

ब्रिटिश हुक्मरानों को यह विश्वास सा था कि बंगालियों की प्रगति से पूरे देश में असन्तोष होगा इसलिए वे इसे क्षेत्रीय समस्या समझते थे। अपने भारत दौरे पर सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी का जितना भव्य स्वागत हुआ, जितने उत्साह से उन्हें सुना गया, उससे पैदा हुई थी वह चिन्ता जिससे एक ओर तो भारतीयों के भीतर आ रहे उफान के मीटरबाक्स के रूप में बहुत कुशलता से लार्ड डफरिन के अनुमोदन से कांग्रेस की नींव डाली गई जिसमें विद्रोही तेवर अपनाने वाले भारतीयों को प्रमुखता से रखा गया था और इसलिए सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को भी होना ही था। यह अंग्रेजों की दहशत का पैमाना तो था ही, इससे घबरा कर उन्होंने अपनी आपदा को टालने के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच टकराव को बढ़ाने की मुहिम तेज कर दी, इसके लिए इस्तेमाल में हाजिर थे सर सैयद अहमद।

यही कारण था कि वह दुहरी सीखी सिखाई नीति पर चल रहे थे जिसका एक पहलू बंगाली बनाम हिन्दुस्तानी था और दूसरा हिन्दू बनाम मुसलमान। परन्तु स्थिति ऐसी थी कि मैं जो इस पूरे विकास और विघटन को परिणामों को देखने के बाद अपना आकलन कर रहा हूं, यदि सर सैयद के स्थान पर होता तो ठीक वही करता जो उन्होंने किया। तत्काल अपनी कौम के लिए अवसर खरीदने के लिए वह यह भुगतान कर रहे थे। कौन तय करेगा कि सर्वशुद्ध निर्णय क्या होना चाहिए था ?

Post – 2017-03-15

दो

हम पहले कह आए हैं कि भाषा श्रुत ध्वनियों का उच्चारण है। जो सुन नहीं पाते, वे बोल नहीं पाते। इसका आरंभ अपने परिवेश की ध्वनियों से हुआ। जिस वस्तु या क्रिया से कोई ध्वनि उत्पन्न होती वही उसकी संज्ञा हो गई । यह कोई नई बात नहीं है । इसे हमारे यहां भी बहुत पहले यास्क से भी पहले उपमन्यु ने सुझाया था । आज लगभग सभी विद्वान मानते हैं कि इस तरह हमारी भाषाओं के बहुत से शब्द अनुनादी हैं । जिस वस्तु से जैसी ध्वनि निकली वहीं उसकी संज्ञा हो गई।

सवाल वहां पैदा हुआ जब उनका सामना वस्तुजगत और भावजगत की ऐसी सत्ताओं से हुआ जिनसे स्वतः कोई ध्वनि पैदा होती ही नहीं। फिर उनके सामने एक और कठिनाई कि इस तरह तो हमें केवल कुछ संज्ञाएं और क्रियायें ही मिल सकती थीं। भाषा का इतना जटिल ढांचा तो तैयार हो ही नहीं सकता था। इसलिए उन्होंने मान लिया हमारी भाषा के केवल कुछ शब्द ही अनुनादी हैं, शेष भाषा की उत्पत्ति रहस्यमय है।

इसी को सुलभाने के लिए चोम्स्की नाम के एक बहुत प्रकांड भाषाविद ने सत्तर के दशक में जेनरेटिव ग्रामर का सुझाव दिया था। उनका विचार था कि हमारी चेतना में निसर्गजात रूप में एक भाषा-व्यवस्था होती है जिसके कारण कुछ ही सालों के भीतर एक शिशु अपनी पूरी भाषा सीख जाता है, जो इतनी जटिल है कि वयस्क को सालों पसीना बहाने पर ही किसी भाषा पर अधिकार हो पाता है। पश्चिम में ऐसी नयी बातें धड़ल्ले से चल जाती हैं जिनको आगे बढ़ाते हुए वे ढेर सारा कचरा पैदा कर देते हैं जिसे हम ज्ञान कहते हैं और जिसका आयात भी करते हैं।

चोम्स्की के प्रयत्न से केवल इतना ही सिद्ध होता है कि भाषा कैसे पैदा हुई यह सवाल भाषावैज्ञानिकों को आज भी परेशान करता है, पर उनके पास वह आधारभूत संपदा नहीं है जो हमारे पास है और जिससे हम अपनी भाषाओं के विकास को समझने के बाद दूसरी भिन्न भाषाओं की उत्पत्ति और विकास को समझने के सूत्र दे सकते हैं।

हम जहां अपने पुराने चिन्तकों और पश्चिम के चिन्तकों से अलग राय रखते हैं और यह मानते हैं कि कुछ शब्दों और क्रियाओं का ही नहीं समूची भाषा का विकास प्रकृति में उपलब्ध ध्वनियों से हुआ है. भाषाविज्ञान में यह मामूली सा तिनका ही मेरा अपना योगदान माना जा सकता है।

अब हमें यह समझना होगा कि जिन वस्तुओं से स्वतः कोई ध्वनि नहीं निकलती उसको उनकी संज्ञा कैसे मिली, और हमारे मनोभाव और संकल्पनाओं के लिए संज्ञा कैसे मिली।

भाषा की भूमिका का जिक्र करते हुए मैंने यह कहा था कि यह अव्यक्त को व्यक्त करने का काम करती है। इसमें यह भी जोड़ लें कि यह अनुपस्थित को उपस्थित कराने, अघटित को अपने माध्यम से घटित कराने की क्षमता रखती है और इस तरह यह एक समानान्तर सृष्टि है। भाषा की यह सृष्टि एक प्रक्रिया है और आज भी जारी है और इसका एक लंबा इतिहास है।

वाचिक संकेतों को रैखिक संकेतों में बदलने की सूझ और लिपि का विकास एक दूसरी सृष्टि है।

ऋग्वेद में कहा गया है कि विष्वामित्र ने जमदग्नि से ससर्परी वाक या घसीट लेखन, भंगुर उपादान पर लिखने की कला सीखी। इसका गुण यह बताया गया कि यह पंख से लिखी जाती है या पक्ष्या है। पेन का मतलब पंख ही होता है और पहले लिखने के लिए पंख के उस सिरे का उपयोग किया जाता था जो चमड़ी में धंसा होता है। दूसरी विषेषता यह कि इसकी आवाज या सन्देश बहुत दूर तक पहुंचता है। वहां तक जहां तक कितना भी चीख कर बोलें आवाज न जाएगी। और तीसरी विषेषता यह कि बोला हुआ शब्द तो बोलने के साथ ही समाप्त हो जाता है, पर यह अमर रहती है।

संभव है विश्वामित्र ने अपनी ओर से इसमें सुधार कर इसे अधिक ग्राह्य बनाया हो जिसके कारण कहा जाता है कि उन्होंने विश्वामित्री सृष्टि कर दी। ब्रह्मा ने जो कुछ बनाया है उसके समानान्तर उससे कुछ घटकर सब कुछ बना दिया और यह है संकेत प्रणाली में असाधारण विकास का श्रेय देने जैसा हुआ।

अब हम अपने विषय पर आएं। प्रकाश में तो ध्वनि होती नहीं, इसके लिए भा, भास, या भाष ध्वनि कहां से मिल गयी ?

मैंने 1970 में अपना पहला शोधकार्य किया था और उसे सौ सवा सौ पन्ने के बाद पूरा नहीं कर सका। यह भारत के स्थाननामोें का भाषावैज्ञानिक अध्ययन था। पूरा इसलिए नहीं कर सका कि सभी नामों का अंत पानी से होता था। मिसाल के लिए पालन, पालम, पलवल, पालघाट, पलानी अर्थात् पिलानी । अंन्तिम घटक पल/प्ल/ पाल आदि। मुझे लगा मैं पीलिया का शिकार हो गया हूं। यह कैसे संभव है कि सभी शब्दों के आदिम ध्वनि का अर्थ पानी हो? मैंने इसका कुछ अंश नागरी प्रचारिणी में प्रकाशित कराया, पर इस काम को न आगे बढा सका, न प्रकाशित कराया। यह आंकड़ों का जंगल था जिसमें किसी सामान्य व्यक्ति की रुचि हो भी न सकती थी।

इसके बाद १९७३ में क आर्यद्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता प्रकाशित कराया जिसका एक अध्याय भाषा की उत्पत्ति पर ही था।
उसमें यह दिखाया था कि एक अनुनादी ध्वनि या शब्द सैकड़ों शब्दों का जनन करता है और उससे संज्ञा, क्रिया, क्रियाविषेषण, प्रत्यय, उपसर्ग सभी सिमट आते हैं और कैसे यह प्रक्रिया संस्कृत और द्रविड़ में लगभग एक तरह चली है। पर रोचक बात यह कि मैं 2004 में फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि जिन वस्तुओं से स्वतः कोई ध्वनि पैदा नहीं होती उनके लिए संज्ञा पानी से मिली है। प्रक्रिया वही, जिसका आरंभ 1968 में हुआ था।

अजीब बात है। रसो वै सः । जल से ही समग्र सृष्टि और उस सृष्टि को शब्दरूप देने वाली वाणी की भी उत्पत्ति जल से। और लीजिए केवल चार साल पहले मुझे लगा, यह बात तो ऋग्वेद के भाषाचिन्तक बहुत पहले कह आए थे, मैं इतने दिनों से इस पोथे को उलटता पलटता रहा हूं कि कई प्रतियां घिस कर फट गई, और इस ऋचा को समझा ही नहीं जिसमें महाशक्तिशाली वाणी, वागम्भृणी, कहती है कि इस द्यौस् पितर अर्थात् समस्त ब्रह्मांड को मैंने जना है, मेरी योनि या मेरी उत्पत्ति स्थान समुद्र के गर्भ में, पानी में है: अहं सुवे पितरं अस्य मूर्धनि, मम योनिः अप्सु अन्तः समुद्रे । वाणी की उत्पत्ति जल की विविध ध्वनियों से।

अब हम भास पर आएं। हिन्दी में जिसके लिए दलदल प्रचलित है उसके लिए भोजपुरी में भास का प्रयोग होता है। यह दलदल में पांव के धंसने की ध्वनि का अनुनाद है। इसके दो ध्वनिभेद हैं भसना और धंसना। भासना में पांव के ऊपर निकलने का आशय है धंसना में गड़ जाने या नीचे चले जाने का भाव। धसने से संस्कृत ध्वंस निकला है न कि ध्वस से धंसना ।

जल से जिन उपादानों का किसी भी रूप में संबन्ध है, सब जल के वाचक हैं। इस भास से एक दूसरा भोजपुरी शब्द निकला भसेड़ जिसे हिन्दी में कमल ककड़ी कहा जाता है।

जल से प्रकाश का संबंध इस नाते जुड़ता है कि जल आदि दर्पण है। इस पर सभी रंग, रूप, लाल, नीली, पीला, हरा, काला सभी दिखाई देते हैं, और प्रकाश भी फूटता है। इसकी कोई न कोई संज्ञा सभी रंगों की द्योतक है। यही वह तर्क है जिसमें अक्तु का अंधकार, आवृत या रात तक अर्थ हो सकता है और ज्योति या प्रकाश भी।

इसलिए भास आग का भी आशय ग्रहण कर ले तो आपको आपत्ति न होनी चाहिए। भाड़, भड़सांय में तो आप इसे लक्ष्य कर ही सकते हैं, भोजपुरी में जलन की अनुभूति के लिए भभाना शब्द प्रचलित है। और मिथ्या प्रदर्शन के लिए भभ्भड़ का प्रयोग करते हैं, उसमें भी इसकी भूमिका है, भोजपुरी लाल भभुक, प्रखर ज्वाला के रंग के लिए प्रयोग में आता है। इस श्रृखलना से जुड़ा है भउरा, भउरी, भभूति जिसे नासमझी में संस्कृतीकरण से विभूति बना दिया गया और खींच तान कर किया जाता है। भभूति पूरे शरीर पर मछरों से राहत पाने और बिना नहाए धोये बदबू और कीटाणुमुक्त रहने के लिए अपनाया गया तरीका था। बाद में टीका भी लगने लगा। अब इसका संदेश सभी कामनाओं वासनाओं को भस्म करके उससे मुक्त होने का दावा। लीजिए आग के प्रसंग में भस्म और भस्मी तो छूट ही गया था।और छूट गया भूजना या भूनना जिस भूजने की आप्तता यह है भाजी, भाजा में फिर हिन्दी में भी न की जगह ज की वापसी होती है।,। इस भूजने का संस्कार करके भर्जन कर दिया गया। यह है आपकी संस्कृत की दादागिरी।

आप देखें, संस्कृत से भी बहुत पुराने रूप हमारी बोलियों में हैं। सच कहें तो बोलियां भाषाएं हैं और संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और हिन्दी समेत हमारी आधुनिक बोलियां कंस्ट्रक्ट या निर्मितियां है, गढ़ी हुई भाषाएं जो हमें वह स्वतन्त्रता नहीं देतीं जो बोलियां देती हैं। इनमे वह गहनता नहीं है जो बोलियों में है। इसलिए जब आधुनिक भाषाओं और बोलियों के बीच मुद्दे खड़े किए जायं तो यह ध्यान रहे कि हिन्दी जैसी भाषा अपनी बोली की पोती पड़पोती तो हो सकती है उनकी जननी नहीं और आधुनिक भाषाओँ को अपनी बोलियों के सामने अदब से पेश आना चाहिए। इनके समर्थकों को भी। हिन्दी संख्या बल पर राजकाज की भाषा बन गई पर अपनी बोलियों से नाता तोड़ कर और संस्कृत से नाता अधिक जोड़ कर अधिक खोखली और बेजान हुई है। यदि बोलियों पर संकट आएगा तो हिन्दी जार्गन में बदलती चली जाएगी। बोलियों को हिन्दी के दबाव से बचाना, हिन्दी को अंग्रेजी के दबाव से बचाना हमारी साझी जिम्मेदारी है।

Post – 2017-03-14

एक
सबसे पहले हम भाषा शब्द का ही समझें । ‘भाषा’ के मूल में ‘भास्’ (भा, भाः, भास)है। अर्थ है प्रकाश । यह भास, आभास, सुभाष, विभास, में मिलेगा तो ‘भा’ भानु, आभा, विभा आदि में। ‘भाना’ – वह मुझे भा गया, या भाता नहीं, में प्रकाश के लिए जो शब्द था वह पसन्द और सुन्दरता के लिए प्रयोग में आने लगा। अब आप ‘भांति’ का अर्थ समझ सकते हैं- सदृश, देखने में वैसा’। भाल का अर्थ सुन्दर, चमकदार।
(भाल के पर्याय ‘ललाट’ में स्वर के हेर-फेर से ‘लाल’ लला बन कर विराजमान है उसमें लाल का अर्थ चमकीला है न कि लाल रंग। )

भाषा अव्यक्त भावों, विचारों और आवेगों को व्यक्त करती है, अंधकार से प्रकाश में लाती है, दिखाती है। ‘व्यक्त’ का अर्थ होता है – ‘वि-अक्त’, अक्त/अक्तु ऋग्वेद में अंधकार, अवलेप, और रात के लिए प्रयोग में आता है परन्तु कुछ स्थलों पर प्रकाश के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। कैसे वही शब्द प्रकाश के लिए भी प्रयोग में आया और अंधकार के लिए इसे हम आगे कभी समझेंगे।
भाल में भी जब स्वर का हेर फेर(स्वर विपर्यय) हो जाता है तो भला – अच्छा, सुंदर। और बंगला के भाल बासा का तो मौसम पुरे मधुमास रहेगा.

कुछ लोग कोश सामने रख कर कहेंगे कि प्रकाश अर्थ में मूल धातु भास है और वाणी वाले अर्थ में भाष । अधिक योग्य होंगे तो कोई धातु पेश कर देंगे। लीजिए, मुझे भी मिल गये धातुपाठ से दो सूत्र – ‘भाष् व्यक्तायां वाचि’, और ‘भासृ दीप्तौ’, अब तो मामला ही सलट गया। पर इसे यदि मैं भी मान लूं तो मेरे पास करने को कुछ बचेगा ही नहीं, एक किताब से उठाया और दूसरी किताब में भर दिया। हेरा फेरी की आदत नहीं, डाका डालने, तोड़फोड़ करने में झिझकता नहीं.

इसलिए मैंने पहले ही बता दिया था मैं भाषा के आदिम चरण की बात करने जा रहा हूं, जहां तक बाद के वैयाकरणों की पहुंच ही नहीं है।

तुलनात्मक भाषाविज्ञान को जिस तरह तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया उससे कुछ शिकायतें मुझे भी हैं, परन्तु इस क्रम में भी हमें उससे अपनी भाषाओं के विषय में कुछ अच्छी जानकारियां मिली हैं। इनके भी दो तरह के पाठ बनते हैं, एक वह है जिसे सोच कर यह पहले बाद का चक्कर चला, दूसरा वह जिससे आरंभ करने पर उलझने सुलझ जाती है।

इन खोजों में इनमें से एक यह है कि मूर्धन्य ध्वनियां प्राचीन चरण पर संस्कृत में नहीं थीं भाषा में बाद में ली गईं। तमिल वर्णमाला में महाप्राण और सघोष ध्वनियां नहीं हैं। शब्द के मध्य में अघोष ध्वनियों का सघोष उच्चारण अवश्य होता है। इसी तर्क से द्रविड़ में ट, ण, ध्वनिया हैं, पर शब्द में बीच में आने पर ट का उच्चारण ड अर्थात् सघोष रूप में हो सकता है । अतएव तमिल में टवर्ग की ठ और ढ, ड़ और ढ़ ध्वनियां नहीं हैं। ड़ के निकट ळ ध्वनि और ढ़ के लिए तमिल की वह मे सम्भवतः वह विषेष ध्वनि है जिसे हम तमिल शब्द के अन्त में पाते हैं और जिसका सही उच्चारण मुझे इतना कठिन लगता है कि आज तक सम्भव हो ही न पाया। इसके लिए अज्ञेय जी ने ष़ चिन्ह का प्रयोग चलाया था ।
खैर तमिल में एक भी शब्द ऐसा नहीं है जो ण से आरंभ होता हो, जब कि जैन प्राकृत में नमो की जगह णमो चलता है, राजस्थान में न प्रायः ण बन जाता है – राणा, राणी, घणों । कहें दन्त्य ध्वनियों को मूर्धन्य बना दिया जाता है। तमिल में ‘न’ को ‘ण’ बनाने की प्रवृत्ति नहीं है । कहें तमिल की तुलना में ण ध्वनि हरयाणवी और राजस्थानी की अधिक अपनी हैं. हम कह सकते हैं मूर्धन्य ध्वनियाँ किसी ऐसी बोली की अपनी लगती है जो सम्भवतः पाषाणी शिल्प में अधिक दक्ष था । वह जिसने किसी युग में मेगालिथों का निर्माण किया था और बाद में सिल बट्टे चकिया जाँत और घीया पत्थर के प्याले आदि बनाने का काम करता था इसलिए लगभग पुरे देश के गांव गांव से इसका सम्पर्क था और उसी के कारण विविध अनुपातों में मूर्धन्य ध्वनियों में से कुछ इधर कुछ उधर । यह मात्र एक सुझाव है, इस विषय में हमारा कोई दावा नहीं।

रामविलास जी का मानना है कि किसी भी बोली में किसी वर्ग की सभी ध्वनियां नहीं थीं, यह पंचाक्षरी व्यवस्था बाद की है। यह तर्क ध्यान देने योग्य लगता है। परन्तु यदि हम मानें कि यह किसी विशेष बोली की ध्वनियां थीं तो यह मानना होगा कि इस समुदाय के लोग अपने कौशल के कारण विभिन्न अंचलों में बसे लोगों के लिए उपयोगी रहे होंगे और इनके ही प्रभाव से ये ध्वनियां द्रविड़/ तमिल में भी पहुंचीं परन्तु अधिक प्रभावशाली उनमें भी नहीं हैं.
जो भी हो, इनके संपर्क में आने से पहले जिन शब्दों में दन्त्य ध्वनि (त, थ, द, ध, न, लृ, ल ) होती थी उनमें इनके प्रभाव से मूर्धन्य ध्वनि (ट, ठ, ड, ढ, ण, ऋ, र) का प्रयोग होने लगा, ऋग्वेद में पहला ही अक्षर (ऋ ) मूर्धन्य हुआ, विकास कुछ उल्टा होता है। जहां पहले र प्रयोग में आता था, वहां कई मामलों में ल का प्रयोग होने लगा। ‘रघु’ बदल कर ‘लघु’ हो गया, ‘अरं’ बदल कर ‘अलं’ और ‘अरंककरण’ बदल कर ‘अलंकरण’ हो गया। ‘अरं/अलं’ – अधिक होना, पूरा होना। आदमी फूल और लता पहन और लपेट का स्वयं पुषित लता या फूल से लदा तरु बन जाना चाहता था, पहले लता और पुष्प से काम चलाता रहा और बाद में धातुओं को पुष्पाकार बना कर कभी न मुरझााने वाले फूल और मालाएं पहनने और लपेटने लगा।

पर जहां पहले दन्त्य ध्वनियां थीं वहां इस विचित्र सामाजिक संपर्क में उनको कुछ स्थितियों मूर्धन्य बनाया जाने लगा। कहीं चल गया, और कहीं न चल पाया। ऋग्वेद में इसी प्रभाव में सोम कुछ स्थितियों में षोम हुआ, अग्नीषोमा।

इसी प्रभाव में भास का एक अवान्तर रूप भाष बना। पर मुसीबत यह कि इसका उच्चारण कभी कही शुद्ध होता रहा तो इसका इस समय हमें ध्यान नहीं। इसे भासा या भाखा के रूप में ही पढ़ा जाता रहा। इस मूर्धन्य सकार वाले रूप को उच्चरित वाणी के लिए लिखित साहित्य में प्रयोग किया जाने लगा. ष का उच्चारण ख के रूप में किया जाता था इसलिए भाखना और भाषना या भाषण देना. इसका रूढ़ अर्थ हुआ,’जो अज्ञात है, उसको मुखरित करना’, जो ओझा सोखा के प्रेतबाधित से उसका रहस्य उगलवाने के लिए प्रयोग में आता है।

भास का भाष वाला रूप कुछ उसी तरह बना जैसे कोश थैला, पेटी जिसमें मूल्यवान वस्तुएं रखी जाती थी, कोई ऐस थैला जिसमें बहुत सा माल अट सके, फिर भंडार, चाहे वह वस्तुओं का भंडार हो या शब्दों का – राजकोश या शब्दकोश । पर ‘कोष’ वाला प्रयोग ही खजाने के लिए स्थिर किया गया, ‘कोश’ का शब्दभंडार के लिए।

यह अंतर मूल संकल्पना, ध्वनि और अर्थ की भिन्नता के कारण नहीं है, दो ध्वनियों वाले जनों के एक ही समाज में रचने खपने और काम करने के कारण है। दोनों के प्रचलन और विलय के कारण दोनों का साथ चलन हुआ और फिर अर्थभेद । यह उससे भिन्न है जिसमें कई शब्दों का उच्चारण एक होता, या घिस कर एक हो जाता है जैसे ‘सोना’ <स्वर्ण, ‘सोना’ <शोभन और ‘सोना’ <शयन ।

Post – 2017-03-13

आज के दिन के सम्मान में मैं भाषा पर अपने लेखन का आरम्भ कर रहा हूँ इसलिए दिन में दो विषय, दो लेख. भाषा के लेख में जो भी मित्र मीनमेख निकालेंगे उनका अग्रिम धन्यवाद. इस क्रम में ज्ञात मिनमेखाधिकारियों अरविन्द कुमार, अजित वडनेरकर, राधावल्लभ त्रिपाठी और गिरिराज जी को विशेष रूप से सहयोग करने का आग्रह करता हूँ.

Post – 2017-03-13

भाषा

इतिहास की पहुंच लेखन के आविष्कार की अवस्थाओं तक है, पुरातत्व प्रकृति के साथ मनुष्य के प्रभावकारी हस्तक्षेप से पहले नहीं जाता, परन्तु भाषा की पहुंच मानवजाति की उस आदिम अवस्था तक है जब मनुष्य अपनी रीढ़ सीधी कर रहा था।

अतः भाषा हमारे अतीत के अन्वेषण को जिस प्राचीनतम अवस्था तक पहुंचा सकती है, वहां तक भूगर्भविज्ञान की पहुंच तो मानी जा सकती है, साहित्य और पुरातत्व की नहीं।

भाषा पुरातत्व की सही समझ भारत की बोलियों और वैदिक की समझ के बिना असंभव है, कारण इसके निर्माण में सभी की भूमिका है जो सामाजिकता और जातीयता की निर्माण प्रक्रिया को समझने में तो सहायक होती ही है, इतिहास और नृतत्व की दूसरी समस्याओं को समझने में भी सहायक है। यहां हम इसके आद्यरूप को अंकुरित, वर्धित, रूपान्तरित और विकसित हो कर उस परिपक्व चरण तक पहुंचते देखते है जिसके बाद मानक भाषा का प्रसार पूरे भारोपीय क्षेत्र में होता है। इसके प्रभुत्व के कारण उन देशों और क्षेत्रों की भाषाएं दब कर रह गई जिनको हम उनके उपस्तर में तो देख सकते हैं, और जिनके कारण उनमें ऐसे विभेद पैदा हुए जिनको उन क्षेत्रों की उपबोलियों के अध्ययन से समझा जा सकता है और इनकी समानताओं में भी कतिपय विचित्रताएं है जिनका समाधान भारतीय भाषाओं के माध्यम से तो हो सकता है, परन्तु अपनी पड़ोसी भाषाओं से नहीं। अतः उनके माध्यम से हम उनकी विकास प्रक्रिया को नहीं समझ सकते। उनके माध्यम से हम उनकी विकास प्रक्रिया को नहीं समझ सकते।

भारत में भी हम अपनी आधुनिक और मध्यकालीन भाषाओं की भिन्नताओं को इसी नियम से समझ सकते हैं।

यह विचित्र लगेगा कि ऋग्वेदिक भाषा संस्कृत की तुलना में भारतीय बोलियों के अधिक समीप है और आधुनिक भाषाएं अपनी बोलियों की तुलना में संस्कृत के अधिक निकट हैं।

इतिहास की वे समस्यायें जो भाषावैज्ञानिक आधार पर खड़ी की गईं और जिनको अपने अनुकूल परिणाम के लिए भाषाविज्ञान को ही तोड़ मरोड़ कर उसके सांस्कृतिक सारतत्व को नष्ट कर दिया गया उन्हें भाषातत्वों के सही विवेचन और उस पूर्ववर्ती अवस्था की खोज से ही दूर किया जा सकता है जिसकी ओर अभी तक किसी का ध्यान इसलिए नहीं गया कि हमने नए विचार और अनुसंधान के काम को पाश्चात्य जगत पर छोड़ दिया है और उनसे अनमेल पड़ने वाली या उनके द्वारा उपेक्षित दिशाओं में काम करने को न अपने वश का मानते हैं, न जरूरी समझते है। इसे बदल कर कहें तो पहल के मामले ने पश्चिम ने औपनिवेशिक अनुभव वाले देशों मे अधिक सक्रियता दिखाई है जिससे वह इनकी मानसिकता को नियन्त्रित किए रहे।

हमने एक सर्वमान्य सत्य को भुला कर वैयाकरणों की व्याख्या के आधार पर भाषाविज्ञान का आरंभ किया जब कि आरंभ उन ध्वनियों की खोज से करना था जिनसे इस जादू को देखा जा सकता है जिससे कोई अर्थ किसी ध्वनि से जुड़ा और एक ओर तो उसका अर्थविकास – अर्थविस्तार, अर्थसंकोच या स्थिरीकरण – हुआ और दूसरी ओर उनमें ध्वनिगत परिवर्तन करते हुए एक विशद शब्द शृंखला का जन्म हुआ, जिनके बहुनिष्ठ घटकों के आधार पर धातुरूपों और उनके अर्थ का निर्धारण वैयाकरणों ने किया, इसलिए ऊपर से बहुत व्यवस्थित प्रतीत होते हुए भी उनके निरूपण में बहुत गड़बड़ियां रह गईं।

हम भाषा के जिस भिन्न सिद्धान्त की बात कर रहे हैं उसकी पुष्टि ऋग्वेद में परिलक्षित भाषा सिद्धान्त से होती है जब कि पाणिनीय व्याकरण से इसे समझने में बाधा पड़ती है। भाषा श्रुत ध्वनियों का यथासंभव वैसा ही उच्चारण करने की प्रक्रिया है इसलिए समस्त भाषाएं अपने प्राकृतिक परिवेश में विद्यमान ध्वनियों से उत्पन्न होती और अनेक मामलों मे अपने भौगालिक स्थिति से प्रभावित होती है। प्रकृति में मनुष्य की छेड़छाड़ के साथ यांत्रिक ध्वनियाँ का प्रवेश होता है और विचारों के पारस्परिक विनिमय में वृद्धि के लिए पूर्वसर्गों, परसर्गों, अन्तःसर्गों आदि को अपनाया जाता जहां से आगे बढ़ने का जोखम हमारे वैयाकरणों ने नही ली अतः ब्याकरण को समझ कर भी हम किसी भाषा की अंतरात्मा तक नहीं पहुँच पाते । हम पाते हैं कि कुछ पहलू पकड़ से छूट रहे हैं.

Post – 2017-03-13

कुछ घडी का है संग होली का

अजब देश है . मैं अपने भारत की बात कर रहा हूँ. राजतन्त्र से इतना प्रेम कि कोई दबंग कहे, यह मेरे खानदान का देश है तो लोग मान लेते हैं. होशियार समझे जाने वाले लाइन लगा कर खड़े हो जाते हैं – हम राजवंश के साथ हैं. मूर्ख कहते हैं यह मेरा देश है. कोई विश्वास ही नहीं करता.
कोई कहे हम लोकतंत्र में रहते हैं.
जानकार लोग समझाते हैं – यह संविधान में लिखा है। संविधान हमने इसलिए अपनाया कि हम सिद्ध कर सकें कि हम कानून कायदा मानने वाले देश के नागरिक हैं। इसे लिखने का काम एक शूद्र को सौंपा कि दुनिया जान सके कि हम जात पांत से इतने ऊपर उठ चुके हैं, कि हमने उस शूद्र को आधुनिक मनु बना दिया, जिसने मनुस्मृति का हवन किया था, पर उसका धुंआ उसके दिमाग में था। उसने संविधान बनाने की जगह नयी मनुस्मृति लिख डाली, इसे हम कैसे मान सकते हैं?

समझ में बात न आए तो वे दुबारा समझाते हैं- देखो जो दलित और पिछडे लोग मनुस्मृति को जलाते आए हैं, अंबेडकर स्मृति को जला न सकें, रौंद तो सकते हैं न।

आशका जताओ, ‘ब्राह़मणों ने संविधान का पालन किया? पुरानी स्मृतियों का पालन करने वालों को तो नई स्मृति का पालन करना ही चाहिए था।’

वे समझाते हैं – ब्राह्मण स्मृतियां बनाता है, स्मृतियों का पालन नहीं करता। वह नियमों से ऊपर है, जो उसकी कलम से लिखा गया, जो उसकी कलम की नोक के नीचे है, उसका पालन करने के बाद वह उससे नीचे हो जाएगा, इसलिए वह किसी नियम का पालन नहीं करता, जो कुछ वह करता है वह नियम बन जाता है, जैसे पाराशर का जी मचल गया तो वह जो गलती कर बैठे, वह परंपरा है।

मूर्ख हैं वे, और इसलिए अपने हाथों उस डाल को काट कर इसे साबित भी कर दिया जिस पर बैठे थे, जिन्होंने कहा था, बच्चों से गलतियां हो जाती हैं।’ कहना चाहिए था, परंपरा का सम्मान करने वालों का सम्मान करो, दंडित मत करो। नालायक ने इसे गलती मान लिया । उसको बच्चों की गलतियों का शिकार तो होना ही था।

आशंका करो, ‘आप विचार की जगह हुड़दंग कर रहे हैं! सब कुछ गड्मड्ड। सबके चेहरे काले और काले कहो तो नीले पीले रंग सजीले, कुछ चिपके कुछ सचमुच ढीले दिखाई देने लगते है।’

वे समझाने की जगह चांटा मारते हैं, ‘नालायक यहां पहुंच गए तो तुक मिलाने के लिए नशीले कह लेना, पर जहरीले मत कहना, गो जहर तो लोग रंगों में भी मिला देते है और विचारों में भी घोल देते है।’ गजब का चांटा है कि गोपियों के मैं मारूंगी तुझे अब मुझे मार की आवाज सुनाई देती है।

हत्तेरे की। सोचा था, चुनाव के नतीजों पर होली के रंग में कुछ रंग भरेंगे पर उसके जहर से बचने की चिन्ता में पड़े रहे। सोचा था, देश किसका है, देश किनका है के बीच का फैसला करेंगे और बीच में चिन्ता की लहर। सामने आ गया उत्तर प्रदेश का एक नेता।
पूछा, होली का रंग कैसा है?
बोला, मेरी भैंस के रंग जैसा है।
पूछा, ‘उत्तर प्रदेश अब उत्तम प्रदेश बन पाएगा?
बोला, उत्तम बने या मद्धिम, यह तय है कि कानून और व्यवस्था का हाल यह होगा कि अगर मेरी भैंस सचमुच खो गई तो पुलिस उसे ढूढ़ नहीं पाएगी। यदि मैं गाय पालूँ, मेरी गाय खो जाय तो मैं थाने में गाय का गा कह कर य कहूँ उससे पहले ही पूरा मजमून भांप कर गाय सामने हाजिर कर देगी ।