Post – 2017-04-18

देववाणी (आठ)

देववाणी में अन्तस्थ य और व की ध्वनियों की जगह स्वर ई और ऊ का शब्द में उनके स्थान के अनुसार ह्रस्व और दीर्घ दोनों रूपों में (हिंदी यहाँ भोज. इहां; हिंदी यह – भोज. ई ; हिंदी वहां = भोज. उहां/ उहवाँ ; हिंदी वह – भोज. ऊ ) होता था और दूसरी बोलियों के प्रभाव में व्यंज. ज और ब के रूप में होने लगा (हिंदी यदि – भोज. जो; हिंदी वस्तु भोज. बस्तु)! परन्तु आज तक उसमे य और व को जगह नहीं मिली।

अंतस्थ ध्वनि र का उच्चारण सम्भवतः घर्षित होता था जिसके उच्चारण में देववाणी सीखने वाले अन्य भाषाभाषियों को कठिनाई होती थी जिसके फल स्वरूप ऋ स्वर का अविष्कार हुआ जिसका भी उच्चारण किंचित घर्षित रि और रु के रूप में होने लगा

हम पहले कह आए हैं की कवर्ग, तवर्ग और पवर्ग देववाणी में थे. ऐसी स्थिति में यह सुझाव देना पहली नजर में अटपटा लगेगा की तवर्गीय अन्तस्थ ल देववाणी में नहीं था। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं कि ऋग्वेद में ल की ध्वनि दुर्बल है।

ऋग्वेद में अनेक ऐसे शब्द हैं जिनमे जहां पहले रकार था वहां संस्कृत में लकार का प्रयोग होने लगा. रोका – लोक ; क्लोश – (आ)क्रोश; अश्रीर – अश्लील (अश्रीरा का अर्थ सायण ने अश्रीका किया है जो सदर्भ और अन्य प्रयोगों से मेल नहीं खाता ‘अश्रीका तनूः भवति रुषती पापया अमुया’), ह्राद – ह्लाद, रिप्त – लिप्त, अरंकृत- अलंकृत, रेल्हि-लेहि, श्रुति – श्लोक, वार – बाल ।

इस बात के भी नमूने हैं जिसमें ऋग्वेद में दोनों प्रयोग मिलते हैं – इरा, इला। और एक नमूना ऐसा है जिसमें ऋ. में ल है जो बाद में र बना. ऋ. सम्मिश्ल – मिश्र! इसकी व्याख्या किस तरह की जाय? हम कहना चाहेंगे कि र का ल दे रूप में उच्चारण करने वाला समुदाय किसानी संस्कृति और देववाणी अपना चुका था इसलिए उसके कतिपय प्रयोग ऋग्वेदिक पाठ में बचे रहे जब कि उस समय भी चलने वाला प्रयोग मिश्र या सम्मिश्र दिखाई नहीं देता। दूसरी और जहाँ हिंदी में ल मिलता है वहां भोजपुरी उसे र में बदल देती है:
हिंदी/ संस्कृत फल – भोज. फर; जलना- जरल/ बरल; धवल – धंवर, बलिष्ठ – बरिआर, कपाल – कपार।

पाणिनि ने भी र और ल में भेद न होने की बात कही है- रलयोः अभेदः। इसलिए यह कहने का लोभ होता है कि देववाणी के घर्षी र के उच्चारण की जिस कठिनाई के कारण कुछ अन्य भाषाओं ने इसका उच्चारण ऋ और रु के रूप में करना शुरू किया वहीं कुछ दूसरों ने लृ ल्रू के रूप में, जब कि ऋ और लृ का वास्तविक उच्चारण क्या है इसे लेकर संस्कृत के विद्वानों में भी अनिश्चय पाया जाता है।. भोजपुरी भाषी के लिए ऋग्वेद रिगुबेद है।

ऊष्म ध्वनियों में दन्त्य (स) और कण्ठ्य (ह) ध्वनियाँ भोजपुरी मैं पाई जाती है. श और ष नही थीं। ह देववाणी की सबसे प्रधान ध्वनि प्रतीत होती है। इसके तीन रूप थे। एक स्वर के रूप में प्रयोग में आता है, या कहें उच्चरित होकर भी शून्य अर्थ-मूल्य रखता है (हऊ = ऊ; हई = ई; हीहां = इहाँ). दूसरा ह का ध्वनिमूल्य और अर्थ और तीसरा विसर्जित मूल्य जो भोजपुरी में लगभग समाप्त है पर संस्कृत में बना रह गया है।

सस्यूर ने काकल्य ध्वनियों की कल्पना की थी जिनका भारोपीय की किसी शाखा से पुष्टि नहीं हो पाई थी। उनको लगा था कि प्रचीन जर्मन में यह ध्वनि रही होगी। इसको लेकर काफी उत्साह देखा गया. इसका उच्चारण क्या था यह अज्ञात होने के कारण इसे ह१, ह२, ह३ के रूप में लिपिबद्ध किया गया। बाद में यह पता चला कि हिट्टाइट के पुरभिलेखो से इसकी पुष्टि भी होती है । आगे बढ़कर यह दावा किया गया कि जननी भाषा से सबसे पहले अलग होने वाली शाखा इंडोजर्मन थी जो इस कसौटी पर ग्रीक और लैटिन से भी पुरानी बताई गई।

इसके विषय में मैं इतना हतप्रभ अनुभव करता हूँ कि किसी दावे का खंडन तक नहीं कर सकता। ध्यान रहे कि फर्डिनांड डी सस्यूर ने अपने एक लेख में जननी भाषा के की ध्वनियों पर विचार करते हुए यह नतीजा निकाला था की उसमे आ और ओ पृथक ध्वनियाँ थीं और इसी क्रम में उन्हें कुछ काकल्य ध्वनियों का ख्याल आया जो आज तो अस्तित्व में नहीं हैं इसलिए उनके सही उच्चारण का पता नहीं परन्तु उनके होने की सम्भावना की पुष्टि इस बात से होती है की इन ध्वनियों के प्रभाव से इनके आसन्न व्यंजन के उच्चारण में फर्क आया. इसकी व्याख्या जिस रूप में एक अधिकारी विद्वान ने की है उसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं.
The evidence for them is mostly indirect, but serves as an explanation for differences between vowel sounds across Indo-European languages. For example, Sanskrit and Ancient Greek, two descendants of PIE, exhibit many similar words that have differing vowel sounds. Assume that the Greek word contains the vowel e and the corresponding Sanskrit word contains i instead. The laryngeal theory postulates these words originally had the same vowels, but a neighboring consonant which had since disappeared had altered the vowels. If one would label the hypothesized consonant as *h1, then the original PIH word may have contained something like *eh1 or *ih1, or perhaps a completely different sound such as *ah1. The original phonetic values of the laryngeal sounds remain controversial .
(Indo-European Language Association )

प्रश्न ही कर सकता हूँ की अभी हमने भोजपुरी में ह ध्वनि के जिन रूपों की पुष्टि की है उसको इससे समझने में कोई मदद मिलती है?

Post – 2017-04-17

सत्य होता नहीं है गढ़ा जाता है

और इसलिए एक ही तथ्य से अपनी अपनी जरूरत के अनुसार लोग अपने अपने सत्य गढ़ कर तैयार करते हैं जैसे एक ही धातु से शिल्पी ग्राहकों की मांग के अनुसार विविध प्रकार के अलंकार, हथियार, औजार या उपादान बनाता है।

वस्तु जगत में चालाकी पकड़ में आ जाती है इसलिए लोग झूठ और मिलावट से यथासम्भव बचते हैं। कोई नहीं कहेगा कि आभूषण विशेष या आभूषण मात्र सोने चांदी का एकमात्र उपयोग या रूप है. चांदी वस्तु है जिसके असंख्य उपयोग हो सकते है जिनमे से कुछ का हमें पता तक नहीं, परन्तु हमारी सभी जरूरतों को वह पूरा नहीं कर सकती, और कर सकती है तो किसी अन्य कारण से जिनमें एक है उसकी दुर्लभता और अविकारी गुण, जिसके कारण यह शोभा की वस्तु से ऊपर उठ कर सिक्का बन जाती है और जिसके बल पर यह हमारी सभी भौतिक जरूरतों को पूरा कर सकती है।

पर सिक्का चांदी का प्रतीकात्मक उपयोग है, उसका सत्य नहीं। चांदी को सिक्के की भूमिका से और स्वयं सिक्के को हटाया जा सकता है। वस्तु विनिमय में चांदी या सिक्का बीच में नहीं आता था, आधुनिक बैंक प्रणाली में चांदी हट सकती है पर उसकी प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं।

इन सभी संभावनाओं के बाद भी चांदी अपने आप में एक उपादान है, एक वस्तु है, सिक्का बनने के साथ यह उपादान से प्रतीक बन जाती है और उपादान अर्थात चांदी को उस जगह से हटा दो तो वस्तु के रूप में न रहते हुए भी प्रतीक के रूप में उपस्थित रहती है इसलिए यह दावा नहीं किया जा सकता की चांदी का कोई अंतिम सत्य होता है।

जो वस्तु जगत में द्रव्य या उपादान या वस्तु है वह विचार जगत में तथ्य या प्रतीक बन जाता है और उसकी वास्तविकता के ओझल हो जाने के कारण उसका उपयोग करने वाले अपने गढ़े हुए को अन्तिम सत्य मान कर सत्य की विजय के लिए उसके अन्य सभी रूपों को नष्ट कर देना चाहते हैं जिससे सत्य की, उनकी समझ से अन्तिम और एक मात्र सत्य, की प्रतिष्ठा को सके।

इसे धर्म, राजनीति, दर्शन सर्वत्र देखा जा सकता है। इसलिए सत्य में घालमेल से बचने के लिए भौतिकवादी तरीका अधिक सुरक्षित है।

परन्तु जो अपने को भौतिकवादी कहते हैं उनमें से अधिकांश भाववादी हैं। मार्क्सवाद का सत्यानाश इन भाववादियों के कारण हुआ न कि वह रास्ता इतना गलत था। पूरी तरह सही क्या है इसे मालिक जनता और गुलाम उसका पालन करता है , अन्यथा बहुत सी चीज़ें न तो पूरी तरह गलत होती हैं न सही । उनका प्रयोग या परिणाम जिसका दूसरा नाम इतिहास है, बताता है कि जो सही लगता था वह सही था या नहीं और वह किनको उनकी अपनी जरूरतों के कारण सही लगता था ।

यदि उस पर भाववादी ढंग से अमल न किया गया होता तो भारत की आज की विकल्पहीनता में वह एक विकल्प बन सकता था। अब नहीं बन सकता क्योंकि अपने भाववादी आग्रहों के कारण वह अपने पुनराविष्कार की ही नहीं उसकी पूर्वापेक्षा, आत्मनिरीक्षण की शक्ति भी खो चुका है । उसका भविष्य तय है भारत का भविष्य अनिश्चित।

Post – 2017-04-17

देववाणी (सात)

भोजपुरी बाहरी प्रभावों से मुक्त नहीं रही है। उसमें वे सभी परिवर्तन देखने को मिलेंगे जिनसे संस्कृत प्रभावित हुई। अपने लम्बे इतिहास में यह स्वयं भी अन्य भाषाओँ के सम्पर्क में आई लगती है यद्यपि हम इस बात का अनुमान नहीं लगा सकते की इसके संपर्क की प्रकृति क्या थी।

हम केवल इतना ही कह सकते हैं की अपनी जमीन से जुडी और व्ववहार में आती रहने के कारण इसने अपनी मूल ध्वनिप्रकृति उसी तरह नहीं छोड़ी जैसे दूसरी क्षेत्रीय बोलियों ने अपनी ध्वनिप्रकृति नहीं छोड़ी। इसी से इस बात का कुछ अनुमान हो पाता है कि किन क्षेत्रों में आज से दसियों हजार साल पहले से किन भाषाई समुदायों का जमाव दूसरों की तुलना में अधिक रहा है जिसके कारण अपना सब कुछ न गंवाते हुए भी दूसरी बोलियों को उससे समायोजित होना पड़ा और अनुमान हो पाता है कि उस क्षेत्र में पहुंचने पर संस्कृत में किस तरह के बदलाव आए हो सकते हैं।

संस्कृत उन क्षेत्रों में पहुंचने और संस्कृत भाषियों के कृषि विद्या में अग्रता के कारण कृषि कर्म अपनाने वाले स्थानीय जनों के बीच अपनाई जाने लगी और संस्कृत सीखने वालों के माध्यम से स्वयं रूपान्तरित हुई. संस्कृत की तरह क्षेत्रीय बोलियों को अपने मूल निवास से हटना नहीं पड़ा और संस्कृत के चलन के बाद भी बोलियों का व्यवहार स्थानीय स्तर पर चलता रहा। इसीलिए सभी में उनकी मूल प्रवृत्तियां बनी रह गई हैं और उनमें स्थानभ्रष्ट संस्कृत जैसा रूपान्तरण नहीं हुआ।

संस्कृत भाषियों के इतर क्षेत्रों में पहुंचने के बाद स्थानीय जनों की संख्या अधिक होने के कारण उनके उच्चारण की सीमाओं के चलते संस्कृत का चरित्र बदला। यह बहुत स्वाभाविक और लक्ष्य न की जाने वाली प्रक्रिया थी। इसलिए स्वयं संस्कृत के भी कई रूप हो गए।

हम पहले कह आए है कि उत्तर भारत की प्रधान भाषाओं या भाषा प्रवृतितयों का उदय भोजपुरी क्षेत्र में होता है और जब यह शौरसेनी क्षेत्र में पहुंचती है तो उपका मानक रूप उभरता है जो अपनी मूल बोली से इतना अलग होता है कि पहचान में न आए परन्तु इसके बाद ही इसे व्यापक स्वीकृति मिलती है।

यह सूझ मेरी अपनी नहीं है। इसे सुनीति कुमार चटर्जी ने हिंदी के प्रसंग में पाली, प्राकृत का हवाला देते हुए और हिंदी जिसकी बोली का आधार कौरवी है उसके भी पूर्व में स्वीकार, संवर्धन और फिर सौरसेनी क्षेत्र में उसका मानक रूप स्थिर होने और इस लिए इसे पुरे भारत के लिए सहज स्वीकार्य भाषा होने का समर्थन करते हुए रेखांकित किया था।

परन्तु इसमें वह स्वयं संस्कृत को नहीं जोड़ सकते थे। यह उनकी समझ से पश्चिम से आई थी। इसका उदगम वह मारिया जिम्बुतास के सुझाव के अनुसार कुर्गान संस्कृति का क्षेत्र मानते रहे जब कि उनका स्वयं का कहना था कि लिथुआनिया और यूगोस्लाविया की परम्परा के अनुसार उनके पूर्वज गंगा के तट आए वेदवुद्स थे जो अपने साथ समस्त ज्ञान विज्ञान ले कर वहां पहुंचे थे। इस पर ध्यान देने की जगह उन्होंने इस परम्परा को ही कल्पित ठहरा दिया था.

अब हम भोजपुरी की ध्वनि प्रकृति को आधार बना कर आदि भारोपीय या देववाणी की ध्वनिमाला का निर्धारण कर सकते हैं:
इसके स्वरों में अ, इ और उ हैं जिनके दीर्घ आ, ई, ऊ हैं. इनके अतिरिक्त ह्रस्व ए (एगो) और ह्रस्व ओ (ओके) तथा दीर्घ ए (एक) और दीर्घ ओ (ओकर) हैं परन्तु इनका विकास बाद में हुआ लगता है! भोजपुरी में ऐ और औ नहीं हैं. इनके स्थान पर द्विस्वर इअ (इअवा), उअ (बबुआ), अइ (अइसन), अउ (अउरी) हैं। इनके अतिरिक्त ह के साथ इकार उकार का ऐसा प्रयोग होता है जिसमें ह स्वर की तरह प्रयोग में आता है, हइ (हइहै), हउ (हउहार)।

वर्गीय ध्वनियों में कवर्ग, तवर्ग और पवर्ग की ध्वनियां पुरानी और चवर्ग और टवर्ग की ध्वनियां किसी अन्य बोली से ग्रहण की गई लगती हैं क्योंकि इनका व्यवहार उतना नियमित नहीं है। परन्तु रामविलास जी का यह सुझाव बहुत मूल्यवान है कि यदि किसी वर्ग की कुछ ध्वनियाँ किसी भाषा में पाई जाती हैं तो यह नहीं मान लेना चाहिए की उस वर्ग की सभी ध्वनियाँ उसमें सदा से रही हैं ! (आगे जारी)

Post – 2017-04-16

छूटी हुई कड़ी

हमने स्वतन्त्रता के बाद देशनिष्ठा, समाजनिष्ठा और आत्माभिमान में जैसी गिरावट देखी वैसी गुलामी के दिनों में भी नहीं देखी थी। मध्यकाल जो निरंकुशता का काल था, जिसमें समाज विविध प्रकार से उत्पीड़ित था, उस दौर में भी मनोबल का ऐसा ह्रास देखने में नहीं आया। [लोगों ने यातनाएं सहीं, कल्पनातीत यंत्रणाएं सहीं, अकल्पनीय नरसंहार सहे, उनकी दिल दहला देने वाली कहानियां कहते सुनते रहे, दुर्भिक्ष के दिनों में भी लगान-वसूली की नंगातलाशी झेली, दबाए गए, दब कर रहना भी पड़ा पर झुके नहीं। प्राण दिए पर सम्मान न दिया। दुखी थे, अममानित अनुभव करते रहे, आंसू के घूंट पीने का मुहावरा उनके लिए मुहावरा न था]। कंपनी के शासन में अंधी लूट झेली, पर माथा उतना नहीं झुका जितना स्वतन्त्रता के बाद हम तनने की कवायद में, तनने के लिए झुके । दूसरों से अधिक तनने के लिए अधिकाधिक झुकते गए और अकशेरुक जीवकोटि में पहुँच गए। इसकी ग्लानि से बचने के लिए हमने स्वाभिमान की परभाषाएँ भी बदल दीं, मानो झुकना भी तनने का पर्याय हो।

समस्या कष्ट सहने या मौज मस्ती से रहने के बीच चुनाव की नहीं है, समस्या मनोबल के आपातिक गिरावट की है, कटने के लिए तन कर खड़ी गर्दन का टुकड़े उठाने के लिए एकाएक झुक कर टुकड़े बटोरने की होड में शामिल होने और अपनी झोली दूसरों से अधिक भर लेने पर गर्व करने की है।
इसे मैंने अपनी आंखों देखा था। देख कर इतना आहत हुआ था कि स्वतंत्रता पर भी ग्लानि अनुभव होने लगी थी।

परन्तु इसका एक कारण यह भी रहा होगा कि मैं उन दिनों शाखा में जाया करता था। उसमें कांग्रेस की और खास तौर से गांधी जी की बहुत निन्दा हुआ करती थी। कम्युनिस्टों की निन्दा नहीं होती थी, परन्तु अमरीका की तारीफ होती थी, ‘जहां का मजदूर भी कार में सवार हो कर मजदूरी करने जाता है।‘
राजनीति मैं जानता नहीं था। शाखा में स्वास्थ्य लाभ के लिए जाने लगा था वह भी अपने चुनाव से नहीं, पिता जी के आदेश से और उस आदेश के पीछे यह लिहाज था की जब गांव के सबसे बड़े जमींदार दरवाजे पर आकर इतना छोटा सा अनुरोध कर रहे हैं कि बच्चों का स्वास्थ्य सुधारना भी शिक्षा से कम महत्वपूर्ण नहीं है, तो इसे न मानना उनका अपमान होगा।

परन्तु यदि यह कहूं कि शाखा में जाने के बाद मेरी सोच में अन्तर नहीं आया तो यह गलत होगा। चौदह पन्द्रह साल के उस आवेश भरे दौर में आदमी को शिक्षा और प्रोत्साहन से देवता, महामानव, हैवान, जानवर या पूरी तरह जड़ बनाया जा सकता है, यह मैं इन अनुभवों से गुजरने के बाद ही समझ पाया।

गांव में एक ही अखबार रघुनाथ सिंह मंगाते थे. पहले उसे डाकिये से लेकर गांव के कुछ समझदार समझे जाने वाले चौकी पर बैठकर पढ़ते और राजनितिक बहस करते फिर उनके घर पहुँचता और अगले दिन स्कूल जाते समय मेरे समवयस्क और मेरी ही कक्षा में पढ़ने वाले जगदीश चाचा अखबार पढ़ते और मैं कविता की इज्जत बचाने की कोशिश में अख़बार को देखते हुए भी अदेखा करते हुए खीझता खड़ा रहता और उसके बाद हम स्कूल को प्रस्थान करते।

मेरी राजनीतिक समझ और नासमझी की जड़े जितनी गहरी हैं उतना ही गहरा हैं किन्हीं मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पण भाव और अनुचित और अनैतिक के प्रति वितृष्णा । यह मेरा अर्जित नहीं है, मेरी विमाता के निजी और सामाजिक व्यवहार की भिन्नताओं को समझने के प्रयत्न से उपजा ज्ञान है जिसे कभी मूल्यवान माना ही नहीं ।

आज अनुभव करता हूँ कि मेरे मन में तलदर्शिता का दुराग्रह से बचने का निश्चय इसके अतिरक्ति किसी दूसरे उपाय से पैदा हो ही नहीं सकता था । एक ओर मैं जिंदगी भर रोता रहा कि मेरी विमाता ने मेरा शैशव और बचपन मुझसे छीन लिया ; दूसरी ओर उसे नमन करता हूं कि मेरे जैसा अल्पमति उस प्रक्रिया से गुजरे बिना कुछ बन ही नहीं सकता था।

इसका परिणाम यह था कि जिस कोण से मैंने अपने ऐतिहासिक विकास को देखा वह दूसरों से भिन्न था। मैं हीनता, उसकी क्षतिपूर्ति और आत्मदैन्य का ऐसा पुतला बना रहा कि उसे कोई मनोविश्लेषक ही सही मुहावरों में प्रस्तुत कर सकता है । मुझे केवल इतना मालूम है कि इस गठीले स्वभाव के कारण मुझसे ऐसी मूर्खताएं हुईं कि सोच कर झेंप अनुभव करता हूँ और आलोक का ऐसा ज्वार भी देखने को मिला जो मेरे अतिरिक्त किसी अन्य ने देखा ही नहीं.

आज़ादी के बाद एक साथ प्राकृतिक विप्लव की तरह जैसा नैतिक क्षरण देखने में आया जिससे मुक्त केवल गाँधीवादी मिले उसके लिए मैं जल्दबाज़ी में नेहरू को अपराधी मान लेता हूँ। यथा राजा तथा प्रजा के सूत्र के दिमाग में गहरे उतर जाने के कारण। यह गलत नहीं है पर पूरा सच नहीं है. अंग्रज़ी में एक कहावत है- तुमको वैसा ही नेतृत्व मिलेगा जिसके काबिल तुम हो।

मैं एक व्यक्ति को पूरा देश मान लेता हूँ, जो सही नहीं है। हमारा दुर्भाग्य की यह पूरी तरह गलत भी नहीं है. आजादी के स्टॉक मार्किट में बहुत कम लोग थे जिन्होंने त्याग की आड़ में इन्वेस्ट नहीं किए थे. अपनी जमा पूंजी नहीं लगाईं थी.

नेहरू परिवार का इन्वेस्टमेंट इतना सुनियोजित था कि उसे कोई भांप न सका और यदि उस वंश परम्परा में यह मानसिकता रुग्णता की सीमाएं न लाँघ जाती जिसमे यह दावा निर्लज्जता से किया जाने लगा कि भारत नेहरू वंश का है, और इसके बाद भी नेहरू के कार्य और व्यवहार में इसे झुठलाने वाला कोई प्रमाण मिल जाता तो ऐसा कहने की अशिष्टता मैं नहीं करता.
इसे मैंने २००० से पहले ही ताड लिया था. परन्तु स्वतन्त्रता का फल चखने की ललक तो नीचे से ऊपर तक भरी थी यह नेहरू जी के नियति से मिलन की आधी रात के बाद की गिरावट से ही जाहिर हो गया था.

यह एक अजीब गणित है जिसमें जो सही लगता है वह गलत से कम सही रह जाता है। राजनीति में जब गणित भी फेल हो जाता है तो आदमी सही कैसे रह सकता है। कितने सही एक साथ कितने गलत हो जाते है:
1. उपनिवेशवादी सही थे कि वे भारतीयों को स्वायत्तता या स्वतन्त्रता देना चाहते हैं परन्तु यह जिम्मेदारी देने से पहले उनको यह जिम्मेदारी संभालने के योग्य बनाने के लिए, इसे धीरे धीरे, योग्यता में बढ़त के अनुसार देना चाहते हैं।
2. उनका यह दावा भी सही था कि वे समस्त प्रजा को उनका न्यायोचित लाभ देना चाहते हैं, इसलिए इसकी कोई समझदारी भारतीयों में विकसित हो जाने के बाद ही ऐसा करना संभव है।
3. कांग्रेस का यह दावा सही था कि वह पूरी भारतीय जनता का, पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्वि करती है .
4. लीगियों का यह तर्क भी सही था कि यदि भारत आजाद हुआ और लोकतन्त्र स्थापित हुआ तो उनको कहीं जगह ही नहीं मिलेगी, बहुमत तो हिन्दुओं का ही निकलेगा इसलिए सत्ता हिन्दुओं के हाथ में चली जाएगी जिससे बचने के लिए मुसलमानों को पृथक और सुनिश्चित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और वह इनता प्रभावशाली होना चाहिए कि अपनी आवाज बुलन्द कर सके इसलिए यह प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में नहीं, उससे बहुत अधिक होना चाहिए।
5. उनका यह दावा भी सही था कि कांग्रेस उनकी न्यायोचित मांग को नहीं मान रही है इसलिए वह हिन्दुओं की पार्टी रही है, आज भी है और आगे भी रहेगी।
6. कांग्रेस का यह दावा भी सही था कि सत्ता हस्तान्तरण के लिए विलंब करते हुए अंग्रेज सामाजिक माहौल को सांप्रदायिक बना रहे हैं आगे जो जितना ही विलंब होगा इसके उतने ही बुरे परिणाम होगे ।
7. गाँधी जी और कांग्रेस का यह कहना भी सही था की हिंसा हिंसा को बढ़ावा ही नहीं देती अपितु अहिंसा के नाम पर भी हिंसा भड़काई का सकती है ।
8. क्रांतिकारियों का यह मानना तो सोलह आने और आज के हिसाब से सौ पैसे सच था की आज़ादी भीख में नहीं मिलती.

सच के अनंत रूपों में इतिहास का सच केवल वह होता है जो घटित हुआ, जिसे रोका न जा सका, जिस रूप में हुआ उसे बदला नहीं जा सका और इसको सच बनाने वालों ने जिन हथियारों का प्रयोग किया उनसे बचा नहीं जा सकता था भले माउंट बैटन द्वारा गोरी चमड़ी की श्रेष्ठता से अभिभूत नायक को अपनी बूढी मर्दखोर औरत को परोस देने जैसा टुच्चा दांव ही हो. इतिहास का रथ बहुत कमजोर और ढीले जोड़ों पर पर्दा डालते हुए आगे बढ़ता है.

Post – 2017-04-16

देववाणी (6)

भोजपुरी संस्कृत के प्राकृत और अपभ्रंशों के स्खलन से पैदा नहीं हुई, यह उस देववाणी की उत्तराधिकारिणी है जिसके कई चरणों के विकास के बाद संस्कृत स्वयं अस्तित्व में आई थी। इसका प्रमाण यह है की भारोपीय भाषाओँ की जिस जननी भाषा के लक्षणों की परिकल्पना भाषा शास्त्रियों ने की उसके जो लक्षण संस्कृत में नहीं पाए जाते वे भोजपुरी में पाए जाते हैं।

इनमे एक विशेषता महाप्राण ध्वनियों का उस प्राचीन रूप में बचा रहना है जिसे देख कर ग्रियर्सन स्तब्ध रह गए थे और यह कह कर छुट्टी पा ली थी कि पूर्वी हिन्दी भारोपीय भाषाओं में सबसे अधिक रूढ़िवादी है।

जो लक्षण भारोपीय की किसी शाखा में, यहां तक कि सभी बहनों में ज्येष्ठा संस्कृत तक में नहीं बचे, भोजपुरी में कैसे पैदा हो गए? आर्यों के ही नहीं भारोपीय जनों के पूर्वज कब पूर्वी हिंदी क्षेत्र में पहुँच गए यह सवाल तक नहीं उठाया गया, क्योंकि लिंगविस्टिक सर्वे का छिपा लक्ष्य भाषा की आड़ में भारतीय समाज को बाँटना, आर्यों के हमले की पुष्टि करना था न की भारतीय भाषा समस्या को समझना।

यह काम उन्होंने और हार्नले ने किया भी और उन्हें रामप्रसाद चाँद जैसे नृतत्वविद भी मिल गए जिनकी स्थापनाओं का खंडन सुनीति बाबू ने बड़े तर्कपूर्ण ढंग से किया था।

हम उस बहस में न उलझ कर यह याद दिलाना चाहते हैं कि भाजपुरी के विषय में अतिप्राचीन ध्वनियों की अतिजीविता की ओर उनका भी ध्यान गया और इसे उन्होंने दुहराया भी, फिर वह इस तथ्य को रेखांकित क्यों न कर सके कि वह भाषा जिससे भारोपीय भाषाओँ की जननी पैदा हुई उसका क्षेत्र पूर्वी हिंदी क्षेत्र है। जिस भाषा का विश्व में प्रसार हुआ वह वैदिक समाज की बोलचाल की भाषा थी पर इस समय तक उसमें भी अनेक पुराने लक्षणों का लोप हो चुका था।

दुराग्रह कितने प्रबल होते हैं कि इतने प्रबल भाषावैज्ञानिक तथ्य की उपेक्षा करते हुए दो सौ साल तक भारोपीय का जन्म कहां हुआ था इसे लेकर पहेलियां बुझाई जाती रहीं। यह जानते हुए कि इसका समाधन भारत में ही सम्भव है और यहां इसके निर्णायक प्रमाण मिल सकते हैं भारत को विचारणीय क्षेत्रों बाहर रखा जाता रहा और हमारे विश्वविख्यात माने जाने वाले भाषाशास्त्राी भी मुग्धभाव से उन मूर्खतापूर्ण सुझावों को मानते रहे जिनमें सभी इतने लचर थे कि जिसे जो भी स्थल रास आता था उसे क्षीणतम अटकलों कि आधार पर क्रोडक्षेत्र मन कर अपनी भड़ास निकाल लेता रहा जब की दूसरा उसकी बखिया उधेड़ कर रख देता था, जैसा की मैलोरी ने रेनफ्रू के साथ किया और मजे की बात यह कि आज भी उसे दुहराने वाले मिल जाएंगे।

हम भषाविज्ञान और इतिहास की राजनीति की ओर बहकने की जगह तुलनात्मक अध्ययनों से भाषाशास्त्री जिन नतीजे पर पहुंचे थे उसे अपने ढंग से रखना चाहेंगे :

1. जननी भाषा में पूर्ण भूतकालिक क्रिया के लिए क्रिया रूप की आवृत्ति की जाती थी घन+अ +घन = घनाघन जो ऋ . घनाघनो क्षोभणश्चर्षणीनाम।
२. बाद में मध्य नकार का लोप हो गया और स्वर आगे जुड़ गया और इसका रूप घघान हो गया।

३. संस्कृत भाषी भिन्न भाषाभाषी पृष्ठभूमि वाले ऐसे जनों के अपने समाज में विलय के कारण जो प्रयत्न के बाद भी एक साथ आए दो घोष महाप्राण ध्वनियों का उच्चारण नहीं कर पाते थे, स्वयं भी इसे अपना लिया । सम्भवतः इस भाषा में चवर्गीय ध्वनियों के लिए विशेष आग्रह था इसलिए पूर्ववर्ती ध्वनि का महाप्राणन समाप्त हो कर वह घोष ही नहीं हो जाती थी अपितु घोष भी चवर्गीय हो जाता था और जघान रूप बनता था। ऐसा कवर्ग के साथ होता था इसलिए इसकी गुत्थी सुलझाने के लिए उन्होंने आदि भाषा की कवर्गीय ध्वनियों के जिह्वामूलीय उच्चारण वाले एक अन्य वर्ग की कल्पना की। इनके सूत्र उन्हें पाणिनीय व्याकरण से ही मिल भी रहे थे। वे समस्त विकास नस्ली ढंग से तलाश रहे थे, यही सीमा पाणिनि की भी थी इसलिए संस्कृत के विकास में किसी भिन्न भाषाई समुदाय के योगदान की बात उनको न सूझी। इससे आदि भारोपीय की कल्पित वर्णमाला अनावश्यक रूप से बोझिल हो गई।

४. जहां घोषमहाप्राण की समस्या नहीं घोष के बाद घोष आता था वहां पूर्ववर्ती में घोष का लोप होकर गम +गम = गगाम – जगाम रूप, कर+कर= ककार – चकार; घस + घस= घघास – जघास जैसे रूप बनने लगे।

५. दूसरे वर्गों में घोषमहाप्राण की आवर्तिता पर पूर्ववर्ती ध्वनि का घोष रूप ही उच्चारित होता था : धर+धर = दाधार; भू+भू=बभूव

६. चवर्ग सहित दूसरे वर्गों की अन्य ध्वनियों में कोई परिवर्तन न होता था – चर+चर= चचार; मर+मर= ममार, तर+तर= ततार।

भोजपुरी में ये विकार क्यों नहीं आए इसकी चर्चा हम कल के लिए स्थगित रख सकते हैं।

Post – 2017-04-15

ऐसा नहीं है की भाई, माई, खेत अपने अंतिम स्वर के स्वरित उच्चारण को नए द्विस्वर ई – इआ- इया/ इअवा/ अ-आ, -वा में बदल देते हैं. स्वरित उच्चारण को द्विस्वर में बदलना सम्बोधन में तथा अन्य कारक पदों के साथ होता है:
इ हमार खेत ह, हमरे खेतवा में जव बोवल बा, तुहरे खेतवा में पानी लागल बा, इ हमार बहिनि ह. इ ओकरे बहिनिया के साथे इस्कूल जाई. पर इ हमार भाई ह. इ हमार भइया हवें. में भाई का अर्थ छोटा भाई है और भइया आदर सूचक बड़े भाई के लिए. जब भोजपुरी भाषी भइया का प्रयोग करता है तो उसका अर्थ भाई से कुछ अधिक होता है. इसमें सम्मान और आत्मीयता का पुट होता है. यह कुछ वैसा ही प्रयोग है जैसे भाऊ, भावे आदि.
यहां आकर मेरी सोच बदल गई और ऊपर जो कयास लगाया था वह कुछ संशोधित हो गया. अब हम इस नतीजे पर पहुँच रहे हैं की भारत की सभी बोलियों में लालित्य, आदर और आत्मीयता के लिए शब्द के अंत में कुछ अतिरिक्त प्रत्यय लगाते है. मामला पूरी तरह पूरब पश्चिम का नहीं है अन्यथा सिंधी में अतिरिक्त -नी, ब्रजभाषा और भोजपूरी में – मइया, मतवा जैसे

तू ही कहता है कि यह दिन तो किसी शाम का है
मैं भी कहता कि तू आदमी कुछ काम का है
कहता हूं शाम है दिन काम जी लगा के करो
तू बताता है कि यह वक्त तो आराम का है।

अब तो वह दिल नहीं जो टूटता जुड़ जाता था
सपने बुनता था आसमान में उड़ जाता था
अब वो धड़कन नहीं जो मौज से आगे थी बहुत
अब वो हसरत नहीं जो ख्वाब से आगे थी बहुत
अब जो टूटेगा तो सर्जन ही काम आएगा
अब जो डूबेगा तो बाहर न निकल पाएगा
अब तो बस राम राम राम राम ही कहिए
दिल को अब तो मिले आराम राम ही कहिए

Post – 2017-04-15

देववाणी (पांच)

देववाणी के स्वरप्रेम के एक रोचक पहलू ‘कवन गली गए श्याम है’. आधे पौन घंटे तक मुग्ध भाव से संगीत का रस लेने के बाद जब संगीत समाप्त होता है तो क-व-न—ग-ली-गए-श्sss- श्याssssम म पर ही. गली का पता ही नहीं चल पाता. गरज की स्वरण प्रधान भाषाओं की संगीतात्मकता में अर्थ-संचार मंद पड़ जाता है और भाव संचार अधिक गहन हो जाता है.

हमारी भाषाओँ का चरित्र एक साथ कई चीजों से प्रभावित होता है:- उसका अपना चरित्र, भाषा-परिवेश, दूसरे भाषा-भाषियों का किन्हीं भी कारणों से हमारे समाज में विलय या उनका प्रभावशाली स्थिति में होना, तकनीकी प्रगति और उस क्रम में ज्ञान, संवेदन, और अभिवक्ति में आया परिष्कार और भाषासंपदा में वृद्धि के अतिरिक्त हमारी भौगोलिक स्थिति की भी भूमिका होती है. यह अंतिम तथ्य हमारे स्वाभाव, हमारे आदर्श, हमारे सामाजिक व्यवहार, कहें भौतिकता और मानसिकता दोनों को प्रभावित करता है.

यदि हम हिन्दी के पूर्वी सिरे से पश्चिमी सिरे तक जायं तो भाषा में ही वह मन्थरता और मिठास पश्चिम की दिशा में बढते हुए कम होती और उच्चारण में क्षिप्रता और कथन में त्वरा ही नहीं आती जाती है जिसे हमने स्वर की प्रधानता, गेयता और माधुर्य के रूप कमी और परुषता में वृद्धि के रूप में चिन्हित किया था, जलवायु भी आद्रताबहुल से शुष्कता की ओर बढ़ती चली जाती है, स्वभाव की मस्ती और बेफिक्री घटती जाती है और अधिक से अधिक कम से कम समय और आयास में पाने की जल्दबाजी बढ़ती जाती है। अन्तमुर्खता और परलोकवादिता कम हो कर भौतिकता और उपभोगवादिता बढ़ती जाती. पूर्व में अंतर्मुखता और अध्यात्मवादिता अधिक मिलेगी, बहिर्मुखता और वस्तुपरकता कम.

यह अकारण नहीं है की ऋग्वेदिक समाज को हम अधिकाधिक धन, प्रजावृद्धि, शत्रुविजय, क्षेत्रविस्तार के लिए प्रयत्नशील पाते हैं परन्तु जब शताब्दियों तक चलने वाली प्राकृतिक आपदा के चलते जिसमेँ सरस्वती सूख जाती है, दूसरी नदियां भी क्षीणतोया हो जाती हैं और उधर से भागने वाले विदेह माधव को पूर्वी हिंदी क्षेत्र में शरण लेनी पड़ती हैं तो वेदज्ञ वेदान्तज्ञ बन जाते हैं, दुनियादारी बोझ लगने लगती हैं, यज्ञ से प्राकृतिक शक्तियों को तुष्ट करके उनसे अपनी मनोकामनाएं पूरी करने का दम भरने वाला समाज मनोकामनाओं को ही नियंत्रित करने और ब्रह्म और आत्म के सवालों से उलझने लगता हैं, पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं भौतिक ज्ञान और चिंता को वह व्यर्थ और अज्ञान का ही एक रूप मानने लगता हैं, भूत ही चिंता करने वाला आत्म की चिंता करने लगता हैं, शत्रु विजय करने वाला इन्द्रियविजय करने लगता हैं.

यह भी अकारण नहीं हैं कि बंगाल पुनर्जागरण में तंत्र-मंत्र अंत: साधना की एक समांतर धारा चलती हैं, राममोहन रॉय से लेकर रवीन्द्र तक, सबमें उपनिषदीय आध्यात्मिकता बनी रहती हैं, रामकृष्ण, विवेकानंद, अरविन्दघोष सभी आध्यात्मिकता को भारत की अपनी निजी विशेषता मानते हैं और पश्चिम की ओर आने पर दयानद सरस्वती वेदों को अपना प्रेरणा स्रोत बनाते हैं और दावा करते हैं की भारत ज्ञान विज्ञान में सर्वोपरि था और उनका जोर समाजसुधार, स्त्रीशिक्षा, स्वतंत्रता प्राप्ति, पश्चिमी समाज की अनुकरणीय विशेषताओं को अपनाने और सभी दृष्टियों से आगे बढ़ने पर होता हैं. शिक्षा के क्षेत्र में भी वह बंगाली चिंतकों की तरह पश्चिमी शिक्षा पद्धति के सामने घुटने नहीं टेकते, अपितु प्राचीन जमीं पर एक नए सामंजस्य की चिंता करते हैं.

भाषा के सन्दर्भ में भोजपुरी या उससे भी पहले की देवभाषा में स्वर और संगीतात्मकता को भी इस विशद परिप्रेक्ष्य में देखना उचित होगा. इसमें बात स्वर प्रधानता पर ही समाप्त नहीं होती, अपितु स्वरों में भी अ और आ दूसरे स्वरों पर भारी पड़ते हैं जिसे भाई – भइया, माई – मइया, आजी – अजिया, बहिन – बहिनी, बहिनी, बहिनिया में देखा जा सकता हैं. पर इससे भी रोचक हैं देस- देसवा, परदेशी – परदेसिआ, करम- करमवा जैसे प्रयोग.

जहाँ पश्चिम की बोलियों में स्वरों को क्षिप्रता के तकाजे से खा जाने की बेताबी हैं वहाँ पूर्व में उतने से ही संतुष्ट न होकर अतिरिक्त स्वर जोड़ने पर ही अनुराग और आत्मीयता पैदा होती हैं.

इसका एक कारन क्या यह हो सकता हैं की आदिम कृषि के चरण पर जंगली जानवरों या लुंचन कारियों के संकट के समय लम्बी गुहार लगा कर सहायता के लिए दूसरों को बुलाने के क्रम में यह प्रवृत्ति पैदा हुई हो? कारण और पूर्व में बढ़ने पर अकार का ओकर भले हो जाय, ये प्रवृत्तियां नहीं पाई जातीं.

Post – 2017-04-14

सच बयां करता हूं तो कोई कान देता नहीं
झूठ गढ़ता हूं तो कुछ लोग समझ लेते हैं
लोगों को जानने की लंबी कवायद की है
पर न जाना किसे क्या लोग समझ लेते हैं।

Post – 2017-04-14

विडंबना

उसने कहा, “वामपंथियों से कभी तुम्हें प्रेम थ एकाएक वह नफरत में कैसे बदल गई?”
“नफरत में नहीं तरस में।”
“चलो तरस ही सही, दक्षिण पन्थियों के लिए इतना प्यार कहां से छलकने लगा?”
“प्यार नही तरस कहो।”
“कमाल के समदरसी हो, दोनों में कौन सी कमी है कि कि दोनों पर तरस खाते हो?”
“एक की दाहिनी आंख काम नहीं करती, दूसरे की बाईं आंख काम नहीं करती। दोनों को पूरा सच दिखाई नहीं देता और दोनो को जो आधा दिखाई देता है वह दूसरे को नजर नहीं आता।”
“यह तो सचाई है, इस पर तरस खाने की बात कहां से आ गई?”
“मैं दोनों की मदद करना चाहता हूं। पर दोनों ने एक आखं की नजर खोई इसका उन्हें अहसास तक नहीं है। दोनों अन्तिम सत्य पह पहुंचे हुए हैं और उल्टे मुझ पर ही तरस खाते हैं कि यह आदमी मेरी बात मानता क्यों नहीं?”

Post – 2017-04-14

देववाणी (चार)

देववाणी की एक अन्य विशेषता जिसका उल्लेख राजवाड़े जी ने किया है वह यह कि इसमें शब्द स्वरान्त होते थे। कोई शब्द हलन्त नहीं होता था।

इसका रहस्य यह है कि यद्यपि आहार संग्रह के चरण पर मानव यूथ दूर दूर तक, जहां भी फल और कन्द आखेट या मछियारी की सुविधा हुई, बढ़ जाते थे अतः कोई भी आदिम या विकसित भाषा ऐसी नहीं है जिसमें अनगिनत अन्य भाषाओं के कुछ लक्षण न तलाशे जा सकें, अपन्तु एक चरण पर आपसी तकरार से बचने के लिए उन्होंने भूमि का आपस में बटवारा करना आरंभ किया।

यह परिसीमन प्राकृतिक लक्षणों को ध्यान में रखते हुए किया गया और इसके बाद एक का दूसरे में प्रवेश वर्जित ठहराया जाने लगा। यहां तक कि यदि एक के द्वारा घायल शिकार भाग कर दूसरे क्षेत्र में पहुंच जाय तो भी वह उसे पकड़ने के लिए उस दायरे में नहीं जा सकता था। यह देश की अवधाराणा का आदिम रूप था और इसे मैंने अन्यत्र भी रेखांकित किया है कि क्षेत्रीय सीमा को मर्यादा कहा जाता था जिसका अर्थ बाद में बदल कर शिष्टाचार या परंपरा आदि हो गया परन्तु पुराना अर्थ वह सीमा है जिसे लांघने पर दूसरा उसके प्राण ले सकता है या अपनी जान दे भी सकता है। मर्यादा उसी मूल से निकला है जिससे मृत्यु और मर्त्य (जो बहादुरी का अर्थ देने वाला मर्द बन गया)। देश की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर करने की मानवीय प्रवृत्ति का जो रूप आज है वह उसी का विकास है। पहले इस पर जान देना सबका कर्तव्य था । बहुत बाद में, कहें खेती आरंभ होने पर इसके लिए कुछ तरुणों को नियुक्त किया जाने लगा क्योंकि अव यह खतरा मनुष्यों से ही नहीं पशुओं आदि से भी था जिसमें भैंस से लेकर हिरनों तक के झुंड का सामना करने में जान की बाजी लगानी पड़ती थी। यहां से क्षत्रिय वर्ण का उदय हुआ।

खैर, इस तरह स्थायी बस्ती से बहुत पहले स्थायी क्षेत्र अस्तित्व में आए और घुमक्कड़ी पर अंकुश लगा। इसके परिणाम स्वरूप भाषा के आंचलिक लक्षणों का विकास हुआ जिसे रामविलास जी ने ध्वनियों के पृथक केन्द्रों के रूप में पहचाना था और एक बहुत महत्वपूर्ण स्थापना दी थी कि जिस वर्णमाला से हम परिचित हैं उसका निर्माण पारस्परिक संपर्क बढ़ने के फल स्वरूप हुआ है फिर भी सभी ध्वनियां सभी में प्रवेश नहीं पा सकीं, इसलिए आज भी संस्कृत के विद्वानों द्वारा भी उन वर्णों में से कुछ का शुद्ध उच्चारण नहीं हो पाता, जो हमारी वर्णमाला के अंग हैं। उच्चारण के अलग से प्रशिक्षण या शिक्षा की आवश्यकता इसलिए भी पड़ती थी।

अब यदि हम उत्तर भारत में पश्चिम से पूर्व की ओर चलें तो पाएंग पश्चिमी बोलियां व्यंजनप्रधान हैं औ कुछ में स्वरलोप या स्वर विचलन की प्रवृत्ति है जिसका परिणाम यह कि जो शब्द अकारान्त होते हैं, जिन शब्दों के अन्त में हल का चिन्ह नहीं है, उनका उच्चारण भी हलन्त के रूप में होता है और यह केवल हिन्दी में नहीं होता, संस्कृत में भी होता था। पूर्व की ओर बढ़ते हुए अन्त्य वर्ण के स्वरण में क्रमिक वृद्धि होने लगती है। भोजपुरी क्षेत्र तक आते आते अकारान्त शब्द का अन्तिम वर्ण एक मात्रा, डेड़ मात्रा या पौने दो मात्रा का या कहें आकार तो नहीं पर उसके निकट पहुंच जाता है । बंगाल पहुंचने पर यह इतना बढ़ जाता है कि अकार का शुद्ध उच्चारण संभव ही नहीं रह जाता, यह ह्रस्व ओकार बन जा जाता है जिसके लिए हिन्दी वर्णभला में लिपिचिन्ह नहीं है परन्तु द्रविड़ में है। बंगला का यह ओकारत्व ओरोबिन्दो, रोबिन्द्र आदि से समझा जा सकता है।

भोजपुरी में कहें तो शब्द स्वरान्त ही नहीं किंचित स्वरित रूप में पाया जाता है जिसके लिए मल्लिका अर्थात गोरखपुर, बलिया, आजमगढ़ मे कुछ मामलों में अवग्रह या खंडाकार के चिन्ह का प्रयोग करना उचित प्रतीत होता है। काशिका में यह पौने दो मात्रा तक पहुंच जाता है इसलिए वे शब्द को अकारान्त रखने की जगह आकारान्त कर देते हैं।
जाब = जाउूंगा,
मल्लिका – जाबS बनारसी – जाबss = जाओगे?

हम कह सकते हैं कि देववाणी में शब्द अजन्त या स्वरान्त ही नहीं होता था, अन्त्य स्वर सुश्रव्य होता था। इस अंतर के कारण पश्चिमी, विशेषतः हरयाणवी हिंदी बोलता है तो उसमें वेग बढ़ जाता है, पूरबी हिंदी भाषी की गति मंद होती है, लगता है वह गा रहा है. पश्चिमी प्रखरता के कारण कर्ण कटु लगता है, पूर्व की और बढ़ते हुए स्वरण के प्रभाव से माधुर्य या संगीतात्मक बढ़ जाती है।