Post – 2017-04-13

देववाणी (तीन)

[मैंने भाषा पर लिखने का दुस्साहस फेसबुक पर इसलिए किया कि विविध बोलियों से परिचित मेरे मित्र मेरी गलतियों की ओर जो उदाहरणों में, दूसरी बोलियों के विषय में या भोजपुरी के दूसरे अंचलों के विषय में हो सकती हैं और जिसके डर से ही अब तक इस विषय को हाथ लगाने से बचता रहा हूं, उनकी ओर संकेत करेंगे। वह प्रशंसा से अधिक जरूरी है और मेरी प्रस्तुति को अधिक निखोट बनाने में सहायक होगा। आप इसमें अपनी भूमिका निभाते चलें।]

रानटी अर्थात देववाणी की एक अन्य विशेषता यह थी कि इसमें लिंग भेद नहीं था। भोजपुरी में और उससे पूरब की बोलियों में भी लिंगभेद नहीं मिलता। कहते हैं एक बार जब डा भगवानदीन (यह जैनेन्द्र जी के मामा थे और इतनी प्राणवान हिन्दी लिखते थे कि मैं उनको हिन्दी के श्रेष्ठतम गद्यकारों में गिनता हूं) जब रवीन्द्रनाथ से मिलने गए तो अन्य बातों के अलावा रवि बाबू ने विनोद में हिन्दी के विषय में कहा था, जिस भाषा में मूछ और दाढ़ी स्त्रीलिंग हो और स्तन पुलिंग उस भाषा को कोई कैसे सीख सकता है?

आपने देखा होगा जिन्दगी भर हिन्दी क्षेत्र में गुजारने के बाद भी बगाली हिन्दी बोलते समय लिंग की गलतियां करता है और यदि उसे सुन कर लोग मुस्कराने लगें तो वह हैरानी में सोचता है उसने ऐसी कौन सी बात कह दी जिस पर किसी को हंसी आए।

ऐसी ही हंसी श्रोताओं को लालू यादव की भोजपुरी ठाट वाली हिन्दी सुन कर आती है और जिसका वह अपने कथन को प्रभावशाली और साथ ही हास्यकर बनाने के लिए प्रयोग करते हैं। इन प्रयोगों में अन्य बातों के अतिरिक्त स्त्रीलिंग और पुलिंग में अभेद भी होता है। जनाना लोग जाएगा, लड़की जाएगा, लड़का जाएगा।

इसका उपहास करने वाले यह नहीं जानते होंगे कि लिंग विधान का सेक्स से संबन्ध नहीं अहंता से संबन्ध है और अपनी अस्मिता के प्रति सचेत लड़कियां प्रायः अपने लिए पुलिंग क्रियाओं का प्रयोग करती हैं। संस्कृत में यदि कोई चीज सबसे गड़बड़ है तो वह है लिंग व्यवस्था जिसमें कई बार एक ही शब्द के दो लिंग एक साथ होते हैं और नपुंसक लिंग में लिंगबाह्य सत्ताओं का लिंग कभी पुलिंग होगा, कभी स्त्रीलिंग और कभी नपुंसक लिंग।

इस अराजकता का कारण यह है कि देववाणी की अवस्था में इसमें लिंगभेद नहीं था। स्त्रियों और पुरुषों की सामाजिक हैसियत में भी भेद न था। लिंग के मामले में मुंडारी में समाहित बोलियों में भी अनिश्चितता पाई जाती है परन्तु द्रविड़ में यह बहुत स्पष्ट है। उसमें स्त्रीलिंग, पुलिंग और हेय लिंग जिसे अमहत लिंग कहते हैं प्रयोग में आते हैं। यदि द्रविड के अमहत को जिसमें छोटे जन, निर्जीव वस्तुएं और मानवेतर प्राणी आते हैं यथातथ्य अपनाया गया होता तो न तो संस्कृत में लिंग की इतनी गड़बड़ी पाई जाती, न ही हिंदी को संस्कृत से यह गड़बड़ी विरासत में मिली होती। यह हिन्दी सीखने वालों के लिए भी कठिनाई पैदा करती है।

इसका ऐतिहासिक समाजशास्त्र में फलितार्थ यह है कि द्रविड़ भाषी समाज का संस्कृत के विकास में उतना निर्णयकारी प्रभाव नहीं पड़ा जितना मुंडारी समुदाय का या तो संस्कृतभाषी समाज में विलय होने वाले द्रविड़ समुदाय की संख्या अपेक्षाकृत कम थी, अथवा सहयोगी के रूप में उनकी भूमिका मुंडारी समुदाय की तुलना में कम थी।

मुंडारी में परिगणित बोलियां भी द्रविड़ प्रभाव में आईं और उनमें भी स्त्रीलिंग, पुलिंग और अमहत का भेद कहीं कही देखने में आता है, परन्तु नियमितता का अभाव है। कुछ में यह प्रभाव आज तक नहीं आ पाया। उदाहरण के लिए खड़िया के विषय में आर.पी. साहु बताते हैं, ‘‘खड़िया संज्ञाओं ओर सर्वननामों में लिंग बोध करने के संकेत नहीं हैं, और न ही विशेषण ही स्त्रीलिंग पुलिंग भेद दर्शाते हैं। क्रिया भी एक लिंग की होती है। कहने का तात्पर्य यह कि खड़िया में लिंग भेद नहीं होता।

किसी भिन्न समुदाय से ग्रहण की गई थाती को व्यवस्थित करने में व्यवस्थागत विचलन पेश आती ही है। वह संस्कृत में भी लक्ष्य की जा सकती है और ऐसी मुंडारी बोलियों में भी जिन्में लिंग विधान पाया जाता है।

Post – 2017-04-12

देववाणी (दो

देववाणी की दूसरी विशेषता यह थी कि इसमें वचन भेद न था.
एक लइका जाई
दस लइका जाई,
के जाई,
के के जाई,
सब जाई
यह कहना ठीक न होगा कि ये प्रयोग भोजपुरी में चलते है पर यह भी नहीं कहा जा सकता कि आज भी किसी अंचल में किसी स्तर पर नहीं चलते होंगे। यह अवश्य सच है कि यदि कोई ऐसा प्रयोग कर बैठे तो वह सुनने वाले को खटकेगा नहीं और अर्थ संचार में बाधा नहीं पड़ेगी।

राजवाड़े जी यह सुझाव देने के साथ कि रानटी में, वचन की जगह संज्ञा से पहले संख्या वाचक शब्द प्रयोग में आता था यह भी सुझाते हैं कि संस्कृत में तीन ही वचन होने का कारण यह है कि उस समय संख्या का विकास तीन तक ही हो पाया था।

जैसा कि उन्होंने बताया है उन्होंने बहुत छोटी अवस्था में संस्कृत सीखते समय अपनी जिज्ञासा यहीं से आरम्भ की थी कि यदि एक के बाद दो के लिए अलग वचन का विधान है तो उससे बाद वचन विभक्ति तीन के लिए हुई और इस नियम से चार के लिए अलग विभक्ति होनी चाहिए थी जो नहीं है. इससे वह यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ऐसा इस लिए हुआ होगा कि वे उस चरण तक तीन से बड़ी संख्या से परिचित नहीं थे।

उनका यह सुझाव उनके ही पहले सुझाव से मेल नहीं खाता कि वे सबसे पहले वचन के लिए संज्ञा से पहले संख्या वाचक शब्द का प्रयोग करते थे।

यह सच है कि विकास के आदिम चरणों पर गणना का विकास तीन से आगे नहीं बढ़ा था और तब तीन समस्त के लिए प्रयोग में आता था. तीनो लोक, तीनों आकाश (त्रिदिव) समस्त लोक और समस्त आकाश के बोधक थे। बाद में संख्याओं की वृद्धि के क्रम में चार, पांच, छह, सात, आठ, दस सभी समस्त और फिर अपनी सटीक संख्या के द्योतक हुए। तथाकथित आधुनिक आर्य बोलियों में और साथ ही प्राकृतों में भी द्विवचन नहीं मिलता। एक वचन और अनेक वचन (बहु वचन) ही हैं. ऐसा ह्रास या लोप के कारण नहीं है। मुंडा में गिनी जाने वाली अधिकांश बोलियों में एक वचन, द्विवचन और बहुवचन का प्रयोग आज भी चलता है जब कि लम्बे समय से ये बोलिया अपनी पडोसी आधुनिक ‘आर्य’ भाषा के दबाव में रही हैं. उदाहरण के लिए खड़िआ में, हो में, आज भी एकवचन, द्विवचन, बहुवचन प्रचलित है।

खड़िआ

एक वचन द्विवचन बहुवचन
कूऽढीङ (मेला) कूऽढीङकियर (दो मेले) कूऽढीङकी (बहुत से मेले)

जोल (तेल) जोलकियर (दो तेल) जोलकी (बहुत से तेल)

ऐसा नहीं हो सकता कि अपने पूरे प्रसार क्षेत्र में आधुनिक आर्य भाषाओँ और प्राकृतों अपभ्रंशों में द्विवचन का लोप होजाय और संस्कृत की यह विशेषता मुंडारी में अपना ली जाये।

इस लिए अधिक निरापद यह प्रतीत होता है कि देववाणी में एक वचन और बहुवचन (एक और अनेक) का प्रचलन किसी अन्य भाषा के सम्पर्क में आने के बाद हुआ। संभवत: उसी के प्रभाव से संस्कृत में तीन वचन आये। बोलचाल के स्तर पर यह एक-अनेक वचनों तक सीमित रहा, परन्तु संस्कृत या देवसमाज के अभिजात स्तर पर इसे पूरी तरह आत्मसात किया गया। यहां से ही संस्कृत के उस पूर्वरूप का सम्बन्ध जनसाधारण से कटना आरम्भ हुआ। द्विवचन द्रविड़ बोलियों में नहीं पाया जाता इसलिए यह अनुमान करना अनुचित न होगा कि संस्कृत ने यह प्रभाव मुंडारी की किसी बोली से लिया।

हम इसे उस चरण का हस्तक्षेप मान सकते हैं जब कृषि कर्म में जानवरों का उपयोग होने लगा और इस लिए उन्हें फंसा कर कृषि उत्पाद के बदले कुछ जानवरों को पकड़ और साध कर वे देवों को बेचने लगे।

कुइपर ने संस्कृत भाषा में दो प्रपुख स्रोतों की भूमिका बताई है और यह सुझाव दिया की द्रविड़ प्रभाव की तुलना में मुंडारी प्रभाव अधिक प्राचीन है:
On the basis of the lexical and syntactic evideñce found in the language of the Rigveda, historians and the linguists believe that ‘the Rigvedic society consisted of several different ethnic components, who (sic) all participated in the same cultural life’ (Kuiper 1991:8). Therefore the term Aryan was not used as a racial term: it referred to a people who were basically a pastoral community keeping herds of cattle as its economic mainstay. The Dravidian Languages Bhadriraju Krishnamurti, Cambridge Language Surveys 203,p.35

इसलिए हम मानते हैं कि यह प्रभाव निश्चित रूप से मुंडारी की कोई बोली बोलने वाले समुदाय के देव समाज से संपर्क बढ़ने और क्रमश: उसका अंग बन जाने का परिणाम था और इन देवभाषियों के पहाड़ी क्षेत्र से नीचे उतरने के बाद आरम्भ हुआ होगा।

द्विवचन लातिन और ग्रीक में भी पहुंची यद्यपि यूरोप में भी आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं की ही तरह एक और अनेक बचन ही प्रचलित हुए। यह साम्य बहुत रोचक है। इसके दो फलितार्थ हैं। एक तो यह कि संस्कृत भाषा में वचन सूचक विभक्तियों के विकास के बाद इस भाषा का प्रसार देशान्तर में हुआ। दूसरा यह कि संभवतः जिस समय भारतीय समाज का एक छोटा सा अभिजात वर्ग ही संस्कृत का आपसी व्यवहार और साहित्यिक रचनाओं के लिए प्रयोग करता था उसी समाज का शेष भाग जिसमें स्त्रियां, बच्चे, सेवक और संपर्क में आने वाले दूसरे लोग थे प्राकृतों की तरह दो वचनों से काम चलाते थे और यूरोप में भी यह प्रभाव दो स्तरों पर पहुंचा एक अभिजात वर्ग और दूसरा उनके सहायक और परिजन जिनो लिए वे वीर का प्रयोग करते थे और जिसकी अधकचरी समझ के कारण यूरोप में कुछ समय तक आर्य जनों की जगह वारोस का प्रयोग होता रहा। यह निवेदन करते हुए हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि ये मात्र एक खयाल है और इसका एक अन्य आधानर यह है कि यूरोपीय भाषाओं में केवल संस्कृत के ही नहीं, द्रविड और मुंडारी के शब्द भी पहुंचे थे। अर्थात अभिजात और इतर जन दोनों की मिली जुली भूमिका थी।

Post – 2017-04-11

आत्मविजय और स्वाभिमान

हम किसी लेन देन में जितना देते हैं उससे अधिक पाने की कोशिश करते हैं तो बेईमानी करते हैं। हम जब चालाक बनने की काशिशि करते हैं, तो ही मूर्ख बनते हैं। यदि हम परिश्रम न करेंगे या कम से कम परिश्रम से अधिकतम पाना चाहेंगे तो बेईमानी से बच नहीं सकते। इन कसौटियों पर देखें और अपना मूल्यांकन करना चाहें तो आप पाएंगे कि बेईमानी, चालाकी, उससे अनिवार्य रूप से जुड़ी मूर्खता और मिथ्याचार हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है । मुझे विश्वास है कि इस निष्कर्ष से हमारे अधिकांश पाठक सहमत हो जाएंगे और इसका दोषी अपने आसपास के सभी लोगों को मानने को तैयार हो जाएंगे और इसके साथ ही अपने कर्तव्य को पूरा मान लेंगे। यह देखने का प्रयत्न नहीं करेंगे कि इसमें वे स्वयं भी शामिल हैं और यदि इस गर्हित स्थिति से निकलना है तो इसे अपने आप से आरंभ करना होगा।
ये आत्मानुशासन से जुड़े सवाल हैं। हम आदर्श के रूप में जिन पंक्तियों को दुहराते हैं , उनमें से अधिकांश को अग्रणी समाजों के सभ्य और सुशिक्षित नागरिक अपने जीवन में उतार चुके हैं जब कि वे हमारे लिए डींग हांक कर अपनी क्षुद्रता को छिापने के ओट हैं। हमारा पहला वाक्य अस्तेय के सिद्धान्त से प्रेरित था और दूसरा सत्य के पालन से प्रेरित था जिनके आढ़ती होने का हम दावा करते हुए पुरानी किताबों के पन्ने दिखाते फिरते हैं और उपदेश के रूप में दूसरों को मुफ्त बांटते रहते हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि उन समाजों के सभी लोग उन गुणों से लैस हैं और हमारे देश में इसका सर्वाथा अभाव है। सचाई यह है कि उनमें इन गुणों पर खरे उतरने वालों को संख्या अधिक है, इन गुणों की कद्र अधिक है, इसलिए इन गुणों से संपन्न लोग निर्णायक स्थितियों में हैं अतः इन प्रवृत्तियों को बढावा देते हैं और अपने को सुयोग्य बनाने के क्रम में वहां इनको अपनानो का पर्यावरण तैयार होता है। हमारे यहां स्थिति ठीक इससे उल्टी है इसलिए निमम्मों, परजीवियों, धूतों की संख्या भी अधिक है, वे निर्णायक पदों पर भी पहुंचे दिखाई देते हैं और उनके द्वारा ऐसी प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता है इसलिए यहां उन्हीं गुणों को हतोत्साहित करने की प्रवृत्ति पैदा होती है। अयोग्य व्यक्ति आपने से योग्य व्यक्ति को अपने अधीन सहन नहीं कर सकता क्योंकि उससे वह खम खाता रहेगा। उसे अयोग्य लोगों की मंडली चाहिए वे ही उसकी अयोग्यता को जानते हुए भी उसकी तारीफ करेंगे क्योंकि इसी के बल पर वे उससे कुछ पा सकेंगे।
मैं शोध और सेमिनारों के जश्न और उसी अनुपात में बौद्धिक गिरावट की चर्चा के प्रसंग में पहले ही यदि आज के एक बहुत महत्वाकांक्षी संचार माध्यम द्वारा प्रचारित और प्रशंसित लेख का दृष्टान्त देते हुए यह दिखाने का लोभ संवरण नहीं कर पाया था तो इसलिए कि मैं इसके माध्यम से यह तो दिखाना ही चाहता था कि हम पढ़ना और देखना और सुनना तक भूल गए हैं, अपितु अपने अल्प को बहु बहनाने की कितनी बेताबी में है और यह प्रवृत्ति किसी एक संस्था या संस्थान या विभाग तक सीमित नहीं है। इसकी व्याप्ति बहुत अधिक है। इस स्थिति में किसी अन्य को दोष देने से अच्छा है हम यदि इस स्खलन को समझ पा रहे हैं तो सबसे पहले अपने को बचाएं। अपने आचार और व्यवहार में इन प्रवृत्तियों पर काबू पाएं और ठीक उल्टा आचरण करने का अभ्यास डालें। अधिक देकर कम पाने पर न खिन्न न हों। इस बात पर गर्व करें की हमने दिया अधिक है लिया कम है। मैं ऋण लाद कर नहीं ऋण बाँट कर, उऋण होकर विदा लूँगा ।
यदि हमें भारतीयता पर गर्व है तो यह वंदे मातरं कहने से व्यक्त न होगा, उन मूल्यों को आचार और व्यवहार में उतरने से चरितार्थ होगा । फेस बुक पर समय काटने या फब्तियां कसने से पूरा न होगा, अपने कार्यक्षेत्र में अधिक ऊँचे कीर्तिमान तय करके उन्हें हासिल करते हुए नए कीर्तिमानों की और बढ़ने से होगा। आप दौड़ में शामिल हैं पर वह दौड़ गलत है. दौड़ का मैदान बदलना होगा। प्रदर्शन की जगह आत्मदर्शन और आत्मतुष्टि की दौड़ में शामिल होना होगा। यह आत्मतुष्टि थोड़े में संतोष का निग्रहवादी पाठ नहीं है, अपितु इस स्तर का, इस निष्ठा और समर्पण भाव से ऊँचे लक्ष्यों तक पहुँचने की दिशा में अपने प्रयत्न और श्रम से तुष्टि है । यह काम किसी हैसियत का आदमी कर सकता है। जहाँ कोई है वहां से एक एक कदम आगे की मंजिल तक पहुँचने की होड़ में मरियल और बीमार आदमी तक शामिल हो सकता है।
यह पीड़ा इस तरह क्यों हावी हो गई की मैं उपदेशक की मुद्रा में आ गया इसे आप समझ सकते हैं। आप फेसबुक से ही चाहें तो समझ सकते हैं की जिन्हें आप समझदार मानते आये हैं वे तक किस स्तर पर उतर कर अपनी बात रखते हैं। शुरुआत उन्हें दोष देने की जगह इससे कर सकते हैं कि जैसा मैं लिख रहा हूँ क्या उससे अधिक अच्छा नहीं लिख सकता.? आपको लग सकता हैं मैं आज भी अपने विषय से भटक गया। पर मैं इसे कई बार दुहरा चुका हूँ की मेरी लड़ाई उस मानसिकता से हैं जो पराधीनता में लम्बे समय तक रहने और उससे समायोजित हो जाने से पैदा होती हैं। मेरी लड़ाई अपने आप से भी हैं, आप से भी हैं, दूसरों स। ।

Post – 2017-04-11

देववाणी (एक)

राजवाडे जी ने जिस आदि भाषा का सुझाव दिया है
उसमें कारकचिन्ह या विभक्ति के प्रत्यय नहीं लगते थे. यह प्रवित्ति क्षीण रूप में भोजपुरी में, विशेषत: इसके मुहावरों में बनी रह गई है :
1. बढ़े न मोटाय बैगन बतिये कहाय. (यदि बैगन की तरह शरीर की बाढ रुक जाए और आदमी मोटा भी न हो तो क्या उम्रदराज होने के बाद भी वह बच्चा ही कहलाएगा? )
2. हम बोला तुम सुना. (मैने कहा तुमने सुना).

अर्थभेद बलाघात और स्वराघात से होता था। इस तरह यही कथन क्या मैंने कहा? क्या तुमने सुना था और हां मैंने ही कहा तुमने सुना तो सुना भी था का व्यंजक भी हो जाएगा।
अपने भावों और सरल विचारों को प्रकट करने की दृष्टि से देववाणी संस्कृत या अपने ही बाद के चरणों की भाषा की तुलना में अधिक प्रभावशाली थी। अन्तर एक था कि यह जटिल विचार और चिन्तन के उपयुक्त न थी। संवेदनात्मक स्तर पर भी यह अधिक सूक्ष्म मनोभावों को प्रकट करने में समर्थ न रही होगी। राजवाडे का मानना है कि यह समासप्रधान थी जिसमें कारक के स्थान पर शब्दविन्यास काम आते थे, या कुन्देन्दुतुषारधारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदंडमंडितकरा या श्वेतपद्मासना जैसे प्रयोग चलते थे जिसके अवशेष आज तक सामासिक प्रयोगों में बचे रह गये हैं ।

इसका प्रयोग आज तक सभी भाषाओँ में होता है परन्तु संस्कृत में अधिक नहीं होता जब कि वैदिक में इस पर इतना ध्यान दिया जाता है कि माना जाता था कि तनिक भी चूक से अर्थ का अनर्थ हो सकता है और यदि मंत्र पाठ में चूक हो तो परिणाम उलटे हो सकते हैं. यह प्रधान कारण था कि सभी को वेदपाठ की अनुमति नहीं थी. पाठ संगीत प्रधान था और संगीत की तरह वेदपाठ का अभ्यास भी किसी वेदपाठी या उपाध्याय के निर्देशन में ही सीखा जा सकता था. अक्षरों के साथ मात्राओं के अतिरिक्त स्वराघात और बलाघात को इंगित करने वाले विकारी चिन्हों का प्रयोग किया जाता था. इसके बाद भी स्वरों के आधी, तीन चौथाई और चौथाई मात्राओं का विधान प्रातिशाख्यों में मिलता है. सच कहें तो शिक्षा का अर्थ एजुकेशन नहीं उच्चारण का अभ्यास था. उच्चारण दोष से अनर्थ का उदाहरण देते हुए इन्द्रशत्रु में बल के अंतर् से आई त्रुटि का हवाला दिया जाता है. दूसरे शब्दों में कहें तो सामासिक भाषा में स्वराघात और बलाघात का महत्व अधिक था. अपने विकास क्रम में संस्कृत ने विभक्तियों का प्रयोग आरम्भ किया अतः साहित्यिक संस्कृत में स्वराघात और बलाघात का अधिक महत्त्व न रह गया और यह इसके कारण दुरूह भी हो गई तथा उस संगीत से कट गई जो बोलियों में बची रह गई है और जिसके कारण संस्कृत के विद्वान भी संस्कृत को अवरुद्ध और नीरस भाषा (खारा कूप जल) और बोलियों को मधुर और प्रवाहमय (देसिअ बयना सब जग मिट्ठा, या भाषा बहता नीर ) मानते थे । हम कह सकते हैं कि देववाणी संस्कृत की तुलना में अधिक प्रवाहमय, अधिक सरस और अधिक मर्मग्राही तो थी ही अधिक सरल भी थी, परन्तु यह सरलता उस भाषा भाषी समाज तक ही सीमित थी. व्याकरण जितना भी कठिन हो, संगीत की तुलना में अधिक कठिन नहीं होता है, किसी मानक भाषा को सीखना, अपनी बोली से भिन्न किसी बोली को सीखने से अधिक आसान है । और यह कठिनाई इसके अपने संगीत की भिन्नता के कारण होती है ।

Post – 2017-04-10

छानबीन
छिद्रं हि मृगयन्ते स्म विद्वांसो ब्रह्मराक्षसा:

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पहली बात यह की लेखक ने जो सामग्री जुटाई है उससे आप के ज्ञान का विस्तार होता है. मेरे ज्ञान का विस्तार भी हुआ. पर मेरे पास जो बहुत मामूली सी जानकारी है वही, इस लेख के मंतव्य का खंडन करने और यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है की लेखक के मन में खोट है, उसने जो संकेत दिए हैं उससे पाठकों को मूर्ख बनाया गया है और मूर्ख बने पाठकों ने इसका सविमर्श पाठ न करके, इसकी आलोचना किए बिना अपने प्रभाव वृत्त में उस मूर्खता का विस्तार किया है जब कि आंकड़ों और सूचनाओं से उनकी जानकारी का विस्तार हुआ है. यह रोचक स्थिति है कि एक और उसी पाठ्य सामग्री से जानकारी भी बढ़ रही है और आप मूर्ख भी बनाए जा रहे हैं और उस मूर्खता पर गर्व भी कर रहे हैं और उसका दायरा भी बढ़ा रहे हैं और मूर्खता उजागर होने के बाद आपकी विश्वसनीयता भी क्षीण हो रही हैं.

जब हम कहते हैं कि नीयत में खोट होने या किसी तरह का राग, द्वेष, दुराग्रह होने पर जानकर से जानकार आदमी भी सचाई तक नहीं पहुँच सकता तो आधी बात कहते हैं. पूरी बात यह हैं कि वह सचाई तक पहुंचना ही नहीं चाहता और अपने ज्ञान और प्रतिभा का प्रयोग झूठ के प्रचार और प्रसार के लिए करता हैं.

फेसबुक के पाठक कम से कम समय में अधिक से अधिक मैदान मारने के आदी होते हैं और इसलिए शीर्षक या कैप्शन देख कर अपनी राय बना लेते हैं अपनी पसंद नापसंद जाहिर करके आगे बढ़ जाते हैं. अधिक से अधिक लेख कि लम्बाई और चित्रों पर नज़र डाल कर इस बात के कायल हो जाते हैं कि जो कुछ लिखा गया हैं वह तथ्यों, प्रमाणों और उनकी संगति का ध्यान रखते हुए लिखा गया हैं. इससे उनकी धारणा को बल मिलता हैं. परन्तु कारण जो भी हो, परिणाम एक ही होता हैं. मुर्ख बनने, मूर्खता का विस्तार करने और आगे से उसी से मिलते जुलते आरोपों को झटपट मान लेने की प्रवृत्ति का विस्तार और बौद्धिक सतहीपन, जिसमें सोचने समझने की झंझट से मुक्ति और मानने ठानने की रुझान आदत में बदलती जाती हैं.

अब हम इसकी जाँच करेंगे जो किसी पाठक को, उन्हें भी जो हमारे इस छानबीन को देख रहे हैं, किसी भी सामग्री को, जिसमे मेरा लिख भी शामिल हैं इसी निष्पक्षता से जांचते हुए पढ़ना चाहिए. सचाई जानने के लिए यह जरूरी नहीं की आप लेखक जितने या उससे अधिक पढ़े लिखे हों.

१. इस प्रस्तुति में यह दावा किया गया हैं की गोरखनाथ मुस्लिम योगियों की देशभाल करते या सरक्षण देते थे. इस बहाने यह संकेत किया गया हैं कि उनका वर्तमान उत्तराधिकारी इससे उल्टा कर रहा हैं. पर गोरखनाथ के समय में तो उत्तर भारत में इस्लाम का प्रवेश हुआ नहीं था मुस्लिम योगी कैसे पैदा हो गए?

२. जिन अधिकारी विद्वानों का हवाला दिया गया हैं उनमें कोई ऐसा नहीं कहता, कहता यह हैं कि गोरखपंथी जोगियों में कुछ ने शादी व्याह कर लिया, उनके लिए नाथपंथ में जगह नहीं रह गई. वर्ण समाज में उनके लिए पहले भी जगह न रह गई थी इसलिए वे मुसलमान बन गए.

३. मेरी समझ से यह बिंदु भी जाँच की अपेक्षा करता हैं क्योंकि वे इस्लाम का कुछ भी नहीं मानते थे. गीत गोपीचंद और भरथरी का गाते थे. इसलिए अधिक सही यह कहना होगा कि वे पंथ वहिष्कृत और समाज वहिष्कृत का जीवन जीने लगे या हिन्दू न रह गए. पर इस सुझाव को भी मात्र विचारणीय मानता हूँ. बचपन में उनको दूसरे भिखारियों की तरह मानता हूँ जो एकतारा लिए आते थे सूर के पद गाते थे और ब्राह्मण होने का दावा करते थे. जोगी का वेश, बाना, और कंधे से घुटनों के नीचे तक लटकता गुदड़ी का धोकरा सब का रंग गेरुआ. इन दोनों को भीखारी कहना भी उतना ही ग़लत हैं जितना नटों, बाजीगरों, संपेरों, बन्दर का खेल दिखाने वालों को, और यदा कदा आने वाले भांटों को जो पद्यरचना में कुशल और वंश-परम्पराओं की अच्छी जानकारी रखते और उसे बड़े आवेश भरे स्वर में गाते थे, या अल्ल्हा और लोरिकायन गाने वालों को जनशिक्षा और मनोरंजन की प्राचीन परम्परा का हिस्सा मानना अधिक उचित हैं, क्योंकि ये श्रमणों और बटुकों की उस परम्परा से भी अलग थे जो भिक्षा मांगते थे और सीधे भीख का ही गुहार लगाते थे. ये सारंगी पर भरथरी आदि की करुण कथा इतने मार्मिक स्वर में सुनाते थे की महिलाएं दरवाजों की ओट में देहरी में आकर बैठ जाती, उनका गान सुनतीं, फिर उनको किसी बच्चे बूढ़े की हाथ अनाज या पिसान देतीं. ये दोनों याचना नहीं करते थे. कुछ देर सारंगी या एकतारा बजा कर रुकते और कोई आहट न पाकर आगे बढ़ जाते.

४. इसमें आरोप सा हैं कि हिंदुत्व के उत्थान के साथ अब ये नहीं दिखाई देते. एक तो हिंदुत्व यदि शब्द नहीं हैं एक भाव हैं तो हिंदुत्व सिद्धो, योगियों आदि से बहुत पुराना हैं न की बाद का. दूसरे अदृश्य केवल भरथरी के गीत सारंगी पर गाने वाले योगी ही नहीं हुए. एकतारे पर सूर के पद गाने वाले, साँपों का खेल, भालू का खेल, बंदर का खेल दिखाने वाले, बाजीगरी दिखने वाले. आल्हा और लोरिकायन गाने वाले सभी हुए हैं. पूर्वाग्रह के कारण लेखक को न पूरी सचाई दिखी, न ही उसका कारण समझ में आया, कारण की पड़ताल करने चलेंगे तो भटक जायेंगे, इसलिए इतना संकेत पर्याप्त हैं कि इसके मूल में हैं शिक्षा और मनोरंजन कि माध्यमों में बदलाव जिसका प्रभाव लोकगीतों और संस्कार गीतों, लोरियों, दादी नानी की कहानियों, कहारों, धोबियों और दूसरी जातियों के नाच और पैने व्यंग, अहीरों के नाच और दंगल और प्रदर्शन सभी पर पड़ा हैं जिसे सांस्कृतिक समस्या और चरमराती हुई कृषि व्यवस्था के रूप में देखा समझा जाना चाहिए.

५. यह सच हैं की अपनी जीवन शैली में कहीं से मुसलमान न दीखने वाले जोगी, नट, खटीक जिनको हम मुसलमान ही मानते और वे अपने को मुसलमान ही कहते थे, उनके बीच तब्लीगी प्रचार और दबाव के कारण उनका इस्लामीकरण बढ़ा हैं जो एक अलग पक्ष हैं.

६. प्रसंगवश यह याद दिला दें कि सिद्धों की तुलना में नाथपंथी समाज से कटे नहीं रहे अपितु इसमें हस्तक्षेप करने वाले रहे हैं और गोरखनाथ पीठ के जिन दो पूर्ववर्ती महंतों को मैंने देखा हैं – दिग्विजयनाथ और अवैद्यनाथ वे राजनीति में सक्रिय रहे हैं और वह सक्रियता आदित्यनाथ में उनसे कुछ अधिक दिखाई देती हैं. जहां तक साम्प्रदायिकता का प्रश्न हैं इनका हिन्दू महासभा से सम्बन्ध रहा हैं न की संघ या भाजपा से परन्तु निजी आचार सेक्युलर रहा हैं. जिस बम फूटने की बात एक बार योगी ने की थी वह मेरी जानकारी में बस्ती की घटना थी न कि गोरखपुर की. जहाँ तक साम्प्रदायिक दंगों की बात हैं गोरखपुर शहर या पुराने जिले से निकले चार जिलों में कभी साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ और और इसका श्रेय गोरखनाथ के महंथों को जाता हैं. इसके विपरीत गोरखपुर की स्थानीय राजनीति वर्णवादी रही हैं, जिसमें ब्राह्मणवादी पहल रहा हैं और महंथ उसके विरोधी रहे हैं जिन्हें इसी कारण क्षत्रियवादी माना जाता रहा हैं, जिससे बचने के चक्कर में मुझे साधनहीन अवस्था में गोरखपुर छोड़ना पड़ा और कोलकाता में सर फोड़ते हुए दिन काटने पड़े थे.

७. योगी के कार्यों, विचारों, कथनों पर विचार और जहाँ वह गलत लगे उसकी सीधी आलोचना होनी चाहिए न कि आड़ लेकर तीरंदाजी. इसे निन्दनीय माना जाता रहा है: कूट्योद्धा हि राक्षसा: पर कथन और कार्य की आलोचना करते समय अवसर और औचित्य का ध्यान रखा जाना चाहिए. मैं उनके चुनावकालीन भाषणों से हताश था. जब दूसरे शंकालु थे तब मैं निश्चित मत का था की जीत भाजपा की ही होनी हैं. तब सभावित मुख्यमंत्रियों में योगी के चयन को मैं उत्तर प्रदेश के हित में नहीं मानता था. इसे लिखा भी था, परन्तु योगी के राजनितिक आचरण ने मेरी आशंकाओं को निर्मूल किया हैं. मुझे कुछ ऐसी बातों से शिकायत अब भी हैं जिनकी अख़बारों और समाचार माध्यमों में तारीफ हो रही हैं, व्यावहारिक राजनीति की समझ कम तो हैं ही यह भी पता हैं कि वहां कोई परिवर्तन वैकल्पिक राजनितिक दबाव से ही सम्भव हैं न कि ‘सुलेखों’ और सुझावों से.

Post – 2017-04-09

इतिहास की खोज और सेमिनारों की उपलब्धि

सेमिनारों को हम विद्वानों का महाभोज कहें या पूर्वाग्रहों का ढिढोरा इस पर बहस हो सकती है पर इस सवाल पर बहस नहीं हो सकती की इनसे मेरा मोहभंग हुआ है. ये अक्सर फरवरी या मार्च में आयोजित होते हैं. पुस्तकों की सरकारी खरीद मार्च में की जाती है. इनका ज्ञान या अनुसन्धान से कम और बचे हुए सरकारी अनुदान का पैसा खर्च करने से अधिक सम्बन्ध होता है. मुझे आरम्भ में इसका लाभ यह अवश्य मिला कि मैं आर्यों के आक्रमण में पैनी कलम और पंचर दिमाग लेकर लड़ते रहने वाले या उनके जत्थे को देश-विदेश से इम्पोर्ट करने वालों को यह समझा सकूं कि आप मिथ्या प्रतीति से ग्रस्त हैं. लोगों को मेरी बात पर हैरानी होती कि बात तो सही है पर ऐसा किसी ने पहले कहा क्यों नहीं. मगध विश्वविद्यालय कि इतिहास और पुरातत्व विभाग के आचार्य और कौशाम्बी की खुदाई करने वाले डी पी सिन्हा मेरे प्रशंसकों में थे पर इसका एक कारण यह था कि ‘तुम जब भी आते हो एक नई बात कहते हो. मजे की बात यह की मैं कभी कोई नई बात कहता ही नहीं. मैं मौलिकता को अध्येता कि लिए दुर्गुण मानता हूँ. मैं कोई ऐसी बात नहीं कहता जिसे पहले किसी ने कहा न हो या जिसके आंकड़े बहुविदित न हों और फिर भी किसी ने उसका वही निष्कर्ष किसी ने पहले निकाला हो जो मैं निकालता हूँ.
यदि किसी ने पहले किसी बात को सिद्ध कर दिया है तो उसे दुबारा लिखने की क्या जरूरत. उसका हवाला देना ही काफी है. सच यह है कि बहुत कम लोग होते हैं जो वह अकादमिक स्वायत्तता अर्जित कर पाते हैं जिसमें वे सभी तरह के प्रलोभनों, दबावों और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर विचारणीय विषय और वस्तु को उसकी अपनी रगत में देख सकें. यह मुक्तावस्था जिस साधना से आती है उसको प्रतिभा और ज्ञानसम्पदा या पद और प्रतिष्ठा से अर्जित नहीं किया जा सकता इसलिए वस्तुसत्य से आप लुकाछिपी का खेल खेलते रहते हैं. पूरी अनदेखी संभव नहीं. आप नंगे हो जाएंगे. पूरी ईमानदारी के परिणामों का सामना करने का सहस नहीं. इसलिए आप मिलावट करते हैं. अपनी और से कुछ डाल देते हैं और लगभग उसी चालाकी से जिससे खानेपीने की चीज़ों में मिलावट की जाती है और जो पोषक की आड़ में विषाक्त का कारोबार किया जाता है. यदि इससे बचा जा सके तो उसी विवेचन के चमत्कारी परिणाम हो जाते हैं.

इसे समझने में शायद आप को कठिनाई हो इसलिए इसे एक उदाहरण से समझाना उचित होगा. मेरे एक मित्र जो एक पत्र के लम्बे समय तक सम्पादक रहे हैं, लम्बे समय से एक ऐसे चैनल के विचार मंच पर दूध को दूध और पानी को पानी नहीं रहने देते क्योंकि इसी पर उस चैनल का नीरक्षीर विवेचन का कारोबार चलता है हाल में एक लेख शेयर किया जिसके शीर्षक का अर्थ था कभी गुरु गोरखनाथ मुस्लिम योगियों की देख भाल करते थे.
वीडियो का कैप्शन अंग्रेजी में है BEFORE THE RISE OF HINDUTV GORAKHNATH NURTURED MUSLIM YOGIS
https://thewire.in/119102/before-the-rise-of-hindutva-gorakhnath-nurtured-muslim-yogis/
लेख हिंदी में है जिसका शीर्षक है सांप्रदायिकता और जातिवाद के ख़िलाफ़ शुरू होने वाले गोरखनाथ पीठ से कभी बड़ी संख्या में मुसलमान और अछूत मानी जाने वाली जातियां जुड़ी थीं.
मित्र की पदीय हैसियत, विश्व भ्रमण का अनुभव, व्यापक सम्पर्क, एक तीखे तेवर वाले चैनल पर दूध को पानी और पानी को दूध करने की महारत के कारण उसके जुमलों पर आने वाली टिप्पणियां सैकड़ों तक और पसंदगी कई हज़ार तक कुछ घंटों के बाद ही पहुँच जाती है पर पिछले तरह दिनों से लगातार चल रहे इस साझेदारी पर ५०० से भी कम पसंदगी देखकर हैरानी हुई तो मूल लेख पर नज़र डाली और पाया इसे पांच हज़ार सात सौ लोगों ने शेयर किया है. यदि बुद्धिजीवियों के शेयर मार्किट में एक शेयर का औसत मोल ५०० तो नहीं पर १०० भी मानें तो यह ५लाख ७०हजार को पसंद है. मुझे जानकारों ने बताया कि दस पढ़ने वालों में कोई एक पसंद ज़ाहिर करता है. सादा गणित से इसे ज़ेरेनज़र करने वालों की संख्या ५७ लाख हो गई. विश्वास करे कि मैंने आजतक लेख, पुस्तक और ‘मैं भी हूँ, तुम भी हो, दोनों है आमने-सामने’ जिसका अंग्रेजी अनुवाद है ‘फेस बुक’ पर पोस्ट किये मेरे सभी आवेदनों के पाठकों की संख्या इस कीर्तिमान तक नहीं पहुँच पाई होगी. ऐसे लेखक के सामने मेरी हैसियत क्या है. यदि मैं इसकी आलोचना करूं भी तो वह कितने लोगों तक पहुंच पायेगी और उनमें से कितने लोग मेरी बात के कायल होंगे.
संख्या का दबाव विराट लगते हुए भी दूसरे दबावों के सामने तुच्छ होता है या इसमें दूसरे दबाव भी शामिल होते है. यहॉ तो केवल लाखों और करोड़ों का सवाल है नए सत्य तक पहुँचने वाले वैज्ञानिक के सामने तो समस्त के सामने खड़ा होकर अपनी बार कहनी होती है. यदि आप सत्य का अनुसन्धान कर रहे हैं तो आपको संख्या से नहीं अतर्क्य से डरना चाहिए, असत्य से डरना चाहिए और अपनी
मेरे सामने सदा से यह समस्या इससे हजारगुना बड़ी होकर उपस्थित रही है और मैंने अपने प्रमाण देते और पहले की मान्यताओं का पुनः पाठ किया और उसमें वर्तमान असंगतियों को इंगित करते हुए अपनी बात कही. जो गलत है वह गलत है जिन तक यह सन्देश पहुँच सके पहुंचे. सच और झूठ का मुकाबला पुराना है. ऋग्वेद के अनुसार सही और गलत बातों में प्रतिस्पर्धा चलती रहती है – सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते. आपको चुनाव करना है की आप सत्य के साथ हैं या संख्या बल के साथ हैं या सत्य के साथ. आप के साथ जो भी गुजरे आप तभी तक है जब तक सत्य आपके साथ है. असत्य का दायरा अंधकार की तरह विराट होता है – तम तम से कभी घिरा था – तम आसीत तमसा गूढमग्रे – यह अधूरा सच है. पूरा सच यह की तमोस्ति तमसा ग्रस्त अद्यपि. परन्तु उसकी विश्लता में छिपी दीनता यह है कि वह जुगनुओं की क्रीड़ा और माचिस की तीली से भी डरता है क्योंकि प्रकाश कि प्रकाश के प्रथम आलोक से ही उसका विस्तार और अंधकार का सकोचन और विनाश आरम्भ हो जाता है.
यह खुह्फहमी हो सकती है और इसी ने मैं जो कुछ नहीँ हूँ वह होने से बचाया है.
अब हम इस लेख को समझने और समझ के औजारों का इस्तेमाल करने के तरीके और तर्क सीख सकते हैं.
परन्तु इस पर आने से पहले यह बताना ज़रूरी है कि एक ही कथन के अर्थ किन बातों से प्रभावित होते हैं और उनका ध्यान रख कर ही उनका मर्म समझ सकते हैं:
१. कोई बात कब कही गई ?
२. क्यों कही गई ?
३. किसने कही ?
४. कैसे कही गई ?
५, किन शब्दों में कही गई?
६. किनके बीच या किनसे कही गई?
किसी कथन का अर्थ और वक्ता की पहचान, उसके इरादे और योजना की परीक्षा इन कसौटियों पर होने के बाद हम उसके संचार मूल्य का निर्धारण कर सकते हैं.
पहले इन के आधार पर हमने जिस लिंक का हवाला दिया है उसे पढ़ें, उसके बाद उसका सही पाठ क्या बनता है इसे समझने की कोशिश कल करें. उसके बाद हम अपने कथी७ पर लौटेंगे.

Post – 2017-04-08

बात भाषा की

और भाषा में भी भाषा भोजपुरी जिसका हिन्दीवाले भी मजाक उड़ाते हैं।

अगर रानटी या आदिम वन्य भाषा के तत्व इसमें सुरक्षित रह गए हैं तो हिन्दी की ही अन्य विकसित बोलियों तक की तुलना में इसका मजाक तो उडेगा ही। हम जानते हैं कि मनुष्य पहले बन्दर था और हाल ही में उत्तरप्रदेश में बन्दरों के गिरोह में न जानें कब से पली लड़की का ‘उद्धार’ करने के प्रयत्न में उसे उनके जत्थे से बचा कर लाया गया है और उसे इंसान बनाने की कोशिश चल रही हैं। वह आदमी बन सके या रामू भेडिये की तरह वह भी आदमी बनने से पहले मर जाये इसकी चिंता किसी को नहीं है।

इतना श्रम उसे आदमी बनाने पर किया जा रहा है, जब कि यह एक अवसर था कि उसे पकड़ने के बाद उसको कोई सूचनाग्राही यन्त्र पहना कर उसे उसी गिरोह में छोड़ दिया जाता जिसमें वह समायोजित थी और उस यन्त्र के माध्यम से बानरों के व्यवहार, उन पर आने वाले संकटों और वन के दूसरे जन्तुओं के व्यवहार का अध्ययन किया जाता ।

रामू भेड़िये के समय यह सुविधा उपलब्ध नहीं थी। मेरे इस सुझाव के बाद भी कोई अन्तर नहीं आएगा, क्योंकि यह पोस्ट उन तक पहुंचेगी ही नहीं जो बानरी जीवन अपना चुकी और उसी में सन्तुष्ट बच्ची को आदमी बनाना चाहते हैं। पर इससे यह निष्कर्ष तो निकलता ही है कि किसी प्राणी को बानर से नर और मनुष्य बनाया जा सकता है । इसमें लंबा समय लगेगा। परन्तु आदमी को बानर या भेड़िया बनाने के लिए परिवार, समाज या राज्य का अपने कर्तव्य पालन में असावधानी बरतना ही काफी है। वे कुछ ही समय के भीतर उनमें बदल जायेंगे जिनके बाीच आपने समय के अभाव या अनुशासन के अभाव में किसी के द्वारा अपना बना लिए जाने के लिए उन्हें छोड़ दिया है।

यह पश्चिमी समाजों में भी हो रहा है हमारे समाज में भी हो रहा है, परन्तु कारण अलग हैं। हमारे यहां गरीबी और शरीरवैज्ञानिक कारणों के योग से बच्चे हैसियत से अधिक पैदा हो जाते हैं और उनको बहुत छोटी अवस्था में ही स्वावलम्बी बनाने की विवशता पैदा हो जाती है और जिस दिन पता चलता है कि बच्चा/बच्ची वापस नहीं आई तो उसके गुम होने की रपट तक नहीं लिखवाई जाती। कुछ तो इसलिए कि चलो छुट्टी हुई और कुछ पुलिस पर भरोसे के निचले ग्राफ के कारण।

पर अब आप बताएं कि हम चले थे भोजपुरी के लक्षणों पर बात करने, वह हो पाएगी क्या?

विषयांतर हो ही गया तो चलते राह पूछ लें कि क्या उत्तर प्रदेश में ही रामू भेडिये और मंकी गर्ल पैदा होते हैं? यदि हाँ तो कारण क्या है? यदि नहीं तो उत्तर प्रदेश की क्या विशेषता है कि इसमें आदमी भेड़िये और बन्दर में बदल जाता है, और इसकी भाषा बानरी युग और मानवी युग के कितने तत्व सभाले हुई है जिसे लेकर मैं घबराया हुआ हूँ. भाषा की समस्या कितनी पेचीदा और कितनी लम्बी है इसे समझने का प्रयास हम कल करेंगे, यदि कर सके तो, परन्तु इसके उन प्रशासकों पर जो उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने को कटिबद्ध हैं, क्या अपनी चुनौतियों का पता है कि यहां इंसान से जानवर बनाये जा चुके लोगों को आदमी बनाने की पहली समस्या है और उत्तम आदमी बनाना तो एक स्वप्न है.

Post – 2017-04-08

राजनीतिक हितबद्धता और इतिहास की समझ

जोंस ने ऐतिहासिक समझ की कमी से पैदा आत्मग्लानि से यूरोप को बचाने के लिए जो तरीका अपनाया था वह अधकचरा था। उसमें अपने विचारों को हिन्दुओं के बीच स्वीकार्य बनाने के लिए उन्होंने लफ्फाजी से काम लिया था पर वह हमें भा गई थी और यूरोप में उसका भारी विरोध हुआ था। जेम्स मिल का इतिहास जोन्स की खाल उधेड़ने की कोशिश है जिसमे अपनी खाल बचाने की कोशिश तक नहीं दिखाई देती।

उनकी चमड़ी उधेड़ने का काम बहुत निर्ममता से मैक्समूलर ने what India can teach us किया परन्तु यदि आप मैक्समुलर के अपने काम मो देखें तो वह धर्म और विश्वास के दायरे से आगे नहीं बढ़ता जिसका अर्थ है दूसरे सभी धर्मो, विश्वासों और मान्यताओं की कुछ इस तरह व्याख्या करना जिससे उनको हीन या, आधुनिक समाज के लिए अव्यवहार्य सिद्ध करते हुए ईसाई प्रचारकों को अपने मत की श्रेष्ठता सिद्ध करने का अवसर पैदा किया जा सके। विल्सन जिनके विषय में इस तरह का दुष्प्रचार था कि वह अपने कपड़ों के नीचे जनेउू पहनते हैं, उस बोडेन चेयर के पहले प्रमुख बने थे जिसकी स्थापना कर्नन बोडन ने संस्कृत साहित्य का अनुवाद आदि करके ईसाई प्रचारकों को सामग्री सुलभ कराना था ।

ध्यान रहे कि विल्सन के उत्तराधिकारी बनने के दो दावेदारों में एक मैक्समुलर भी थे, जिनके जर्मन मूल के कारण उनका चुनाव न होकर मोनियर विलियम्स का हुआ जिनको हम उनके संस्कृत अंग्रेजी कोश के कारण जानते हैं। इसकी भूमिका में उन्होंने स्वयं लिखा था कि इसका संकलन और संपादन भारत में काम करने वाले ईसाई धर्मप्रचारकों की सहायता के लिए किया गया था। मुझे यह देख कर हैरानी होती रही है कि लगभग सभी प्राच्यविदों का काम भारतीय कर्मकांड, पूजा, जादू मंत्र, पुराने विश्वास आदि पर केन्द्रित रहा, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, आदि पर कम से कम ध्यान दिया गया। व्याकरण पर अच्छा अधिकार अवश्य भारतीय संस्कृतज्ञों से अपने को अधिक योग्य सिद्ध करने के लिए किया जाता रहा। आज तक पश्चिमी अध्येताओं की सीमा यही बनी रह हुई है, इसका केन्द्र अवश्य यूरोप से खिसक कर अमेरिका में चला गया है। पहली नजर में अत्यन्त सदाशयतापूर्ण और भारतकेन्द्रित प्रतीत होने वाले और हमारे विचारकों को मुग्ध करने वाले कामों के पीछे जो सोच काम कर रही थी वह थी धार्मिकता को उभर कर उसका इस्तेमाल करना और राजनीतिक और आर्थिक शोषण की ओर से ध्यान हटाए रखना।

मैक्समुलर के हिंदुत्व प्रेम पर कुछ लोग इतने मुग्ध थे कि उन्हें मोक्षमूलर कह कर अपना आभार प्रकट करते थे। उनके द्वारा रचित संस्कृत साहित्य के इतिहास का शीर्षक था ए हिस्ट्री ऑफ़ ऐन्श्येंट संस्कृत लिटरेचर सो फार एज इट इलस्ट्रेट्स दी प्रिमिटिव नेचर ऑफ़ दी रिलिजन ऑफ़ दी ब्राह्मणाज। इन विद्वानों का कुछ विस्तार से उल्लेख हमने १९७३ में प्रकाशित अपनी पुस्तक आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता में उस चरण पर अपनी समझ के अनुसार किया था। सच कहें तो इससे मेरा ऐसा मोह्भंग हुआ कि उसके बाद से मैं यद्यपि तथ्यों के मामले में उन पर संदेह नहीं करता, पर निष्कर्ष यदि प्रीतिकर हों तो भी, उन्हें यथातथ्य स्वीकार न करके ध्यान इस पर देता हूँ कि उपलब्ध आंकड़ों में से किनको छोड़ा या सन्दर्भहीन प्रस्तुत किया गया है और इनमें कितनी अंत:संगति या विसंगति । इतने से ही परिणाम इतने चमत्कारी निकलते हैं कि लेखक की मान्यता का तो खंडन हो जाता है, उसकी नीयत की खोट भी उजागर हो जाती है।
मैंने यह प्रश्न पहले उठाया था कि यदि अधिकांश काम उन देशों के शोधकर्ता ही कर रहें हैं जिनके इरादे संदेहास्पद हैं तो सन्दर्भ के लिए हमारे पास क्या बचता हैं। एक बार बहुत पहले झिड़की भरे लहजे में कहा था कि अधिकांश लोगों को लिखना तो दूर पढ़ना भी नहीं आता हैं। इसमें यह भी जोड़ सकते हैं सुनना तक नहीं आता हैं। या तो वे पहले वाक्य पर ही अपनी राय बनाकर टूट पड़ते हैं, सुनने का धीरज खो देते हैं, या अनवधान हो जाते हैं, या उल्टा अर्थ लगा बैठते हैं।

ऐसा हमारे पूर्वाग्रहों के कारण होता हैं। पढ़ने में चूक छपे हुए शब्द, व्यक्ति या ग्रंथ के साथ जुड़ी आप्तता में विश्वास के कारण होता हैं और इसीलिए किसी भी देश में क्रन्तिकारी सन्देश लेकर आने वाले सिखाते रहे हैं कि किसी पर विश्वास मत करो, हर चीज़ और व्यक्ति पर संदेह करो, तभी अपनी आँखों से देख सकोगे, वह चाहे वह बुद्ध हों या मार्क्स या स्वामी दयानन्द। इसके विपरीत आपके दिमाग को अपने नियन्त्रण में रखने को आतुर लोग श्रद्धा, आस्था, विश्वास को वरीयता देते रहे हैं, वह धर्म के नाम पर हो, परम्परा के नाम पर हो, या विचारधारा के नाम पर हो ।

इसीलिए मैं यह कई रूपों में दुहराता रहा हूँ कि विचारक के पास विचार के समय धर्म, देश, विचारधारा, अपना-पराया कुछ भी जुड़ा हैं तो वह अपनी साख नहीं बचा सकता और जिसकी साख खत्म हो गई उसके पास सबकुछ होते हुए कुछ नहीं रह जाता। मार्क्सवादियों का सबसे घिनौना हथियार असहमत जनों की साख खत्म करना रहा हैं और अपने आतंक और संख्या बल में मदांध होने के कारण इसका उन्होंने इतनी बेशर्मी से इस्तेमाल किया कि अपनी ही साख गवां बैठे। वह अब अपने माक्र्सवादी होने का दावा करने वाले लेखकों तक सिमट कर रह गई है और वहां भी तभी तक बची रहेगी जब तक सामूहिक आतंक या विरादरी बद्र होने का दबाव बना हुआ है और लोग अपनी आखों से देखना और अपने दिमाग से काम लेना आरंभ न करके समबो लुभाने वाले फिकरो की खोज या आविष्कार करने में लगे हुए हैं।

फेसबुक पर इसके नमूने बहुत आसानी से मिल जायेंगे जिसमे खासे जिम्मेदारी के पदों – प्रोफेसर, सम्पादक, ऊँचे पदों से कार्यमुक्त अधिकारी – पर काम कर चुके लोग भी ऊपर बताई सीमाओं के कारण हलके स्तर के विनोद करते या ऐसे विचार पेश करते हैं कि उनके ज्ञान, प्रतिभा और निजी काम को याद करते हुए उनके इस आचरण पर हैरानी होती। पर अन्धें बहरों का दायरा यदि वहीं तक सिमट कर रह जाता तो उससे बाहर निकल कर सुकून पाया जा सकता था। इसके ही नमूने इनको गालियां देने और कोसने वाले भी देते हैं। बटवारा इतना साफ है और बीच का बफरलैंड तक इस तरह नदारद है कि सोच कर घबराहट होती है।जब तक सोच के केन्द्र में व्यावहारिक राजनीति रहेगी हमारे समाज में बुद्धिजीवी पैदा हो ही नही सकता, पैदा हो तो अकेला पड़ जाएगा और उसकी चीख सही कानों तक पहुंच ही न पाएगी।

आज हमारी चिन्ता के केन्द्र में यह सवाल नहीं है कि मोदी या जोगी कितनी गलतियां कर रहे हैं, सच तो यह है कि अपनी गलतियों के बाद भी वे इतनी ततपरता से काम कर रहे हैं और उसकी कौंध में उनसे कोई छोटी मोटी चूक हो भी जाय तो जनता उसे देखने तक के लिए तैयार नहीं। सारी चिन्ता अपनी साख खोते संचारमाध्यमों और बुद्धिजीवी कहे जाने वालों की हजार लाख की परिधि तक सिमट कर रह जा रही है क्योंकि दशकों के बाद पहली बार गुंडातन्त्र और माफ़ियातंत्र के उस डरावने भविष्य से राहत अनुभव हो रही है जिसमें राजनीति सबसे घटिया पर सबसे अधिक लाभदायक जुए के खेल में बदल चला था और हमारा बुद्धिजीवी उसमें या तो इतना सुकून पा रहा था उसे किसी बात से शिकायत ही नहीं थी, या इतना घबराया हुआ था कि उसकी समझ में नहीं आरहा था कि इससे बाहर निकलने का क्या रास्ता हो सकता है । इस निराशा के बीच से बाहर निकलने का रास्ता निकालने वाले प्रकट हुए, पहली बार देश के लिए काम करने वालों की सरकार ही नहीं दिखाई दे रही है अपितु राजनीतिक आचरण का पूरा चरित्र इतना बदल चला है कि यह विश्वास पैदा हुआ है कि पुराने और घटिया तरीकों से कोई समर्थन हासिल नहीं कर सकता।

इस स्वागतयोग्य स्थिति के बीच चिन्ता का सबसे बड़ा कारण है कटाव करती धारा के दबाव में विकल्प का लगातार भहराते जाना और किसी स्वस्थ और टिकाऊ विकल्प का बढ़ता अभाव कि एकाचारी तन्त्र कायम होने की सम्भवना पैदा हो जाय जो लोकतन्त्र के लिए खतरे की बात है। बुद्धिजीवियों को चुटकुलेबाजी बन्द करके इस पर ध्यान देना चाहिए कि पैशुनि सोच कि जगह स्वस्थ और तर्क और प्रमाणसम्मत आलोचना के माध्यम से क्या ऐसे विकल्प को खड़ा करने में क्या उनकी कोई भूमिका हो सकती है। यह राजनीति की बात हुई जिसकी मेरी अपनी जानकारी सन्तोषजनक नहीं है।

मेंरी चिन्ता भारतीय सामाजिक चेतना के भावी स्वरूप को लेकर है। हमने देखा कि धार्मिकता का उभार हमारे देश के हित में नहीं है इसे उभारने का काम वे करते रहे हैं जो हमे बौद्धिकता के रास्ते से हटाकर भावुकता में ग्रस्त रखना चाहते रहे हैं और इस हद तक सफल भी थे कि विज्ञान के छात्र भी इसके शिकार होते रहे और आज भी हो रहे हैं।

चिंता यह कि एक ऐसा दल जिसकी चेतना का निर्माण ही धार्मिक सरोकारों को उभारते हुए हुआ, वह मुस्लिम भावुकता को खुराक देकर बढ़ाने वाले बुद्धिजीवियों की मूर्खतापूर्ण सोच के बीच क्या समाज को भावुकता के भटकावों से मोड़ कर तार्किकता और वैज्ञानिकता की दिशा में आगे बढाने की दिशा में सफल हो सकती है। अभी तक के अनुभव इस विषय में आश्वस्त नहीं करते। यह अनायास नहीं है कि आपके परामर्शदाता मंडलों में उसी हिन्दुत्व को खूराक देने के कारण महत्व पाने वाले विदेशी स्थान पाएं जिनके पूरे इतिहास में भितरघात के अतिरिक्त कुछ तलाश करने में कम से कम मैं विफल रहा और जिसे १९७३ से लगातार दुहराता रहा हूँ। व्यक्तिगत रूप से इन विद्वानों से मेरे अच्छे सम्बन्ध हैं। मैं उनको इस विषय में सचेत भी कर चुका हूँ कि इतिहास और समाज के विषय में यह नजरिया हमारे ही नहीं मानवता के हिट में नहीं है और परोक्षत: संघ के समर्थन से आयोजित एक सेमिनार में यह भी निवेदन कर चुका हूँ कि हिन्दू इतिहासदृष्टि या भारतीय यथासदृष्टि जैसी कोई चीज उसी तरह सम्भव नहीं जैसे हिन्दू रोगनिदान या हिन्दू विज्ञानं जैसी कोई चीज नहीं हो सकती पर यह दुर्भाग्य की बात है कि वैज्ञानिक इतिहास की बात करने वाले भी आजतक वैज्ञानिक इतिहास नहीं लिखना चाहते। अपने दुराग्रहों को सही सिद्ध करने के लिए वे विज्ञानं की परिभाषा तक बदल देते हैं।

Post – 2017-04-07

भाषा की एक भिन्न समझ ने ही मुझे इतिहास को, साहित्य को भिन्न रूप में प्रस्तुत करने में समर्थ बनाया. भाषा, गणित, प्राणायाम (श्वसन प्रणाली की वैज्ञानिक समझ ) का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं परन्तु दो गहरी समानताएं हैं. १- इनमें से किसी के आभाव में हम हतचेत हो जाते हैं; और २- इनका विधिवत ज्ञान अर्जित करने में हम सबसे अधिक आलस्य करते और इसलिए जानने से घबराते हैं जब कि इनमें सबसे कम श्रम लगता है और एक बार इनकी आदत पड़ गई तो आप आनंद की ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं कि बाहर निकलने को जी ही नहीं करता. ब्रह्मानंद का सम्बन्ध इन्हीं से है. परन्तु मेरे इस प्रबोधन के बाद भी बहुत कम लोग ही इसमें रूचि ले पाएंगे, यह जानता हूँ. मेरी अपेक्षा पसंद करने वालों की संख्या नहीं है. जो थोड़े से लोग रुचि लेते या विकसित कर सकते हैं उनसे उनकी समझ में न आनेवाली या गलत लगनेवाली बातों पर उनकी खुली और बेझिझक पर संयत भाषा में व्यक्त की गई टिप्पणियों से है. दूसरा सरोकार राजनितिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक भी है जिसे भारतीय मानस की औपनिवेशिक दासता से मुक्ति का मोर्चा कहा जा सकता है. इसमें अधिक लोगों का दखल होगा इस लिए इस पर भी साथ साथ लेखन चलेगा. मित्र अपनी पसंद तय कर सकते हैं.

Post – 2017-04-07

भाषा के विकास की उल्टी समझ

हम पहले निवेदन कर आए हैं कि व्यक्ति हो या संस्था या कोई उद्भावना वह अपने बीज रूप से प्रौढ़ता तक इतने कायाकल्पों से हो कर गुजरती है हम उसे प्रत्यक्ष देखते हुए भी विश्वास नहीं कर पाते। यदि उस प्रौढ़ भाषा के, जो जहां जहां लिपिबद्ध हो पाई उसके क्लैसिक रूप में ही पाते हैं, जातक को समझना चाहते हैं तो हमें इस अचरज के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

दुर्भाग्य से तुलनात्मक भाषाविज्ञानियों ने इस सीमा को समझते हुए भी उस प्रौढ़ भाषा के बहुनिष्ठ घटकों को ले कर ही उसकी ध्वनिमाला तैयार करनी चाही, किसका क्या अधिक पुराना है, क्या बदला है, यह तय करना चाहा और सबसे बड़ी बात यह कि उसके आद्यरूपों का विशाल कोश भी तैयार कर दिया। इसे अकाट्य मानने और मनवाने के लिए उन्होंने ध्वनि नियमों की अकाट्यता का सिद्धान्त तैयार कर डाला, जब कि यह भी पता चलता रहा कि भाषाओं की प्रकृति इतनी स्वविशिष्ट होती है कि एक के नियम दूसरे में तो काम आ ही नहीं सकते, उसमें भी पूरी तरह काम नहीं करते, इसलिए अपवादों का सामना करना होता है।

क्लैसिक भाषाएं सामान्य व्यवहार की भाषाएं नहीं होतीं, जार्गन से भरी होती हैं, विशेष दक्षता रखने वालों के बीच व्यवहार में आती हैं, और विचार, अनुभव और ज्ञान के उच्चस्तर पर जरूरी होती हैं, सामान्य संचार के लिए इनमें दक्षता रखने वालों को भी जनभाषा का ही सहारा लेना होता है और इसलिए असली भाषा वही होती है।

क्लैसिक भाषाओं के नियम भी उठे तो जनभाषा से ही होते हैं फिर एक वायवीयता या कृत्रिमता के शिकार हो जाते हैं और यह इतनी बढ़ जाती है कि इसके लिए व्याकरण अलग से सीखना होता है और बहुत सारा श्रम व्याकरण और भाषा सीखने पर ही करना होता है जिसकी जरूरत जनभाषा में नहीं पड़ती इसलिए हम उसमें सीधे कथ्य या वस्तुसत्य का साक्षात्कार करते हैं। संस्कृत, ग्रीक, लातिन, अवेस्ता सभी पर यह नियम लागू होता है। संस्कृत व्याकरण और धातु रूप भाषा की सचाई नहीं है, ध्वनि और आशय की बहुनिष्ठ इकाइयां हैं, जिनमें अर्थ का स्वतः आभास नहीं होता, उसका आरोपण करना होता है।

पश्चिमी तुलनात्मक भाषाविज्ञानियों ने पाणिनीय पद्धति को अपने यहां अपनी भाषाओं सहित या उनको प्रधानता देते हुए उसी तरह के बहुनिष्ठ घटकों से आद्यरूपों को समझने का प्रयास किया जो भाषा में होता नहीं कल्पित किया जाता है इसलिए वे उस आदिम भाषा की तलाश कर ही नहीं सकते थे। आंकड़ों का अंबार अवश्य खड़ा कर सकते थे इसलिए इस भाषा विज्ञान को सास्युर विवेचन से अधिक क्रीड़ा कहा थाः
Surprisingly, there was never a more flawed or absurd idea of what a language is than during the thirty years that followed this discovery by Bopp (1816). In fact, from then on scholars engaged in a kind of game of comparing different Indo-European languages with one another, and eventually they could not fail to wonder what exactly these connections showed, and how they should be interpreted in concrete terms. Until nearly 1870, they played this game without any concern for the conditions affecting the life of a language.
This very prolific phase, which produced many publications, differs from its predecessors by focussing attention on a great number of languages and the relations between them, but, just like its predecessors, has no linguistic perspective, or at least none which is correct, acceptable and reasonable. It is purely comparative. … Saussure’s Third Course of Lectures on General Linghuistics (1910-1911) publ. Pergamon Press, 1993 [28 October 1910]Introductory chapter: Brief survey of the history of linguistics.

हम न तो पाणिनीय व्याकरण, धातुपाठ और अर्थपाठ को व्यर्थ मान सकते हैं, न ही पाश्चात्य तुलनात्मक भाषाविज्ञानियों के प्रयत्न को। हमारा निवेदन मात्र इतना है कि इसके माध्यम से भाषाव्यवस्था या उसके लक्षणों को समझने में और ‘सही’ भाषा सीखने में मदद तो मिल सकती थी पर न तो इससे ‘जीवन्त’ भाषा तक पहुंचा जा सकता था न ही इस भाषा की पूर्वावस्थाओं का अनुमान किया जा सकता था और फिर भी उसके कुछ ऐसे रहस्यों का उद्घाटन हो सकता था जो सूखे काठ को अपने उपयोग के लिए काटने चीरने के बाद पता चलता और जिसको जीवन्त वृक्ष को देख कर हम समझ नहीं सकते थे, जैसे उसके हीर के घेरों की गणना से उसकी वास्तविक आयु का ज्ञान।

तुलनात्मक और ऐतिहासिक अध्ययन यह तय करने के लिए आरंभ नहीं किया गया था कि सादृश्य रखने वाली भाषाओं में सबसे पुरानी कौन है, या वह भाषा कैसी थी जिससे इन सबका जन्म हुआ। यहां समझने से अधिक कोई ऐसा तर्कसंगत बहाना तलाशने का उद्देश्य था, जिससे वे काले बंगालियों की संतान होने की शर्म से बच सकें। न तो वे उस भाषा के चरित्र को समझ सकते थे, न ही समझ पाए। धांधली करते भी रहे, इसे छिपाते भी रहे और तभी उनका ध्यान रोमान्स भाषाओं की ओर गया।
In the Romance sphere, other conditions quickly became apparent; in the first place, the actual presence of the prototype of each form; thanks to Latin, which we know, Romance scholars have this prototype in front of them from the start, whereas for the Indo-European languages we have to reconstruct hypothetically the prototype of each form. Second, with the Romance languages it is perfectly possible, at least in certain periods, to follow the language from century to century through documents, and so inspect closely what was happening. These two circumstances reduce the area of conjecture and made Romance linguistics look quite different from Indo-European linguistics.

किसी भी काल या क्षेत्र का लिखित दस्तावेज साहित्यिक भाषा में ही होता है जिसका चरित्र अपने ही क्षेत्र की बोलचाल की भाषा से भिन्न होता है। सास्युर इस मामले में भी सचेत थे। इस अध्ययन से जो मुख्य अन्तर आया वह था पहले जहां लिखित या साहित्यिक भाषा को अधिक महत्व दिया जाता था अब उल्टे बोलियों को दिया जाने लगा।
a scientific study will take as its subject matter every kind of variety of human language: it will not select one period or another for its literary brilliance or for the renown of the people in question. It will Pay attention to any tongue, whether obscure or famous, and likewise to any period, giving no preference, for example, to what is called a classical period’, but according equal interest to so-called decadent or archaic periods. Similarly, for any given period, it will refrain from selecting the most educated language, but will concern itself at the same time with popular forms more or less in contrast with the so-called educated or literary language, as well as the forms of the so-called educated or literary language. Thus linguistics deals with language of every period and in all the guises it assumes.

रोमांस भाषाओं के अध्ययन क्रम में वह सचाई सामने अवश्य सामने आई कि मानक भाषाओं के क्षरण से बोलियां नहीं पैदा होतीं अपितु बोलियों में से अनेक में से किसी एक के प्रधानता पाने के कारण उसका क्रमिक उत्थान होता है और वह उस क्लैसिक चरण पर पहुंचती है । एक वैज्ञानिक पड़ताल में यह जानने का प्रयास किया जाना चाहिए था कि यदि किसी भाषा ने, मान लीजिए अ ने किन्हीं भी कारणो से आ ई उ ए आदि क्षेत्रों में प्रसार पाया जिसके कारण सभी में कुछ गहरी समानताएं हैं, और इसके बाद भी सभी अपनी क्लैसिक ऊंचाई पर पहुंची दिखाई देती हैं, तो हमारे सामने कोई एक भाषा नहीं है अपितु सभी में अ तत्व है अआ, अई, अउ, अए आदि फिर अ का विकास कहां और कैसे हुआ। निश्चय ही वह इनमें से ही कोई क्षेत्र रहा हो सकता है ।

इसका उत्तर पाने के लिए हमें सभी क्षेत्रों की बोलियों के अध्ययन से सही देश काल का अनुमान हो सकता है। यह नहीं किया गया। क्योंकि इसका उत्तर भी उन्हें पता था और उस उत्तर से ही वे बचना चाहते थे] इसलिए भारोपीय के उद्भव क्षेत्र पर भारत को यह कह कर बाहर कर दिया गया कि एक समय में भारत के विषय में बहुत विचार हुआ है इसलिए अब उसे विचारणीय क्षेत्रों से बाहर माना जाता है। वह विचार लंबे समय तक कब हुआ, कहां हुआ, यह हमें पता नहीं क्योंकि जैसा कि हम पाते हैं, इस पर निर्णायक स्वर में कोई दावा करने के पहले ही प्रयास में विलियम जोन्स ने उस कल्पित लुप्त भाषा का जिसका आज अस्तित्व नहीं रह गया है, क्षेत्र] ईरान ठहरा दिया था और मजेदार बात यह कि वह स्वयं मानते थे कि अवेस्ता की भाषा का संस्कृत से वही संबंध है जो भारत की प्राकृतों का संस्कृत से है।

जो भी हो, मूल क्षेत्र का निर्धारण करना जहां से अपने मानक चरण पर पहुंच कर अ का भारोपीय क्षेत्र में प्रसार हुआ इतना आसान था जितना गणित का खेल पर नीयत में खोट हो तो गणित की ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता। हम विलियम जोंस के जिस कथन को बार बार दुहराते हैं वह निम्न प्रकार हैः
The Sanskrit language, whatever be its antiquity is of wonderful structure, more perfect than the Greek, more copious than the Latin and more exquisitely refined than either.

यदि यह दावा सही है तोः
1. तो कोई भाषा या संस्कृति जब अपने मूल स्थान से दूर जाती है तो उसमें उसका समग्र नहीं जाता, बहुत कुछ छूट जाता है, अतः जो कोपियस है वह उसका मूल क्षेत्र हुआ।
2. कोई चीज जब अपने मूल स्थान से हट कर किसी भिन्न परिवेश में पहुंचती है तो उसके साथ समायोजित होने में उसमें कुछ विकार या अनगढ़ता आती है, इसलिए जहां वह अखोट या परफेक्ट दिखाई देती है वह उसका मूल क्षेत्र हुआ ।
3. यही बात परिमार्जन के विषय में कही जा सकती थी ।
इसलिए जोंस स्वयं अपनी ही मान्यताओं का सारतत्व नहीं ग्रहण कर पा रहे थे क्योंकि वह संस्कृत के विस्थापन की प्राथमिक तैयारी करके और अपनी कार्ययोजना को अपने यात्रा काल में तय करते हुए आए थे।
4. बाद के अध्ययनों में जो बातें सामने आईं वे भी स्वतः सिद्ध थीं । यूरोपीय भाषाओं में केवल संस्कृत के ही तत्व नहीं पहुंचे अपितु द्रविड और मुंडारी के भी तत्व पहुंचे थे। एक को लेकर बरो आदि उलझन में थे तो दूसरे को लेकर हाफमैन आदि । पर उत्तर था जहां से यह भाषा अन्यत्र फैली वहां भले प्रमुख संपर्क भाषा संस्कृत बन गई हो, उस क्षेत्र में द्रविड़ भाषी और मुंडा भाषी भी थे और उस कार्यव्यापार में जिसके माध्यम से भाषा का प्रसार हुआ किसी न किसी स्तर पर उनकी भी भूमिका थी।
यदि बोलियां विकास करती हुई मानक चरण तक पहुंचती हैं तो इस विकास रेखा को समझने के लिए उस क्षेत्र की बोलियों का अध्ययन करना लाभकर हो सकता था। परन्तु जिसे नकारने के लिए इतने सारे लोगों ने अपनी जान लड़ा दी उसे वे स्वीकार कर ही नहीं सकते थे।
उनकी विवशता हमारी समझ में आती है] भारतीय इतिहासकारों और भाषाशास्त्रियों की विवशता समझ में नहीं आती ।