Post – 2017-05-11

देववाणी (तीस)
कुछ कह सके हैं कुछको जानते भी नहीं हैं

अब हम एक एक शब्द पर यह देखने के लिए विचार करेंगे कि क्या उनमें उन नियमों का निर्वाह होता है जिन्हें हमने भाषा की उत्पत्ति का सिद्धान्त माना है। हमने इनमें से कुछ का उल्लेख किन्हीं प्रसंगों में किया है। यहां उनकाे एक साथ उल्लेख जरूरी है। परन्तु उससे भी अधिक जरुरी है यह समझना की अनेक के मूल में उनमें से कोई एक हो सकता है और ध्यान देने पर यह तय किया जा सकता है की वह कौन हैा समझना यह भी जरूरी है की पहले की प्रेरणा से ही सही, एक बार भाषा में अपना स्थान बना लेने के बाद कुछ क्षेत्रों से ग्राहक भाषा का शब्द दाता को अपदस्थ भी कर सकता है और इनमें से कोई यादृच्छिक रूप में आचरण नहीं करता। उसका अपना एक तर्क होता है।

हम जो सुनते हैं उसे बोलने का प्रयत्न करते हैं । परन्तु यह इतना आसान काम नहीं है। एक शिशु अपने परिवेश की ध्वनियों को सुनने की और उसका उच्चारण करने का लंबे समय तक अभ्यास करता है जिसे हम शिशु के संगीत में पाते हैं । इसके बाद वह जो पहली ध्वनि निकालता है वह बोधगम्य तो होता है, पर अपेक्षा से कुछ घट कर होता है। आगे भी कुछ समय तक यह अटपटापन बना रहता है । हम इसे तोतली जबान कहते है (तोतली का मतलब क्या तोते की तरह सुने वाक्य को इस तरह दुहराने की क्रिया के लिए प्रयुक्त हुआ होगा जिसमे वाक्य समझ में आ जाता है यद्यपि उच्चारण सही नहीं होता ?)। सही सही सुनने या बोलने के लिए हमें लंबा अभ्यास करना होता है।

अतः जितना सच यह है कि चन, सन, द्र, मन, मस अनेक भाषाई समुदायों के आपस में मिलने और एक बृहत्तर सामाजिक संरचना के अंगभूत होने का प्रमाण हैं, उतना ही सच यह नहीं है कि परस्पर मिलने से पहले उन सभी में ये शब्द रहे हों और उन्ही अरथों में प्रयोग में आते रहे हों। यह संभव है कि जल के लिये जिस समुदाय में सं, सन् का चलन रहा हो उससे मिलने से पहले चं, चन् बोलने वाले की बोली में चं, चन् रहा ही न हो। उसने यह शब्द सं, सन् बोलने वालों से लिया। लिया कहना भी सही नहीं है वह सं और सन को, चन् के रूप में सुनता और बोलता रहा हो। इसे उलट कर भी रखा जा सकता है । कालान्तर में दोनों समुदाय अपनी पृथक पहचान भूल गए। दोनो वध्वनियां साझी ध्वनिमाला का हिस्सा बन गईं और दोनों शब्द उनके शब्दभंडार का अंग ही नहीं बन गए अपितु उनका विशेष सन्दर्भों में दूसरे की अपेक्षा अधिक प्रयोग होने लगा।

उदाहरण के लिए वजन का प्रचलन होने के बाद हम बाजार की भाषा में पूछते हैं इसका वजन कितना है? वजन अधिक हुआ तो कहते हैं भारी है। भार कितना है? तौल क्या है? या बहुत वजनी है, कहने वाले भी मिल जाएंगे, पर औसत से बहुत कम और सुनने वाले को कुछ अटपटे भी लगेंगे ।

हम दन्त्य प्रेमी देववाणी की बात कर रहे हैं तो इस समाज में चकार प्रेमी समुदाय कुछ बाद में मिला, अत: पानी का इसका शब्द ‘सम / ‘सन’ होना चाहिए। कारण देववाणी स्वरांत या अजंत बोली थी जिसमे असवर्ण संयोग नहीं होता था। भोज. में यह समसना, सानना, आदि में बचा है। कौरवी प्रभाव में यह ‘स्न, स्नेह, स्नान, बना और अंग्रेजी में स्नो, स्लो, स्नेक, स्नीक, स्नेल में दिखाई देगा परन्तु जिस चरण पर हम पहुंचे हैं उस पर इसे समझने में कठिनाई होगी। इसलिए यह याद दिलाना जरूरी है कि:

१. विविध भावों, अवस्थाओं, गुणों, अनुभवों और मनोरागो को अपनी संज्ञा किसी न किसी जलवाची शब्द से मिली है क्योंकि इनसे कोई ध्वनि नहीं पैदा होती जो इनकी संज्ञा बन सके.
२. ऐसी भैतिक सत्ताओं के लिए जिनमें स्वतः कोई क्रिया नही होती उनको अपनी संज्ञा जल की किसी क्रिया से उत्पन्न ध्वनि से मिली है।ह
३.गति के विविध रूपों को अपनी संज्ञा जलपरक शब्द से मिली है।
४. समस्त खाद्य और पेय पदार्थों, अनाजों, ओषधियों को अपनी संज्ञा जल के किसी पर्याय से मिली है।
५. सभी रंगों, रूपों के लिए, अंधकार से लेकर प्रकाश तक को अपनी संज्ञा जल के किसी नाम से मिली है।
६. सभी नदियों और जलाशयों का नाम तो जल के किसी पर्याय से जुड़ा रहेगा ही, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
७. क्षुद्रता और महिमा, अणु और ब्रह्माण्ड, छोटी से छोटी संख्या और बड़ी से बड़ी सभी के मूल में कोई जलवाची शब्द मिलेगा. क्यों मिलेगा यह बताएं भी तो लाभकारी न होगा।
8. कर्म, सातत्य, अनंतता, काल के सभी अभिधेय जलपरक हैं।
और भी कोटियां हैं जिनको गिनाना सभव नहीं ।

Post – 2017-05-10

शब्दक्रीडा

यह तो होना था, हो गया भी लो
पर्दा उठना था उठ गया भी लो
हमको मरने का ढूँढना था सबब
तुम मिले और मिल गया भी लो
लोग सादे है और सीधे है
क्यों बुरा मानें बुरा होने का
जितना चाहो बुरा करो उनका
बाद में उनकी फिर दुआ भी लो
अच्छा क्या है कहो बुरा क्या है
जो हुआ बस उसी को होना था
समझ इतनी है तो जमी हाज़िर
और ऊपर से आसमां भी लो
तुम भी भगवान आदमी तो बनो
आसमां में जगह बची ही नहीं
उम्र के साथ अक्ल भी खो दी
मेरी मानो कोई दवा भी लो .

Post – 2017-05-10

देववाणी (उनतीस)
फिर वही बात चांद तारों की

अब हम नए सिरे से चन्द्रमा पर विचार करें । इससे कुछ रोचक प्रश्न खड़े होते हैं । पहला तो यही कि क्या यह सही है कि यह चार शब्दों के मेल से बना है और उनमें से हर एक का मतलब चांद था? क्या एक ही आशय के कई शब्द मिल कर एक साथ उसी या उससे मिलते जुलते आशय में प्रयोग में भी आसकते हैं ?

दूसरा, क्या ये सभी शब्द मूलत: जलवाची थे?

तीसरा, क्या जब हम चन्द्रमन् कहते हैं तो तीन बार चांद कहते है और मुख्यधारा का अंग बनने वाले एक समुदाय के चांद को छोड़ देते हैं और जब चन्द्रमस् कहते हैं तो भी तीन बार चांद कहते हैं और एक समुदाय के चांद को छोड़ देते हैं?

चौथा प्रश्न यह कि जिस चरण पर भारतीय संपर्क भाषा का तथाकथित भारोपीय क्षेत्र में प्रसार हुआ, उस चरण पर इन सभी समुदायों के शब्द प्रयोग में आते थे ? यदि हां तो क्या इन सभी के चन्द्रवाची शब्दों का देशान्तर में प्रसार हुआ?

पांचवा, ऊपर, प्रश्न दो का निहितार्थ क्या है ?

छठां, चौथे प्रश्न का फलितार्थ क्या है ?

हम पहले प्रश्न को लें। इससे पहले भाषा के समाजशास्त्रीय पक्ष के सन्दर्भ में किसी अन्य अध्येता ने इस प्रश्न को उठाया है या नहीं , यह अपने सीमित ज्ञान के कारण मुझे नहीं मालूम, परन्तु इसके अनगिनत उदाहरण मिलते हैं: तमिल तण् = पानी +नीर=पानी, > तन्नी=पानी, ठंढा पानी; जल+आब =जुलाब; तर/ तल =पानी+आब =तालाब; त. तण् +आग= तड़ाग, (अभी यह सवाल न दागें कि आग का अर्थ पानी कैसे हो सकता है, मुझ पर भरोसा रख कर मान लें कि होता है)।

दूसरे प्रश्न का उत्तर हां में ही देना होगा । पर इसके लिए इनमें से एक एक के विस्तृत विवेचन की अपेक्षा होगी। इसे हम कुछ रुक कर उठाएंगे।

तीसरे प्रश्न का उत्तर भी हां ही है परन्तु इस सुधार के साथ कि हम वास्तव। में चांद कहते हुए भी चमकने वाला कहते है, इसलिए उसी का प्रयोग किसी दूसरे चमकने वाले ग्रह या नक्षत्र के लिए कर सकते हैं। जब आप चांद सा चेहरा या माहजबीं कहते हैं तो भी चमकते हुए चेहरे की ही बात करते हैं।

चौथे का उत्तर देने से पहले यह याद दिलादें कि चकार प्रेमी समुदाय की भाषा में स ध्वनि नहीं थी। वह उसका उच्चारण च के रूप में करता था, तमिल में स्वामी को सामी अर्थात् चामी लिखा और बोला जाता है सं. प्रभाव में इसे सामी भी बोलते हैं इसलिए चान फारसी में शान बना (और सनक और सनकी भी चन्द्रमा के लिए चन/सन से संबन्ध रखता हो तो कुछ अचरज की बात नहीं ) और अंग्रेजी में sun बन गया, द्र (तर/ दर कौरवी प्रभाव में त्र/ तृ, द्र/दृ), drop और निषेधात्मक dry और drought में मिलेगा। प्रकाश वाला भाव भारत से ही वै. स्तृ = तारा बन कर निर्यात हुआ और अंग्रेजी star/ starry और stare में दिखाई देता है। PIE के चक्कर और मूल स्रोत से बचने कतराने के कारण इनकी जो व्युत्पत्तियां पश्चिमी व्युत्पत्तिकोशों में दी गई है इसकी जॉंच पड़ताल का काम उन मित्रों को संभालना चाहिए जिन्हें इसमें निपुणता प्राप्त है । मस् जैसा हम पहले देख आए हैं सं. मास में, फा. माह में तो है ही । यूरोप की किसी बोली में पहुंचा या नहीं, पता करना होगा। निष्कर्ष यह कि भारतीय आर्य भाषा या सेठों साहूकारों और अभिजात वर्ग की भाषा में जल और प्रकाश तथा प्रकाश पिंडों के लिए प्रयोग में आ रहे थे और हड़प्पा के संपर्क क्षेत्र में इन सभी का प्रसार हुआ ।

पांचवे और छठे प्रश्नों का उत्तर बहुत रोचक है। प्रकाश के लिए सभी में संकल्पनातमक समानता एक ही सामािजक गठन से पहले भी लंबे आदान प्रदान और सोच विचार में निकटता का ही परिणाम हो सकता है। कहें, अलगाव की अवस्था में भी सांस्कृतिक एकसूत्रता पैदा हो चुकी थी । ये सभी भाषाई समुदाय वर्षाबहुल प्रदेश के निवासी थे जिनका नैसर्गिक ध्वनि परिवेश जल की विविध गतियों, क्रियाओं और अवस्थाओं से निर्मित था ।

Post – 2017-05-09

देववाणी (अठ्ठाइस)
नाद ही शब्द, नादभेद ही अर्थभेद

हम जिसे देववाणी की विशेषता मानते हैं वह, हमारी अपनी समझ से, सभी आदिम बोलियों की विशेषता थी, इसलिए इसे विशेषता कहना भी केवल विकसित और मानक भाषाओँ के सन्दर्भ में ही सार्थकता रखता है। आज आदिम अवस्थाओं में जीने वाले समाज भी हमारी समझ के कारण आदिम हैं, अन्यथा अपने आदिम जीवन के लिए कुख्यात आस्ट्रेलियाई आदिवासियों तक के जीवन पर दूसरी संस्कृतियों का प्रभाव लक्ष्य किया गया है।

हम भाषा के सन्दर्भ में जिस प्राचीन चरण की बात कर रहे हैं उसमें ध्वनि परिवर्तन से अर्थभेद किया जाता था, दुनिया की कुछ भाषाएँ आगे भी उसी जुगत का प्रयोग करती रहीं. उदाहरण के लिए अरबी और इससे प्रभावित भाषाओँ में स्वरभेद से ही अर्थभेद – किताब-क़ुतुब-कातिब – किया जाता है. अंग्रेजी में सिंग-सैग-संग-सांग के पीछे भी यही तर्क बचा हुआ है। वैदिक में यह संस्कृत की अपेक्षा अधिक क्रियाशील था। उदाहरण के लिए भोज. में हिंदी सब के लिए आज भी कुछ लोग ‘सभ’ का प्रयोग करते हैं। हिंदी के प्रभाव से ‘सब’ का प्रयोग भी चलता है और हिं. ‘सभी’ के लिए अनपढ़ भी ‘सब ही’ (एमे सब ही केs हिस्सा चाही = इसमें सभी को हिस्सा चाहिए) का प्रयोग करते पाए जा सकते हैं. परन्तु सामान्य प्रयोग (एहमे सभकेs हिस्सा चाही) ही है। देववाणी का सभ हिन्दी में सब हुआ और वह कौरवी प्रभाव में सर्व हुआ, न कि सब, सर्व का अपभ्रंश है, और सभी सब के साथ निश्चयात्मक, हि, प्रत्यय जुड़ने का परिणाम है। अब क्रम सभ > सभा > सभी का बना जो वैदिक में सभेय और संस्कृत में सभ्य उसी तर्क से बना जिससे इह यह, और इहां, इहवां, यहां, बना फिर ‘सभ्य’ का अर्थविस्तार होने के बाद वैदिक में भी सभासह बना और सं. में सभासद ।

हम आपका ध्यान दो बातों की और दिलाना चाहते हैं. पहला यह कि संस्कृत वैयाकरणों के नियमों का एक नई दृष्टि से अध्ययन जरूरी है। जिसे वे ऐतिहासिक बदलाव मानते हैं वह आंचलिक बदलाव है। उनके अनुसन्धान अमूल्य हैं, पर तभी जब हम समझें कि बोली बानी के भेद के कारण एक ही शब्द को कई भाषाई समुदायों के सम्पर्क में आने के बाद उनके विविध रूप हो जाते थे। हमारे वैयाकरणों ने इन्हे ऐतिहासिक संदर्भ में देखा। आंचलिक विविधताओं की ओर भी उनका ध्यान गया, अन्यथा पाणिनि यह न लिखते कि गान्धारों में ‘शव’ का अर्थ गमन होता है। परन्तु इस सर्वेक्षण में चूक यह थी कि वह यह न देख सके कि मरने के लिए लोक में गुजरने का प्रयोग गांधार तक सीमित नहीं है।

Post – 2017-05-08

#देववाणी (सत्ताइस)
शब्द निर्माण प्रक्रिया

‘यदि तुमने किसी सारंगी वादक को तारों पर आघात के सूक्ष्म अन्तर से अलग अलग ध्वनियां निकालते देखा हो तो भाषा के विकास के उस चरण को भी समझ सकते हो जिसमें बोलना तक एक आह्लादकारी अनुभव से गुजरना था। नये प्रयोग अर्थ सेचार के साथ सर्जना के आनन्द की अनुभूति भी कराते थे। शब्द फूल जैसे हल्के, नैसर्गिक प्रतीत होते थे और उनका अर्थ गंध की तरह स्वतः बिना परिभाषित किए श्रोता तक पहुंच जाता था। बोलियों में, सभी बोलियों में, ये तत्व आज तक नष्ट नहीं हुए हैं। कृत्रिम भाषाएं तो कागजी फूल है। उनमें भाषा का अपना आनन्द नई व्यंजनाएं गढ़ते हुए ही प्राप्त होता है। पर यह अपनी कारीगरी पर मुग्धता होती है, जिसका संचार उतना सहज नहीं होता।

देववाणी का यह गुण वैदिक में कुछ कुछ बचा रह गया था, इसलिए हमने ऋग्वेद से जिन शब्दों को अपने तकनीकी भंडार में शामिल किया, वे हिन्दी में उसी तरह घुल गए जैसे नमक पानी में घुल जाता है। निविदा, संविदा, सदन, सदस्य, संसद, समिति आदि ऐसे ही शब्द हैं। पर ऋग्वेद तक देववाणी अपना सौष्ठव काफी दूर तक खो चुकी थी। तकनीकी जरूरतों और सूक्ष्मतर संकल्पनाओं की मांग नैसर्गिक तरीकों से पूरी नहीं हो पाती।

जहां से हम प्रकृति में हस्तक्षेप करते हैं, वहीं से उस सूनृता वाक् में भी हस्तक्षेप करते हैं जिससे हमने भाषा का विकास किया था। औजारो और युक्तियों का जोड़तोड़ करते हुए नए आविष्कार करने वाले भाषा में भी जोड़तोड़ करते हुए अपनी अपेक्षाएं पूरी करने को बाध्य थे।

यहीं से वह इंजीनियरी आरंभ होती है जिसमें भाषा की निर्माण प्रक्रिया भी बदलती है और इसे समझने की युक्तियां भी बदलती हैं। बदलती भी इस हद तक हैं कि हम पिछले चरण की विकास प्रक्रिया तक के प्रति अनभिज्ञ होते चले जाते हैं। यही संस्कृतीकरण की प्रक्रिया है। यहां कौरवी की एक कारक भूमिका भी है। यही कारण है कि जब तक कोई भाषा हमारे सुख दुख, राग विराग के प्रकृत स्तर पर बनी रहती है उसका काम देववाणी की युक्तियों से चल जाता है, परन्तु जब वह विचार और दर्शन की ओर अग्रसर होती है तो उसे संस्कृत से सहायता लेनी होती है, वह संस्कृतमय होती चली जाती है।

ऋग्वेदिक समाज तकनीकी दृष्टि से बहुत आगे बढ़ा हुआ था, इसलिए कई विफल प्रयोग नयी चीजे बनाने वालों ने भी किए ही होंगे, वैसे ही कुछ अटपटे भोंड़े प्रयोग शब्द गढ़ने में भी किए गए, जैसे सास्युक्थ्यः (सः+ असि+उक्थ्यः) एतायामोप (आ+इत+ अयाम+उप) इहेहमातरा (इह इह च सर्वत्र माता), अक्रविहस्त (निष्पाप) , अदब्धव्रतप्रमतिः (जिसे जो ठान लिया उससे कोई डिगा न सके ), आदि ।

इन विरल अपवादों को छोड़ दें जिनकी संख्या अधिक नहीं है तो दूसरे रूप अपेक्षाकृत अधिक सटीक और कम अटपटे हैं जैसे अकृत्तरुक (लकदक), अकामकर्शण (अनाकर्षक), हृदयाविध (मर्मभेदी), अतिविद्ध (ऐसा मनका जिसका छेद अधिक चैड़ा हो गया हो), आदि।

परन्तु वैदिक शब्द निर्माण प्रक्रिया बोलियों की अपनी निर्माण प्रक्रिया के निकट पड़ती है जिसमे निर्माण जैसा कुछ लगता ही नहीं, सारंगी के तार का स्पर्श और धर्ष का दबाव और स्पंदन बदल जाता है. केतु, प्रतीत, प्रतीक, अंक, अच्छा, अजस्र, अंकी, अंकुश, अंग, अजस्र,, तन्द्रा, अति, अद्भुत, अद्य, अनवद्य, अध्यक्ष, अधिवक्ता, उपवक्ता, दूत, सम्राट, अधिराट। हिन्दी में ये शब्द भी घुलमिल गए।

यह स्मरण दिलादें कि वैदिक में इनमें से अधिकांश शब्दों का अर्थ वही नहीं है जिससे हम परिचित हैं। यह गढ़े हुए शबदों की अपनी सीमा है जिसे हम बता आए हैं। यहां हम इस प्रश्न को इसलिए उठा रहे हैं कि जिने सुन्दर, सरल और मार्मिक शब्द वैदिक समाज गढ़ सका वैसे नए और सर्वजनग्राह्य शब्द हमारे शब्दनिर्माता क्यों न गढ़ सके? अंग्रेजी में जो तकनीकी शब्द समस्या पैदा नहीं करते वे हिन्दी में समस्या क्यों पैदा करने लगते हैं? इसका उत्तर यह है कि जब तकनीकी विकास में प्रयत्नशील समाज अपने नये अविष्कारो और तकनीकी आवश्यताओं के अनुसार शब्द गढ़ता है तो उसमें वस्तु बोध और शब्दबोध में वह दूरी नहीं होती जितनी दूरी बिना कुछ किए, उधार की तकनीक लेकर, उसका भी सही उपयोग न कर पाने वाले समाजों की भाषा में पाई जाती है । समस्या श्रमिकों, उत्पादकों, विविध उद्यमों में जुड़े लोगों के शब्दों को अपनाने की जगह, शब्द से शब्द गढ़ने की समस्या के कारण पैदा होती है। इसे मैं प्रायः भैंस से दूध दुहने की जगह भैंस दुहने की समस्या मानता हूं।

पर रोना वही की भूमिका में ही समय निकल गया। बात तो देववाणी के शब्द निर्माण पर करनी थी जो हो सकता है कल आरम्भ हो जाए।

आज इतना ही कि भाषा की इंजीनियरी श्रम से परहेज़ करने वाले पंडितों द्वारा गढ़ी गई है इसलिए उसमे आडंबर है, वह स्वाभाविकता नहीं जो वैदिक जार्गन में मिलती है ।

संस्कृत का सहारा लेने वाली बौलियाँ भी संस्कृत की तरह अपना अलग संसार रचने लगती है, अपनी जड़ों तक को भूलने लगती है और जब जड़ें ही कमजोर हो जायं तो भाषा की प्राणवगा चुकने लगती है और समाज के सामान्य संचार की भाषा नहीं रह जाती और काल कवलित हो जाती है।

इसलिए चिरायु होने के लिए अपनी जड़ों की ओर लौटना, उस रस का जिसे पत्तियां ग्रहण करके वृक्ष का पोषाहार बनाती हैं जड़ों तक वापस जाना और जड़ों से खाद पानी ग्रहण करना दोनों साथ साथ चलता रहे तो भाषा स्वाभाविक भी बनी रहेगी, अमूर्तन की अपेक्षाओं को भी पूरा कर सकेगी।

हम इस झमेले से निकल कर उस चरण पर लौटें जिसकी तलाश दुनिया की सभी बोलियों में की जा सकती है। मूलोच्छिन्न भाषाओं में यह अपेक्षकृत कम मिलेगा, मूल से जुड़ी भाषाओं में किंचित अधिक। परन्तु आज तो यह संभव नहीं।

Post – 2017-05-07

देववाणी (छब्बीस)
बोलियां, लोक भाषा और मानक भाषा

भाषा, समाजशिक्षा, सामाजिक सर्जनात्मकता और राष्ट्रीय उत्थान की समस्यायें परस्पर जुड़ी हुई हैं, और इस दृष्टि से किसी देश की शिक्षा नीति और सरकारी कामकाज की भाषा विषयक निर्णय बहुत महत्व रखते हैं। हम इस विषय पर पहले से लिखते आए हैं। परन्तु हमारा क्षेत्र विचार या मानसिक बदलाव तक सीमित है न कि इसके आन्दोलन से जुड़ा। आन्दोलन में शक्तिशाली यदि गलत या अन्यायी हो तो भी उसकी जीत होती है और अंग्रेजी की वरीयता के पीछे जितना व्यापक और बहुआयामी समर्थन है उसका सामना करने वाला आन्दोलन नहीं खड़ा किया जा सकता। विचार में सत्य और न्याय का पक्ष अपने दायरे का विस्तार करता है और स्वतः अपने औचित्य के बल पर इतनी प्रबल शक्ति बन जाता है कि वह अपने विरोधियों को निस्तेज करके व्यर्थ कर दे। कुछ यूं कि हउनके सारे हथियार और औजार व्यर्थ हो जायं।

मुझे इस पोस्ट के माध्यम से कुछ भ्रान्तियों का निराकरण करना, या उनके विषय में अपना मन्तव्य प्रकट करना जरूरी लगा।

पहली बात हम बोलियों का प्रयोग उन उपबोलियों के क्षत्र क्षेत्र के रूप में कर रहे हैं जिन्हें हम अपनी मां और अपने परिवेश से सीखते हैं और बोलते हैं, परन्तु जिनमें इतने अन्तर होते हैं कि या तो इनका कोई मानक रूप तैयार किया जाय तो अपने पूरे प्रसार क्षेत्र में एकरूपता बनाए रख सकती हैं, और उस दशा में आरंभिक शिक्षा का भी माध्यम बन सकती हैं, अ्न्यथा अपनी महत्वाकांक्षाओं को त्याग कर अपने स्थानीय चरित्र को बचाए रख सकती हैं।

ध्यान में रखना होगा कि पूरे बोली क्षेत्र में व्यवहार के लिए जिस मानक भाषा का निर्धारण किया जाएगा वह अल्पायु ही होगी। उपबोलियां उस मानक रूप में नीचे अपनी गति से चलती रहेगी। परिवर्तनों से गुजरने के बाद भी ये चिरायु हैं। इनका भी अन्त हो सकता है यदि पूरे समाज के शिक्षा, संस्कृति और आर्थिक स्तर में समरूपता पैदा हो सके और शैक्ष भाषा निजी व्यवहार में आ कर उस ग्राम्य पद्धति को ही बदल दे जिसमें अनपढ़ ओर अपने ही भौगोलिक परिवेश में सिमट कर रहने वालों की संख्या इतनी कम हो जाय कि उनकी भाषा, भाषाई परिवेश का निर्धारण न करे।

दूसरी बात यह कि मानक भाषाएं तभी तक जीवन्त बनी रह सकती हैं जब तक वे लोक भाषा को अपना आदर्श मानें। यहां लोक भाषा से मेरा तात्पर्य उस मानक भाषा के लोक व्यवहार वाले रूप से है, न कि क्षेत्रीय बोलियों से। कहें, यह मानक भाषा का वह रूप है जिसे आप हाट बाजार में बोलते हैं और जिसे बोलते समय इस विषय में अतिरिक्त रूप में सावधान हुए बिना आप की वाक्य रचना में सरल वाक्यों की संख्या बढ़ जाती है, ऐसे शब्द प्रयोग में नहीं आते जिनको समझने में अशिक्षित को भी कोई कठिनाई हो।

ऋग्वेद में मरुतों के वाहन चित्रमृग (चीतल ) के लिए पृषती प्रयोग में आया है, बोलियां भी चितकबरी हैं, रंगबिरंगी हैं। बहुत ग्रहणशील फिर भी सब कुछ अपनी प्रकृति में ढाल कर अपनाती हैं। कौरवी ने देववाणी को भी अपने रंग में ढाल लिया था। आज संस्कृत किसी क्षेत्र के काम काज की भाषा नहीं है, सामान्य बोलचाल की भी नहीं, परन्तु कौरवी उससे पहले भी थी आज भी है और आगे भी रहेगी। यह सौभाग्य किसी मानक भाषा को प्राप्त नहीं हुआ, यह हम पहले कह आए हैं, परन्तु इसका कारण यह था कि ये मानक भाषाएं कृत्रिम भाषाएं बनती हुई, अपने ही वायवीय जगत में विचरण करती हुई लोकभाषा से अपना नाता तोड़ बैठीं।

हिन्दी ने भी यह किया। सरकारी भाषा बनने की अपेक्षा पूरी करने के लिए। और सरकारी भाषा का हाल यह कि इसका मूल पाठ अंग्रेजी में तैयार किया जाता है, फिर उसे हिन्दी में अनूदित किया जाता है और वह हिन्दी जार्गन बोझिल होती है। विन्यास अंग्रेजी से प्रभावित होता है। हिन्दी जार्गन को समझने के लिए यह याद करना होता है कि यह किस अंग्रेजी शब्द का अनुवाद है। अर्थात् सरकारी हिन्दी जानने की एक अघोषित शर्त यह है कि आपको अंग्रेजी शब्दों का अर्थ पता होना चाहिए। ऐसी स्थिति में हिन्दी जानने वाले के सामने भी यदि कोई सरकारी ज्ञापन या पत्र हो और उसके साथ अंगेजी पाठ भी सुलभ हो तो वह अंग्रेजी पाठ पढ़ेगा, न कि हिन्दी पाठ।

मैं एक दुखद सचाई की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं। वह यह कि सरकारी हिन्दी सरकारी अंग्रेजी से अधिक दुर्बोध भाषा है और इसलिए इसके नाम पर आप हिन्दी दिवस मना सकते हैं, हिन्दी पखवाड़ा मना सकते हैं, विश्व हिन्दी सम्मेलन कर सकते हैं, परन्तु इसे कामकाज की भाषा नहीं बना सकते, क्योंकि यह कर्मकांड की भाषा बन चुकी है। इसे कर्मकांड की भाषा से बदल कर व्यवहार की भाषा बनाना हिन्दी बचाओ, हिन्दी चलाओ, आन्दोलन से अधिक जरूरी है।

संसार भावुकता से नहीं व्यवहार से चलता है, जिसमें भावुकता का भी अर्थशास्त्र होता है। अपनी भाषा की महिमा का राग अलाप कर हिन्दी का विरोध करने वाले बंगालियों और तमिलों ने भाषावार राज्य बनने और राजभाषाओं के स्वीकार के बाद भी अपने अपने राज्य में अपनी भाषा को अमल में लाने में सबसे अधिक समय लिया था।

संस्कृत का नाम आते ही भावुक हो जाने वाले ब्राह्मणों में उच्च पदों पर बैठे ब्राह्मण अंग्रेजी के सबसे बड़े समर्थक हैं। जातिवाद और वर्णवाद को पानी पी पी कर गाली देने वाले दलित और पिछड़े जातिवाद और वर्णवाद के सबसे बड़े समर्थक हैं। वर्णवाद के समाजशास्त्र से अधिक प्रबल है वर्णवाद का अर्थशास्त्र।

इसलिए हम जब किसी समस्या पर विचार करते हैं तो हमारे सामने यह बहुत साफ होना चाहिए कि हम उस समस्या का समाधान चाहते हैं, या उसे इसलिए बनाए रखना चाहते हैं कि हम उसको लंबे समय तक उछालते हुए उसका राजनीतिक लाभ उठा सकें और उस चिन्ता से अपने को कातर दिखा कर अपना रुतबा बढ़ा सकें।

यदि समस्या का समाधान चाहते हैं तो समस्या की प्रकृति को समझना होगा। समझने के लिए भावुकता से दूरी बनाते हुए विवके का सहारा लेना होगा। अपने विवके से काम ले रहे हों तो यह समझ जरूरी है कि उस वस्तु व्यापार को प्रभावित करने वाले घटक क्या हैं? उनके जिस संबंध से वह समस्या पैदा हुई है उनमें कुछ बदलाव लाया जा सकता है या नहीं? यदि हमने यह समझ लिया कि उन संबंधों में बदलाव लाया जा सकता है तो आधी समस्या हल हो गई। आधी समस्या का हल इस समझ पर निर्भर करेगा कि उन संबंधों को बदला कैसे जाए। हो सकता है यह कठिन काम हो, परन्तु जब तक हम पहली को नहीं समझते, तब तक सबसे कठिन समस्या समझने की ही है ।

हम पहले जार्गन बहुल या विशिष्ट क्षेत्र की भाषा जिसे हम तकनीकी शब्दावली से भरी भाषा कहते हैं उसे समझ लें। जार्गन शास्त्रीय होता है। सबसे कम भरोसे का होता है और लोक शास्त्र का विपक्ष है। जार्गनबोझिल भाषा उसकी भाषा नहीं हो सकती, फिर भी विवशताओं के कारण बहुत सारे जार्गन उसकी भाषा में जगह बना लेते हैं। जार्गन से जार्गन की कोई यात्रा नहीं है, वह भाषा के प्रवाह के बीच एक प्रतीक के रूप् में उपस्थित होता है जो न रहे तो उसी बात को समझाने के लिए हमें एक व्याख्यापरक टिप्पणी देने की आवश्यकता होगी और इस क्रम में भाषा इतनी पृथुल और इसके कारण ही उससे भी अधिक दुर्बोध हो जाएगी जितनी तकनीकी शब्दों या जार्गन के प्रयोग से दीखती है। अतः यह समझना जरूरी है कि जार्गन भाषा को या कथन को सरल बनाने का उपाय है, न कि उसे कठिन बनाने का।

दूसरा यह कि जार्गन बदले जा सकते हैं, उनका सांकेतिक अर्थ उनके द्वारा या किसी अन्य शब्द या संख्या के द्वारा उसी सटीकता से व्यक्त किया जा सकता है। परिचित श ब्दों को जार्गन के रूप् में प्रयोग किया जा सकता है। चाणक्य ने जिन शब्दों को जार्गन बना कर प्रयोग किया उनका अर्थ नए सिरं से समझना होता है। वेद से लिए गए शब्द संविदा, निविदा, संसद, परिषद उसी अर्थ में प्रयोग में नहीं आते थे जिस अर्थ में हमने उनको ग्रहण किया।

जार्गन विषेशज्ञों के उपयोग में आते हैं और हमारे बुनकर, चर्मकार, मछियारे, नौचालक, सभी जार्गन का प्रयोग करते है और उस क्षेत्र की जानकारी के लिए उनके जार्गन और उन्हीं क्षेत्रों के पाश्चात्य जार्गन को समझना और उनके बीच चुनाव करना जरूरी है।

जार्गन का एक परिवेश और इतिहास होता है जिसे वे प्रतीकब़द्ध करते हैं। यदि वह आपका सिरजा हुआ नहीं है, उसे आपने उधार लिया है तो शराफत का तकाजा है कि उसे अपना बनाने की जगह उस शब्द को अपनी भाषा का अंग बना लें। आपकी भाषा सरल न भी हो तो कम दुरूह रह जाएगी।

भाषा में बेईमानी नहीं चलती। शुद्धतावाद नहीं चलता। सबका स्थान प्रयोग, प्रयोज्य और प्रयोजनीयता ले लेती है। जिन अर्थों में जो शब्द लोकभाषा का अंग बन चुके थे उनको नकारते हुए अपनी ही लोकभाषा को नकारते हुए लोकविमुख भाषा दूसरी किसी भाषा की अनुचरी हो सकती है, स्वतन्त्र भाषा नहीं हो सकती।

वह अपने को रेाक न पाया। ‘यार, मैं तुम्हें सुनता हूं तो लगता है तुम जानी समझी बातों को भी दुर्बोध बना देते हो।’

मेरे पास उससे सहमत होने के अतिरिक्त कोई चारा न था, ‘तुम ठीक कहते हो। सच को जानने के लिए उसकी पृष्ठभूमि को जानना जरूरी होता है। उसके अभाव में सच दुर्बोध हो जाता है। यही है भाषा और जार्गन की भेदरेखा।

Post – 2017-05-06

देववाणी (पचीस)
भाषाविज्ञान की कब्र

– तुम्हें एक भेद की बात बताउॅ, भाषा की सबसे अधकचरी जानकारी वैयाकरण की होती है। वह उसे सूखे काठ के रूप में, एक बढ़ई की नजर सेख् देखता है न कि एक जीवन्त वृक्ष की तरह, जैसे एक बागबान देखता है। इस मामले में उसका मुकाबला कोशकार ही कर सकता है जो भी उसी का छोटा भाई होता है। और यदि किसी भाषा का भाग्य उनको सौंप दिया जाय तो, या तो वह भाषा मर जाएगी, नही तो वह समाज जिसने उसे अपना लिया है। सरकारी हिन्दी के साथ यही दुर्भाग्य घटित हुआ।

– मैं जानता था तुम यही करोगे। तुम्हें बेतुकी बातें करने की बीमारी है। बात शब्दों की करनी थी और मुड़ गए वैयाकरणों की ओर। जानते हो, तुम जिन वैयाकरणों को कोसते नहीं थकते, वे न होते तो संस्कृत का पता तक न चलता।

– मैं कोस नहीं रहा हूं अपनी हैरानी जता रहा हूं कि इतनी मोटी बात भी तुमलोग नहीं जानते जब कि करने के नाम पर जिंदगी भर हिंदी पढाने का ही काम किया है ।

यह मेरी अपनी बात नहीं है, इसे तो पतंजलि और भर्तृहरि कह गये हैं।
तुमको पतंजलि की बात तो बताई भी थी कि भाषा का निर्माण वे करते हैं जिनको अपने अनुभवों, परिस्थितियों, उत्पादों, क्रियाओं, आदि को दूसरों तक पहुँचाना होता है। वे उनका नामकरण करने के लिये वैयाकरण के पास नहीं दौड़ते अपनी भाषा चेतना से नये शब्द गढ़ लेते हैं।*

‘यह बात तो तुमने पहले कभी नहीं कही.’

‘ठीक इन्हीं शब्दों में नहीं कही. पतंजलि ने एक उदाहरण देकर संक्षेप में यही बात कही थी, परन्तु भर्तृहरि ने तो साफ कहा था की भाषा को लोक गढ़ता है, उसके नियम कायदे सब वही बनाता है. तुम कहोगे की जब भाषा लोक गढ़ता है तो वैयाकरण क्या करता है?

‘ वैयाकरण एक ही जैसी बोली की भिन्नताओं से पैदा समस्या का समाधान करने के लिए किसी एक उपबोली को सबके लिए बोधगम्य बनाने के लिए उसका मानकीकरण कर देता है। उन स्वतंत्रताओं को नियंत्रित करने का प्रयास करते हुए दरजी या बढ़ई की तरह काट छाँट और जोड़ तोड़ करता है जिनसे भाषा की प्राणवत्ता बनी रहती है । कहो, उसकी प्राणवत्ता और लोच को भी कम कर देता है. वैयाकरण बनने के बाद आदमी न देश दुनिया को समझ पाता है,न कोई दूसरा उसे समझ पाता है और वह खुद उस भाषा की हथकड़ियों बेड़ियों को तो अच्छी तरह समझता है, पर अफ़सोस कि भाषा को नहीं समझता है।

मैं कोस नहीं रहा हूं अपनी हैरानी जता रहा हूं । सोचो क्या बोलने वाला व्याकरण के नियम तलाशते हुए अपने प्रयोग करता है। उस प्राथमिक चरण पर जब ध्वनि ही (१) उस स्रोत की संज्ञा थी जिसकी किसी क्रिया से या जिसके साथ हुई छेड़छाड़ से वह ध्वनि पैदा हुई, उदाहरण के लिए सर – जल, (२) वह ध्वनि ही उस क्रिया का बोधक थी, जिससे यह पैदा हुई, उदाहरण के लिए प्रवाह या गति, सरन, सरकना (३) वह ध्वनि ही उस ध्वनि की लय की,उस विशेषता का द्योतक थी जिससे यह पैदा हो रही थी, उदाहरण के लिए सर सर, (४) वह ध्वनि ही उस गुण को प्रकट कर सकती थी जो उस वस्तु में है उदाहरण के लिए, सरस, (५) वह ध्वनि ही उस वस्तु के भंडार को अभिहित कर सकती थी, उदाहरण के लिए, सर = सरवर > सरोवर, सरि, (६) वह ध्वनि ही उस क्रिया वाली वस्तुओं के लिए प्रयोग में आ सकती थी, उदाहरण के लिए, सर=बाण, (7) कभी कदा उसके आदि अक्षर को उपसर्ग के रूप में काम में लाया जा सकता था, उदाहरण के लिए ‘स’ ! यहां याद दिलादें कि यह प्रस्ताव हम एक वैदिक प्रयोग के आधार पर कर रहे हैं जिसमे ससर्परी प्रयोग आया है, और इसका सघ (सह) के आद्यक्षर के उपसर्ग बनने से नहीं।

हम इसे और विस्तार देने से बचते हुए यह कह सकते हैं कि जैसा कि हम बट बीज और शुक्राणु और अंडाणु के उदाहरणों से पहले कह आये है आद्य रूपों में अव्यक्त रूप में परवर्ती विकास निहित होता है इसलिए अनुनादी शब्दों में ही, संज्ञा. क्रिया, विशेषण, क्रियाविशेषण, उपसर्ग और अन्तःसर्ग या निपात और प्रत्यय बनने की ही क्षमता नहीं थी, बहुत कुछ और को नामित करने की क्षमता भी थी।

पाश्चात्य भाषाविज्ञानी असाधारण श्रम और संकल्प के बाद भी अनुनादी शब्दों में से केवल कुछ को पहचान पाए और उनका ज्ञान नाद और उससे जुडी संज्ञा से आगे बढ़ ही न पाया। अपने उत्साह में वे अनुसन्धान कर रहे थे या भाषाविज्ञान की कब्र खोद रहे थे?

मकबरा बुलन्द है पर उसमें दबी लाश पर फूल चढ़ाए जा सकते हैं, हासिल कुछ न होगा। ऐतिहासिक भाषाविज्ञान विज्ञान है ही नहीं, इसकी घोषणा भी उनके ही एक मेधावी को करनी थी!uŷ

Post – 2017-05-05

देववाणी (चैबीस)
अर्थविस्तार और आत्मविस्तार

‘अब ‘शेष कल’ वाली बात पर तो आओ।’

‘जिधर भटक गए उसकी गलियों से तो जान पहचान हो जाये। जिस तार को छेड़ दिया है उसके स्पंदन का तो अनुभव हो जाए ।’

उसके चेहरे से लगा, वह इस उत्तर से प्रसन्न नहीं है। शायद उसे डर था कि अब उसी बात को लेकर मैं उसके बेहोश होने तक अपना राग अलापता रहूंगा। मै उलझन में पड़ गया, फिर सोचा संक्षेप में कुछ तो बताना ही होगा। कहा, देखो ‘मैं कुछ उदाहरणों से यह बताना चाहता था की किसी बोली के प्रभाव से कुछ भाषाओँ में, जिनमें अन्य कोई समानता नहीं पाई जाती मूर्धन्य अनुनासिक ण के प्रति इतनी आसक्ति पैदा हुई कि वे न का ण के रूप में उच्चारण करने लगे। तमिल में तो ण के साथ साथ न के दो उच्चारभेद हैं। एक को हम अन्द = वह, इन्द= यह मेँ पाते हैं तो दूसरे को एन्रु = कब? किस दिन ? किस समय? मेँ । इसके बाद भी इसमें मन, मानव, मनन, आदि के आशयों में न को ण में बदलने की झक देखी जा सकती है:
माणम = महिमा उत्कृष्टता,
माणवकन् = विद्यार्थी
माणवन् = मानव
माणाक्कन् = विद्वान
माण = महत्व, सम्मान

देववाणी जिसे णकार का पता ही न था कौरवी क्षेत्र में पहुँच कर मनिआर (भोज. मनिहार) को मणिकार और मनका को मणि कहना पसंद करने लगी.
और एक बात की और भी ध्यान दिलाना चाहता था। लम्बाई नापने के लिए हाथ, ऊंचाई नापने के लिए अपने शरीर के जोड़ों और फिर अपनी काया और उससे ऊपर के अनुसार और दूरी नापने के लिए पांवों का सहारा लेता था। अतः अंगुल, वितस्त= बालिश्त , हस्त, भोग या भुज क्रम में माप होती थी, जिसमे हस्त को मान भी कहते थे. हस्त को तुम अंग्रेजी हैंड में और मान को मैनि- में देख सकते हो. ध्यान रहे मैन – मनु या मनुष्य से और मैनीपुलेशन हाथ के पर्याय मान से सम्बंधित है।

धरती की माप का संकेत विष्णु के तीन पग जमीन मांगने से समझा जा सकता है. और गहराईं मापने का सांकेतिक हवाला ऋग्वेद के दशवें मंडल के इकहत्तरवें सूक्त में मिलेगा जिसमे आदध्नास, उपकक्षास प्रयोग आए हैं और तुम आवक्ष, आशीर्ष और पुरुष प्रमाण या दोनों हाथ ऊपर उठाने के बाद की गहराई जिसके लिए पोरसा का प्रयोग होता है को इस क्रम में रख सकते हो। इससे अधिक गहरा हुआ तो अथाह!

एक बार कोई तार टूट जाय तो उसकी श्रृंखला बिखर जाती है. आपको यह याद दिलाना भी भूल गया की सचाई का अणु भी झूठ के पहाड़ की व्यर्थता प्रमाणित कर देता है. अंग्रेजी का मैन और दूसरी भाषाओँ में इसके सहोदर यह सच्चाई बयान करने के लिए काफी थे की होमो क्षेत्र का सम्पर्क मनु के देश से जुड़ा था या मनु की संतानें होमो प्रदेश में अपनी भाषा और संस्कृति के साथ पहुंची थीं. यहां मेरे उन पुराने लेखों को याद रखें की मनु युग या मानव युग देव युग के बहुत बाद में आता है. देव युग के पालतू पशुओं में मुख्य बकरी और गधा (अश्व) थे और मनु युग गोरू पालन के साथ आरम्भ होता है.

एक बात और याद दिलाने की थी कि मांड़, मड़िया संस्कृत में इसलिए न मिलेगा क्योंकि मड का कौरवी प्रभाव में मृदा हो गया। परन्तु बोलियों में यह चलता रहा। कौरवी प्रभाव संस्कृत पर पड़ा और अपने क्षेत्र में तो था ही। इससे बाहर यह लगभग निष्प्रभाव रहा। इसी तथ्य ने भाषाविज्ञानियों को सचमुच उलझन में डाल दिया था जिसका जिक्र हम पीछे कर आए हैं। अतः यह सोचना उचित नहीं कि हिन्दी का मिट्टी या भोज माटी, मटिया- मिट्टी का छोटा बर्तन, मेटा, मिट्टी का बर्तन, मृदा से व्युत्पन्न हैं। परन्तु मधुतता, मधु,ए मृदु आदि का सीधा संबंध मृदा और मृदु से है तथा मद, मत्त, मदन, का मत से। यह मुझे अभी ठीक लग रहा है परन्तु हो सकता है विचार क्रम में कोई दूसरा सूत्र सामने आए और इसमें सुधार करना पड़े। इसलि, मैं चाहता हूं आप इसे ध्यान से पढ़ें और प्रमसध्स न मानकर विचार प्रक्रिया मानें और खटकने वाली बातों से समय समय पर अवगत भी कराएं।

परन्तु आज तो तुम्हारे हस्तक्षेप के कारण जो कहना चाहता था कह ही न पाया।

Post – 2017-05-04

देववाणी (तेईस)
आधी जानकारी का आढ़ती

‘एक बात कहूं तो बुरा तो न मानोगे? उसने शायद पिछली खीझ मिटाने की भूमिका बनाते हुए सवाल किया।
‘तुदेम इस डर से कि कोई बुरा मान जाएगा, किसी बात को कहने में घबराहट अनुभव करोगे, यह पता लगने पर भी बुरा नहीं मानूगा, क्योंकि मैं जानता हूं इसके लिए अपनी समझ पर विश्वास और नैतिक दायित्व की जरूरत होती है। वह तुमलोगों के पास होता नहीं क्योंकि यह उस दाल या संगठन का नीतिगत फैसला हुआ करता है.

वह हत्प्रभ नहीं हुआ, ‘मैं यह कह रहा था कि तुम भरोसे के आदमी नहीं हो। अपने लिखित वादे भी पूरा नहीं कर पाते।’
मैं सचमुच चौंक उठा।

‘तीस अप्रैल की पोस्ट के अन्त में तुमने लिखा था ‘शेष कल।’ मैं प्रतीक्षा कर रहा था कि वह छूटा हुआ हिस्सा क्या है, पर वह कल तो आज तक हुई नहीं।

मुझे दिमाग पर जोर देना पड़ा। याद नहीं आ रहा था, पर इतना पता तो था ही कि कई विषयों को पूरा नहीं नहीं कर पाता इससे पहले ही चर्चा किसी दूसरे विषय की ओर मुड़ जाती है। यहां तक कि जिस बात को कहने की भूमिका बनाता हूं उसके तर्कों का दबाव ही दिशा बदल देता है। मैंने हाथ खड़े कर दिए, ‘यार अब तो हाल यह है कि कई बार अपना नाम तक भूल जाता हूं। याद नहीं आ रहा उस पोस्ट में लिखा क्या था.’

उसमें तुम मणि शब्द की हड्डी पहसली अलग करते चांद पर कदम रख चुके थे। मैंने सोचा इससे आगे सूरज की ओर तो बढ़ नहीं सकते, बढ़े तो भस्म हो जाओग, इसलिए चर्चा पूरी मान ली थी। फिर ‘शेष कल’ पढ़ कर उत्सुक था कि अधूरी जानकारियों का यह आढ़ती देखें कल कौन सी गठरियां खोलता है और इतजार में पांच दिन बूढ़ा हो गया।

अजीब बात है । भूलता हूँ तो कुछ भी यद् नहीं आता और फिर याद आता है तो पूरा दृश्य उपस्थित हो जाता है, ‘अब याद आया। लेकिन तुमने यह कैसे सोच लिया कि चांद के बाद सूरज का नम्बर नहीं आ सकता। देखो चांद और सूरज में आज जितना फर्क दिखाई देता है उतना पहले नहीं था। वे दूर तो थे पर उतने दूर और पराये भी नहीं। इनसे हमारी रिश्तेदारियां थीं। इसी से तुम हमारी पुरानी हैसियत नाप सकते हो. सूरज तो चाँद से भी अधिक पास था. सुना है वह बच्चों के खेल में गाया जाने वाला गीत – चान मोर मामा सुरुज मोर पित्ती. ज्योतिर्विज्ञान में जैन चिन्तकों का काम कम नहीं है लेकिन वे मानते थे कि चांद सूरज से भी बहुत दूर है, क्योंकि उसकी गर्मी पता ही नहीं चलती जब कि निकट होने के कारण सूर्य अपने ताप से झुलसा देता है।’

उसे हैरानी हुई।

‘और जहां तक शब्दों का प्रश्न है, दोनो हमारे लिए चमकदार हैं, इसलिए चान या चन्नन को सूर्य बनते देर न लगेगी। चन्द्रमा में मे जो चन है वही अंग्रेजी में सन है और तमिल चेन्नै का मतलब जानते हो?’

नहीं जानता था। मैं सचमुच अधूरी जानकारियों का आढ़ती हूँ, अब मुझे भी लग रहा था.

‘चेन का अर्थ कभी सूर्य था, अब भूल गया लगता है। चेन्नम के अनेक आशयों में एक है सूर्यवंश। चेन्नै मद्रास का पुराना नाम था जिसका उद्धार करनेवाली जया ने अपने समाचार चैनल का नाम सन टीवी रखा था। यद्यपि चेन्नै के नामकरण के विषय में कुछ अन्य किंबदन्तियां भी प्रचलित हैं। चान, सन, और सनि (शनि) में चन को स्पष्ट देखा जा सकता है। तुम कहोगे शनि नहीं, सनीचर, शनिश्चर, शनैः चरति इति शनैश्चरः । मैं चुप लगा जाऊँगा, अपनी अधूरी जानकारी के कारण.

‘तब एक बात की ओर तो मेरा ध्यान गया ही नहीं था, इसलिए तार्किक संगति के आधार पर यह मानते हुए भी कि चन्द्रमा के मध्य पद द्र का प्रयोग भी किसी समुदाय में चन्द्रमा के लिए प्रयोग होता रहा होगा, मुझे ऐसा कोई शब्द ध्यान में नहीं आ रहा था जिसका प्रकाश, ज्ञान या किसी ग्रह नक्षत्र से संबंन्ध हो।

मुझे कौरवी प्रभाव में बने द्र के उस प्रभाव से मुक्त रूप पर विचार करना चाहिए था। वह था तर पर उस समय तरणि, तारा, और मुहावरे का आंख का तारा याद ही न आया । अब साथ ही यह भी देखो कि आंख की पुतली के लिए एक भाषाभाषी समुदाय पुतली का, दूसरा कनि / कनी या कनीनिका का और तीसरा तार / तारा का प्रयोग करता था। कन को ही चवर्गीय समाज चन कहता था जो चान, बना।

आज की स्थिति में हम तय नहीं कर सकते कि (१) चन/ चान , (२) तर/तार (३) मन और (४) मस किन बोलियों में प्रचलित रहे होंगे, पर यह कह सकते हैं कि तर का प्रयोग करने वाला अल्पप्राण और अघोषप्रेमी प्रेमी रहा होगा। इस प्रसंग में आज तमिल का स्मरण हो आता है। पर तमिल का अपना शब्द कन था या तर यह तय करने चलें तो समस्या पैदा हो जाएगी। कन तमिल में आंख के लिए प्रयुक्त मिलता है, जिसमें अनुनासिक मूर्धन्य है, तर के विषय में कोशकार संस्कृत का आभार मानते हैं।

खैर हम कह सकते हैं कि यह समुदाय घोषप्रेमी समुदाय के संपर्क में तर को दर भी पुकारने लगा होगा या यह तर बोलता रहा होगा । घोषप्रेमी उसे दर सुनता और बोलता रहा होगा और कौरवी ने इसका कबाड़ा करके द्र/ दृ आदि में बदला जिससे एक ओर तो हमारी दृग, दृष्टि. दृश्य, दृष्ट, दृष्टान्त और वैदिक दृशीक, द्राक्षीत का संबन्ध है, दूसरी ओर दर्प और दर्पण का दृ से जो शब्द भंडार तैयार हुआ है उसे दुहराने का औचित्य नहीं। इसके विपरीत तर ने तृषा, तृप्त, तृप्ति, तरु, तरणी ही नही तर्पण, तारतम्य और तरीका आदि शब्दों का आविर्भाव किया।

तर, तर तर चूना, किसी पत्ती पर पड़ी बून्द के ढरकने की ध्वनि को, या जैसा पसीने की बून्द के खिन रुक कर एक झटके में नीचे जाने के क्रम में ध्यान से सुने स्वन पर ध्यान दें तो पता चलेगा यह अनुनादी शब्द है. यही हाल चन/ चम का है. मन मत और मस का है. सभी जल की ध्वनियाँ हैं. यदि अभी तक चंचल, हलचल; तरपत / तड़फड़ाने का अर्थ समझ न पाए हो तो याद करो पानी के अभाव में विकलता को।
भाषाविज्ञानियों की चिंता थी भाषा का इतना जटिल ढांचा अनुनादी स्रोत से कैसे पैदा हो सकता है. हम ऊपर के किसी अनुनाद को लेकर उत्पन्न विपुल शब्दभंडार पर ध्यान दें जिसमे क्रिया मूल या धातुएं हैं, संज्ञाएँ हैं, विशेषण हैं, भाववाचक और गुणवाचक शब्द है, और उपसर्ग और प्रत्ययों का आदि रूप हैा
परन्तु मैं उस दिन जो बात कहना चाहता था वह इससे अलग थी।

Post – 2017-05-03

देववाणी (बाईस)
सान्ध्यराग

उसे नींद आई थी या नहीं, नही जानता । उठा आंख मलते ही थी, वह भी चाय के लिए आवाज लगाने पर, हाथ मुंह धोकर चाय के लिए बैठा तो प्याला उठाने के साथ बोला, ‘हां अब बताओ!’

मैं हंसने लगा।

‘हंसने से काम नहीं चलेगा। बगलें मत झांको। जवाब तो देना ही पड़ेगा।‘

‘मैं जब कहता हूं पश्चिम का प्रखर से प्रखर बुद्धिजीवी भाषा की उत्पत्ति को नहीं समझ सकता तो न तो मेरे मन में उनकी बौद्धिक क्षमता को लेकर कोई सन्देह है, न ही उनके अध्यवसाय को लेकर। इन सभी मामलों में वे हमारे लिए अनुकरणीय हैं। उनकी अनुसंधान पद्धति हमसे अधिक विकसित है, जिस सीमा तक हम उसका निर्वाह करते हैं, परीणाम अच्छे ही आते हैं। हम उनका निर्वाह नहीं कर पाते पर उन्हें बचपन से ही, कहो छोटी कक्षाओं से ही इसकी आदत डाल कर इसे उनके सामान्य आचरण का अंग बना दिया जाता है। हम अनेक दृष्टियों से पश्चिम से पीछे हैं और कुछ माने में अपने गौरवशाली दिनों में भी उनसे आगे नहीं रहे। साधनों और सुविधाओं की तो कोई तुलना संभव ही नहीं।

इसके बाद भी जब मैं मानविकी के क्षेत्र में उनकी कुछ अशक्यताओं की बात करता हूं तो इसलिए कि जिन प्रतिज्ञाओं का पालन वे प्रकृत विज्ञान के क्षेत्र में करते हैं उनका निर्वाह वे मानविकी में नहीं करते। ऐसा नहीं कर पाते क्योंकि यहां विजय का संकल्प (the will to conquer), प्रभुत्व का आवेग (the urge to dominate) इतना प्रबल रहा है कि विवेक इन आवेगों का गुलाम बन जाता रहा है। वैज्ञानिकता से प्रेम की कसमें खाने के बाद भी वे कुछ मामलों में इतने जाहिल सिद्ध होते हैं कि उनकी सर्वोत्तम मेधाएं भी परिवेशीय दबाव में इस तरह झुक, मुड़ और बदल जाती हैं कि जब तक यह समझ न लो कि अमुक कारणों से ये ऐसी गलतियां कर सकते हैं और ऐसे स्थलों को पहचानते न चलो तब तक उस विडंबना को समझ ही नहीं सकते जिसके शिकार अन्यथा बहुत सचेत और तत्वदर्शी विद्वान भी हो जाते रहे हैं।

मैं स्वयं इसे समझाने चलूँ तो तुम्हारी खोपड़ी में यह बात घुसेगी ही नहीं, इसलिए अपने प्रिय भाषाविज्ञानी सस्यूर की कुछ निष्पत्तियों की ओर तुम्हारा ध्यान दिलाना चाहूंगा। मैं ज्योतिषी नहीं हूँ परन्तु इस बात का पूर्वानुमान मुझे भी था कि तुम किस तरह के सवाल मुझसे करोगे, इसलिए जब तुम सो रहे थे मैं अपने नोट तलाश रहा था, जिसे जो मान बैठा उसे बहुत कुछ हासिल होगा, परन्तु यह आत्मविश्वास नहीं कि मैंने अपनी जानकारी का सही उपयोग करते हुए सत्य को समझने का प्रयास किया है और हमने अपनी समझ पर विश्वास करनेवालों को गुमराह नहीं किया है। पहले इन वाक्यों को हृदयंगम करो और आराम से चाय पिओ फिर बात करेंगे:
१. The sense of a term depends on presence or absence of a neighbouring term.
२. The system leads to the term and the term to the value.
३. system of words as opposed to the word in isolation.
४. what are our ideas, apart from our language ? They probably do not exist.
५. … there is nothing at all distinct in thought before the linguistic sign.
६. Idea of different tenses, which seems quite natural to us, is quite alien to certain languages। As in the Semitic system (Hebrew) there is no distinction, as between present, future and past; that is to say these ideas of tense are not predetermined, but exist only as value..
७. So the whole language system can be envisaged as sound differences combined with differences between ideas.
८. There are no positive ideas given, and there are no determinate acoustic signs that are independent of ideas.
९. In the end, the principle it comes down to is the fundamental principle of the arbitrariness of the sign.

इसका लाभ मुझे तो मिला पर वह मेरे नोट में इस तरह उलझ गया कि उसकी चाय ठंढी हो गई और इतना नुकसान सहने के बाद एक लाभ उसे भी हुआ, उसने सवाल किया, ‘इसमें गलत क्या है?’

मैंने कहा, ग़लत यह है की इसके कारण तुम्हारी चाय ठंढी हो गई। मैं जानता था चाय तो ठंढी होगी ही, इसलिए केतली में गर्म पानी बचा रखा था। अब तुम चाय पियो और मेरी बात ध्यान से सुनो! मैंने नई चाय बनाई और पेश करने के बाद जब वह चाय पीने चला तो कहा, अब बोलूंगा मैं, और तुम मेरी बात पूरी होने तक चुपचाप सुनोगे।

जवाब में उसने चाय की चुस्की ली और मेरी ओर कुछ इस अंदाज से देखा जैसे कह रहा हो। ‘मंजूर !’

मैंने कहा इन वाक्यों का एक एक कथन इतना सही है की मैं इनमें से किसी का विरोध नहीं कर सकता, पर कमी यह है की विचारक ने अपनी ही प्रतिज्ञाओं का निर्वाह नही किया है। यदि श्रव्य संकेत के बिना विचार संभव ही नहीं है और विचार रहित श्रुत संकेतों का कोई अर्थ ही नहीं तो श्रुत संकेतों का एक निरर्थक पर्यावरण होना चाहिए जिसमें कुछ ऐसे लक्षण होने चाहिए जिनके कारण किसी श्रुत इकाई को किसी विचार का वाहक माना जा सके। इसमें एक सीमा तक मनमानापन भी है की किसी अर्थ में एक ध्वनि के रूढ़ हो जाने के बाद यह प्रयत्न रहे की वही ध्वनि किसी दूसरे के लिए प्रयोग में न आये, परन्तु इसमें अनुनाद की जो स्पष्ट भूमिका थी उसे आंकने में उनसे चूक हुई क्योंकि:
१- पाश्चात्य भाषाएं अपनी जड़ों से दूर होती गई हैं इस लिए वे अनुनादी शब्दों की भूमिका का महत्त्व न समझ सके न समझ सकते थे क्योंकि वे वे यूरोपीय भाषाओँ को सबसे उन्नत भी सिद्ध करना चाहते थे और सबसे पुरानी भी।
२. सास्युर को यह पता था की रोमांस बोलियों की पड़ताल से पुरानी धारणा बदली की मानक भाषाओँ से बोलियां पैदा हुई हैं और एक उल्टा सत्य सामने आया की मानक भाषाएं किसी एक बोली के अभ्युदय के फलस्वरूप अस्तित्व में आई है। फिर उन्हें पूर्ववर्ती चरणों के लिए अपेक्षाकृत अल्पविकसित बोलियों की बात करनी चाहिए थी। हम इसके लिए उन्हें दोष नहीं दे सकते क्योंकि वह इस झमेले में पड़े ही नहीं, प्रामाणिक आंकड़ों के आधार पर ही अपने विचार रखते रहे।
३. परन्तु हम उनको इस बात के लिए दोषी तो मान ही सकते हैं जिसके लिए नहाने के पानी के साथ बच्चे को भी फेंक देने का मुहावरा बना है।
मुझे और कुछ नहीं कहना है। अब तुम कुछ कहना चाहो तो सुनने को तैयार हूँ।

उसने कहा, ‘यार मुझसे तेरी ऐसी क्या दुश्मनी है। कभी तो मुझे भी यह भरम पालने का मौका दे दिया कर की मैं भी कुछ जनता हूँ।’