Post – 2018-12-20

इकबाल की मुल्लावादी दार्शनिकता

उर्दू कविता का मिजाज सूफी रहा है। धार्मिक कट्टरता का विरोध इसका मुख्य स्वर है। इस्लाम में अल्लाह रहम तो करता है, पर दहशत भी पैदा करता है। सूफी असर के कारण उर्दू कवि उससे डरता नहीं, सजदा नहीं करता, प्यार करता है। यह प्यार दिन में एक बार या चार-पांच बार नहीं पैदा होता, एक नशे के रूप में इसका असर बना रहता है, शायर होश में आना ही नहीं चाहता। वह मुसलमानों के लिए लगाई गई पाबंदियों का कायल नहीं है। मुअज्जिन (अजान लगाने वालों) का मजाक उड़ाता। धार्मिक उपदेशक, शेख. वाइज, नासेह, की खिल्ली उड़ाता है। वह खुदा को सातवें आसमान पर बैठा नहीं मानता, सर्वव्यापी मानता है ( वह जगह बता कि जहां पर खुदा न हो। संक्षेप में सूफी मत के माध्यम से उर्दू कविता पर वेदांत का प्रभाव रहा है। हिंदुओं से लेकर मुसलमानों तक उर्दू कविता की लोकप्रियता का एक रहस्य यह भी है।

इकबाल से पहले शायर हैं, जो मुल्लों के साथ खड़े दिखाई देते हैं। अकबर इलाहाबादी भी, जो देवबंदी थे, मगर शायरी में उनका मिजाज भी सूफियाना था। उनकी मशहूर गजल, हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है। इकबाल में सज्दे की ओर लौटते हैं। शायरी में भी आदमी को मुसलमान बनाना उनकी प्राथमिकता है। आशनाई या प्रेमानुभूति एक दुर्बलता जिसे सच्ची खुदापरस्ती के लिए दिल से निकालना होगा।
मैं जो सर ब-सज्दा हुआ कभी तो जमीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम आसना मुझे क्या मिलेगा नमाज़ में।
हो सकता है कि मैं इसे जिस रूप में देख रहा हूं वह गलत हो, कविता के वाक्यों के तरह-तरह के अर्थ निकालते ही हैं लोग। परंतु मुझे लगता है यह हिंदुत्व के बचे हुए संस्कारों से मुक्त हो कर पक्का मुसलमान बनने का संकेत हो सकता है। सनम-आशना, मूर्ति में आसक्ति, हिंदू संस्कारों के अवशेष का द्योतक लगता है। तबलीग यहीं से शुरू होता है। यह अर्थ खींचतान भरा लग सकता है इसलिए, हम उनके गद्य में कहे गए वाक्यों पर ध्यान दें।
I suggest the formation of an assembly of ulema which must include Muslim lawyers who have received education in modern jurisprudence. The idea is to protect, expand and, if necessary, to reinterpret the law of Islam in the light of modern conditions, while keeping close to the spirit embodied in its fundamental principles. This body must receive constitutional recognition so that no bill affecting the personal law of Muslims may be put on the legislative anvil before it has passed through the crucible of this assembly. .. Indeed it declares that every code of law other than that of Islam is inadequate and unacceptable. This principle raises some political controversies closely connected with India.
(New Year Message, Broadcast from the Lahore Station of All-India Radio on 1st January, 1938.)
मुस्लिम पर्सनल लॉ मुस्लिम समाज मे अपनी ही महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को भी सही साबित करने और उसको चलते रहने देने के लिए खड़ा हो जाता है, तो इसके पीछे इकबाल का हाथ न भी देखा जाए, इसका समर्थन तो देखा ही जा सकता है।

हिंदू कोड बिल पहले इंडियन कोड बिल था। सुनते हैं मजमून तैयार करने के स्तर पर ही जब जाकिर हुसैन साहब को इसका पता चला और उन्होंने नेहरू जी को मुस्लिम पर्सनल लॉ संवेदनशीलता की याद दिलाते हुए इसे केवल हिंदुओं के लिए जारी करने को विवश किया। हम मुस्लिम पर्सनल लॉ की ताकत, आधुनिक युग के संदर्भ में इसको बनाए रखने के लिए मोहम्मद इकबाल की पहल और सामान्यतः राष्ट्रवाली माने जाने वाले मुसलमानों की मानसिकता को एक दूसरे से जुड़ा हुआ पाते हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ में केवल पुरुष मुसलमान है। स्त्री उसकी इच्छा पूर्ति का साधन है इसलिए उसका अलग कोई अधिकार नहीं है, अन्यथा मानवता की समानता की बात करने वाला मजहब स्त्री और पुरुष दोनों के अधिकार की समानता को तो स्वीकार करता। ऐसा नहीं है और इकबाल स्वयं स्त्री और पुरुष को समानता देने के पक्षधर नहीं है।
… I am not an advocate of absolute equality between man and woman. It appears that Nature has allotted different functions to them, and a right performance of these functions is equally indispensable for the health and prosperity of the human family. The so called “emancipation of the western woman” necessitated by western individualism and the peculiar economic situation produced by an unhealthy competition, is an experiment, in my opinion, likely to fail, not without doing incalculable harm, and creating extremely intricate social problems. Nor is the higher education of women likely to lead to any desirable consequences, in so far, at least, as the birth rate of a community is concerned. Experience has already shown that the economic emancipation of women in the west has not, as was expected, materially extended the production of wealth. On the other hand it has a tendency to break up the Physical life of Society. (The Muslim Community — a Sociological Study. पूर्व. 134)।

स्वाभाविक है कि वह तलाक के विधान को भी पूर्वाग्रह से मुक्त मानें। वह इस्लाम में ऐसी व्यवस्था की बात करते हैं जिसमें स्त्री को भी तलाक देने का अधिकार है, और पश्चिमी आलोचक इसे समझ नहीं पाते हैं इसलिए इसकी आलोचना करते हैं।
The laws of divorce in Islam are also of great interest. The Muslim woman has equality of divorce with her husband. This, however, is secured in Muhammadan Law by the wife calling upon her husband at the time of marriage to delegate his right of divorce to her, to her father, brother or any stranger. This is technically known as “tafviz”—that is to say, handing over or transfer. The reason why this roundabout way of security is adopted I leave to the lawyers of Europe to understand. 158

इसका व्यावहारिक रूप क्या है, इससे हम जितना परिचित हैं, उसमें यह नहीं मान सकते किस व्यवस्था का कोई लाभ मुस्लिम महिलाओं को मिला है।

हिजाब या बुर्का प्रथा को वह महिलाओं के लिए उचित मानते हैं, ऐसा करके ही वे अपने सम्मान की रक्षा कर सकती हैंः
The source and symbol of the greater respect which Eastern women enjoy is in that very veil. Nothing has happened to diminish the respect in which they were held for centuries, and the principle of protecting them from approaches of strangers and from all humiliations has been safely maintained.

उनकी समझ से इस्लामी जनतांत्रिक व्यवस्था सर्व मुस्लिम सुखाय (Commonwealth) पूर्ण समतावादी व्यवस्था हैः
That the Muslim Commonwealth is based on the absolute equality of all Muslims in the eye of the law. There is no privileged class, no priesthood, no caste system.
यह केवल मुस्लिमों तक सीमित है और इसे मुसलमान बन कर ही हासित किया जा सकता है, पर जो मुसलमान न हैं न बनने के तैयार वे इस कामनवेल्थ में चैन से नहीं रह सकते।

हम नहीं जानते अच्छे मुसलमान का मतलब पक्का मुसलमान या कट्टर मुसलमान से अलग भी कुछ होता है और सब को अच्छा मुसलमान बनाने की योजना तबलीग से अलग क्या हो सकती है। वह मानते हैं कि अच्छा मुसलमान हुए बना उद्योग व्यवसाय कुछ भी सफलतापूर्वक नहीं चल सकताः
If we want to turn out good working men, good shopkeepers, good artisans, and above all good citizens, we must first make them good Muslims.

यदि इकबाल का मतलब ईमानदारी, कार्य निष्ठा और सद्भाव से है जो अच्छे मनुष्य के गुण हैं, है अच्छा मुसलमान की जगह अच्छा इंसान कहते तो शायद उनकी बात हमारी भी समझ में आती। उद्योग, व्यवसाय अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए शांति और सुरक्षा चाहिए। अच्छे मुसलमानों ने सबसे पहले इसे ही नष्ट किया है जिसके कारण न वे अपनी प्राकृतिक संपदा का सही उपयोग कर सके, न उससे मिलने वाले लाभ का सही निवेश कर पा रहे हैं।

इस्लाम को सही सिद्ध करने के लिए, वह जाने कहां कहां से तिनके जुटाकर एक काल्पनिक महल खड़ा करते हैं जिसमें स्वतंत्रता इस्लाम में ही संभव है और गुलामी तक स्वतंत्रता का विस्तार है, That slaves had equal opportunity with other Muhammadans is evidenced by the fact that some of the greatest Muslim warriors, kings, premiers, scholars and jurists were slaves.

इकबाल को लगता है मुस्लिम समाज में दो कमियां, नेतृत्व में सक्षम व्यक्तियों का अभाव, दूसरे झुंड की मानसिकता का अभावः
Let me tell you frankly that, at the present moment, the Muslims of India are suffering from two evils. The first is the want of personalities. … the community had failed to produce leaders. By leaders I mean men who, by Divine gift or experience, possess a keen perception of the spirit and destiny of Islam, along with an equally keen perception of the trend of modern history. Such men are really the driving forces of a people, but they are God’s gift and cannot be made to order. The second evil from which the Muslims of India are suffering is that the community is fast losing what is called the herd instinct.

जो कमी थी उसे इकबाल पूरी कर रहे थेः नेतृत्व प्रदान कर रहे थे, नेता की जगह सरगना पैदा कर रहे थे और समाज को झुंड में भी बदल रहे थे।

शांति तो इस इस्लाम के नाम के साथ ही जुड़ी है, दूसरों का दुर्भाग्य है मुसलमानों के कारण शांति से रह नहीं पाते।
.. The post-Islamic history of the Arabs is a long series of glorious military exploits, which compelled them to adopt a mode of life leaving but little time for gentler conquests in the great field of science and philosophy.
समानता इस्लाम का दूसरा सबसे प्रधान गुण है, लेकिन यह इस्लाम में भी आरंभ की कुछ शताब्दियों तक ही बना रहाः
The absolute equality of all the members of the community. There is no aristocracy in Islam. … Now, this principle of the equality of all believers made early Mussalmans the greatest political power in the world. 80
क्यों आरंभिक शताब्दियों तक ही बना रहा इकबाल इसे जानते हैं परंतु ऐसे प्रसंगों में याद नहीं करते। यह उस दौर में ही संभव था जब वह कबीलाई जीवन के निकट और उसी के नियमों से प्रेरित था। उद्विकास एक से बहु, समान से विभिन्न की दिशा में चलता है। जिसे ऐरिस्टोक्रेसी की इस्लाम में इकबाल संभावना तक नहीं देते हैं उसके जितने भोंड़े रूप देशों में, इस्लामी शासन में देखने में आते हैं, जोअन्यत्र कहीं नहीं दिखाई देते।

Post – 2018-12-18

और आगे अंधेरा है

चिंतक के पास वर्तमान होता है और वह भविष्य का निर्माण करता है। भविष्य एक व्यक्ति की इच्छा या उद्योग से संभव होता तो वह अपनी कामना का भविष्य बना लेता। भौतिक परिस्थितियों को विचारों से पैदा नहीं किया जा सकता। विचार उन्हीं के भीतर से पेदा होते हैं। विचारक उन्हीं के नियमों को पहचानते हुए, उन्हीं से तैयार किए गए उपकरण से उसे बदलने का प्रयत्न कर सकता है। इसी का दूसरा नाम विज्ञान है।

विचार सही था या गलत इसका निर्णय उसके अमल के बाद उसके परिणामों से होता है। इकबाल के व्याख्यानों, लेखों और वक्तव्यों के संपादक को भी पता नहीं था कि इकबाल के चिंतन का परिणाम क्या होगा। परंतु, वह मानता था और ठीक मांनता था कि Iqbal stands in the front rank of Muslim thinkers of all times and the Indian Muslims cannot at this juncture afford to ignore or lose sight of anything that the great sage has said. वह महान तत्वदर्शी थे या असाध्य मनोरोगी यह इतिहास को तय करना था, जिस पर 1944 में संपादक की नजर भी नहीं जा सकती थी, क्योंकि परीक्षण काल अभी आया नहीं था। मुस्लिम समाज जोश में अवश्य था, और इतिहास में ऐसे मौके भी आते हैं जब जोश को ही उपलब्धि मान लिया जाता है, अन्यथा कुछ बातें, तार्किक संगति या असंगति से प्रयोग से पहले ही समझी जा सकती हैं।

उदाहरण के लिए, जब इकबाल जो, अपने लेखों आदि में 71 बार हिंदुस्तानी मुसलमान का जिक्र करते हैं, और सही सरोकारों के साथ याद करते हैं, यह कहते हैं कि हिंदुस्तानी मुसलमान को अपने को हिंदुस्तानी मुसलमान नहीं कहना चाहिए, क्योंकि मुसलमान का देश नहीं होताः The expression Indian Muhammadan, however convenient it may be, is a contradiction in terms: since Islam in its essence is above all conditions of time and space. Nationality with us is a pure idea; it has no geographical basis.
तो उनको इस बात का आभास तक नहीं होता कि वह जिनको इस कथन से उत्तेजित कर रहे हैं उसे घर से बेघर बना रहे हैं, अपने देश से निर्वासित तो कर रहे हैं पर इसकी एवज में कुछ दे नहीं रहे हैं। उसे अपनी ही धरती पर भार, उसके प्रति गैरजिम्मेदार परजीवी और लिःसत्व बना रह् हैं। मुसलमान का यथार्थ से निरे खयाल में बदल जाना, देश ही नहीं काल से भी बाहर निकल जाना, जीवन है या मृत्यु। गुजर जाने का मुहावरा मरने वालों के लिए ही होता है और वही अपने समय के साथ नहीं रह पाते। कालातीत केवल प्रेत होते है जिन का आवेश जिन पर होता है, उन्हें प्रेतबाधित कहा जाता है, और उनका आचरण स्वयं उनके लिए ही सबसे अधिक अनिष्टकर होता है, दुखी दूसरे भी होते हैं। आश्चर्य होता है यह सवाल उनसे किसी ने पूछा क्यों नहीं और पूरा समुदाय उनको तत्वदर्शी मानकर उनके बताए रास्ते पर चलता रहा।

अधिकांश लोगों को इकबाल से इस बात की शिकायत है कि उन्होंने देश के विभाजन की नींव रखी। यदि इससे हिंदुओं को जो भी क्षति होती, मुसलमानों का हित होता तो मुझे कोई शिकायत न होती। उल्टे उनके प्रति सम्मान बढ़ जाता, जैसे युद्ध में या खेल में पराजित होने के बाद भी विजेता के प्रति सम्मान बना रहता है।

मुझे शिकायत इस बात की है कि उन्होंने मुसलमानों के बारे में सोचना आरंभ किया, उनके अच्छे भविष्य की रूप रेखा तैयार करते रहे, परंतु उसके जो परिणाम आए वे सबसे अधिक मुसलमानों के लिए अनिष्टकर रहे और उनके संरक्षण में हिंदुओं को उत्पीड़ित होना पड़ा। वह देश के विभाजन के जनक ही नहीं रहे, उन्होंने मुसलमानों के स्वाभिमान को जगाते हुए उनकी भावनाओं को उग्र करते हुए जिस अंधी गली की ओर मोड़ दिया उससे बाहर निकलने का रास्ता वे तलाश भी करना चाहें, तो कर नहीं सकते। वर्तमान जितना भी कष्टकर, भविष्य जितना भी निराशाजनक हो, इतिहास में पीछे लौटने की गुंजाइश नहीं होती। पीछे लौटने पर भी कोई जगह है ही नहीं।

मैं हिंदू होने के नाते इस्लाम के इतिहास पर न तो बहुत सही ढंग से सोच सकता हूं, न ही, यदि मेरे विचार सही हों तो भी, कोई मुसलमान उन्हें सही मान सकता है और यदि सभी हिंदू सही मान लें तो भी आत्मविश्वास नहीं पैदा हो सकता। प्रश्न पाले का है ही नहीं, प्रश्न तार्किक संगति का है। इकबाल मानवीयता की बात करते हैं, और इंसानों की बड़ी बिरादरी से कटकर मुसलमानों के बीच मानवता तलाशते हैं, भारत के दूसरे लोग उनको नजर ही नहीं आते। उनके निम्न टिप्पणियों पर ध्यान देंः

Does the Indian Muslim possess a strong will in a strong body? Has he got the will to live? Has he got sufficient strength of character to oppose those forces which tend to disintegrate the social organism to which he belongs? 71

The life-force of the Indian Muhammadan, however, has become woefully enfeebled. The decay of the religious spirit, combined with other causes of a political nature over which he had no control, has developed in him a habit of self-dwarfing, a sense of dependence and, above all, that laziness of spirit which an enervated people call by the dignified name of ‘contentment’ in order to conceal their own enfeeblement. 71

Truly economic dependence is the prolific mother of all the various forms of vice. Even the vices of the Indian Muhammadan indicate the weakness of life-force in him. Physically too he has undergone dreadful deterioration. If one sees the pale, faded faces of Muhammadan boys in schools and colleges, one will find the painful verification of my statement. Power, energy, force, strength, yes physical strength, is the law of life. 72
पराधीनता और आर्थिक दुर्गति से क्या भारत के सभी निवासियों की यही स्थिति नहीं थी। वह समूचे भारतीय समाज में इसकी चेतना पैदा करने की जगह केवल मुसलमानों में पैदा करना चाहते थे, और फिर भी मानवीयता की बात करते थे। असलियत यह है कि वह आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं का समाधान उन क्षेत्र में न करके, धर्म के क्षेत्र में करना चाहते थे। कवि के 100 खून माफ होते हैं, वह तुक में अपनी बात करता है, महाकवि के हजार खून माफ किए जा सकते हैं, लेकिन उसके किए का फल तो हमें ही भोगना पड़ता है और भोगना पड़ा है।

मुसलमानों में एकता कायम करने के लिए उन्होंने जिस नए मुसलमान की बात की थी, वह गढ़ने और जोड़ने से अधिक, उन्हें तोड़ने, अभी जो कुछ है वैसा न रहने देने का संकल्प है। हम अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए मुसलमानों के एक शुद्धतावादी समुदाय अहमदिया को ले सकते हैं। एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए उनके सामने जो चुनौती थी वह इसमेंकिस रूप में प्रकट होती हैः
Personally, I became suspicious of the movement when the claim of a new

Prophethood, superior even to the Prophethood of the Founder of Islam, was definitely put forward, and the Muslim world was declared Kafir. Later my suspicions developed into a positive revolt when I heard with my own ears an adherent of the movement mentioning the Holy Prophet of Islam in a most disparaging language. Not by their roots but by their fruits will you know them.

हम उनकी सलाह मानते हुए इसीलिए उनके परिणामों से आंकना चाहते हैं। यदि इनके विचारों में परिवर्तन लाकर मुसलमानों के बीच, उन्हें एक रास्ता बनाने के लिए, एकता लाई जा सकती थी या इस दिशा में कोई कोशिश या नतीजा दिखाई देता तो मेरे मन में, एक चिंतक के रूप में, इकबाल के प्रति सम्मान पैदा होता । अहमदिया हों, या कादियानी, या शिया सुन्नी विभेद, उलकी कविता के दौर के इतने साल बाद भी तनाव में कहीं कोई कमी नहीं आई । इस्लामिक मानवीयता की इक़बाली योजना में हिंदू से मुसलमान हुए और फिर भी हिंदू समाज से कुछ नाते रिश्ते रखने वालों को अधिक कट्टर मुसलमान अवश्य बनाया गया। पहले के सद्भभाव को कम भेद को अधिक पुख्ता बनाया गया और फिर भी इकबाल को कोई नहीं कहेगा कि वह तबलीग के समर्थक, तालिबान के जन्मदाता और मुस्लिम समाज में असहिष्णुता बढ़ावा देते हैं।

एक वाक्य में कहें तो वह भारतीय समाज को और भारतीय भूभाग को बांटने में तो समर्थक हुए ही, मुसलमानों को पहले से अधिक बांटने का अपराध उन्हीं के सिर आता है।

मुसलमानों की अपनी समझ से उनके हिस्से में एक बड़ा भाग आ गया और जो बचा था उसमें बचे भी रह गए परंतु इंसान के रूप में उनको बचाने के लिए भारत की ही जरूरत थी जहां सभी मतों के मुसलमान सुरक्षित हैं जबकि उनके सपने के विश्वव्यापी इस्लाम में एक को छोड़ किसी दूसरे मुसलमान के लिए जगह नहीं है। पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमान हैं मुसलमान नहीं माने जाते,
“But why did they declare you non Muslim? What were the pressures on them?”
“ you must ask Benazir Bhutto. Benazir will tell you why her father declared us non Muslims. he was very friendly with us and then he went and did that.” Mr. Sherwani, to V.S. Naipaul, Among the Believers, p.108

ईरान में सुन्नी और सुन्नी देशों में शिया मुसलमान नहीं माने जाते। कुर्दों को सुन्नी और शिया दोनों मिटाने पर आमादा हैं। अनीश्वरवादियों के लिए किसी मुस्लिम देश में जगह नहीं है। परंतु कड़वे और कषैले अनुभव के बाद भी भारत में सबके लिए जगह है। बिखरों को जोड़कर रखने की क्षमता, जिसे राष्ट्रीयता कहते हैं केवल भारत में भारतीय समाज के कारण है, हिंदुओं के कारण है। जिस उदार देशहीन राष्ट्रीयता की कल्पना पश्चिमी समाज नहीं कर पाता उस की संभावना ही नहीं उसका जीवन्त प्रमाण भारत में है जिससे पश्चिमी जगत ने भी कुछ सीखा है अन्यथा उनके सनकी राष्ट्रवाद और पवित्र ईसाइयत में संकटग्रस्त मुसलमानों को शरणार्थी बना कर रखने को भी दूसरा कोई देश भारत के संपर्क में आने से पहले तैयार नहीं होता।

इकबाल ने मुसलमानों को बेहतर मुसलमान बनाने की जगह कृतघ्न बनाया और ठीक उस मुकाम पर जब खनिज तेल से अर्जित संपन्नता से स्वयं को और दुनिया को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने की भूमिका निभा सकते थे, ऐसे जज्बाती मसीहाओं के हाथ में पड़ कर वह नई दासता का शिकार हो गया। दूसरे देशों में पिछड़ापन था भारत के मुसलमान अपनी संख्या और संस्कृति के बल पर उनको नई दिशा दिखा सकते थे परंतु, अपने कार्य भार को निभा नहीं सके।

Post – 2018-12-17

राष्ट्रीयता और मजहबपरस्ती

बिना पर्याप्त जानकारी और अधिकार के मुझे इस चक्करदार समस्या से उलझना नहीं चाहिए। परंतु, मुझे या भ्रम है कि मेरे पास कुछ ऐसी जानकारियां हैं, जिनका इन विषयों पर चर्चा करते हुए कभी उपयोग नहीं किया गया है, इसलिए एक ऐसे समय में जब देश, राष्ट्र, और राष्ट्रवाद पर नितांत बचकानी बातें की जा रही हों, और लोगों को यह भी पता न हो कि इस बचकानेपन का स्रोत क्या है, और इसके बावजूद उनको सुपठित और बुद्धिमान मानकर लोग उनके प्रभाव में आ जाते हो, चुप रहना भी उनके अपराध में सहयोग करना है। केवल और केवल इस नाते मुझे इसमें हस्तक्षेप करने की आवश्यकता अनुभव हुई। इसका आरंभ अल्लामा इकबाल ने किया था, इसलिए उन पर चर्चा करते हुए, अपनी असहमति प्रकट करना जरूरी लगा।

रघुवीर सहाय ने जो भी सोच कर कहा हो, सुकवि की मुश्किल को कौन समझे, सुकवि की मुश्किल, सुकवि की मुश्किल। मेरी समझ से सुकवि की मुश्किल यह है कि वह अपनी कविता पर, प्रभावशाली उदगार पर, इतना भरोसा करता है कि उसे लगता है कि वह यथार्थ को समझे बिना भी उसे अपने शब्दों की ताकत से बदल सकता है।

विश्वास नया नहीं है। हमारे यहां तो प्रभावोत्पादक छंदबद्ध और मनोयोग पूर्वक पढ़ी गई रचना को युगांतर कारी प्रभाव से युक्त माना जाता रहा है, जो निष्फल जा ही नहीं सकती। आधुनिक युग में यह जितने सटीक रूप में अल्लामा इकबाल पर घटित होता है किसी अन्य पर नहीं।

सुकवि की मुश्किल का कारण यह है कि वह वस्तु को भाव में बदल देता है, फिर भावगत परिवर्तन करके उसको दुबारा वस्तुजगत पर घटित मान लेता है। मनचाहा प्रभाव पैदा करने के लिए थोड़ी घालमेल भी कर लेता है, भावना के स्तर पर इसे हेराफेरी तक नहीं माना जाता, फिर भी इसका परिणाम तो भुगतना ही पड़ता है।

मुसलमानों को एक अलग राष्ट्र सिद्ध करने के लिए इकबाल ने जो तर्क दिया था उसमें इससे काम लिया गया था । इससे भी पहले जब सर सैयद ने दो कौमों की बात की थी उसमें भी घालमेल था। मजहब नश्ल नहीं हो सकता, रेस की धारणा मजहब से अलग है। दोनों में कोई मेल नहीं। परंतु राजनीतिक परिभाषाओं में बुद्धि काम नहीं करती, लाठी काम करती है, जिसकी लाठी उसकी भैंस। और लाठी का मतलब होता है, जिसको राज्य या सत्ता का समर्थन प्राप्त है, उसके हाथ का तिनका भी लाठी की ताकत रखता है और मान्य हो जाता है। जो लाभ सर सैयद को मिला था वही लाभ अल्लामा इकबाल को भी मिलना ही था, क्योंकि किसी भी बहाने से सामुदायिक भेद और विद्वेष तिनके को लाठी बनाने वाले की जरूरत थी।

हमारी शिकायत यह है कि जिस फ्रेंच दार्शनिक रैनाँ के बहुचर्चित व्याख्यान के एक अंश को उन्होंने मुस्लिम राष्ट्रवाद का आधार बनाया था, उन्होंने उसमें व्यक्त भावना का भी उल्लंघन किया था।

राष्ट्र और राष्ट्रीयता पश्चिम के लिए नई संकल्पनाएं हैं जो 19वीं शताब्दी में पैदा हुई और पैदा भी इतनी ऊर्जा लेकर हुई कि उसे संभालने की शक्ति उनके पास नहीं थी, इसलिए जितने काम की सिद्ध हुई उससे अधिक बदनाम हुई। नई उद्भावना होने के कारण इनकी व्याख्या अपनी सुविधा के अनुसार किया जाता रहा, और इसलिए जहां कुछ लोगों ने इसे बिल्कुल नई अवधारणा माना वहीं ऐसे भी लोग थे जिन्होंने इसे मानवीय इतिहास के आदिम चरण से विविध रूप लेते हुए आज तक विद्यमान सिद्ध किया।

गुरुत्वाकर्षण की ओर जिस दिन हमारा ध्यान गया उसी दिन वह पैदा नहीं हुआ। वह था, उसके परिणाम से हम प्रभावित थे, उसका उपयोग करते थे, परंतु इस नाम से न पहचानते थे, न पुकारते थे।

भारत के लिए यह शब्द भी बहुत पुराना है और इसकी भावना भी उतनी पुरानी है। भावना है समग्र की शक्ति का एक दिशा में उपयोग। प्राचीनतम रूप है, एक दल के रूप में विचारने वाले समूह। और इनको जोड़ने वाली ताकत है एक भाषा। ऋग्वेद मैं एक साथ चलने वालों को जोड़कर रखने वाली जमीन नहीं थी, उनका धर्म भी नहीं था, थी एक भाषा – अहं राष्ट्री संगगनी वसूनां मैं संदर्भ कुछ आगे का है, परंतु है भाषा के महत्व पर।

वृत्र से सुरक्षा प्रदान करने के लिए इंद्र को विश के द्वारा अधिपति चुनने का उल्लेख बाद का है। समय-समय पर कुछ बदलते हुए इसने अनेक प्रादेशिक और आंचलिक देशों को जोड़ने वाली संकल्पना के रूप में स्थान पाया और फिर यह छोटी इकाइयों वाले देशों के ऊपर एक विराट देश की कल्पना को जन्म देकर उसका पर्याय बन कर प्रयोग में आता रहा। इसमें जोड़ने का भाव था, किसी से शत्रुभाव न था।

हमारे लिए यह संतोष की बात यह है कि यूरोप की राष्ट्र की परिभाषा भी जोड़ने वाली ताकत के रूप में अलग अलग रूपों में परिभाषित होती रही। इन्हीं में से एक का उपयोग करते हुए इकबाल ने मुस्लिम राष्ट्रवाद की संभावना को प्रकट किया, परंतु यह भी स्वीकार किया यह एक चुनौती भरा काम है। इसके लिए असाधारण प्रयत्न की आवश्यकता है। अर्थात उसे पैदा करना है। और इसे पैदा करने के लिए वह भावना की जमीन पर किसानी करते रहे।

मोटे तौर पर हम राष्ट्रीयता की जिस परिभाषा से परिचित हैं उसमें इस भावना को पैदा करने के लिए मजहब, सजातीयता, भाषा और भौगोलिक क्षेत्र या देश का एक होना जरूरी था। अपनी सुविधा के अनुसार इनमें से कुछ को छोड़ दिया जाता था और नया तत्व जोड़ लिया जाता था। छोड़ने का परिचय रेनां की परिभाषा में मिलता है, जिसमें देश ही गायब कर दिया जाता है और जोड़ने वाले समान दुश्मन को भी जोड़ लेते हैं।

यह बात ध्यान देने की है कि राष्ट्र और राष्ट्रीयता की परिभाषा बदलने में पत्रकारों और आंदोलनकारियों की भूमिका अधिक प्रधान रही है और इसलिए उन्होंने अपनी क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार परिभाषा को बदला है।
फ्रेंच दार्शनिक अर्न्स्ट रेनां ने 1882 में अपने एक भाषण में (‘What is a Nation? delivered at the University of Sorbonne) राष्ट्रीयता की अर्थात् बहुत बड़े समुदाय की समग्र भावनाओं को एकदिश करने में देश या अंचल की भूमिका को अनिवार्य न मानते हुए यह भी संकेत किया था की राष्ट्रवाद एक तरह की गुलामी है जिसके लिए दूसरे तरीके अपनाए जा सकते हैं। परंतु इसके उदात्त पक्ष को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा थाः
A nation is the culmination of a long past of endeavours, sacrifice and devotion. A heroic past, great men, glory, that is the social capital upon which one bases a national idea. To have common glories in the past, to have a common will in the present, to have performed great deeds together, to wish to perform still more, these are the essential conditions of being a people. A nation is therefore a large-scale solidarity.

अल्लामा इकबाल इसे ही गोल कर गए थे। इसकी पूर्ति उस राष्ट्रीयता से ही होती थी या हो सकती थी जिसे कांग्रेस ने अपनाया था और जिससे अल्लामा इकबाल मुसलमानों को दूर ले जाना चाहते थे। मुसलमानों को ऐसा ही फिलॉस्फर मिलना था। भावना भड़काने की क्षमता वहां वैचारिक उत्कर्ष कैसे बन जाती है इसे न मुस्लिम समाज को समझाया जा सकता है न वे इसे समझने की जरूरत समझते हैं। यह हमारी जरूरत है कि हम किसी को दबाव से मुक्त हो कर पढ़ें और यह तय करना है कि इन गलतियों का इलाज तलाश करें।

Post – 2018-12-16

मुस्लिम राष्ट्र

इकबाल की आलोचना करते हुए हम उन्हें अच्छा या बुरा सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं। यही बात दूसरे नेताओं के साथ भी है। हमारे लिए उनका केवल वह पक्ष महत्वपूर्ण है जिससे इतिहास बनता है। व्यक्ति वही है, उसमें जिन परिस्थितियों में जो परिवर्तन होता है वह हमें किस रूप में प्रभावित करता है हमारे समाज को उससे क्या सही या गलत दिशा मिलती है, यही हमारे उपयोग का है। जिस समय अंग्रेजों के प्रयत्न से बंगाल में समाज को बांटने की कोशिश की जा रही थी और मुस्लिम लीग की स्थापना कराई जा रही थी, उस समय देश के लिए इसे खतरा मानते हुए वतन की फिक्र करने की अपील करने वाले सबसे मुखर कवि इकबाल ही प्रतीत होते हैं-
वतन की फिक्र कर नादां मुसीबत आने वाली है
तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में,
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्तां वालो
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।

इतिहास की यह कैसी विडंबना है कि वही कवि जिस सुदूर खतरे को भांप कर उससे बचने की चेतावनी दे रहा था, वही उसका समर्थक बना। जिस इंग्लैंड के कड़वे अनुभवों के साथ, पश्चिमी सभ्यता के प्रति मन में नफरत पाल कर, वह लौटा था, उसी की योजनाओं के अनुसार आगे काम भी करता रहा और अंत में तो उससे मदद की उम्मीद भी लगाए रहा। वह क़यामत जिससे बचने के लिए वह अपने समाज को आगाह करता रहा, वह सचमुच क़यामत बन कर ही आई। इसलिए हमें व्यक्तियों और समुदायों के चरित्र में आए बदलाव पर ध्यान देना चाहिए, न कि उनको अच्छा या बुरा सिद्ध करने पर।

इकबाल से पहले सर सैयद दो कौमों की बात करते थे, जिसको अंग्रेजी अनुवाद करने वालों ने नेशन बना दिया। इसकी बात पहली बार इकबाल ने इंग्लैंड से लौटने के बाद की ।

अंग्रेज मुस्लिम नेताओं के साथ पेश आते हुए एक ओर तो उनको बहुत आत्मीयता से जलील करते हुए समझाते कि तुम कुछ नहीं हो (देखें हंटर). अपही पिछली करतूतों के कारण, लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसका फल तुम्हे भुगतला पड़ेगा. लोकतंत्र में राज उनका होगा। इनकी प्रतिहिंसा से हम तुम्हें बचा सकते हैं और तुम्हारी मदद कर सकते हैं । हमारे अलावा तुम्हारा कोई रखवाला नहीं है।

इकबाल के मन में भी वही भाव पैदा करते हुए राष्ट्र के मामले में यह समझाया था कि भारत में न तो हिंदू मुस्लिम मिलकर एक राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं क्योंकि जातीयता का एक होना धर्म का एक होना राष्ट्रीयता की मांग है, न ही मुसलमान अपने तईं राष्ट्र हो सकते हैं क्योंकि उनका अपना कोई अलग देश नहीं है, पूरे भारत में हुए हैं, बिखरे हुए हैं, जहां हिंदू बहुमत में हैं । इसलिए मुसलमानों को एक ऐसी कौम मानते हुए जिसका हिंदुओं से भाईचारा निभ ही नहीं सकता, हिंदुओं के प्रति उनके मन में नफरत भरी थी और अलग रास्ता अपनाने के लिए उकसाया था। इसे मानते हुए ही इकबाल ने मिल्लत का तराना लिखा था, मुस्लिम राष्ट्र का नहीं।

अंग्रेजों का का यह अहंकार कि राष्ट्र यूरोप में ही हो सकते हैं उनके मन में कचोट पैदा करता रहा और वह इस प्रयत्न में लगे रहे किसी न किसी तरह यह साबित कर सकें कि मुसलमान एक अलग राष्ट्र हैं। इस ऊहापोह में उन्होंने जो अध्ययन किया उसमें रेनन नाम के एक दार्शनिक से एक नई दृष्टि मिल गई। रेनन का मानना था कि राष्ट्रीयता के लिए भौगोलिक इकाई की जरूरत नहीं है जातीय एकता इसके लिए पर्याप्त है। उनके मंतव्य को इकबाल ने जिस रूप में प्रस्तुत किया, वह इस तरह हैः
“Man,” says Renan, “is enslaved neither by his race, nor by his religion, nor by the course of rivers, nor by the direction of mountain ranges. A great aggregation of men, sane of mind and warm of heart, creates a moral consciousness which is called a nation.”
मुसलमानों के मामले में “इस तरह की संरचना बिल्कुल संभव है परंतु यह एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है जिसमें लोगों को नए जज्बे से लैस करके उन्हें एक नए इंसान के रूप में ढालना होगा। ”
Such a formation is quite possible, though it involves the long and arduous process of practically re-making men and furnishing them with a fresh emotional equipment.

उन्हें इस रूप में ढालने का काम उन्हें ही करना था। काम आदत बदलने का था, मौज-मस्ती (मुसलमानों की फिक्र करने वालों को अमीरों की जबान, मिजाज की ही याद इसलिए आती है कि आम आदमी के स्तर पर हिंदू मुसलमान में कोई खास भेद नहीं रह जाता) के अनुपात गिरावट की ओर बढ़ते समाज को उठाने की जिम्मेदारी सभी नहीं संभाल सकतेः
नशा पिला के गिराना ता सबको आता है
मजा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी।

यह साकी इकबाल खुद बनना चाहते थे और चाहते थे कि उनका अय्याशी में डूबा हुआ समाज अध्यवसाय और नई ऊर्जा से लबरेज हो, नई ऊंचाइयों को छूने के लिए मुश्किलों से रूबरू होना सीखे और जैसे पश्चिमी लोगों ने खतरे मोल लेते हुए हर एक क्षेत्र में नए कीर्तिमान रखे हैं, वैसा ही करें।
नहीं तेरा बसेरा क़स्रे सुल्तानी के गुंबद पर
तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में।

इसी मनो भूमि पर उनके कई और शेर हैंः
तू बाजी है परवाज है काम तेरा
तेरे सामने आसमा और भी हैं।

ऐसी पंक्तियों को यदि उनके समग्र चिंता जगत को दरकिनार करके पढ़ें, केवल भारतीय संदर्भ में रख कर पढ़ें तो इनके दूसरे अर्थ लिए जा सकते हैं, और पश्चिमी जगत के उत्थान में अरबों की भूमिका को याद करते हुए आज की तोहीन को महसूस करने वाले कवि के रूप में देखें और उनसे भी आगे बढ़ने की चुनौती को सामने रखें तो इसका अर्थ उससे हट कर एक व्यापक चुनौती का रूप ले लेता है। जो भी हो उस दौर में मुस्लिम समाज को देखते हुए परिणाम निराशा जनक ही थे परंतु इकबाल अपना प्रयत्न छोड़ने वाले नहीं थेः
नहीं है नाउमीद इक़बाल अपनी किश्ते वीरां से
ज़रा नम हो तो यह मिट्टी बहुत ज़रखेज़ है साक़ी।

उनकी ऐसी पंक्तियां जिनमें वह मुसलमानों में नया जोश पैदा करने की कोशिश करते दिखाई देते हैं, उन्हें हिंसा के लिए उकसाने वाला समझा जा सकता है। मैं उनको कुछ अधिक जानने से पहले ऐसी पंक्तियों का यही अर्थ लगाया करता थाः
मोहब्बत का जुनूँ बाकी नहीं है
मुसलमानों में खूँ कि नहीं।
अभी बाकी हैं मिस्रो रोमो चीना
सभी बाकी हैं तू बाकी नहीं है
इस उद्धरण में तीसरी पंक्ति में कुछ गलती हो सकती है परंतु तात्पर्य स्पष्ट है, आज कोई अरब संस्कृति का नाम लेने वाला भी नहीं रह गया। मुसलमान ऐयाशी में डूबे हुए हैं।
Does the Indian Muslim possess a strong will in a strong body? Has he got the will to live? Has he got sufficient strength of character to oppose those forces which tend to disintegrate the social organism to which he belongs? I regret to answer my questions in the negative. The reader will understand that in the great struggle for existence it is not principally number which makes a social organism survive. Character is the ultimate equipment of man, not only in his efforts against a hostile natural environment but also in his contest with kindred competitors after a fuller, richer, ampler life. The life-force of the Indian Muhammadan, however, has become woefully enfeebled. The decay of the religious spirit, combined with other causes of a political nature over which he had no control, has developed in him a habit of self-dwarfing, a sense of dependence and, above all, that laziness of spirit which an enervated people call by the dignified name of ‘contentment’ in order to conceal their own enfeeblement. 107
या

The Indian Muslim has long ceased to explore the depths of his own inner life. The result is that he has ceased to live in the full glow and colour of life, and is consequently in danger of an unmanly compromise with forces which, he is made to think, he cannot vanquish in open conflict. He who desires to change an unfavourable environment must undergo a complete transformation of his inner being. 45

परंतु व्यंग्य देखिए, जो कभी भारतीय राष्ट्रीयता के साथ जुड़कर जिन संस्कृतियों को समाप्त मानता था, कहता था दूसरे सभी मिट गए सिर्फ हमारा नाम-ओ-निशां बचा हुआ है अपनी अलग राष्ट्रीयता की तलाश में उसने पाया की सभी बचे हुए हैं खुद वह कहीं नहीं है। जो भी हो, राष्ट्रीयता की इसी तलब में इकबाल ने हिंदुस्तान के मुसलमानों को अपनी अलग राष्ट्रीयता का दावा करने का समर्थन कियाः
Sir Fazl-i-Husain’s advice to Indian Muslims to stand on their own legs as an Indian nation is perfectly sound and I have no doubt that Muslims fully understand and appreciate it. Indian Muslims, who happen to be a more numerous people than the Muslims of all other Asiatic countries put together, ought to consider themselves the greatest asset of Islam and should sink in their own deeper self like other Muslim nations of Asia in order to gather up their scattered sources of life and, according to Sir Fazli’s advice, “stand on their own legs.”

और यहीं से आरंभ होता है मुसलमान का अपने घर से बेघर होते हुए भी सारी दुनिया का बनने का सपना जिसे पैन इस्लामियत कहा गया।
इस बेतुके प्रस्ताव का एक ही जवाब है अगर सारा जहां तुम्हारा है तो फिर हिंदुस्तान में मुसलमानों के एक अलग देश की जरूरत क्यों ?

हम यह नहीं कहते कि जिस तरह की दहशत ब्रिटिश कूटनीति ने मुसलमानों के मन में भर दी थी और जिस तरह मुसलमानों के सेंटीमेंट का इस्तेमाल करते रहे उसमें एक अलग देश की मांग गलत थी। दिमाग की उस बदहवासी में कुछ भी जायज था। माइनॉरिटी सिंड्रोम के कारण सहवासी की जगह सहद्वेषी की जो भावना भरी गई थी उसमें अलग क्षेत्र की मांग भी तर्क के लिए मानी जा सकती है, परंतु यह नहीं माना जा सकता कि तुम्हारी राष्ट्रीयता देश और भूमि से ऊपर है और फिर भी तुमको एक अलग देश और भूमि चाहिए। मुसलमानों में दबाए जाने का भय उनके मन में पलने वाली हिंदुओं को दबाकर रखने की लालसा का दूसरा नाम था। भय उस लालसा के पूरा न हो पाने से पैदा होता था जो आज भी बना हुआ है न कि इस कारण कि हिंदू अपने प्रति अपकार का बदला लेंगे।

Post – 2018-12-15

न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्ताँ वालों

इकबाल की दार्शनिकता का प्रेरक वह उपहास था, जिसे अपनी ओर से भारतीय धर्म संस्कृति और समाज की बात करते हुए उन्हें अंग्रेजों से झेलना पड़ा था। हम इसके ब्यौरे में न जाकर केवल इतना ही कहना चाहेंगे उन्हें जिन प्रश्नों का जवाब देते न बनता था,या जो जवाब देते थे उसे भी वे हंसकर उड़ा देते थे, वे भारतीयता राष्ट्रीयता और धर्म को लेकर थे। इसका उन्होंने अलग से उल्लेख नहीं किया है, परंतु यह उनके लेखन से ही स्पष्ट।

उनकी पहली आपत्ति भारतीय राष्ट्रीयता को लेकर थी। वे राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयभावना के बीच में फर्क नहीं करते थे, क्योंकि दोनों ही रूपों में भारतीय राष्ट्रीयता उनके शासन के लिए खतरे की घंटी थी। राष्ट्रीय भावना का स्रोत था विविधता में एकता। अंग्रेजी कूटनीति का प्रयत्न था, विविधता को विघटनकारी बनाना। अपने उदाहरणों से यह दिखाना कि राष्ट्रवाद तो, जाति भाषा क्षेत्र और धर्म के एक हुए बिना संभव ही नहीं है। भारत में हिंदू समाज में जहां वर्ण व्यवस्था है, ऊंच-नीच का भेद है, जहां हिंदू और मुसलमान दो कौमें बसती हैं, इनमें भाई चारा नहीं है, राष्ट्र की बात करना हास्यास्पद तो है ही।

कांग्रेस, जिस की स्थापना और नामकरण एक अंग्रेज ने किया था, अब अपने नाम को बदल नहीं सकती थी, सहयोग के बिना स्वतंत्रता आंदोलन अपनी प्राण शक्ति खो देती थी। इसी में विविधता में एकता की चेतना, जो धर्म, भाषा जाति और क्षेत्र की भिन्नताओं के बावजूद हजारों वर्षों से बनी चली आ रही थी, उसका उपयोग करते हुए कांग्रेस सब को एक सूत्र में बांधना चाहती थी। और उसी भावना का आदर करते हुए इकबाल ने वह तराना लिखा था जिसमें भारत विविध रंगो के फूलों वाला गुलिस्तान, और भारतीय उसमें अपने-अपने गीत गाने वाले पक्षियों जैसे दिखाए गए। अंग्रेजों से बहस करते हुए, उपहास सहते हुए, इकबाल का विश्वास डगमगा गया था। इस दौर में कौमी जुनून जिस तरह उभारा गया था, उसका बी परिणाम था लौटने के साथ ही उसे डिसओन करते हुए उसी तर्ज पर मिल्ली तराना लिखना। इसके बाद किसी को इसे जबान पर लाना ही नहीं चापिए था, परन्तु मेलमिलाप के फरेब रचे जाते रहे उसमें किसी को यह समझाना तक संभव नहीं कि इस गीत को कवि द्वारा ही वापस ले लिया गया था। राष्ट्रगान के साथ यदि उपराष्ट्रगान की जरूरत है ही तो वंदे मातरम गाओ, भारति जय विजय करे गाओ पर उस बेचारे को तो माफ करो, तो किसी की समझ में नहीं आएगा।

उनके साथ अब समस्या अपनी अस्मिता की खोज की थी , यह कि यदि हिंदुस्तान राष्ट्र नहीं तो उनका अपना राष्ट्र क्या है? यह उनकी निजी खोज हो, या बहस में सुझाया गया विचार हो, या उनकी उस मुकाम पर वापसी हो, जहां सर सैयद अहमद खान दो कौमों की बात करते हुए हिंदुओं से अलग मुसलमानों की कौमी एकता की बात करते थे।

हमें ऐसा लगता है कि सर सैयद अहमद खान और इकबाल दोनों के मन में यह बात अंग्रेजों ने भरी थी, क्योंकि सर सैयद ने हिंदुओं की राष्ट्रीय एकता पर जो सवाल खड़े किए वे सवाल इकबाल के दिमाग में भी उतारे गए थे। अंतर केवल एक था, सर सैयद ने इसे समग्र भारत की भौगोलिक एकता को नकारते हुए बंगाल महाराष्ट्र और मद्रास के ब्राह्मणों को अलग अलग राष्ट्र माना था, जबकि इकबाल इसके पीछे वर्ण व्यवस्था की भेद रेखाओं को मुख्य कारण मानते थे।

हिंदुओं के पास देश था, धर्म और पौराणिक विरासत की संस्कृत भाषा में सब की निष्ठा थी, अतः इनकी राष्ट्रीयता को खंडित करने वाली एक ही मजबूत विभाजन रेखा वर्णों के आधार पर थी जिस में खानपान विवाह का निषेध था। इसे इकबाल पूरी तल्खी से महसूम करते थे, इसलिए इसका कायल करने के लिए एक संकेत ही पर्याप्त था।

इसका परिणाम था उस देश से ही उनका मोहभंग जिसमें एक मनुष्य दूसरे का स्पर्श करने से भी इंकार करता है। ऐसे अपमान के शिकार केवल हिंदू समाज के अस्पृश्य ही नहीं थे, शासक होते हुए भी स्वयं अंग्रेज थे। शासन कर चुके, ऊंची जातियों में रह चुके, मुसलमानों को भी इस अपमान को सहना पड़ता था, इसलिए वे इसे जिस तल्खी से महसूस करते इससे कितनी घृणा करते थे यह समझ पाना सवर्ण हिंदुओं के लिए संभव ही नहीं।

इकबाल को हमने मनोभग्नता का शिकार अपने मन को कड़ा करके ही लिखा था। उनकी आंतरिक व्यग्रता का अनुमान करते हुए। वह मानवीय थे, ईमानदार थे, साहसी थे। जो सही लगा उसे कहने के खतरे उठाने को तैयार। पर खतरे आकर ही हम जैसों को यह समझा पाते हैं कि किसी व्यक्ति ने खतरा उठाया था।

वह हिंदुओं को काफिर नहीं मानते थे, और इस कारण कट्टर मुसलमान उनको काफिरों के नजदीक मानते थे और उनका मजाक उड़ाया करते थे । इसी मजाक में किसी ने तंज कसा थाः
सुनता हूं कि काफिर नहीं हिन्दू को समझता
है ऐसा अकीदा असर-ए-फलसफा दानी।

जब गौतम बुद्ध, कृष्ण, राम पर लिखा था और राम को एक मुसलमान की पूरी जिम्मेदारी निभाते हुए ईश्वर का अवतार नहीं, पैगंबर भी नहीं, मात्र इमाम कहा थाः
है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज
अहले नजर समझते हैं उसको इमाम-ए-हिन्द
तो कट्टरपंथियों ने उन्हें काफिर कहना शुरू कर दिया जिसका जवाब उन्होंने उसी दृढ़ता से दिया थाः
जाहिद-ए-तंग नजर ने मुझे काफिर जाना
और काफिर ये समझता है मुसलमान हूं मैं।

इसलिए जब इंग्लैंड प्रवास के दौरान उन्हें जाति व्यवस्था की क्रूरता का तीव्रता से बोध हुआ तो उन्होंने अपनी स्वाभाविक तड़प के साथ की वेदना को व्यक्त करते हुए लिखा
आह! शूद्र के लिए हिन्दोस्तां गम-खाना है
दर्द-ए-इंसानी से इस बस्ती का दिल बेगाना है।
और संभवतः इसी प्रसंग में अपनी व्यथा को उससे भी प्रखर रूप में व्यक्त करते हुए लिखा
करदे फकत इशारा अगर शाहे खुरासान
सजदा न करूं हिंद की नापाक जमीन पर।

हिंदुओं में भी अपनी कठोर आलोचना झेलने की ताकत होनी चाहिए अन्यथा मुसलमानों को बंद दिमाग का बंदा कहने का उनका कोई अधिकार नहीं है।

हम विषय से भटक गए। बात मुसलमानों के लिए अस्मिता की खोज और इस्लाम को लेकर पश्चिमी जगत में जो धारणाएं, प्रचलित हैं, जैसे कि यह हिंसा पर पलने वाला मजहब है, इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए जगह नहीं है, इसमें गुलामी मानसिकता भरी हुई है, यह हिंदुओं से अलग एक कौम तो है, पर राष्ट्र नहीं है। इस्लाम सबसे ज्यादा पिछड़ा मजहब है जिसम जिसमें ज्ञान, विज्ञान, कला, सौंदर्यबोध और मानवीयता के लिए जगह नहीं है। ऐसे अनेक सवाल थे जिनका जख्म लेकर वह इंग्लैंड से लौटे थे और जिनका जवाब तलाशने में लंबा समय लगाया था। इसी के कारण वह कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन का सबसे कीमती समय इस्लाम के अध्ययन में लगाया है, परंतु यह अपनी मान्यताओं को सही ठहराने की कोशिश से आगे नहीं बढ़ पाता।

Post – 2018-12-14

हिंदू था यह मुसलमां, क्यों भूलता नहीं है

इकबाल के व्यक्तित्व का निर्माण 19वीं शताब्दी में हुआ था। वंशागत संस्कार हिंदू थे, जिसके लिए ईश्वर सर्वत्र विद्यमान होता है। ईश्वर के बाद धर्म की सर्वव्यापकता आती थी। हिंदू समाज में धर्म विश्वास नहीं है, निसर्गजात गुण और नैतिक विधान है इसलिए कर्तव्य बोध से जुड़ता है। इस्लाम में मजहब की ठीक वही व्याख्या नहीं मिलती जो हमारे यहां धर्म की मिलती है। उसका खुदा भी सर्वव्याप्त नहीं है, अपनी सृष्टि से ऊपर, दूर कहीं किसी सातवें आसमान पर विराजमान है। अपने ही रचे संसार से उसका संबंध फरिश्तों के माध्यम से होता है और उसकी इच्छा का पालन इसी निमित्त पैदा हुए या पैदा किए गए इंसान के माध्यम से होता है जो अपनी अंतरानुभूति से और उन फरिश्तों के संदेश को सुन या देख पाता है।

यह पूरी रूपरेखा भावना और विश्वास पर टिकी है क्योंकि यह तर्क की आंच नहीं झेल सकती। उदाहरण के लिए यदि कोई पूछे यदि अल्लाह निराकार, निर्गुण और इसलिए अनिर्वाच्य है तो उसके लिए आसमान या जगह की जरूरत क्या है? किसी मुकाम की जरूरत साकार के लिए होती है। तो इसका उत्तर देना कठिन होगा।, पूछे कि जिसने कहा, ‘प्रकाश हो’ और प्रकाश हो गया, वह अपने संदेश अपने भेजे हुए प्रतिनिधि से सीधे संपर्क क्यों नहीं कर सकता? यदि उसने कहा प्रकाश हो, तो वाकतंत्र के बिना यह कहा कैसे? तो जवाब देने में परेशानी होगी। यह परेशानी अकेले इस्लाम के साथ नहीं है सभी सामी मजहबों के साथ है और किसी एक मामले में नहीं, हर निर्णायक कड़ी के साथ है, इसलिए उनमें तर्क के लिए, सोचने- विचारने के लिए अवकाश नहीं है। वे विचारधारा से नहीं विश्वासधारा से प्रचलित होते। स्वयं सोचने की जगह किताब का सहारा लेना पड़ता है। किताब से बाहर या अलग जाने की छूठ ही नहीं है। नैतिक और अनैतिक का विचार करने की गुंजाइश ही नहीं है। यदि किताब में वैसा लिखा है वह सही है, अन्यथा गलत। उचित और अनुचित, नैतिक या अनैतिक नहीं। सही या गलत, यथालिखित या उससे अलग। अलग है तो गर्हित है।

हम यह नहीं कहते कि भारतीय चिंता धारा में तर्कातीत के लिए जगह नहीं है। हमारी सीमा है कि इस समय हम इस्लाम पर बात कर रहे हैं और उसी के गुण दोष देख रहे हैं। यह याद दिला दें कि जब गार्गी याज्ञवल्क्य से ऐसा करती है जिसका उत्तर वह नहीं दे पाते हैं तो कहते हैं, अतिप्रश्न मत कर गार्गी, नहीं तो तेरा सिर फट जाएगा। विज्ञान भी, जो ईश्वर को न करता है, इस बात का जवाब नहीं दे सकता कि यदि ब्रह्मांड का विकास भूत से हुआ है तो वह भूत कहां से आया और उससे पहले क्या था। हम केवल यह कह सकते हैं कि सामी मजहबों में प्रश्न तक अतिप्रश्न बन जाता है और इसलिए मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग जो कुछ किताबों में लिखा है उसे सही सिद्ध करने में करता है।

हम इस चर्चा में इसलिए पड़ गए कि यह समझ सकें कि जिसे इकबाल का दार्शनिक योगदान माना जाता है वह हिंदुत्व के प्रभाव या सामंजस्य का परिणाम है, जिसे वह स्वयं नकारने की भी कोशिश करते हैं। इसलिए जब वह कहते हैं कि “राजनीति की जड़ें मनुष्य के आत्मिक जीवन में है और मजहब वह शक्ति है जो मनुष्य और राष्ट्र के जीवन में सर्वाधिक महत्त्व रखता है”, तो हमें वह गांधीजी के मुहावरे में बोलते प्रतीत होते हैं
“politics have their roots in the spiritual life of man,” and that “religion is a power of the utmost importance in the life of individuals as well as nations”.
परंतु वह इसका निर्वाह इसलिए नहीं कर सकते कि वह इसी से विरोध रखते हुए इस्लामी मान्यताओं को स्वीकार्य और एक ख्याल को हकीकत बनाना चाहते हैं, जिसके लिए इस्लाम में जगह ही नहीं है। नीचे लिखे वाक्यों में पर ध्यान दें। जहां किताब के सामने जिज्ञासा करने का भी अवकाश नहीं है, वहां इंडिविजुअलिटी या निजता का प्रश्न ही नहीं आता, परंतु इकबाल इसका आरोपण कर लेते हैं और निर्वाह नहीं कर पाते। नीचे के वाक्यों पर ध्यान देंः

The whole system of Islamic ethics is based on the ideal of individuality; anything which tends to repress the healthy development of individuality is quite inconsistent with the spirit of Islamic law and ethics. A Muslim is free to do anything he likes, provided he does not violate the law. The general principles of this law are believed to have been revealed; the details, in order to cover the relatively secular cases, are left to the interpretation of professional lawyers.

फिर स्वतंत्रता कहां है ? बात संस्कारों की है। जैसे हम अपने गुणसूत्रों को नहीं जानते हैं और जानें भी तो आसानी से यह नहीं समझ पाते कि हमारी आनुवंशिक व्याधियों और विशेषताओं के सूत्र पिछली पीढ़ियों में किस से जुड़े हुए हैं, उसी का तरह का रहस्य संस्कारों के साथ भी जुड़ा होता है। लिबास बदलने से आदमी नहीं मदल जाता, न ही मजहब बदलने से संस्कार बदल जाते हैं, अन्यथा हिंदुओं को धर्मांतरित मुसलमानों के इन दोषों के लिए न कोसा जाता जिन्हें हिंदुत्व की देन माना जाता है और जिसे इकबाल स्वयं भी कोसते हैंः
there are castes and sub-castes like the Hindus’. Surely we have out-Hindued the Hindu himself; we are suffering from a double caste system—the religious caste system, sectarianism, and the social caste system, which we have either learned or inherited from the Hindus.

बुराइयों की तरह ही अच्छाइयों और विचारों का भी प्रवेश हो सकता है और स्वयं इकबाल की दार्शनिकता का एक पहलू यह है। दूसरा इससे पलायन से जुड़ा है, जिसके प्रति भी वह सचेत नहीं हैं। इकबाल के सचेत होने से भी अधिक अंतर नहीं आता, क्योंकि धर्मान्तरित व्यक्ति को स्वयं उसकी मान्यताओं पर खरा उतरना होता है, वह उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। यह काम उन लोगों का था जिन्होंने इकबाल को दार्शनिक कवि माना और उनकी गहराइयों को समझने से चूक गए, अन्यथा इस समझ के माध्यम से ही भारतीय इस्लाम का एक नया चरित्र उभरता जो इस्लाम को भी नया रास्ता दिखाता और अपने ही घर में बेगाना होने से बच जाता। उसे अपने अस्तित्व के लिए किसी पराए का मुंह नहीं देखना पड़ता। पान इस्लामिज्म आत्मविश्वास की इसी कमी की क्षतिपूर्ति है।

Post – 2018-12-13

कौन लिखता है इबारत किसकी

प्रमोद जोशी ने मेरी एक भूल को दुरुस्त करते हुए बताया है कि कौमी तराने में परिवर्तन किसी अन्य ने नहीं इकबाल ने स्वयं किया था। इंग्लैंड जाने से पहले 1904 में उन्होंने वह गाना लिखा था जिसे हम कौमी तराना मानते आए हैं, लौटने के बाद 1910 में उन्होंने उसी तर्ज पर मिल्ली तराना लिखा था, जो पहले लिखे तराने की पैरोडी तो था ही, उसे भूल मानते हुए उसे वापस लेने जैसा निर्णय भी था । यह तराना विकीपीडिया पर उपलब्ध है फिर भी इसे देना जरूरी है, क्योंकि यह उनके नजरिए में बदलाव को समझने में एक कुंजी का काम करता है। उनकी बौद्धिक अपरिपक्वता को भी समझने में सहायक होता है। सबसे अधिक आम मुसलमानों के नजरिए को बदलने में इकबाल की भूमिका को भी स्पष्ट करता है। यह मात्र एक तराना नहीं था, एक राजनीतिक अभियान का हिस्सा था। इकबाल कहते जरूर हैं कि उनका राजनीति से कोई सरोकार नहीं, परंतु यह इस सीमा तक ही सही है क्वि वह किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े थे, अन्यथा वह सबसे अधिक राजनीतिक कवि हैं और इसे हटा दिया जाए तो उनकी कविता में और कुछ बचेगा ही नहीं । राजनीतिक अभियान से जुड़े होने के कारण उनमें गर्मजोशी अधिक है, वह बारूदखाने से अपनी भाषा निकालते हैं और हम जानते हैं बारूद का प्रयोग करने वालों के पास मारक क्षमता तो होती है, विवेक का अभाव होता है। जिस तराने की बात हम कर रहे हैं वह निम्न प्रकार हैः
चीनो अरब हमारा, हिंदोस्ताँ हमारा
मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहाँ हमारा।
तौहीद की अमानत सीनों में है हमारे
आसां नहीं मिटाना नोमो-निशां हमारा।
दुनिया के बुतकदों में पहला वो घर खुदा का
हम उसके पासबां हैं, वह पासबां हमारा।
तेगों के साये में हम पलकर जवां हुए हैं
खंजर हिलाल का है कौमी निशां हमारा।।
मगरिब की वादियों में गूंजी अजां हमारी
थमता न था किसी से सायल रवां हमारा ।।
बातिल से दबने वाले ऐ आसमां नहीं हम
सौ बार कर चुका है तू इम्तहां हमारा।।
ऐ गुलसिताने अंदलुस वह दिन है याद तुझको
था तेरी डालियों पर जब आशियां हमारा।।
ऐ मावजेय दजला तू पहचानती है हम को
अब तक है तेरा दरया अफसाना ख्वां हमारा।।
ऐ अर्जे पाक तेरी हुरमत पर मर मिटेंगे
है खून तेरी रग में अब तक रवां हमारा ।।
सालारे कारवां है मीरे हिजाज अपना
इस नाम से है बाकी आरामे जां हमारा।।
इकबाल का तराना बांगे दरा है गोया
होती है जादा पयमा फिर कारवां हमारा।।

इसे हम इकबाल की कविता मानें या उनकी जिन्होंने कौम की चिंता करने वाले कवि को, अपने माध्यम के रूप में इस्तेमाल करते हुए, उसकी क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए, स्वयं यह कविता लिखी। आखिर कौम की बात करने वाले, अर्थात् राष्ट्रीय मनोभूमि वाले कवि के साथ ऐसा क्या हुआ, क्यों हुआ कि उसके पांव के नीचे से जमीन खिसक गई। यह उसका चुनाव तो नहीं था, परंतु यह इंग्लैंड जाने का प्रभाव अवश्य था। पहला तराना इकबाल ने लिखा था, दूसरा तराना ब्रिटिश कूटनीति ने इकबाल का इस्तेमाल करते हुए लिखा था। दिमाग वह काम कर रहा था, जिसे उन्होंने बनाया था। इबारत वह लिखी जा रही थी जो वे लिखाना चाहते थे। जुमलों में खूंरेजी उनके द्वारा भरी जा रही थी।

मैं जानता हूं, आपको मेरा यह कथन कुछ अटपटा लग रहा होगा, परंतु यदि आपने किसी प्रेतवाधित व्यक्ति के आचरण को देखा होगा, तो, प्रेत में विश्वास करते हों या नहीं, आविष्ट व्यक्ति के आचरण को समझ सकते हैं। आवेश किसने भरा था इसे मानने में आपको कठिनाई नहीं होगी। परंतु यदि आवेश बोल रहा है तो दिमाग काम नहीं कर रहा है, यह भी मानेंगे ।

इंग्लैंड से लौटने के बाद इकबाल का सारा लेखन, कविता और चिंतन आविष्ट व्यक्ति का लेखन, कविता और चिंतन है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से मेल नहीं खाते। वह शीजोफ्रेनिक हैं, जो अपने रीयल सेल्फ और फाल्ससेल्फ में फर्क न कर पाने के कारण दोनों से टकराता हुआ लहूलुहान होता रहता है पर अपनी अस्मिता को पहचान नहीं पाता। स्वयं से सवाल करता है, मेरा वजूद मेरे दिल में या दिमाग में है, और इसका उत्तर पाए बिना मर जाता है।

Post – 2018-12-12

हिंदी का मुसलमाँ होना

सुनते हैं पाकिस्तान में हमारे ‘कौमी’ तराने की एक लाइन बदल कर उसे ‘मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा’ कर दिया गया। इस पर अल्लामा इकबाल को भी आपत्ति न होती। राष्ट्रीयता की उनकी समझ में भी यही बदलाव आया था । वह खुद भी हिंदी से मुसलमान हो गए थे। इस लाइन का बदला जाना,उन्हीं के प्रयत्न से पैदा हुई मानसिकता की अभिव्यक्ति थी।

उनकी सोच में आया यह बदलाव भारतीय राजनीति में भी एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इससे पहले आम मुसलमानों का मुस्लिम लीग के प्रति वैसा ही रुख था जैसा हिंदुओं का हिंदू महासभा के प्रति था। मोहम्मद इकबाल ब्राह्मण से मुसलमान बनने के कारण कुछ खास हैसियत तो रखते थे, परंतु रईस तबके से नहीं जुड़े थे। अतः आरंभ में इनका दृष्टिकोण राष्ट्रवादी था, बाद में इसमें इतना बदलाव आया कि संप्रदायवाद भी उनकी नजर में श्लाघ्य हो गया:
Yet I love the communal group which is the source of my life and behaviour, and which has formed me what I am by giving me its religion, its literature, its thought, its culture, and thereby recreating its whole past as a living operative factor, in my present consciousness. Even the authors of the Nehru Report recognise the value of this higher aspect of communalism. ( All-India Muslim League, Allahabad Session, 29th December 1930, Presidential Address, Lahore, oc, 10.) ।

इस बदलाव के बाद इनकी कविता के प्रभाव से सभी तबकाें के शिक्षित मुसलमानों के नजरिए में बदलाव आना स्वाभाविक था, क्योंकि कवि की पहुंच राजनीतिज्ञों से अधिक व्यापक, अधिक गहरी, अधिक टिकाऊ होती है और उसका प्रभाव हमारे अवचेतन पर भी पड़ता है। उसे उनका भी दाद मिलता है जिनकी वे आलोचना करते हैं। दुश्मनों के दिलों पर राज्य करने वाला कलाकार ही होता है, राजनीतिज्ञ नहीं। यह जानते हुए भी कि इकबाल का नजरिया संप्रदायवादी था, हम उनकी कविता पर दाद दिए बिना नहीं रह पाते।

इस बदलाव का संबंध उनके इंग्लैंड गमन से जुड़ा दिखाई देता है। इंग्लैंड आने वाले भारतीयों के लिए ब्रिटिश कूटनीति इतनी व्यापक और परिष्कृत सिद्ध होती रही है कि यह विरोधी के सर पर चढ़ कर बोलने लगती थी। कारण, भारत में भारतीयों के साथ अंग्रेज अधिकारी जितनी हेकड़ी से बर्ताव करते थे उसका वहां आभास तक न होता था। यह किसी एक व्यक्ति की चालाकी से जुड़ी योजना नहीं थी,अपितु उनकी राष्ट्रीय सोच, मिजाज और सरोकार से जुड़ी थी, जिसमें सभी स्तरों के लोगों का योगदान था। कहीं यह नहीं लगता कि आपको कुछ सिखाया-पढ़ाया जा रहा है, या तर्क से अपनी बात का कायल किया जा रहा है । यहां तक कि आपको यह भी नहीं लगता की आपके दृष्टिकोण का अनादर किया जा रहा है, आपके विचारों को नजरअंदाज किया जा रहा है। अपनी मान्यताओं में दृढ़ लोग भी इस हल्की आँच का मज़ा लेते हुए पत्थर से मोम बनते चले जाते थे और खुद ही उस सांचे के लिए अपने को तैयार कर देते थे जो उनकी कूटनीतिक जरूरत पूरी करता है।

इस प्रक्रिया को समझने में इकबाल हमारी जितनी मदद करते हैं उतनी कोई दूसरा नहीं। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। इकबाल कहते हैं जब भी मैं कभी पूरब की किसी विशेषता की बात करता था तो वहां का हर खास व आम की एक ही प्रतिक्रिया होती थी, ‘कितनी अजीब बात है!’ यह शब्द मेरे हैं, इकबाल के शब्दों में कहें तो: Asabiyyat is patriotism for religion; Patriotism, Asabiyyat for country. Asabiyyat simply means a strong feeling for one’s own nationality and does not necessarily imply any feeling of hatred against other nationalities. During my stay in England I found that whenever I described any peculiarly Eastern custom or mode of thought to an English lady or gentlemen, I, almost invariably, invoked the remark—”how funny” as if any non-English mode of thought was absolutely inconceivable.

हम इसका शब्दशः अनुवाद इसलिए नहीं कर सकते कि पहले ही वाक्य में शब्दों का खेल तो है, परंतु असलियत का सही चित्र नहीं। असलियत यह है कि मजहब और देश दोनों अलग अवधारणाएं जिनमें केवल नाम का अंतर नहीं है। दोनों का मतलब एक है – अ=ब= स इसलिए अ=स जैसा सीधा मामला नहीं है। दोनों में अल्ला कहें या खुदा कहें, जैसा नाम-भेद नहीं अपितु वस्तु-भेद है। एक का गुण दोष दूसरे पर नहीं लादा जा सकता। यदि वह कहते असबिय्यत का अर्थ है गहन निष्ठा। वह एक साथ मजहब के प्रति भी हो सकती है और देश प्रति भी, तो यह हमें भी अजीब न लगता। यदि कहते एक के प्रति गहन निष्ठा दूसरे के प्रति गहन निष्ठा का निषेध नहीं करती, या कहते अपने देश के प्रति गहन निष्ठा, दूसरे देशों के प्रति नफरत नहीं पैदा करती, अतः हमारा राष्ट्र प्रेम पश्चिम की तरह संकीर्ण और अन्य राष्ट्रों से नफरत करना नहीं सिखाता, तो पश्चिम से पूर्व का अंतर भी स्पष्ट होता और असहमति के बावजूद उन्हें भी यह फनी न लगता। परंतु कवि विचारों से अधिक चमत्कारों की चिंता करता है, जिससे हमारे समझ में कोई बात वहां भी स्पष्ट नहीं होती जहां हम किसी रचना से चमत्कृत होते हैं।

पश्चिम और पूर्व के विचारों में एक अन्य भेद देखने में आता है विज्ञान और प्रौद्योगिकी में विकास के क्रम में विचारों के सूक्ष्म भेद, सटीक शब्दावली के प्रयोग की सावधानी भी उनकी भाषा में बढ़ती गई है। पूर्व में कुछ हमारी शिथिलता के कारण और कुछ उनके प्रयत्न से वैज्ञानिक सोच और तकनीकी प्रगति लंबे समय तक अवरुद्ध रही, इसके स्थान पर पौराणिकता हावी रही। इसलिए हम न तो विचारों की शुद्धता का निर्वाह करते हैं नाही वस्तुओं की। सटीक नहीं लगभग वाली भाषा में सोचते और व्यवहार करते हैं। इसलिए इकबाल कह सकते थे There are communalisms and communalisms.(पूर्व. 9) और यह किसी पाश्चात्य श्रोता को फनी लग सकता था, क्योंकि किसी संकल्पना की जमात नहीं होती, ला इलाह इल अल्लाह की तरह संकल्पनाएं भी एक और अनन्य होती हैं। व्यंग्य यह है की इकबाल सही होते हुए भी गलत सिद्ध हो रहे हैं उन्होंने विस्तार से यह समझाया है की कम्युनलिज्म से उनका क्या तात्पर्य है, The principle that each group is entitled to free development on its own lines is not inspired by any feeling of narrow communalism. बस चूक प्रस्तुति में है। उन्हें इस वाक्य में not inspired by any feeling of narrow का प्रयोग नहीं करना चाहिए था। और फिर बताना चाहिए था कि अंग्रेजों ने भारत में कम्युनल फसाद पैदा किया और उसको कम्युनलिज्म का नाम दे दिया, जिसे हम नहीं स्वीकार करते, परंतु यह बात वह नहीं कह सकते थे क्योंकि अब तक जिस राजनीति से जुड़ चुके थे, उसमें यह कहना आत्मघाती हो सकता था।
ब्रिटेन का बच्चा बच्चा यह चाहता था हिंदुस्तान में उसका राज्य बना रहे, बच्चा बच्चा यह जानता था कि इसमें कांग्रेस के कारण, राष्ट्रीय चेतना के कारण, समस्याएं पैदा हो रही हैं। अधिकांश को यह भी पता था कट्टर मुसलमान हमारे शासन को बनाए रखने में सहयोग कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में यदि कोई राष्ट्रीय भावना से बात करे, सामाजिक सौहार्द की बात करे और साथ ही मजहब से भी गहरे लगाव की बात करे, तो वह उनके निशाने पर भी आ जाता है, मजहब और देश में फर्क न करने के कारण हास्यास्पद भी लगता है। इसे इकबाल नहीं समझ पाए और उल्टी यूरोप की समझ को लताड़ने लगे, यह तो हमें भी फनी लगता हैः
it does not indicate any want of imagination; the country of Shakespeare, Shelley, Keats, Tennyson and Swinburne cannot be wholly unimaginative; on the other hand it indicates how deeply England’s mode of thought and life, her institutions, her manners and customs are rooted in the mind of her people.
और जब वह कहते हैं

The religious idea, then, without any theological centralisation which would unnecessarily limit the liberty of the individual, determines the ultimate structure of the Muslim Community
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उनके विचारों का कायल होने के स्थान पर हंसते हुए गोरे हो जाने की तलब होती है। इकबाल भावालोक में जिसमें जिसने जितने बड़े दिखाई देते हैं, विचार जगत में उतने ही कमजोर और कंफ्यूज्ड । ऐसे ही भावुक लोग मेधावी बनकर इंग्लैंड जाते थे और सरनामी औजार बनकर वापस आते थे। उनका प्रभाव विस्तार करने के लिए उन्हें अलंकृत भी किया जाता था। वे अपना कद गंवाकर पहले से बहुत ऊंचे हो जाया करते थे, पहले से अधिक चमकदार हो जाया करते थे, परंतु यह भी नहीं छिपा पाते थे कि चमक रंग की नहीं रोगन की है, और इसी अनुपात में बाद की पीढ़ियों के लिए बौने होते चले जाते थे। इकबाल जो कभी श्रद्धा के पात्र हुआ करते थे, आज सहानुभूति के पात्र बन चुके हैं।

Post – 2018-12-11

सर सैयद अहमद खान और अल्लामा इकबाल

यदि हम एक वाक्य में मुस्लिम समाज को प्रभावित करने वाली तीन विभूतियों का मूल्यांकन करना चाहें तो कहना होगा, सर सैयद मुस्लिम समाज को मध्यकालीन मानसिकता से बाहर लाकर आधुनिक चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाना चाहते थे, जिन्ना उनसे भी आगे जाकर, मजहब को केवल सामुदायिक पहचान के रूप में स्वीकार करते हुए सांप्रदायिक संकीर्णता और मजहबी बंदिशों से मुक्त आधुनिक मुस्लिम समाज निर्माण करना चाहते थे, जबकि मुहम्मद इकबाल समाज को मध्यकाल से भी पीछे, इस्लाम के आरंभिक चरण में पहुंचा कर, दरबाबंद मानसिकता में ले जाना चाहते थे।

सर सैयद और जिन्ना की सोच में मुल्लों और मकतबों के लिए जगह नहीं है, दोनों की दीठि यूरोप की ओर है, अकबर इलाहाबादी और इकबाल की सोच में मुल्लों और मदरसों के लिए जगह है, इनकी पीठ यूरोप की ओर है। इसमें उनकी असाधारण काव्य प्रतिभा ने चुंबकीय आकर्षण पैदा कर दिया था।

यह हैरानी की बात है इन तीनों मुस्लिम नेताओं में बौद्धिक रूप में सबसे कमजोर, सबसे जथातथवादी, व्यक्ति को दार्शनिक मान लिया गया, और जिनमें सचमुच बौद्धिक खुलापन था, उनका मुस्लिम समाज ने उपयोग करके कूड़ेदान में डाल दिया। यहां हम केवल यह दिखाना चाहते हैं कि अपने से आधी शताब्दी पहले पैदा हुए सर सैयद अहमद खान से वह कितने पीछे थे।

सर सैयद अहमद का दृष्टिकोण आधुनिक इस मानी में है, कि उनकी चिंता भले अपने वर्ग तक सीमित रही हो परंतु उसके केन्द्र में सामाजिक अवरुद्धता, आर्थिक दुर्गति, शैक्षिक पिछड़ापन, अवैज्ञानिक दृष्टिकोण, औद्योगिक और व्यापारिक उदासीनता, आदि थे। मजहब उनकी चिंता के केंद्र में नहीं आता था, या यदि आता था तो केवल हासिये की समस्या बन कर, जिसको बचाना जितना जरूरी था, उतनी ही जरूरी उसकी ऐसी व्याख्या थी जो समाज को मध्यकालीन भेंड़चाल से बाहर ला सके और आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में बाधक न बनने दे। यह देख कर हैरानी होती है कि अल्लामा इकबाल आधुनिकता को भी मजहबी दीवारों में घेर कर रखना चाहते हैं।

यहां याद दिला दें कि 19वीं शताब्दी में हिंदुस्तान में सैयद अहमद खान नाम के दो व्यक्ति हुए थे। पहले सैयद अहमद खान के विषय में उनके विचार इतने भ्रामक हैं कि इन्हें पढ़ने के बाद मुझे लगा कि वह सर सैयद अहमद को ही वहाबी आंदोलन का भारतीय प्रतिनिधि मान बैठे हैं।उनके विचार निम्न प्रकार हैं:
“19वीं शताब्दी में हिंदुस्तान में सैयद अहमद खान, अफगानिस्तान में सैयद जमालुद्दीन अफगानी और रूस में मुफ्ती पैदा हुए। ये लोग शायद सन 1700 नज्द मी पैदा हुए मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब से प्रेरित थे जिन्होंने तथाकथित वहाबी आंदोलन आरंभ कर किया था जिसे आधुनिक इस्लाम की पहली धड़कन कहा जा सकता है। सैयद अहमद का प्रभाव केवल हिंदुस्तान तक सीमित रहा। फिर भी संभवत है वह पहले आधुनिक मुसलमान हैं जिन्होंने आने वाले युग की झांकी का अनुभव किया। जैसे रूस में मुफ्ती ने सुझाया था उन्होंने भी प्रस्ताव रखा इस्लाम की कमियों का इलाज आधुनिक शिक्षा है। परंतु ऐसे व्यक्ति किसी व्यक्ति की असली महानता इस इस बात में है कि वह पहले हिंदुस्तानी मुसलमान हैं जिसने यह अनुभव किया इस्लाम का रुझान बदला जाना चाहिए, इसके लिए आजीवन काम करते रहे।”
During the nineteenth century were born Syed Ahmad Khan in India, Syed Jamal-ud-Din Afghani in Afghanistan and Mufti Alam Jan in Russia. These men were probably inspired by Muhammad ibn Abdul Wahab who was born in Nejd in 1700, the founder of the so-called Wahabi movement which may fitly be described as the first throb of life in modern Islam. The influence of Syed Ahmad Khan remained on the whole confined to India. It is probable, however, that he was the first modern Muslim to catch a glimpse of the positive character of the age which was coming. The remedy for the ills of Islam proposed by him, as by Mufti Alam Jan in Russia, was modern education. But the real greatness of the man consists in the fact that he was the first Indian Muslim who felt the need of a fresh orientation of Islam and worked for it. We may differ from his religious views, but there can be no denying the fact that his sensitive soul was the first to react to the modern age.
The extreme conservatism of Indian Muslims which had lost its hold on the realities of life failed to see the real meaning of the religious attitude of Syed Ahmad Khan. (Religion and Philosophy, Speeches, writings and Statements of Iqbal, Compiled and Edited by LATIF AH MAD S H E RWAN I, Iqbal Academy Pakistan Govt. of Pakistan, 229-30)
मेरे भ्रम का कारण यह था, और वह भ्रम अभी तक बना हुआ है, कि जिस सैयद अहमद खान की बात अल्लामा इकबाल ने की है उनके बारे में यह कहा है कि वह आधुनिक शिक्षा के समर्थक थे, जबकि उनका अहमदियों का इस्लाम की मान्यताओं से संबंध है, जिहाद से संबंध है, कुरीतियों को दूर करने से संबंध है, और उनके इबादत के तरीके में कुछ नयापन है, परंतु शिक्षा के मामले में इनका कोई योगदान, कोई नया प्रयोग देखने में नहीं आता, आधुनिक शिक्षा का तो प्रश्न ही नहीं उठता। यह काम सर सैयद अहमद ने किया था।

दूसरे, वह सैयद अहमद खान को 19वीं शताब्दी में पैदा हुआ दिखाते हैं । यह सर सैयद के विषय में तो सही है, सैयद अहमद खान के विषय में नहीं। उनका जन्म 1786 में हुआ था, अर्थात वह अठारहवीं शताब्दी में पैदा हुए, यद्यपि उनका आंदोलन 19वीं शताब्दी में चला। इसमें उन्होंने वहाबी परंपरा का निर्वाह करते हुए विधर्मियों के विरुद्ध धर्मयुद्ध छेड़ा और जवानी में मौत को भी प्राप्त हुए हुए।

जहां तक हमारी जानकारी है वही भारतीय अहमदी संप्रदाय के संस्थापक भी थे। अहमदी समुदाय पर लिखते हुए इकबाल ने उनकी कड़ी आलोचना की है और यहां विचारधारा से असहमति के बावजूद उनका रुख प्रशंसात्मक दिखाई देता है। भ्रम को बनाए रखने में यह भी सहायक होता है।

जो भी हो, सैयद अहमद के वहाबी विचारों से भी उनकी असहमति थी और सर सैयद की आधुनिक शिक्षा से भी उनका विरोध था। इकबाल को इस मामले में अकबर (इलाहाबादी) के विचार सर सैयद से अधिक सही लगते थे और अकबर को देवबंद के मदरसों की संस्कृति और शिक्षा पद्धति पश्चिमी सभ्यता और शिक्षापद्धति की तुलना में अधिक अनुकूल लगती थी।

परंतु देवबंदियों को अंग्रेजों से वही शत्रुभाव था जो वहाबी आंदोलन के भारतीय जनक सैयद अहमद खान शाहिद को था। वे अंग्रेजी भाषा, सभ्यता के ही विरोधी नहीं थे, अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए प्रयत्नशील, उनसे सहयोग करने वालों के भी विरोधी और इसलिए मुस्लिम लीग के भी विरेधी थे, जब कि इकबाल लीग के साथ थे और आधुनिक पाश्चात्य ज्ञान के कायल थे, यह जानते हुए कि अंग्रेज अपनी सत्ता बचाने के लिए सांप्रदायिक तनाव पैदा करके स्वतंत्रता को टालते जा रहे हैं उनका अपने हित में उपयोग करने के लिए उनके साथ साथ सहयोग कर रहे थे। ऐसी स्थिति में उनकी इस टिप्पणी को (जिसका अनुवाद हम स्थान की सीमा के कारण नहीं दे रहे हे) ध्यान से पढ़ी जानी चाहिएः
In our educational enterprise we have hardly realised the truth, which experience is now forcing upon us, that an undivided devotion to an alien culture is a kind of imperceptible conversion to that culture, a conversion which may involve much more serious consequences than conversion to a new religion. No Muslim writer has expressed this truth more pointedly than the poet Akhar who, after surveying the present intellectual life of the Muslim Youngman, cries out in despair:
शेख मरहूम का मुझे यह कौल याद आता है
दिल बदल जाएंगे तालीम बदल जाने से।
We now see that the fears of the (शेख) the representative of the essentially Muslim culture, who waged a bitter bitter controversy with the late Sir Sayyed Ahmad Khan on the question of Western Education—were not quite groundless. Need I say that our educational product is a standing testimony to the grain of truth contained in the Sheikh Marhum’s contention. Gentlemen, I hope you will excuse me for these straightforward remarks. Having been in close touch with the student-life of to-day for the last ten or twelve years, and teaching a subject closely related to religion, I think I have got some claim to be heard on this point. It has been my painful experience that the Muslim Student, ignorant of the social, ethical and political ideals that have dominated the mind of his community, is spiritually y dead; and that if the present state of affairs is permitted to continue for another twenty years the Muslim spirit which is now kept alive by a few representatives of the old Muslim culture, will entirely disappear from the life of our community.
(वही, 131-132)
इस कथन के पीछे छिपी चिंता को हंस कर नहीं उड़ाया जा सकता। उनका जोर इस बात पर है कि हमें पाश्चात्य शिक्षा पर इतना इकहरा जोर नहीं देना चाहिए कि हम अपनी जड़ों को, अपने इतिहास को ही भूल जाएं। अपना आत्मविश्वास ही खो दें। यहां तक उनकी आशंका सही थी, परन्तु सर सैयद अहमद ने तो विश्वविद्यालय के खाके में भी इस बात का इतना ध्यान रखा था कि विज्ञान पढ़ते हुए अगली पीढ़ियों को खुदा ही न भूल जाए, इसलिए उन्होंने उसमें मस्जिद और नमाज का भी प्रबंध किया था। उनके प्रसंग में यह बात क्यों याद आई?

एक ही कारण हो सकता है। सर सैयद अपने समाज को आगे ले जाना चाहते थे, इकबाल उसे पीछे ले जाना चाहते थे। सर सैयद और इस मामले में जिन्ना भी, अपने समाज को मुक्त करना चाहते थे और कविता में जोश भरने के लिए ‘तू बाजी है, परबाज है काम तेरा/ तेरे सामने आसमां और भी हैं’ की ललकार लगाने वाला कवि यथार्थ जीवन में उसके पर कतर कर रखना चाहता था। खुले आसमान से, ऐसी तालीम से, बचा कर रखना चाहता था, जो सोचने समझने का तरीका बदल सकती हो। वह उसे कठमुल्ला बना कर रखना चाहता था. मरहूम शेख साहब उनके मार्गदर्शक थे और जिंदा विचारों से उसे घबराहट होती थी।

Post – 2018-12-09

इकबाल और जिन्ना

व्यक्ति या धर्माधिकार से वंचित व्यक्ति के लिए धर्म निजी मामला नहीं होता। उसकी अस्मिता से जुड़ा प्रश्न होता है। उसकी धार्मिक चेतना दूसरों की अपेक्षा अधिक प्रबल होती है। यह एक असामान्य स्थिति है और इसलिए चेतना का यह रूप भी किंचित् असामान्य होता है। इस तथ्य पर ध्यान न देने पर, अध्ययन, अनुभव और चिंतन में बहुत आगे बढ़े व्यक्तियों को इतना अधिक धर्म-केंद्रित पाकर हमें विस्मय होता है ।

इक़बाल बहुत बड़े कवि थे। कवि अपने मिजाज से ही मानव द्रोही नहीं हो सकता। अपने अस्तित्व की चिंता उसे हो सकती है परंतु दूसरों का अहित करते हुए स्वयं कोई लाभ उठाना उसके लिए कल्पनातीत है, जबकि राजनीतिज्ञों के लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सत्ता सदा अनैतिक और हिंसक तरीकों से ही हासिल की जाती रही है। इस अंतर के कारण ही वह अपने को राजनीतिज्ञ नहीं मानते। उनके व्याख्यानों और लेखों आदि का संकलन और संगा0ल करने वाले अहमद लतीफ शेरवानी के शब्दों में, His mind was incapable of the intrigues, trickeries and machinations, which constitute the mental and moral equipment of the common run of politicians। जहां तक राजनीतिक गतिविधियों का प्रश्न है वह बजट से लेकर दूसरे सभी प्रश्नों पर निजी राय रखते रहे और इसे उपयुक्त माध्यमों और मंचों से प्रकट भी करते रहे हैं।

मोहम्मद अली जिन्ना से उनका इसी मामले में अंतर है। जिन्ना राजनीतिक व्यक्ति थे। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं। उन्हें पूरा करने के लिए वह कुछ भी कर सकते थे और उसमें बाधक बनने वाले को कभी क्षमा नहीं कर सकते थे। इकबाल कला जगत के सम्राट थे और विचार या कार्य की दृष्टि से ऐसा कुछ नहीं कर सकते थे, यहां तक कि सोच भी नहीं सकते थे, जो उन्हें मानव द्रोही या संकीर्ण सिद्ध करता हो।

दोनों में समानता यह थी कि दोनों के पितामह ब्राह्मण थे जिन्होंने किन्हीं असामान्य परिस्थितियों में धर्मपरिवर्तन किया था । हिंदू समाज में निकास का रास्ता है परंतु प्रवेश का रास्ता लगभग बंद सा है । इस विवशता के कारण दूसरी मूल्य व्यवस्था से असंतुष्ट होने के बाद भी, जगह उसी में बनानी पड़ती है। जो भी हो इनकी स्थिति दूसरे धर्मांतरित हिंदुओं से ही अलग नहीं थी, एक दूसरे से भी अलग थी।
जिन्ना का मुसलमान होना उनकी विवशता थी, परंतु वह न तो उस धर्म को पसंद करते थे,न इसकी पाबंदियों के कायल थे। वह तिलक के सचिव थे। उनकी उस समय की महत्वाकांक्षाएं नहीं जानी जा सकती थीं, जैसे उनके अंतिम दिनों में किसी को यह तक पता न चला कि वह किस रोग से पीड़ित थे। इकबाल इस तरह का दुराव नहीं पाल सकते थे। उनके व्यक्तित्व में आए बदलाव का उनके लेखन के माध्मय से आरेख बनाया जा सकता है।
प्रकृति के अंतर के कारण ही, इकबाल आरंभ से ही जहां गलत हैं वहां भी बहुत विश्वशनीय और ईमानदार दिखाई देते हैं। मोहम्मद अली जिन्ना नास्तिक थे,जब कि मोहम्मद इकबाल आस्थावादी और निष्ठावान व्यक्ति थे। इसलिए केवल इस बात से कि इकबाल ने ही जिन्ना को मुस्लिम लीग का नेतृत्व संभालने के लिए राजी किया था और उनका समर्थन करते रहे, दोनों के बीच समानता तलाशना गलत होगा।

सच तो यह है कि आरंभ में मुहम्मद इकबाल का भी मुस्लिम लीग की पृथकतावादी दृष्टिकोण से सहमति नहीं थी। और इस मामले में दोनों में, अलग अलग कारणों से पुनः समानता मिलती है कि दोनों अपने को राष्ट्रवादी सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं, पर अधूरे मन से। दोनों के प्रयत्न दिखाई देते हैं, आवेग नहीं दिखाई देता। इकबाल की राष्ट्रवादी कविताओं को उनकी सबसे कमजोर रचना मानना होगा। ऊपरी मन से या सोच समझ कर जोड़ी गई रचनाएं, जिनमे लफ्फाजी है, आवेग नहीं। यह ईमानदारी की कमी के कारण नहीं है, विश्वास की कमी के कारण है। विश्वास की यह कमी, विश्वास किए जाने पर संदेह के कारण है। यह एक ऐसी सामाजिक त्रासदी है जिसे अपनी नीयत के प्रति हिंदुओं के मन में संदेह की संभावना से और अपने को सेक्युलर या मुसलमानों के प्रति संवेदनशील सिद्ध होने के लिए प्रयत्नशील हिंदुओं को झेलना पड़ता है। परंतु इस त्रासदी के पीछे व्यक्तियों या समुदायों से अधिक इतिहास की भूमिका है जिसे भुलाने की कोशिश की जाती है, फिर भी यह विश्वास नहीं पैदा हो पाता कि इसे मन से निकाला जा चुका है।

जब तक इकबाल सामाजिक सद्भाव कायम करने के लिए प्रयत्न कर रहे थे तब तक उनके मन में देश भक्ति के लिए स्थान था और यह विश्वास भी था कि हिंदुस्तान विविधताओं से भरा एक राष्ट्र है – हिंदी हैं हम वतन है हिंदुस्तान हमारा। हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलशितां हमारा। इसके बाद एक मोड़ आता है जिसके बाद राष्ट्र की परिभाषा बदल जाती है देश से लगाव जरूरी नहीं रह जाता। मोड़ को समझे बिना हम इकबाल के व्यक्तित्व, साहित्य और सरोकार में आए बदलाव को नहीं समझ सकते। उसी बदलाव का परिणाम था उनके प्रयत्न से जिन्ना की सोच में बदलाव आना।

परन्तु जिन्ना अपने दृष्टिकोण में आधुनिक हैं, इकबाल में इतना पिछड़ापन है कि वह कई बातों में सर सैयद से भी पिछड़े सिद्ध होते हैं।