Post – 2019-12-16

क्या आपने ऐसा सौदा देखा है जिसमें मोल कोई चुकाए और माल कोई दूसरा हथिया ले। आजादी की कीमत जान, माल, सम्मान सभी रूपों में उन्होंने चुकाई जिन्हें हमने पाकिस्तान को सौंप दिया और आजादी का मजा हम लेते रहे। अभी हमें सेकुलर कहाने का मजा और लेना है इसलिए कहते हैं वहीं मरो खपो।

जो कानून पास हुआ है वह अधूरा है। उसमें 2014 की सीमा नहीं होनी चाहिए। शरणार्थियों के मुफ्त आवास और योग्यता के अनुसार रोजगार की व्यवस्था की जानी चाहिए। पूरा न्याय तब भी न होगा पर इससे अधिक कुछ संभव नहीं है।

Post – 2019-12-16

मृत्यवे त्वां ददामि

नचिकता काअर्थ होता है नासमझ । उशन का अर्थ होता है किसी फल के लिए लालायित। कठोपनिषद का यह वाक्य उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्व वेदसं ददौ’ भारतीय इतिहास का हिस्सा बनने जा रहा था। विभाजन की तैयारी चल रही थी, तब नचिकेता लोग जिनकी समझ में नहीं आ रहा था कि हमारा होना क्या है आशंकित होकर बार-बार पूछ रहे थे हमारा क्या होगा। हम दूसरे भारतीयों से अच्छे न भी हों परंतु बुरे तो किसी से नहीं है। हमारा सब कुछ उनको दे रहे हो जो हमारे साथ शांति से रह नहीं सकते, फिर हमें किसको दे रहे हो। और हमारे नेताओं ने साफ शब्दों में यह तो नहीं कहा कि हम तुम्हें यमराज को दे रहे हैं परंतु यह तो कहा ही था जहां हो वहीं रहो और आप का कुछ नहीं बिगड़ेगा ।

यदि उन्होंने यह आश्वासन दिया था कि वहीं रहो तो उनकी सुधि लेने की जिम्मेदारी भी उनकी बनती थी । किसी की जिंदगी और सम्मान को कोई भी आदमी अपनी इच्छा पूरी करने के लिए जुआड़ी की तरह दांव पर नहीं लगा सकता। यह जघन्य अपराध हमारे नेताओं ने किया था। उसके बाद भूल कर भी उनकी खबर नहीं ली। वे अस्मिता की रक्षा के लिए नरक की यातना सहते रहे। उनकी चीखें सुनाई देती रहीं। पिछली सरकारों ने ध्यान नहीं दिया। मोदी को इस बात का श्रेय जाता है कि इतिहास की इस भयंकर भूल को जिस सीमा तक सुधारा जा सकता है सुधारने के लिए बिल लेकर आए और उसे कानून शक्ल देने में सफल हुए।

यह कानून उन लोगों को सुरक्षा देने के लिए है जो अविभाजित भारत के नागरिक थे, जो हमारे नेताओं के आश्वासन पर उन्हीं देशों में रह गए थे पर उन्हें सुरक्षा न मिली। मुसलमानों में अविभाजित भारत के मुसलमान जहां भी हैं पूरी तरह सुरक्षित हैं। भारत में भी बांग्लादेश में भी और पाकिस्तान में भी। संकट में झोक दिए जाने वाले सभी गैर-मुसलमान थे। उनको संकट से मुक्ति दिलाने का दायित्व कांग्रेस का था, क्योंकि उसी के आश्वासन पर वे वहाँ रह गए थे। इसमें कहीं कुछ कम्युनल नहीं है, इसमें बाधा पहुंचा कर इसे सांप्रदायिक बनाया जा रहा है।

मुसलमानों ने सांप्रदायिक दंगे फैला कर ऐसा माहौल बनाया था कि घबराकर देश का बंटवारा स्वीकार किया गया। भारत में वे जहां भी थे, वही हैं और उन्हें पूरी सुरक्षा मिली है। अविभाजित भारत के जिन गैर मुस्लिम लोगों ने नेताओं के आश्वासन के धोखे में आकर मुस्लिम देशों मे रहना कबूल किया किया संकट में वही पड़े हैं इसलिए यह उन उन संकटग्रस्त लोगों के लिए अल्पतम सुरक्षा देने की चेष्टा है। मुसलमान पूरे देश में है और प्रत्येक राज्य में सड़क पर उतर सकते हैं। परंतु ऐसा करके वे सामाजिक ध्रुवीकरण को और प्रखर करेंगे और इसका लाभ दक्षिणपंथी राजनीति को होगा, इसे उन्हें समझ लेना चाहिए, भारत दोबारा नहीं बँटने जा रहा है।

Post – 2019-12-14

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (38)
भेड़िए की दलील-3

यूरोप के लिए जो समस्या संस्कृत से परिचय के साथ पैदा हुई थी वही समस्या हत्तूसा के उत्खनन से दुबारा सामने आ गई। यूरोप की इज्जत फिर दाँव पर लग गई। पहली का निदान तलाशने में और उसे विश्वसनीय बनाने के लिए विलियम जोन्स ने अपनी जिन्दगी लगा दी थी, कि संस्कृत ईरान की भाषा थी गो अन्त में एक ऐसी गलती कर बैठे जिससे सारे किए कराए पर पानी फिर जाना था, परन्तु किसी भारतीय इतिहासकार ने उस पर ध्यान ही नहीं दिया। राष्ट्रवादी कह कर तिरस्कृत किए जाने वाले इतिहासकारों ने भी नहीं। पश्चिमी इतिहासकारों का ध्यान गया होगा, पर इसका पता नहीं चलता। उनकी समस्या उस पर परदा डालने की थी । उन्हें विलियम जोन्स के लेखन में अपने काम का इतना ही लगा कि संस्कृत सहित यूरोप की प्रमुख भाषाएँ किसी इतर भाषा से निकली हैं, और संस्कृत बोलने वाले भारत में कहीं अन्यत्र से आए थे ।

रोज्नी ( Bedřich Hrozný) द्वारा हित्ती अभिलेखों का पाठ किए जाने के बाद सब कुछ उलट गया। दो बातें सामने आईं । पहली यह कि वह अभिजात वर्ग जिसने कुछ सौ वर्षों तक पश्चिम एशिया पर अपना आधिपत्य कायम किया था, वह कहीं बाहर से आया था, क्योंकि उससे पहले वहाँ असीरियाई प्रभुत्व था । इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि वे पश्चिम एशिया के मूल निवासी थे। दूसरी यह कि वे वैदिक देवों की पूजा करते थे। वेद की रचना भारत में हुई, इसके भौगोलिक साक्ष्य वेद में उपलब्ध थे। इस बात के भी साक्ष्य मिल रहे थे, कि वे पूरब से आए थे। पूरब में उनकी भाषा केवल भारत की हो सकती थी। मैक्स मूलर ने वेद की रचना के लिए जो तिथि निर्धारित की थी वह भी इस से खंडित होती थी। समस्या अधिक कठिन थी क्योंकि बेबीलोनिया में वे 1750 ई.पू. में सत्ता कायम कर चुके थे। यदि जिस मूल से यह निकली थी वह भारत में सिद्ध हो रहा था तो इसके साथ सारी पुरानी कहानियां बेकार हो जाती थीं। इस बार इज्जत बचाना असंभव था।

परंतु इरादा मजबूत हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। प्रमाण कुछ भी कहते रहें, उनकी मनचाही व्याख्या की जा सकती है। बार बार दुहरा कर उसे सचाई में बदला जा सकता है, भले हर कड़ी लचर हो। ऐसे पहलुओं की अनदेखी की जा सकती है जिनसे समस्या पैदा होती है। इनकी भाषा से प्रकट होता था कि यह मूल भारोपीय से सबसे पहले अलग हुई भाषा है। उस मूल भाषा से ही संस्कृत सहित दूसरी प्रमुख भारोपीय भाषाएं निकली लगती हैं। इसके बाद समस्या भाषावैज्ञानिक हो गई और यह जानते हुए भी कि वह भाषा कौन सी है, उस भाषा की खोज का नया नाटक आरंभ हो गया।

पाश्चात्य विद्वान यह जानते हुए भी कि पाणिनीय संस्कृत वैदिक से हजार डेढ़ हजार साल बाद में अस्तित्व में आई, वैदिक में उस तरह की कठोरता नहीं थी, जो पाणिनीय में पाई जाती है, बार बार केवल संस्कृत का नाम इसलिए लेते हैं कि यह सिद्ध कर सकें कि यह कभी किसी क्षेत्र की बोलचाल की भाषा नहीं रही हो सकती। इसलिए यह बाहर से आई थी।

इन वकीलों को विद्वान मानना ज्ञान और विज्ञान दोनों का उपहास है, जो यह जानते हुए भी कि संस्कृत के आंचलिक भेदों के कारण एक ही भाषा अपने ही प्रसार क्षेत्र में इतने रूप ले चुकी थी कि एक क्षेत्र की बात दूसरे मे नहीं समझी जाती थी। इससे निपटने के लिए दूर देश के लोग कुरु पांचाल मे आते थे। यदि बोल चाल की भाषा न होती तो यह समस्या कैसे पैदा होती। परन्तु यह न भुलाया जाना चाहिए कि एक विशाल क्षेत्र में संपर्क की भाषाएं अनेक स्थानीय बोली क्षेत्रों मे प्रचलित होती हैं और ये विशेष कार्य-व्यापार से जुड़े लोगों के बीच में ही व्यवहृत होती है। उदाहरण के लिए आज की हिंदी। जिस समस्या से बर्नार्ड शॉ ने चिंतित हो कर अंग्रेजी के एक मानक उच्चारण का अभियान चलाया था जिसकी उपज बीबीसी की अंग्रेजी है उसी चिंता से कातर होकर पाणिनि ने अपना व्याकरण तैयार किया था और उस व्याकरण में भी यह ध्वनित है कि किस क्षेत्र के लोग किस तरह के प्रयोग करते थे। यह दूसरी बात है कि इस व्याकरण को ब्राह्मणों ने अपनी संपदा बना लिया। इन विविध आंचलिक रूपों के पीछे वैदिक भाषा है जिसके बहुल प्रयोग उसके संपर्क भाषा के रूप में विशाल क्षेत्र में व्यवहृत होने का प्रमाण है।

यह सच है कि संस्कृत सहित भारोपीय परिवार में सम्मिलित भाषाएं उसी से निकली थी। पश्चिम एशिया में पहुंचने वालों की भाषा, उसी से निकली थी, और सचमुच बहुत पहले अलग होने वाली भाषा थी। भारतीय भाषाओं पर इतने लंबे समय तक काम करने वाले पंडितों को, यह राम कहानी मालूम थी, परंतु वे इसे छिपा कर ‘यह देखो, वह देखो, कुछ मत देखो, सब कुछ गड्ड मड्ड लगता हो तो हमारी नजर से देखो’ खेल खेलते रहे, और इसी को तुलनात्मक भाषा विज्ञान का नाम दे दिया। इसके जिस रूप से हम परिचित हैं, वह भी विज्ञान नहीं है, भूल भुलैया है। इसे जितनी जल्दी समझ लिया जाए उतना ही विज्ञान के हित में है। भाषा विज्ञान का रास्ता इस भूलभुलैया से बाहर निकलने के बाद आरंभ होता है।

वह आद्य-भारोपीय वैदिक बोलचाल की भाषा है। उसी का प्रसार उस तंत्र के द्वारा हुआ था जिसे हम हड़प्पा सभ्यता के व्यापक प्रसार के अवशेषों से कुछ अधूरे रूप में जानते हैं और भाषा के माध्यम से वह पूरा संजाल हमारी आंखों के सामने उपस्थित हो जाता है।

हित्ती बोलियों को भारोपीय की भाषाओं में सबसे पुरानी सिद्ध करने का एक तर्क काकल्य (कंठ्य) ध्वनियों की इनमें उपस्थिति है जो किसी दूसरी भारोपीय शाखा में नहीं पाई जाती, परंतु जिन की संभावना की ओर सबसे पहले सास्यूर ने संकेत किया था । इसकी बारीकियों को मैं स्वयं नहीं समझ पाता, जैसे मैं प्रातिशाख्यों की उच्चारण की बारीकियों को नहीं समझ पाता। परंतु वैदिक के बोलचाल के रूप को भी मैं नहीं जानता।

जानता केवल यह हूं कि हित्ती किसानों की भाषा नहीं थी, वहां के अभिजात वर्ग की भाषा थी जो खेती की कला और विज्ञान से परिचित रहे भी हों तो वहाँ स्वयं खेती नहीं कर रहे थे। खेती करने वालों की भाषा अलग रही होगी। वह असीरियन रही होगी यह भी दावे से नहीं कहा जा सकता।

परन्तु जब यह जानते हुए कि आर्य भाषा भाषी वहाँ अधिक से अधिक 2000 ई.पू. में पहुँचे थे, एक ब्रिटिश पुरातत्वविद हेंफिल आदि के दल के द्वारा यह पता चलने पर कि 4500 ई.पू. से 600 ई.पू. के बीच कोई आक्रमण नहीं हुआ, सुझाते हैं कि आदि भारोपीय पश्चिम एशिया की भाषा थी और कृषि प्रौद्योगिकी के प्रसार के साथ भाषा का प्रसार हुआ और इस तरह यह बढ़ते हुए 4500 ई.पू. में भारत में पहुँची थी और इसको पश्चिमी संचार माध्यमों से प्रचारित देखता हूँ तब इसमें सन्देह नही रह जाता कि पश्चिमी देश अपनी दादागिरी कायम करने के लिए हर तरह के कुतर्क का सहारा ले सकते हैं और ज्ञान की किसी शाखा को नष्ट कर सकते है। मानविकी से जुड़ी उनकी किसी स्थापना पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

Post – 2019-12-13

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (37)
भेड़िए की दलील-2
टामस बरो संस्कृत के अधिकारी विद्वान माने जाते हैं। वह The Sanskrit Language (Faber and Faber,1955) के लेखक हैं। वह ईरान में आर्य भाषा के प्रवेश के या मांदार्यो की उपस्थिति के विषय में बताते हैं कि 1000 ई.पू. से पहले इसके ईरान मे होने का प्रमाण नहीं मिलता:
The presence of Medes and Persians in Iran proper is attested in the Assyrian annals from the tenth Century BC. )

उसी के साथ यह भी मानते हैं कि भारत पर आक्रमण का कोई प्रमाण नहीं
For the Indo-Aryan invasion of India no direct evidence is available. 31

कश वंश के विषय में बताते है कि वे 1750-1170 ई.पू. बेबीलोनिया पर राज्य करते रहे। उसके साथ ही यह स्वीकार करते हैं कि वे पूर्व की दिशा से, ईरानी पठार, से होकर आने वाले आक्रमणकारी थे:
The Kassites themselves were invaders from the east. 31

वह बताते हैं कि भारोपीय भाषा का सबसे प्राचीन अभिलेखीय प्रमाण न तो ईरान में मिलता है, न भारत में, यह पश्चिम एशिया में मिलता है:
The earliest recorded traces come neither from India, nor from Iran, but from the near-East. 27

परंतु ये निशान उस मूल भाषा के नहीं हैं जिसे भारोपीय कहा जाता है, अपितु यह उससे अलग हुई सबसे पुरानी भाषा थी:
Separation of Hittite and the languages allied to it form the main body of Indo-European must have taken place earliest of all. 17

उनके निकट पूर्व में आर्यों की उपस्थिति दूसरी सहस्राब्दी के मध्य की है और उसी (पूर्वी) दिशा से हुए आक्रमण का परिणााम है
The presence of Aryans in the Near-East in the middle of the second millennium BC can be best explained by a invasion from this quarter. 30

इसके बाद भी बरो कहते हैं, ये ईरान या भारत से आए हो सकते हैं, इस पर विचार करने की कोई तुक ही नहीं बनती और यह तब कहते हैं जब मानते हैं कि आर्यभाषा भाषियों का यह हमला उधर से ही हुआ है(There is clearly no point in arguments as to whether the the language is Iranian or Indian, since there is no evidence of its being either, 30

क्या ऐसे विद्वानों को कुछ समझाया जा सकता है जो जानते कुछ और हैं, ठानते कुछ और हैं , मानते कुछ और हैं।

हित्ती और उसकी अनुसंगी बेलियोे की समस्त संपदा – चाहे वह व्यक्ति नाम हो या देवनाम हो अश्वपालन से जुड़ी पारिभाषिक शब्दावली हो- भारत छोड़कर किसी अन्य देश से नहीं जुड़ती। ईरान से भी नहीं जहाँ सप्त हफ्त हो जाता है और इसी विवशता में बरो को भी बार बार इंडो आर्यन का प्रयोग करना पड़ रहा था। यदि हित्ताइत अपने मूल से अलग होने वाली पहली भाषा थी तो वह मूलभाषा तो भारत में प्रचलित थी जहाँ से यह आक्रमण हुआ था। ऐसी दशा में भारत पर किसी आक्रमण की बात कोई पागल ही कर सकता है और यह पागलपन वर्चस्व की कामना और रंगभेद के कारण किसी एक पर नहीं पूरे यूरोप पर सवार था और आज भी सवार है और इसीलिए हमें किसी भी पश्चिमी विद्वान या विशेषज्ञ की राय या समर्थन का नकारात्मक अर्थ ग्रहण करना चाहिए। वे सचाई पर परदा डालने की पूरी तैयारी के साथ, अपनापन दिखाते हुए झूठ का प्रचार करते हैं, सचाई उनकी लाख कोशिशों के बाद भी उनकी असंगतियों से सामने आ जाता है, क्योंकि जैसा कि हम कह आए हैं झूठ के सिरे लाख जतन के बाद भी एक दूसरे से मिलते नहीं हैं। आपराधिक छानबीन में इसी के कारण अपराधी अपने गुनाह का सबूत पेश कर देता है।

बरो को भारत पर किसी आक्रमण का प्रमाण नहीं मिल रहा था, मिल सकता भी नहीं, पर भारत से आर्यभाषा भाषियों के आक्रमण के प्रमाण उन्होंने स्वयं पेश कर दिए। उनके ही कथन से यह सिद्ध होता है कि:
(1) भारोपीय भाषा भारत में उस समय बोली जाती थी जब कहीं अन्यत्र नहीं बोली जाती थी।
(2) भारतीय आर्यभाषा भारतीय-ईरानी की शाखा नही, ईरानी मध्येशिया पर भारतीय प्रभाव कायम हो जाने के बाद वहाँ से छिटके मान्दार्यों की एक शाखा है।
(3) भारोपीय की जननी भारतीय आर्य भाषा है और उसका मानकीकरण किस बोली के उत्थान और किन बोलियों के संसर्ग में हुआ था इसकी खोज केवल भारत में ही संभव है।

अब हम बरो के द्वारा भाषावैज्ञानिक साक्ष्यों का उन पुराणवृत्तों या दंतकथाओं से मेल खाने को ले सकते हैं जिनके आधार पर विलियम जोन्स ने यूरोप में संस्कृत के प्रवेश के प्रमाण दिए थे। जोन्स ने यह माना था कि भूमध्य सागर के पूर्वी तटीय क्षेत्र पर संस्कृत बोलने वालों का आधिपत्य था और उनकी देवियों को भारतीय प्रतिदर्शों के अनुरूप ढाला गया था। इन्हीं के माध्यम से ग्रीस और इटली में संस्कृत का प्रवेश हुआ था। परंतु उनके पास पुरातात्विक प्रमाण न था। उस कमी को बरो और दूसरे विद्वान पूरा कर देते हैं: वह बताते हैं कि उस क्षेत्र पर मितन्नियों और उनके अधीनस्थों का जमाव था:
….consequently, we come across rulers of neighboring principalities having similar Aryan names and this extend as far as Syria and Palestine.

Post – 2019-12-12

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (36)
भेड़िए की दलील

ताकतवर कभी गलत नहीं होता। सत्ता के सभी रूपों – प्रशासनिक, ज्ञान-शास्त्रीय और प्रचार-तांत्रिक – पर अधिकार उसे ऐसी शक्ति प्रदान करता है कि वह अपने गलत को भी सही सिद्ध कर सके। उससे टकराने वाला मारा जाएगा। इस डर से उसकी मूर्खता पर आप हँस भी नहीं सकते। जो उससे बा-मुलाहिजा बा-अदब कुछ पाना चाहते हैं वे उसके पागलपन के भीतर सलीका तलाश कर लेते हैं और आपके होकर भी उसके इशारे से पहले ही आप को विद्रोही सिद्ध करके आप का सिर उसे भेट करने को तैयार रहते हैं। आप के दुशमन से अधिक अपनों से डरना पड़ता है।

हम पहले के कुछ निष्कर्षों की याद दिलाने के बाद आगे बढ़ना चाहेंगे। पहली बात यह कि कस गण भारत के बहुत प्राचीन गणों में से एक हैं। कौसिक विश्वामित्र, इन्द्र की कौसिक संज्ञा, कस्यप ऋषि जिनको प्रजापति का विरुद प्राप्त है, कोसी, काेसी नदी काशी, कुशीनगर, कोसल, कुसुमी वन इत्यादि इनकी प्राचीनता और महत्व को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है।

इनकी प्रधानता पूर्वी उत्तर प्रदेश जिसके लिए पहले अवध का प्रयोग होता था, मे थी। दक्षिण कोशल में छत्तीसगढ़ क्षेत्र आता है जिससे यह अनुमान लगा सकते हैं कि अपने पूर्ववर्ती चरण पर ये भी आहार संचय और आखेट पर जीवित रहने वाले समुदाय थे। आज भी पूर्वोतर में कस/खस जन उसी अवस्था में हैं। कस ही वर्णविपर्यय से सक हो जाता है। इंद्र को इसीलिए कौसिक के अतिरिक्त है सक्र हैं(हमने दन्त्य स रखा आप उसे तालव्य कर सकते हैं)।

ये सूर्य के उपासक थे, इसलिए इनको सूर्यवंशी कहा जाता है। सूर्य की पहली संतान या सूर्योपासना का आरंभ करने वाले मनु विवस्वान हैं। इक्ष्वाकु, पृथु, रघु और राम, मनु की वंश-परंपरा में ही आते हैं।

मनु को इस बात का श्रेय दिया जाता है उन्होंने धरती को बछड़ा बनकर दुहा, अर्थात खेती का आरंभ किया। पृथु के विषय में यह कथा प्रचलित है कि उन्होंने धरती को समतल बनाया और यह विधान किया जो वन्य भूमि को समतल करके खेती के योग्य बनाता है वह भूमि उसके स्वामित्व में रहेगी -पृथोः अपि इमां पृथिवीं भार्या पूर्वविदो वुदुः । श्थीणु छेदस्य केदारं आहुः शल्यवतो मृगं। (पुरातन विषयों के जानकार यह जानते हैं कि पृथु ने ही य़रती को भरण पाषण का आधार बनाया और व्यवस्था दी कि जिस तरह शिकीर पर उस व्यक्ति का अधिकार होता है जिसके बाण से वह आहत हुआ है उसी तरह जो व्यक्ति जिस भूभाग झाड़-झंखाड़ से मुकत और समतल करके कृषि योग्य बनाएगा इस पर उसका ही अधिकार रहेगा। इस तरह भूस्वामित्व का आरंभ हुआ। वह जोतने वाले की नहीं है, उसकी है जिसने उसे अरण्य
से उर्वरा भूमि में बदला था।

राम कथा कृषि से संबंधित पहलू पर हम पहले विचार कर आए हैं और यह भी सुझा आए हैं कि सबसे पहले स्थाई खेती पूर्वी उत्तर प्रदेश पश्चिमी बिहार के उत्तर के पहाड़ी क्षेत्र में आरंभ हुई और संख्या बढ़ने और नई उनकी आवश्यकता होने पर यह पहाड़ों से उतर कर नदियों के कछारों में उतरे।

इस दृष्टि से कुस गण को कृषि का आविष्कर्ता और प्रचारक माना जा सकता है, यद्यपि बहुत थोड़े समय में कुछ दूसरे गण भी इस इनमें शामिल हो गए। हमने पहले रघु की विजय यात्रा के संबंध में बेबीलोन पर शासन करने वाले कसों (कस्साइटों) का उल्लेख किया था। उनके विषय में टॉमस बरो का कथन भी इसकी पुष्टि करता है:
the Kassites themselves were invaders from the east, from Iranian plateau, and their language of which something is known has no connection with Aryan or Indo-European, nevertheless in a list of names of Gods with babylonian equivalents we find the sun god….Marut, (rendered En-urta). यदि आक्रमण स्थल मार्ग से हुआ तो वह ईरान को पार करके ही होगा ।

आप में से अधिकांश लोग पश्चिम एशिया में पहुंचने वाले संस्कृतभाषी गणों के विषय में जानते होंगे, फिर भी याद को ताजा करने के लिए यह विवरण जरूरी लगता है

ह्यगो विंकलर मे 1906 मे बोगजकुई का उत्खनन किया था। यह हित्ती राज्य की राजधानी हत्तूसा सिद्ध हुई। खुदाई में एक विशाल ग्रंथालय भी मिला, जिसमें कीलक लिपि में अंकित कई हजार पट्टियाँ थी। इनमें क्या लिखा हुआ है यह किसी को समझ में नहीं आया। इनका वाचन 1916 नें रोज़्नी ने किया। ये पुरानी असीरियाई भाषा में लिखी पट्टियाँ थीं। इस ग्रंथागार में अश्वपालन पर हित्ती भाषा में लिखी एक पुस्तक मिली। जिस व्यक्ति ने यह किताब लिखी उसका नाम किक्कुली था जो शाही अश्वपाल था। इसे मितन्नी बताया गया है। इसका कारण यह है अभियान के पूरे तंत्र को आर्यजन और आर्यभाषा (संस्कृत) की सीमा में रख कर, आक्रमण के रूप में समझने का प्रयास किया गया। व्यापारिक प्रसार की ओर ध्यान ही न दिया गया। हमें नाम से यह मुडारी लगता है।

यह एक नियम सा है कि किसी देश में प्रवेश करने वाले स्थानीय आबादी की तुलना में नगण्य होते हैं, इसलिए उनको स्थानीय भाषा सीखनी ही पड़ती है। अपनी भाषा का प्रयोग अपने सीमित दायरे में ही करते हैं, परंतु यदि वे दूसरों पर हावी होने स्थिति में हों उनकी भाषा के प्रभाव से स्थानीय भाषा का चरित्र बदलता है। तकनीकी शब्दावली के मामले में उसका वर्चस्व अवश्य बना रहता है।

इस किताब मे तकनीकी शब्द संस्कृत के हैं – ऐक वर्तन्न (एक वर्तन – एक फेरा), तेरा, पंज़, सत्त, नववर्तन्न)। विकारों के चलते बोल चाल की तीन भाषाएं लूवियन, लीसियन, पैलई अस्तित्व में आ चुकी थी।

हत्ती राजा का अपने पड़ोसी मित्रों से राग विराग चलता रहता था। झगड़ा निपटाने के लिए हत्ती राजा सुप्रिय और मितन्नी सातिवाज के बीच संधि पत्र लिखा गया था जिसमे मित्र, वरुण, इन्द्र और नासत्या का साक्ष्य दिया गया था। इस प्रसंग में नीचे के वाक्य पर ध्यान दें:
The names of the Mitanni aristocracy frequently are of Indo-Aryan origin, and their deities also show Indo-Aryan roots (Mitra, Varuna, Indra, Nasatya), though some think that they are more immediately related to the Kassites.

(मितन्नी अभिजात वर्ग के नाम प्रायः भारतीय आर्य भाषा के (अर्थात् शुद्ध भारतीय) हैं और उनके देवनामों से मित्र, वरुण, इन्द्र, नासत्या से भी यही प्रकट होता है, यद्यपि कुछ लोग यह मानते हैं कि उनका निकटतम संबंध कस्सियों से है।) यहाँ जिन व्यक्ति नामों का हवाला है वे हैं सुतर्न (सुतर्ण) पर्शस्तर (प्रशस्तर), सौश्शतर,(श्रवस्तर) अर्थदाम (ऋतधाम), अर्तसुमर (ऋतस्मर) ,तुश्रथ (त्वेषरथ), मतिवाज, अर्तम्न (ऋतमन्) ,बर्दश्व (भृहदश्व), बिर्मशुर (ब्रहमेशवर), पुरुश (पुरुः), शैमशुर (श्रेमेश्वर), सतवाज,

इस पेंच को समझना आसान नहीं है। मितन्नियाे की कसों से निकटता तो थी, सच कहें तो मितन्नी भी कश थे।
They (Kassites) were settled primarily in Mitanni kingdom, and where they are found outside, there, they in areas especially affected by Mitennis political and cultural expansion. The Aryans appear in Mitanni from 1500 BC as the ruling dynasty , which means that they must first have entered the country as conquerors among the kings of dynasty one has a name which can be interpreted as aryan Abirattas (Burrow, 28)

मितन्नी उनका अपना नाम न था। यह नाम उन्हें मिस्र के राजा ने दिया था क्योंकि वह मित्र देश की यात्रा पर गए थे, उनका एक नाम नहरीन (नेहरू) भी था, क्योंकि उन्होने अपनी राजधानी वासुकनि खाबुर की एक सहायिका धारा वसु के किनारे पर बनाई थी। परन्तु कस क्या भारतीय नहीं थे।

बेबीलोन के कस्सी अभिलेखों (1750-1170) में आर्य भाषा की छाप है परंतु भाषा पहले की कई भाषाओं की मिलावट तथा उपस्तर के प्रभाव से इतनी विकृत हो चुकी थी उसे अजीबो-गरीब भाषा (linguistic isolate) माना गया क्योंकि उसे न तो इंडो-आर्यन कहा जा सकता है, न सामी न इंडौ-यूरोपीय। फिर भी कस्सियों को भारतीय आर्य भाषा बोलने वाला ही सिद्ध किया जा सकता था। इसलिए यदि इस निकटता को देखते हुए मितन्नियो को कस/ कश माने तो कोई आपत्ति नहीं होगी। परंतु ऊपरी सुझाव में जिस सचाई से बचने की कोशिश की गई है, सीधी पहचान को मिटाने की कोशिश की गई है, उसके परिणाम कल देखेंगे।

Post – 2019-12-10

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (35)
पश्चिम एशिया और भारतीय आर्य भाषा

आज मैं अपनी बात एक पुराण कथा से आरंभ करूंगा। आप चाहें तो इसे कल्पना के रंग में रंग कर प्रस्तुत किया गया इतिहास भी कह सकते हैं। रघुवंश का नाम आपने सुना होगा। रघुवंश के अनुसार रघु दिलीप के पुत्र थे। रामकथा के प्रसंग में पहले कह आए हैं वाल्मीकि रामायण के अनुसार वंशावली कुछ अलग है, इसके बाद भी यह प्रश्न बना रह जाता है कि यह वंश दूसरे किसी पूर्वज के नाम से न चल कर रघु के नाम से ही क्यों विख्यात हुआ। इस संदर्भ में हमने दो प्रश्न उठाए थे। एक का निष्कर्ष यह था कि रघुवंश की भोगोलिक पहचान साकेत और कोसल से जुड़ी है और इनकी पहचान के संदर्भ मे हमने रामकथा की परंपरा (24 और 25) में लिखा था:

”हमने पाया कि वे भारत में जब भी जहाँ से भी आए हों, भारत में वे भारतीय जातीय में वे यहाँ अनादि काल से हैं जो राम की पैतृकता को विवस्वान के पुत्र मनु से जोड़ता है और मध्येसिया के कश, कज्ज, शक उस शौर्य को दर्शाते हैं जो इनकी प्रकृति थी। सूर्यवंश सूर्य से उत्पन्न न था, न हो सकता था, परंतु शौर्य के लिए विख्यात था, इसका साहित्य गवाह है। अविजेय, अयोध्या उन्हीं की राजधानी हो सकती थी।”

“ठीक इसी की आवृत्ति हमें कोसल और साकेत में मिलती है। एक कस से दूसरी सक से। यहाँ याद दिला दें कि भोजपुरी और अवधी में ऊष्म ध्वनि केवल ‘स’ है। तालव्य ध्वनि मागधी की है और मूर्धन्य ‘ष’ कौरवी की। अतः सही उच्चारण कोसल, कासी, कस और सक है। कस और सक एक ही हैं, अक्षरों के फेर-बदल (वर्णविपर्यय) से दो हो गए।”

इस प्रसंग में कुछ और बातों पर ध्यान देना होगा। शतपथ ब्राह्मण में विदेघ माथव की सरस्वती तट से प्राण रक्षा के लिए पलायन करने की जो कथा है, उसमें विदे माथव को सदानीरा के पार जाकर इसलिए बसना पड़ता है, कि उससे पश्चिम की ओर कोसल राज्य है। सदानीरा ही दोनों की सीमा रेखा बनती है। इसमें हम कल्पना से यह जोड़ सकते हैं कि कोसल पहले से बसा हुआ था और उस पर उस सूखे का इतना गहरा असर नहीं पड़ा था जितना कुरुक्षेत्र और उससे आगे के भूभाग पर, और इसमें यह भी जोड़ सकते हैं की कौशल के लोगों को किसी दूसरे जन की घुसपैठ सह्य नहीं थी। जिस तर्क से अयोध्या का अर्थ अविजेय किया जाता उसी तर्क से उत्तर कोसल के लिए अवध नामकरण इसकी सुरक्षा के कारण अवध – अवध्य – पड़ा था।

अपने कुल के दूसरे पूर्वजों के होते हुए यदि आगे का नामकरण रघु के नाम पर हुआ, तो रघु ने अवश्य कोई असाधारण कार्य किया होगा जिसके कारण, उनकी कीर्ति बाद के वंशधरों के नाम से भी जुड़ी। राम राघव, ऱघुराज, ऱघुवीर हैं। रीति रघुकुल की मानी जाती है। यह मानते हुए भी कि रघु दिलीप के पुत्र हैं, कालिदास ने अपनी कृति का नाम रघुवंश रखा। रघु की कीर्ति उनके दिग्विजय से जुड़ी हुई है। दिग्विजय की कल्पना अपने समय के भारत के भौगोलिक ज्ञान की सीमा में कालिदास करते हैं, यवनों , कंबोजों पर उनकी विजय का भी उल्लेख करते हैं, परंतु चक्रवर्ती सिद्ध करने के लिए वह पूरब की दिशा में मुड़ जाते हैं। दक्षिण भारत की विजय कर चुके हैं । वह चक्रवर्ती बनने के लिए शास्त्रीय विजय तो पा लेते हैं, परंतु विजय यात्राओं के अनुरूप विजेता नहीं सिद्ध होते।

हम अब पश्चिम एशिया के इतिहास पर दृष्टि डाल सकते हैं। यहां कस जनों द्वारा बेबीलोन सहित उत्तरी इराक तक साम्राज्य स्थापित करने के सत्य को ले सकते हैं जिनके आधिपत्य का प्रमाण जिस काल में मिलता है उस समय तक उनकी भाषा इतनी बदल चुकी थी कि विज्ञानी उसे स्वविशिष्ट भाषा मान बैठते हैं। इनके विषय में विकीपीडिया की कुछ पंक्तियाँ ध्यान देने योग्य हैं:
The Kassites (/ˈkæsaɪts/) were people of the ancient Near East, who controlled Babylonia after the fall of the Old Babylonian Empire c. 1531 BC and until c. 1155 BC (short chronology). The endonym of the Kassites was probably Galzu, although they have also been referred to by the names Kaššu, Kassi, Kasi or Kashi.

उनकी भाषा के विषय में :
The language itself has been compared to several, such as Hittite and Elamite but genetically found wanting, possibly with the exception of the Hurrian language.
परंतु हुर्रयन कौन थे ?
The Hurrians (/ˈhʊəriənz/; cuneiform: 𒄷𒌨𒊑; transliteration: Ḫu-ur-ri; also called Hari, Khurrites, Hourri, Churri, Hurri or Hurriter) were a people of the Bronze Age Near East. They spoke a Hurro-Urartian language called Hurrian and lived in Anatolia and Northern Mesopotamia.

यहां ध्यान दें तो पाएंगे कि भारतीय ‘स’ ईरानी प्रभाव में ‘ ह’ हो जाता है। यदि वे अपने को हूरी कहते थे यह ऋग्वेद के सूरी हुए, और सूरी का अर्थ ऋग्वेद में उपासक किया गया है। हम इसमें एक शब्द जोड़ना चाहेंगे, वह है सूर्य। हुरी सूर्योपासक प्रतीत होते हैं। और यही सूर्यवंशियो की भी असलियत बयान करता है। सूर्यवंशी सूर्योपासक थे और यह संयोग ही है कि भोजपुरी क्षेत्र में सूर्योपासना की परंपरा आज तक बिना यह जाने कि
इसकी सार्थकता क्या है, आज तक बनी हुई है।

पंजाब में एक उपनाम सूरी है। हुरी इसी का अपभ्रंश लगता है। हुरियों के देवी देवता तक बदल चुके हैं। केवल एक देव ऐसा है जिससे भारतीय यथार्थ पर प्रकाश पड़ता है।
Kushuh, Kušuh; the moon god. Symbols of the sun and the crescent moon appear joined together in the Hurrian iconography. परन्तु अश्वपालन संबंधित शब्दावली मेल खाती है The terminology used in connection with horses contains many Indo-Aryan loan-words। इनके वहाँ इनकी बस्तियाँ आधुनिक ईराक, सीरिया और तुर्की में मिली है।

सूर्यवंशियों के बीच रामचन्द्र की उपस्थिति का रहस्य इससे समझा जा सकता है।

कस्सियों की भाषा में काफी विकार आया था परंतु उनके देवनाम वेदिक थे। इनमें आए विकारों को देखते हुए इस क्षेत्र में उनके प्रवेश का काल 2000 ई,पू. निर्धारित किया गया है। सूचना के इन तारो को मिलाने पर क्या चित्र उभरता है इस पर अभी कुछ न कहेंगे।

Post – 2019-12-09

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (34)
नवजागरण की प्रतीक्षा

सच अधूरा नहीं होता, वह केवल होता है। सच का कोई भी घटक अपने आप में पूरा सच होता है। जहां उसे नष्ट कर दिया जाता है वहाँ भी वह यह व्यक्त करता है कि वह किसी समग्र का टूटा हुआ हिस्सा है। वह स्वतः प्रमाण होता है। उसे प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। मूल रूप में इस बात की मांग करता है कि यदि उसे जानना है तो, उसके खोए हुए, बिखरे हुए, टूटे हुए, समग्र को खोजों, उससे मिलाओ, जोड़ो। जहां उसके अपने खंड मिलते हैं वहां एक दूसरे से इस तरह जुड़ जाते हैं कि उनको चिपकाने के लिए बीच में गोंद तक की भी जरूरत नहीं पड़ती। उनके बीच सुई तक घुसाने की फाँक नहीं बचती। सत्य आत्मदीप होता है।

प्रमाण की जरूरत झूठ के लिए होती है जिसके पास प्रमाणिकता का दावा होता है, दम नहीं होता। उन प्रमाणों के सिरे एक दूसरे से मेल नहीं खाते – अंतर्विरोधी होते हैं। कहावत है, झूठ के पांव नहीं होते। वह अपने दम पर खड़ा नहीं हो सकता। उसको टिकाए रखने के टेकों की जरूरत पड़ती है। वे टेक भी गढ़कर तैयार किए जाते हैं, इसलिए उनके भी पाँव नहीं होते, वे स्वयं भी टिक नहीं पाते, तनिक भी दबाव पड़ने पर लुढ़क जाते हैं और उन्ही के साथ वह वह पहला झूठ भी लुढ़क जाता है जिसे सहारा देने के लिए उसे गढ़ा गया था। इसलिए सहारा देने के लिए जिस झूठ को गढ़ा गया था उसे भी रुके रहने के लिए एक नए झूठ की जरूरत होती है। इस तरह झूठ को सच सिद्ध करने के लिए झूठ पर झूठ तैयार करने पड़ते हैं। इनकी ढेर लग जाती है, ढूह तैयार हो जाता है, परंतु वह किसी वास्तु का रूप नहीं ले पाता। सत्य के पिरामिड बनते हैं। झूठ का मलबा तैयार होता है और इसी को सच्चाई के ऊपर लाद कर एक ऐसा पहाड़ तैयार किया जाता है कि हम मलबे के उस पहाड़ को हटाने का साहस तक नहीं जुटा पाते। सोचते हैं कि मलबा हटाकर सत्य तक पहुंचने का रास्ता बनाया तो ऊपर का मलबा गिर कर हमें तो पीस देगा, पर सत्य सामने नहीं आ पाएगा। आत्मविश्वास की यह कमी भी उन्हीं के द्वारा पैदा की जाती है जो झूठ को सच और सच को झूठ सिद्ध करना चाहते हैं। जो लोग इसके बाद भी सच तक पहुँचने की ठानते हैं, उन्हें वे पागल करार देते हैं, बदनाम करते हैं, उनका उपहास करते हैं, उन्हें दंडित करते हैं। इसके विपरीत वे झूठ को स्वीकार कर लेने वालों को सम्मानित, पुरस्कृत और लाभान्वित करते हैं।

यही वह तरीका था, जिसका आविष्कार विलियम जोन्स ने किया था। इसके कारण सबसे पहले बंगाल के सुशिक्षित ब्राह्मणों ने यह सोचकर कि सत्ता के झूठ के सामने झुकना अधिक लाभकर है, इसे स्वीकार किया, इसके फायदे उठाए और एक आंतरिक उपनिवेशवाद आरंभ किया। इसे बंगाल पुनर्जागरण का नाम दिया गया। पुनर्जागरण के कुछ तत्व इसमें थे भी। पर क्या राजशक्ति का कारिंदा बन कर उसकी योजनाओं को क्रियान्वित करने और पुरस्कृत होने को नवजागरण कहा जा सकता है? जिसे बंगाल नवजागरण कहा जाता है, वह उपनिवेशवाद से अनुकूलित होकर, अपने लिए एक आंतरिक उपनिवेश कायम करने की कोशिश से आगे नहीं बढ़ पाया। बंगाल रेनेसां अपनी अंतर्वस्तु में अवसरवाद प्रतीत होता है। यह मेरा ख्याल है। इसकी गहराई से पड़ताल किए बिना कुछ कहने का अधिकार नहीं है, परंतु असंतुष्ट होने और अपनी आशंका प्रकट करने का अधिकार तो है ही।

इसका केवल एक उदाहरण देना चाहता हूं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह प्रस्ताव किसके द्वारा आया था, इसका भी सही हवाला नहीं दे सकता, परंतु आया था, और इसके अनुसार राष्ट्रीय ग्रंथागार की चार और शाखाएं खोलने की व्यवस्था की। इनमें से एक दिल्ली दूसरा मद्रास तीसरा मुंबई में खुलनी थी चौथे की मुझे याद नहीं। इसके अनुसार प्रकाशकों से यह अपेक्षा की गई थी कि वे जो भी पुस्तकें प्रकाशित करते हैं उनकी 5 प्रतियाँ इन पुस्तकालयों के लिए मुफ्त में भेजेंगे।

इसका विरोध करने वाले, सुनील कुमार चटर्जी थे। उनका तर्क था यदि राष्ट्र एक है तो पाँच राष्ट्रीय ग्रंथागार कैसे हो सकते हैं । जितनी अक्ल से ऐसे मामलों में अक्सर काम लिया जाता है , इस आपत्ति को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय ग्रंथागारों की योजना को समाप्त कर दिया गया। इस योजना को उन लोगों ने समाप्त किया, जो आगे चलकर इस देश में बहुत सारी राष्ट्रभाषाओं को स्वीकार करने जा रहे थे या कर चुके थे और हिंदी के लिए , जिसे राष्ट्रभाषा बनाने का अभियान स्वतंत्रता संग्राम का एक हिस्सा था, राज भाषा या राजकाज की भाषा का नाम चुना गया, और नाम ही रहने दिया गया। हर चंद कोशिश की गई कि राजकाज की भाषा भी न बनने पाए । इसके पीछे कौन लोग से, यह हमारे विचार की परिधि से बाहर है।

नवजागरण अपनी भाषाओं के माध्यम से आता है। ऐतिहासिक या भौगोलिक दृष्टि से दूर की कोई भाषा न नवजागरण की भाषा बन सकती है, न नए विचारों को उस पूरे समाज तक ले जा सकती है जो केवल अपनी मातृभाषा ही जानता है, और व्यापकतम साझेदारी के बिना नवजागरण नहीं आ सकता।

ऐतिहासिक या भौगोलिक दृष्टि से दूर (संस्कृत या अंग्रेजी) भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने के बाद संपन्न लोग इतना अधिक जाग जाएंगे कि अनिद्रा की बीमारी हो जाए, और बाकी समाज इस तरह सोया पड़ा रहेगा है कि उसकी आंख ही न खुले।

रामविलास जी ने, लगता है, बंगाली पुनर्जागरण की तर्ज पर ही हिंदी नवजागरण की अवधारणा पेश की। यह भी नवजागरण नहीं था। इसमें दिशा नहीं थी, सत्ता से मुक्ति की कामना मात्र थी। मुक्ति के बाद क्या? इसका खाका किसी के सामने नहीं था। भारतीय नवजागरण के अग्रदूत स्वामी दयानंद थे, परंतु उन्हें भी अपने पाँव टिकाने की जमीन तलाशते हुए, जो वेद मिला, वह इतना पीछे था कि वहां अपने पाँव टिकाने पर आप सतह से नीचे चले जाते हैं।

इसलिए अनेक दबावों और आघातों के बीच बदलाव हुए, परंतु नवजागरण आने ही नहीं पाया। इसकी एक ही संभावना थी। एक ही अग्रदूत था। उसकी सही पहचान नहीं हो पाई। वह हिंदू था और उससे पहले भारतीय था, उसके सामने हिंदू मुस्लिम का भेद नहीं था। अकेला वह (गांधी) था जिनके सामने भविष्य का एक खाका था। स्वतंत्रता की सही समझ थी और उसके लिए एक ऐसी कार्ययोजना थी जिसके माध्यम से भारतीय समाज के अंतिम सिरे तक चेतना का विस्तार किया जा सकता था। परंतु, भारतीय नवजागरण का हाल यह कि वह सुविधाओं के लिए सत्ता में जगह बनाने के लिए जोगाड़ करने के लिए बनी हुई एक राष्ट्रीय संस्था के माध्यम से अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए बाध्य हुआ जिसमें दूसरे सभी उनकी महिमा के आगे झुकने को तैयार थे, परंतु अंतर्मन से उनको समझने और उनके सुझाए रास्ते पर चलने को तैयार नहीं थे।

भारतीय मानसिकता की टोह लेने के लिए और कुछ छोटी-मोटी रियायतें देकर अपनी पकड़ मजबूत रखने के लिए कांग्रेस की स्थापना 1885 में की गई, गाँधी (1893 में) अफ्रीका पहुंचे थे और वहां पर उन्होंने स्वतंत्र रूप में एक ऐसा आंदोलन आरंभ किया जिसमें नवजागरण के सभी तत्व थे। परंतु, भारतीय नवजागरण का हाल यह कि देश आंतरिक विसंगतियों और विरोधों के चलते, औपनिवेशिकता से मुक्ति के एकमात्र लक्ष्य को पाने के लिए कई रास्ते अपनाता रहा। इनमें आवेश था, पर समझ का अभाव था। कांग्रेस स्वराज्य प्राप्ति का आंदोलन बन कर रह गई, सुराज का वाहक नहीं बन सकी। नवजागरण इस देश में हुआ ही नहीं। हम आज तक सोए पड़े हैं।

बौद्धिक नेतृत्व के लिए, हमें कल के उपनिवेशवादियों, और आज के वर्चस्ववादियों पर निर्भर रहना पड़ता है। सच कहें तो इस देश में ही नहीं, उपनिवेशवाद से मुक्त हुए सभी देशों में, यदि किसी आंदोलन की जरूरत है तो वह है नवजागरण का आंदोलन, परंतु उसकी नीव ही नदारद है। यह काम बौद्धिक वर्ग का होता है, जिसका अभाव है। अपनी प्रतिभा का सौदा करके उसका लाभ उठाने वाले बुद्धिजीवी वर्ग को जो सूचना के मामले में आगे होता है और चेतना के मामले में सबसे पिछड़ा होता है, हम बौद्धिक वर्ग समझ लेते हैं। चेतना ही न रही चढ़ि चित्त तो जो गति होनी वही गति है जी।

Post – 2019-12-07

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध(33)
आनुवंशिकी और भाषाविज्ञान

आनुवंशिकी की महिमा स्वीकार करते हुए भी, मैं अपने अध्ययन से भारतीय समाज रचना को जिस रूप में समझता हूं उससे यदि वह मेल न खाए तो उसे स्वीकार करने में संकोच होता है। इसके दो कारण हैं। एक तो आनुवंशिकी के अध्येताओं को एक सीमित नमूनों के विश्लेषण के आधार पर अपने निष्कर्ष निकालने होते हैं इनमें भौगोलिक और ऐतिहासिक दृष्टि से पर्याप्त नमूने सुलभ नहीं हो सकते। भाषा विज्ञान समाज रचना को समझने में आनुवंशिकी के अध्ययनों की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय प्रतीत होता है इसे समझने में पौराणिक वृत्त भी पूरक का काम करते दिखाई देते हैं। यह संतोष की बात है कि आनुवंशिकी के अध्ययनों से भी हमारी उन मान्यताओं की पुष्टि होती है जिन्हें हमने पहली बार 1973 में अपनी पुस्तक आर्य द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता में प्रकट किया था। उस समय तक पूरा चित्र मेरे सामने उतना साफ नहीं था जितना बाद के अध्ययनों से क्रमशः होता चला गया फिर भी यह सुझाया था कि भारत में असंख्य बोलियां बोली जाती थी और पारस्परिक संपर्क के चलते सभी में कतिपय समान लक्षणों का विकास हुआ था। सभी का रूप बदला । सामाजिक आर्थिक कारणों से इनमें कुछ का कुछ बडे़ क्षेत्रों में संपर्क के लिए व्यवहार होने लगा और इस क्रम में बहुत बड़े क्षेत्र में मानक भाषाओं का उदय हुआ जिनमें अलगाव के बाद भी बहुत गहरी साझेदारियाँ हैं।

भाषाओं में यह मेलजोल सामाजिक मेलजोल को प्रकट करता है। स्थायी बस्तियों बसाने से पहले उत्तर से दक्षिण तक ही नहीं किसी न किसी अनुपात में मध्यभारत से लेकर पश्चिम की ओर भूमध्य सागर तक एक विचरण क्षेत्र था। ब्राहुई पहाड़ियों के चरवाहे कुछ समय पहले तक मध्य एशिया से लेकर पश्चिमी पाकिस्तान के मैदानी भाग विचरण किया करते थे। आहार संग्रह के दिनों में यह विचरण क्षेत्र भूमध्य सागर तक पहुंचता था परंतु यह अपवाद था।

पर्वतीय बाधाओं के कारण केवल असाधारण स्थितियों में ही कोई जत्था अलग होकर दूर तक जाता था। इस तरह एक गहन संपर्क का क्षेत्र बनता था, और दूसरा शिथिल लेन देन का दायरा तैयार होता था। गहन संपर्क के भारत में 3 क्षेत्र थे। एक पूर्वी क्षेत्र था जिसका शिथिल संपर्क एक और को सुदूर दक्षिण पूर्व एशिया (न्यूगिनी) तक था। दूसरी ओर बर्मा से लेकर तिब्बत और चीन तक। इनमें जीवन यापन के दो आधार थे। एक मनुष्य से लेकर पशु तक का शिकार कर सकता था। दूसरा बागबानी और मछियारी के मामले में आगे था। सबसे प्रधान दो संपर्क क्षेत्र थे, जिनके लिए मद्रास इंडस्ट्री और सोन इंडस्ट्री का प्रयोग किया जाता रहा है। इनके औजारों में कुछ भिन्नता लक्ष्य की गई इन दोनों का संगम स्थल मध्य भारत था। दोनों के बीच दूसरों की अपेक्षा अधिक निकटता थी।

भारत की बोलियाँ में संपर्क के इन कसे और ढ़ीले धागों के कारण सामाजिक और भाषाई अंतः-संबंधों के कई तरह के दायरे बनते हैं। भाषा विज्ञान में आदान प्रदान के कुछ क्षेत्र मिलते हैं, जिनको समवाक क्षेत्र कहा जाता है। अर्थात इनमें भाषाएं अलग है, भिन्नता इतनी है कि उन्हें भाषा विज्ञानियों ने अलग अलग परिवारों का मान लिया। इसके बाद भी कुछ साझेदारियां ऐसी है जो इन सभी में देखने में आती हैं और इनकी विशेषता यह है कि ये परिवारों की सीमा तो लाँघ जाती हैं परंतु भारत की सीमा को नहीं लग पातीं। यहां हम भारत में अविभाजित भारत की बात कर रहे हैं जिसे दक्षिण एशिया जाने लगा है।

इसे लक्ष्य करते हुए इमेनो नाम के भाषा विज्ञानी ने भारत को एक-भाषाई-क्षेत्र (India as a Linguistic Area) घोषित किया था और भाषा परिवारों में विश्वास करने के कारण वह अपनी खोज को उसकी तार्किक परिणति पर नहीं पहुंचा सके थे।

हम कह सकते हैं कि भारत लगभग समान गुणसूत्रों वाला क्षेत्र है जिसमें आंतरिक भिन्नता पाई जा सकती हैं इसके बाद भी इन सब का एक संकुल बनता है जो किसी दूसरे से अलग है । और इसका आधार बहुत प्राचीन है।
अध्ययन और ज्ञान की दो शाखाएँ एक ही विषय पर निष्कर्षो पर नहीं पहुंच सकतीं। इसलिए मैं आनुवंशिकी के अध्ययन को विनम्रता पूर्वक स्वीकार करते हुए भी, अलग-अलग अध्ययनों में यदि अलग-अलग निष्कर्ष निकाले जाते हैं तो आनुवंशिकी के वे अध्येता मेरे लिए स्वीकार्य नहीं है जिनके निष्कर्ष भाषा के अपने निष्कर्षों से मेल नहीं खाते।

मुझसे एक गलती हो रही है। यह है भाषा को नृतत्व के निकट ले जाने की, जिससे नस्लवादी सिद्धांत पैदा होता है। परंतु हमारे भाषा वैज्ञानिक अध्ययन में भाषाओं के तत्व सभी में मिले दिखाई देते हैं इसलिए इसका सामाजिक संपर्क से संबंध होते हुए भी नस्ल से कोई संबंध नहीं है।

इस मामले में हमारे पुराण भी हमारी सहायता करते हैं जो यह बताते हैं कि देव और असुर एक ही प्रजापति की संतानें हैं, जिसका मेरे लिए अर्थ होता है कि वे एक ही जनजातीय पृष्ठभूमि से निकले हैं जिनमें सभी के तत्व सभी में विद्यमान हैं। एक ही आदि पुरुष की दो पत्नियों से उनका जन्म हुआ है। यहां पत्नियाँ जीववैज्ञानिक आशय में पत्नियाँ नहीं है बल्कि जीविका के दो रूपों से संबंध रखती हैं एक है कृषि उत्पादन, श्रम और उद्योग और दूसरा है प्रकृति पर निर्भरता और मौज-मस्ती।

सामाजिक मेल मिलाप कितना गहरा रहा है इसे एक उदाहरण से स्पष्ट करना चाहेंगे। बहुत प्राचीन चरण पर जब अंकगणना आदिम अवस्था में थी, एक के लिए ओं का प्रयोग होता था जिसका अर्थ ‘आदि, सबसे छोटा।. आदि के लिए प्र का प्रयोग किसी दूसरी में होता था। किसी तीसरी मे इक का। इक ने एक का रूप लिया, पर क्रमांक में प्रतम > प्रथम आ जाता है। प्र का ही किसी बोली में पह था जो पहल और पहला बना। एक से इकला/ एकला बनना चाहिए था। बना भी, चलन में भी रहा पर आपसी संपर्क से पहला एकता दोनों प्रयोग में रहे, फिर पहला भारी पड़ा, पर एक का एकमात्र में अकेला ही बचा। अं- का फर्स्ट प्र से निकला है जो लातिन और अं. में भी प्री/प्रो रूपों में पहुँचा। ओं >ओन/ ऊन के रूपों मे ढल कर एक ओर त- ओन्र -एक हुआ ऊन के रूप में संस्कृत में ही छोटा, कम या एक कम के आशय में जारी रहा। यह ऊनविंशत, उन्नीस आदि में देखा जा सकता है। लातिन मे और उसके माध्यम से अंग्रेजी में भी ओन/ऊन, वन, ओनली तथा यूनिट में बचा रहा। नव के लिए सही ऊनदश होना चाहिए था, पर ऊन वर्णविपर्यय (अक्षरों के उलटफेर) से नव हो गया। चेतना में यह बना रहा कि पहले यह ओं हुआ करता था। ओंकार के प्र-णव कहने के पीछे यही तर्क काम करता दिखाई देता है।

अभी कुछ विचारणीय पहलू और हैं। तीन से लेकर दस तक की सभी संख्याओं का अर्थ (सबसे बड़ी/ ऊँची या अंतिम भी रहा है। क्योंकि उन चरणों पर उन-उन से बड़ी संख्या की अवधारणा न थी। कहते हैं संख्याओं का विकास उंगली के पोरों, उँगलियों की संख्या, फिर अंगूठे सहित एक हाथ की उँगलियों की संख्या, दोनों हाथ गलियों और फिर हाथ पैर सभी की गलियों की संख्या के क्रम में विकसित हुई। इसमें मामूली सुधार की आवश्यकता हो सकती है। परंतु नामकरण के लिए सही ध्वनि का निर्धारण आसान नहीं था। षट – सत – शत तो मात्र सकार के तालव्य और मूर्धन्य भेद पर आधारित हैं। अष्ट तो षट ष्+अ+ट के ष-कार के स्वर-व्यंजन विपर्यय से बना है। यही परिवर्तन सत के साथ करने से अस्त बनता है जिसका अर्थ है अन्त/ सबसे बड़ा। यह अँगूठा छोड़ दोनों हाथों की उँगलियों की संख्या। इसके बाद अंगूठे सहित दोनों हाथों की उँगलियों की सबसे बड़े अंक की संभावना दिखी. इसके लिए सत अर्थात शत से काम चलाया गया। पहले शत का अंकमान 10 था। विंशत, त्रिंशत आदि में बचा रह गया। परंतु जब इन अंकों के जोड़ तोड़ से सबसे बड़ी संख्या 100 हो गई तो उसी शत का 100 के लिए प्रयोग करना पड़ा और 10 के लिए वर्ण विपर्यय से तश> दश का प्रयोग आरंभ हुआ।
हम फिर तीन पर लौटें जो त्रय या त्रि नहीं ती और ती था। इसका सबसे बड़ी संख्या के लिए प्रयोग जारी रहा लगता है और इसने भी 10 के अंक मान के लिए कभी जगह बनाई थी। 60 के बाद दाशमिक आशय में इसका प्रयोग किया गया -षष्-टि, असी-ति, नव-ति, अंग्रेजी में तो यह 20 से लेकर 90 तक की गणना में जारी रहा, इसका अर्थ है कि मानक संपर्कभाषा में भी बोलचाल के स्तर पर का चलन था।
रोचक है तेलुगू का ओकटि – इसमें संस्कृत का एक तमिल (ओन्र) के प्रभाव में ओक हो गया है, और इसमें वही ‘-टी’ जुड़ गया
जो बांग्ला में लालित्य के लिए लगाया जाता है परंतु, जिसका अर्थ था सबसे बड़ा। और यह बड़प्पन संस्कृत के इति में भी बचा है। इत्यादि में इति अर्थात अंत या सबसे बड़ा और आदि अर्थात्, आरंभिक/ सबसे छोटा, दोनों का योग दिखाई देगा। भाषा का विकास गुणसूत्रों से उभरने वाले चित्र की पुष्टि तो करता ही है उसकी विकास रेखा को भी समझने में मददगार होता है जो कि आनुवंशिकी के आधार पर संभव नहीं होता। इससे भी भारत से यूरोप की दिशा में प्रसार की वैसी ही पुष्टि होती है जैसे गुणसूत्रों के प्रवाह से।

Post – 2019-12-07

राजनीति करने वालों को मुख्यमंत्री का इस्तीफा चाहिए, वे दुखी नहीं हैं, उनकी लाटरी खुली है।
किसी ने नहीं कहा कि उस जज को सहअपराधी मान कर उसके विरुद्ध मुकदमा चलाया जाना चाहिए जिसने रेप के अपराधी को जमानत दी जब कि रेप के अपराधी हमेशा बदले की कार्रवाई करता है इस कारण ही रेप के मामले में जमानत पर रोक है।

Post – 2019-12-06

#इतिहास_की_जानकारी और #इतिहास_का_बोध (32)
पुराण भाषा विज्ञान और पुरातत्व -2

सूचना और ज्ञान का कोई क्षेत्र भरोसे का नहीं – वह व्यक्ति हो, ग्रन्थ हो या शास्त्र (ज्ञान की शाखा); फिर भी कोई ऐसा नहीं जो सत्य तक पहुँचने में सहायक नहीं। यहाँ तक कि झूठ और अफवाह तक सत्य की कई दबी परतों को समझने में सहायक होते हैं। सचाई पर परदा डालना और उस परदे को ही सचाई के रूप में पेश करना एक कला है। सभी कलाएँ सत्य को छिपाती भी हैं और उसकी गहराइयों को समझने में सहायक भी होती हैं; साथ ही छिपाने के पीछे काम करने वाले इरादों और ताकतों की भी सच्चाई को उजागर करती हैं। जैसे अन्य कलाओं को समझने के लिए उनके कला-विधान को जानना जरूरी होता है उसी तरह झूठ की इस कला को भी उसके विधान को समझकर ही सत्य तक पहुंचा जा सकता है।

हमारे अपने प्रसंग में विलियम जोंस ने एक झूठ को सचाई में बदलने का प्रयत्न किया। उसे विश्वसनीय बनाने के प्रयत्न में उस सचाई को ही नहीं प्रकट कर बैठे, अपितु एक ऐसे पक्ष पर भी प्रकाश डाल दिया जिस तक अन्य किसी स्रोत से पहुँचा ही नही जा सकता।

पूरे पश्चिमी जगत ने उस झूठ को सिर पर उठा लिया जिसे वह ठीक से गढ़ भी नहीं पाए थे । उनके अंतर्विरोध की ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया या ध्यान दिया भी तो उसे खतरनाक मानकर आगे कभी उसकी चर्चा ही नहीं की। कहावत है झूठ के पांव नहीं होते, इसलिए उसे खड़ा करने के लिए एक के बाद एक झूठों की मीनारें तैयार की जाती हैं। कुछ लोगों का ध्यान टेक के रूप में गढ़े हुए, नए झूठ के अंतर्विरोध की ओर जाता है और वे इसे मानने से इन्कार करते हैं तो, उनकी आवाज को दबा दिया जाता है। जो बातें असंभव प्रतीत होती हैं उनको चर्चा से बाहर कर दिया जाता है लेकिन कहानी नहीं बदली जाती।

हम ज्ञान की कुछ ही शाखाओं को आप्त मानते हैं। केवल कुछ ही नहीं, ज्ञान की सभी शाखाएँ आप्त होती हैं। स्वार्थी लोग, निजी या जातीय सरोकार से जुड़े हुए हों तो, उनकी आप्तता को नष्ट कर देते हैं। प्राचीन लोग इसे वाणी में पाप का प्रवेश कहते थे। पापियों के कारण कोई विधा, कोई अनुशासन, आप्त नहीं रह पाता; फिर भी उनमें से कुछ के आप्त होने की बात बार-बार की जाती है और कुछ को सिरे से अविश्वसनीय मान लिया जाता है। यहां हम उन्हीं की परीक्षा करेंगे।

पुरातत्व
पुरातत्व के क्षेत्र में आजीवन काम करने वालों को इसका पक्का भरोसा होता है कि पुरातत्व दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है। परंतु दूध का दूध पानी का पानी करने की जगह पानी इतना मिलाया जा सकता है कि दूध दूधिया पानी बनकर रह जाए। उनको भरोसा इस बात का होता है कि उनके सामने तो, टूटे-फूटे रूप में ही सही, पूरी संस्कृति उपस्थित है। समस्या वहां आती है जहां यह तय करना होता है यह संस्कृति किसकी है। आप की चीज को आपसे छीन कर कोई दूसरा व्यक्ति यह दावा तो कर ही सकता है कि यह आप की नहीं उसकी है। तय इससे होता है कि लाठी किसके हाथ में है। इस लाठी के बल पर ही पुरातत्व में जितना झूठ बोला गया है जितनी बातों को छुपाया गया है उतना अन्यत्र कहीं नहीं।

हड़प्पा की पूरी सभ्यता को पश्चिम के बहुत बड़े और ईमानदार कहे जाने वाले पुरातत्वविदों ने मिल कर इस तरह नष्ट किया कि केवल सभ्यता ही नष्ट नहीं की गई, पूरे समाज को धरती से मिटा दिया गया। सभ्यता का निर्माण करने वाले वालों के लिए यह सिद्ध करना मुश्किल हो गया कि यह सभ्यता उनकी ही है। उस कालावधि में हैवानियत की अवस्था में जीने वालों ने यह विश्वास दिलाने का सफल प्रयास किया कि अपने को सभ्य कहने वाले लोगों ने उस सभ्यता का निर्माण किया ही न होगा क्योंकि वे तो उनके घर से आए थे उनके जैसे ही हैवान थे। सभ्यता से नफरत करते थे। उन्होंने ही उस सभ्यता को जिसे वे अपनी मानते आए थे नष्ट किया था। अगला व्यंग्य यह कि उन सभ्यताद्रोही लोगों ने भारत में सभ्यता की आधारशिला रखी।

जिस शाखा में इतनी बेसिर पैर की बातें की जा सकती हों, क्या उसे पुराणों से अधिक विश्वसनीय माना जा सकता है? अपराध पुरातात्विक वस्तुओं का नहीं है। अपराध वर्चस्व कामना से और औपनिवेशिक स्वार्थों से ग्रस्त समाज का है। जिस तरीके से संस्कृत भाषा और संस्कृत भाषियों को इस देश से उजाड़ कर अज्ञात देश में फेंक दिया गया था, उसी तरह इस सभ्यता को भी उन्होंने भारतवासियों से छीन कर अज्ञात लोगों के हवाले कर दिया जो कहां रहते थे, कब और क्यों आए थे, कैसे उस अवस्था तक पहुंचे थे, इसे कोई नहीं जानता था, न जान सकता था।

पुराण
पुराण तो अपने झूठ के लिए बदनाम हैं ही। उनमें पुरातत्व से कम बे सिर पैर की बातें तो हो ही नहीं सकती। उनमें अकेला एक आदमी, बिना किसी की सहायता के, शौर्य के लिए ही जाने जानेवाले क्षत्रियों का पूरी दुनिया से संहार कर देता है। एक बार पूरा संहार कर देने के बाद तो संहार करने को कुछ बचा ही नहीं रहना चाहिए, पर इक्कीस बार यही काम करता है, और आकाश के तारे गिनने वालों को इस गणित में कहीं कोई कमी नहीं दिखाई देती। वचन मात्र से असंभव को संभव करने की शक्ति का दावा करने वालों ने ऐसी अनगिनत कहानियां पुराणों में भर रखी हैं और ज्ञानी से लेकर अज्ञानी तक इनमें विश्वास करता चला आया। जितनी असंभव बातें पुरातत्व में की जा सकती है उनसे अधिक पुराणों में की जा सकती है। लोग दोनों पर विश्वास भी करते रहे, यह हमारी बुद्धि का कमाल है।

परन्तु यदि हम पौराणिक वृत्तों के कला विधान से परिचित हैं तो उन हास्यास्पद अतिरंजित कहानियों के पीछे बौद्धमत के प्रभाव के कारण ब्राह्मणों की उपेक्षा का सत्य भी सामने आएगा जो इस दौर के सामाजिक इतिहास को समझने के लिए जरूरी है; यज्ञ मंत्र की प्रभावकारिता में सामाजिक विश्वास के उठ जाने के बाद, ब्राह्मण का शाप और आशीर्वाद – वाचि वीर्य द्विजानाम् – के प्रभाव की कहानियाँ गढ़ कर, इन्हें धर्म और पुण्य के काम बताते हुए लगातार दुहराते हुए समाज को सम्मोहित करके अपनी साख जमाई गई। बुद्ध को और बौद्धों और श्रमणों समाज की नजर में गिराने के लिए किस किस तरह की कहानियां रची जाती हैं, कैसी गालियां आविष्कार की जाती हैं, इसे हम पुराणों की गहराई में उतर कर ही समझ सकते हैं।

परंतु पुराण कथाएं केवल पुराणों में नहीं मिलतीं। ऋग्वेद में, संहिताओं में ब्राह्मणों और उपनिषदों में, यहां तक कि पंचतंत्र की कहानियों में, महाभारत में भी पौराणिक वृत्तांत बिखरे हुए हैं।

इनसे प्राचीनतम अवस्थाओं से लेकर बाद के विकास का जो सामाजिक इतिहास सामने आता है वह उनकी सहायता के बिना संभव ही नहीं है। कहें पुराण के झूठ का भी अपना सच है और उसके सही विवरणों का भी इतिहास है। जिस विवेक की आवश्यकता पुरातत्व की उपादान संस्कृति को समझने में होती है उसी की आवश्यकता पुराणों से इतिहास का सच बाहर लाने में होती है।

आनुवंशिकी
जर्मनों को अपने से नीचा दिखाने के लिए फ्रांसीसी विद्वानों ने उनके सिर की बनावट, आँखों और बालों के रंग आदि की तुलना करते हुए उन्हें संकर नस्ल का सिद्ध करने के लिए जिन फब्तियों का आरंभ किया उसका विकास नृतत्व में हुआ और भाषा विज्ञान से कुछ बाद में आरंभ हुआ यह अध्ययन उतनी ही तेजी से लोकप्रिय हुआ और इसकी शाखाएंँ प्रशाखाएँ पैदा हो गईं।

आगे चलकर इसने अधिक वैज्ञानिक आधार लेते हुए इसी नेआनुवंशिकी की नीव रखी, जिसे हाल के दिनों में इतनी विश्वसनीयता मिली है कि इनके आधार पर किसी व्यक्ति का हजारों साल पहले का इतिहास अर्थात उसका आनुवंशिक संबंध तैयार किया जा सकता है। जहां इस रूप में इसे चुनौती नहीं दी जा सकती, वहीं इतिहास और समाज रचना को समझने में इसका सीधा उल्टा एक समान इस्तेमाल किया जा सकता है। हेंफिल के दल ने व्यापक जांच करने के बाद (1991) नतीजा निकाला था कि 4500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व के बीच न तो भारत से बाहर किसी बड़े पैमाने पर निर्गमन हुआ, न ही आगमन हुआ। इससे दो बातें एक साथ सिद्ध हुईं। पहली यह कि भारत पर आर्यों के आक्रमण की कहानी बकवास है। दूसरी, हड़प्पा सभ्यता का निर्माण तथाकथित आर्यों ने किया है।

इसके बाद 2001 और 2003 में आनुवंशिकी के 3 अध्ययनों को यह सिद्ध करने के लिए कि इनकी यात्रा पश्चिम से पूर्व की ओर हुई है और भारतीय आबादी में उनसे मिलते-जुलते कुछ भेदक गुण सूत्र मिलते हैं, विटजेल द्वारा दबे हुए स्वर में आर्यों के आक्रमण की दलील तलाश की गई। कुछ अध्ययनों से यह प्रमाणित हुआ कि भारत में आनुवंशिक आधार पर उत्तर और दक्षिण आर्य और द्रविड़ के बीच कोई भेद नहीं। हाल में राखीगढ़ी के अवशेषों के अध्ययन से एक दल ने यह नतीजा निकाला कि यह सभ्यता पूरी तरह भारतीय है, मध्येशिया से इसका कोई संबंध नहीं है। इस तरह के निष्कर्षों के पीछे कई तरह की सीमाएं होती है परंतु नितांत निजी में और व्यापक सामुदायिक निष्कर्षों के रूप में आनुवंशिकी का निष्कर्ष वही होता है जिसे दूसरे स्रोतों से सही पाया जाता है। अब तक का सबसे विश्वसनीय अध्ययन हमें Toomas Kivisild, Surinder S. Papiha, Siiri Rootsi, Jüri Parik, Katrin Kaldma, Maere Reidla, Sirle Laos, Mait Metspalu, Gerli Pielberg, Maarja Adojaan, Ene Metspalu, Sarabjit S. Mastana, Yiming Wang, Mukaddes Golge, Halil Demirtas, Eckart Schnakenberg, Gian Franco de Stefano, Tarekegn Geberhiwot, Mireille Claustres & Richard Villems के द्वारा 2000 में किया गया अध्ययन An Indian Ancestry: a Key for Understanding Human Diversity in Europe and Beyond प्रतीत होता है, जिसके निष्कर्ष निम्न प्रकार हैं:

Summing up, we believe that there are now enough reasons not only to question a ‘recent Indo-Aryan invasion’ into India some 4000 BP, but alternatively to consider India as a part of the common gene pool ancestral to the diversity of human maternal lineages in Europe. Our results on Y-chromosomal diversity of various Indian populations support an early split between Indian and east of Indian paternal lineages, while on a surface, Indian (Sanskrit as well as Dravidic speakers) and European Y-chromosomal lineages are much closer than the corresponding mtDNA variants.